शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

ये सफर अभी लंबा, कष्टदायक है

- कार्टून गूगल बाबा
कवि दुष्‍यंत कुमार ने अपनी एक मशहूर कविता में लिखा है, ‘तू किसी रेल-सी गुजरती है, मैं किसी पुल-सा थरथराता हूं।’ इसी कविता में वे आगे लिखते हैं, ‘एक बाज़ू उखड़ गया जबसे और ज्‍़यादा वज़न उठाता हूं।’ भारतीय रेल की हालत कुछ ऐसी ही है। अकुशलता और कमजोर प्रदर्शन की बीमारी से रेलवे का एक हाथ खराब हो चुका है, ऊपर से यात्री और माल ढुलाई का ट्रैफिक में बड़ी बढ़ोतरी हुई है। रेल मंत्री सुरेश प्रभु से उनके दूसरे बजट में इस बात की उम्‍मीद नहीं थी कि वे यात्री किराया बढ़ाएंगे। असल में जंग खाते डिब्‍बों वाली उनकी रेल खस्‍ताहाल पटरियों पर पिछले साल धड़धड़ाते हुए दौड़ी और तत्‍काल शुल्‍क से लेकर सर्विस टैक्‍स और ऊंचे दर्जे के किराए में संसद और बजटीय प्रक्रियाओं को दरकिनार कर कुल 4.35 फीसदी के इजाफे से लोग थरथराते रहे। पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट सुरेश प्रभु से उम्‍मीद की गई थी कि वे अपने महकमे के संचालन अनुपात यानी 100 रुपए कमाने में खर्च हो रहे 97.8 रुपए के खर्च को कम करने के प्रयास करेंगे। लेकिन 2016-17 के रेल बजट में उन्‍होंने इस खर्च को 92 प्रतिशत तक ला पाने की उम्‍मीद जताई है। इसके लिए उन्‍होंने यात्री और माल भाड़े में इजाफा नहीं किया है। आप इसे बेशक राहत की बात मानें। लेकिन मेरे लिए व्‍यापार करने वाली सरकार से किसी भी तरह की रियायत की उम्‍मीद नहीं करनी चाहिए। बीते वित्‍त वर्ष की तरह प्रभु नए साल में भी जब चाहें भाड़ा बढ़ा सकते हैं और इसके लिए उन्‍हें सिर्फ अधिसूचना जारी करनी होगी। कोई उनसे सवाल-जवाब नहीं करेगा। 

प्रभु के सामने इस साल के रेल बजट की तैयारी करने से पहले तीन अहम सवाल होने चाहिए थे। 1. रेलवे की कमाई कैसे बढ़ाई जाए 2. रेलवे को केंद्र सरकार से मिलने वाली बजटीय सहायता राशि में 30 प्रतिशत की कटौती को देखते हुए खस्‍ता माली हालत को सुधारने के प्रयास क्‍या हों और 3. रेलवे को बाहरी निवेश के माकूल कैसे बनाया जाए। नए रेल बजट में इन तीनों सवालों के जवाब नदारद हैं। रेलवे की पूंजीगत योजना 1.21 लाख करोड़ रुपए की है, जो कि 1.25 लाख करोड़ के अनुमान से कहीं कम है। रेलवे को सातवें वेतन आयोग को लागू करने पर वेतन और पेंशन के रूप में सालाना 33 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्‍त खर्च भी उठाना है। केंद्र सरकार को इस साल के लिए दिए जाने वाले 8000 करोड़ के लाभांश का बोझ अलग से है, जिसे रेलवे ने अपनी खस्‍ता माली हालत पर रहम करते हुए आधा करने की गुजारिश संसदीय समिति से की थी, लेकिन उसे बेरहमी से ठुकरा दिया गया। औद्योगिक मंदी और माल ढुलाई की मांग न बढ़ने का असर भी पड़ा है। इतनी खराब हालत के बाद भी रेल मंत्री ने सदन में अगले पांच साल में रेल ढांचे के आधुनिकीकरण में 8.5 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की बात कही है। इसमें से 1.5 लाख करोड़ रुपए भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) से आएगा, जो कि जनता जनार्दन की गाड़ी कमाई का पैसा है और रेलवे इस पैसे को 8.5 या 9 प्रतिशत की ब्‍याज दर पर लेगी। रेल मंत्री के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि रेलवे की मौजूदा हालत को देखते हुए इस जोखिम को कैसे कम किया जाएगा। केवल रेल्‍वे ही क्‍यों, किसी भी सार्वजनिक निकाय की खस्‍ता माली हालत को देखते हुए निजी क्षेत्र उन पर पैसा लगाने को राजी नहीं हो रहा है। आखिर में सरकार एलआईसी के कान खींचकर पैसा लगाने को कहती है। साफ है कि रेल मंत्रालय बाहरी निवेशकों का भरोसा कायम करने में नाकाम रहा है।

रेल मंत्री ने अपने बजट भाषण में अगले साल 10 प्रतिशत ज्‍यादा कमाई की उम्‍मीद जताई। वे बड़ी चालाकी से यह बात छिपा गए कि पिछले वित्‍त वर्ष में यात्री और माल भाड़ा दोनों में रेलवे की कमाई लक्ष्‍य से कहीं कम रही है। देश में रेल्‍वे के 40 फीसदी सेक्‍शनों में क्षमता का 100 फीसदी या उससे कहीं ज्‍यादा भार है। वहीं सबसे व्‍यस्‍ततम सेक्‍शनों में 65 प्रतिशत पटरियां क्षमता से ज्‍यादा भार ढो रही हैं। विश्‍व बैंक ने 2012 के एक आंकलन में बताया था कि चीन का रेल मंत्रालय अपने हर मुसाफिर के टिकट पर हमसे तीन गुना ज्‍यादा कमाता है। वहीं माल ढुलाई में भी चीन भारतीय माल भाड़े से आधी दर पर ज्‍यादा मुनाफा कमा रहा है। यह कमाल रफ्तार, समय की पाबंदी और बेहतरीन सुविधाओं के चलते होता है। भारतीय हालात को देखें तो हमारे पैसेंजर ट्रेनों की औसत रफ्तार 36 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्‍यादा नहीं है। सुपरफास्‍ट कहलाने वाली रेल गाड़ियां महज 56 किलोमीटर की औसत रफ्तार से दौड़ती हैं। मालगाड़ियों की औसत गति तो 26 किलोमीटर प्रति घंटा ही है। चीन की ट्रेनें भारतीय रेल से दोगुनी रफ्तार से भागती हैं। बावजूद इसके, रेल मंत्री ने पिछले साल देशवासियों को बुलेट ट्रेन का ख्‍वाब दिखाया और इस साल चुप बैठ गए। रेलवे के पास इस समय नई रेल लाइनों, आमान परिवर्तन और लाइनों के दोहरीकरण की 362 परियोजनाएं लंबित हैं। अगले तीन से पांच साल में इन्‍हें पूरा करने के बाद ही रेल्‍वे को किसी नई परियोजना के बारे में सोचना चाहिए। हालांकि, ऐसा हो नहीं रहा है। रेल मंत्रालय उन स्‍वीकृत परियोजनाओं पर भी खर्च नहीं कर पा रहा है, जिनके लिए उसके पास पर्याप्‍त धन है। फिर भी रेल मंत्री ने इस साल 2500 किलोमीटर की ब्रॉड गेज लाइन बिछाने की घोषणा की है।

रेल मंत्री के रूप में सुरेश प्रभु ने अपनी सजगता के मामले में प्रधानमंत्री को भी पीछे छोड़ दिया है। देश का कोई भी नागरिक उन्‍हें सीधे ट्वीट कर शिकायत कर सकता है। सवाल यह उठता है कि क्‍या उनकी तरह रेल मंत्रालय के बाकी अधिकारी भी उतने ही सजग हैं ? ट्रेनों की लेटलतीफी, रोलिंग स्‍टॉक के रखरखाव, महिलाओं-बुजुर्गों की सुरक्षा के मामले में लापरवाही और टिकटों की कालाबाजारी को बढ़ावा देने के मामले किसी के लिए भी नए नहीं हैं। रेल्‍वे के अच्‍छे ‘पहरेदार’ के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि जिन यात्री सुविधाओं की वे बजट में घोषणा करते हैं, उनमें से कितनी जमीन पर स्‍थायी रूप से लागू होती हैं। सुरक्षा के सवाल पर रेल मंत्री देश के प्रमुख स्‍टेशनों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने का ऐलान किया है, लेकिन उन पर लगातार निगाह रखने वाली चौकस निगाहों और संकट की स्‍थिति में तुरंत कार्रवाई की चपलता वे कहां से लाएंगे ? बुलेट ट्रेन क्रांति की उम्‍मीद जगाए बैठे भारतीय जनता को रेल मंत्री और प्रधानमंत्री से यह सवाल पूछना चाहिए कि अगर भारतीय ट्रेनें समय से चलें, मुसाफिरों को ज्‍यादा इंतजार न कराएं, उन्‍हें न्‍यूनतम समय पर मंजिल तक पहुंचा दें तो फिर स्‍टेशनों पर फाइव स्‍टार विश्राम गृह, कैफेटेरिया वगैरह की जरूरत ही न पड़े। इस बार के रेल बजट से यह भी उम्‍मीद थी कि रेल मंत्री यात्रियों की लंबी प्रतीक्षा सूची को देखते हुए रेलगाड़ियों में डिब्‍बे बढ़ाने का ऐलान करेंगे। लेकिन फिलहाल देश के कई प्रमुख स्‍टेशनों में 22 से ज्‍यादा डिब्‍बे की गाड़ी बमुश्‍किल प्‍लैटफॉर्म पर खड़ी हो पाती है। अलबत्‍ता रेल मंत्री ने जन साधारण के लिए अंत्‍योदय एक्‍सप्रेस और ऊंचे तबके के लिए वातानुकूलित हमसफर एक्‍सप्रेस चलाने का ऐलान किया है। मौजूदा क्षमता से 40 फीसदी ज्‍यादा मुसाफिरों को ढोने वाली उत्‍कृष्‍ठ डबल डेकर ट्रेनें एक अच्‍छी योजना है, बशर्ते कि सड़क परिवहन से मुकाबले में ये खरी उतर सकें।

रेल मंत्री ने अपने महकमे के कायाकल्‍प के लिए 2020 तक का समय मांगा है। अगले आम चुनाव 2019 में होने हैं। परंपरागत रूप से सरकारें अपने लिए पांच साल तक का ही जनमत मांगती रही हैं। केंद्र की एनडीए सरकार और रेल मंत्री दोनों इससे कहीं आगे का समय मांग रहे हैं। अगर रेलवे की यही मौजूदा हालत आगे भी रही तो निश्‍चित रूप से देशवासियों के लिए यह बेहद लंबा और कष्‍टदायक सफर होगा।