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रविवार, 7 अप्रैल 2013

सूखे की बिसात पर पानी की राजनीति

फिर भी हंस रही है मूर्ख अवाम





सूखा कुदरती नहीं, जमीनी आफत है। यह देश के मूर्धन्‍य योजनाकारों की दिमागी गफलत है। इसे अजित पवार जैसे भ्रष्‍ट राजनेताओं की काली कमाई का जरिया कहा जाना चाहिए, जो 70 हजार करोड़ रुपए का सिंचाई घोटाला करने के बाद भी बेशर्मी से कुर्सी पर जमे रहते हैं। महाराष्‍ट्र के उप मुख्‍यमंत्री अजित पवार मूल रूप से धंधेबाज राजनेता हैं। उन्‍हें कुर्सी पाने के लिए कुछ भी करने से कोई गुरेज नहीं। और फिर कुर्सी मिलने के बाद बजाय सूखे से निपटने के यह कहने से भी कोई परहेज नहीं कि राज्‍य के बांधों में पानी नहीं है तो क्‍या मैं उसमें पेशाब करूं ?

शरद पवार के भतीजे अजित ने यह बात ऐसे समय पर कही है, जब महाराष्‍ट्र के 34 जिले 1972 के बाद सबसे भीषण सूखे का सामना कर रहे हैं। लेकिन कुल 62 फीसदी बारिश के बाद इस तरह के सूखे की आशंका नहीं होती। लोग रेलगाड़ियों के शौचालय की टंकी से अपने बर्तन भर रहे हैं। यह नौबत आई है, राजनेताओं, नौकरशाहों और उद्योगपतियों की मिलीभगत से। देशभर में कुल बांधों का 36 फीसदी महाराष्‍ट्र में है। लेकिन इनके पानी पर पहला हक उद्योगों, पावर प्‍लांट्स को, फिर रसूखदार बड़े किसानों को और सबसे आखिर में प्‍यासे लोगों का है। यही है अजित पवार जैसे शातिर और भ्रष्‍ट राजनेताओं की नीति, जो बांध बनाने की जिद पूरी करने एड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं। इसलिए, क्‍योंकि अरबों के प्रोजेक्‍ट से बड़े-बड़े ठेकों में करोड़ों तो जेब में आ ही जाते हैं। इन बांधों से हजारों परिवार जमीन से उजड़ते हैं और उन्‍हें मुआवजे के खेल में फिर तिजोरियां भरी जाती हैं।
           

महाराष्‍ट्र जल संसाधन नियामक प्राधिकरण के 2005 में बने कानून में साफ लिखा है कि सूखा पड़ने पर नदी परियोजनाओं के पानी का बराबर बंटवारा होगा। लेकिन पिछले साल जब औरंगाबाद में गोदावरी पर बने जयकवाड़ी बांध में जब दो फीसदी पानी बचा था तो पुणे और नाशिक में ऊंचाई पर बने बांधों से पानी नहीं छोड़ा गया। यही हाल दक्षिण महाराष्‍ट्र में उजनी बांध का भी हुआ, लेकिन तब भी पानी नहीं मिला। बाद में जब शोलापुर के किसानों और एनजीओ ने हल्‍ला मचाया तो नवंबर के आखिर में सीएम पृथ्‍वीराज चौहान ने पानी छोड़ने को कहा। लेकिन उजनी बांध को अभी भी पानी नहीं मिला है, क्‍योंकि ऊपर के चार बांधों के पानी पर पिंपरी-चिंचवाड़ के उद्योग और नीचे ताकतवर शकर लॉबी अपना हक जताते रहे हैं। जयकवाड़ी बांध भी पिछले 10 साल से पूरा नहीं भर पाया है, क्‍योंकि सरकार पानी का एक समान वितरण नहीं करना चाहती। योजनाकारों की बेवकूफी इस बात से झलकती है कि नई सरकारी योजनाओं के लिए पानी के स्रोत पहले से सूखे जयकवाड़ी और उजनी बांधों को माना गया है। इन हालात में भी अजित पवार जैसे नेता कमाई की जुगाड़ बिठाने में लगे हैं। पवार का कहना है कि वे कर्नाटक के अलमाटी बांध से पानी का इंतजाम करेंगे। जाहिर है, इसके लिए फिर अरबों खर्च होंगे और घपले-घोटालों में उन्‍हें भी हिस्‍सा मिलेगा।

सरकार कानून बना देती है, लेकिन उसे लागू करने के लिए नीतियां नहीं बनातीं। अगर बनाती भी है तो इतनी लचर कि कोई भी अपने फायदे के लिए उसमें सेंध मार सके। महाराष्‍ट्र का सिंचाई कानून (1976) कहता है कि सिंचाई परियोजनाओं के तमाम कमांड एरिया को अधिसूचित करना जरूरी है। लेकिन आज 37 साल बाद भी इसके लिए नियम नहीं बने। इसलिए नहीं बने, ताकि सिंचाई और पीने के लिए पानी के उपयोग को बदलकर उद्योगों को पानी दिया जा सके। सिंचाई विभाग के पास पानी के उपयोग को बदलने से रोकने का हक नहीं है। लोगों को नियम-कानून का पता नहीं है और मुख्‍यधारा की मीडिया उन्‍हीं ताकतवर लोगों के हाथ में है जो प्‍यासी अवाम से पानी का हक छीनना चाहते हैं। पानी के बंटवारे को नियंत्रित करने के लिए महाराष्‍ट्र राज्‍य जल बोर्ड और जल प्राधिकरण बने हैं, लेकिन पिछले आठ साल से इनकी एक भी बैठक नहीं हुई। तो सूखा कुदरत ने पैदा किया है या उन भ्रष्‍ट नेताओं ने, जो उद्योगों से अपना हिस्‍सा लेकर सूखे जैसे हालात पैदा करते हैं।

जब सरकार निकम्‍मी हो तो अवाम अपने हिसाब से इंतजाम करती है। हमारी 90 फीसदी अवाम मूर्ख है (मार्कंडेय काटजू को कोट करते हुए- कई बार लगता है कि वे ही सही हैं)। इतनी मूर्ख कि जिस डाल पर बैठी हो, उसे काटने से जरा भी संकोच नहीं होता। सरकार भी बड़ी चालाकी से इस मूर्खता पर हंसते हुए उनकी पीठ थपथपाती है। शोलापुर का गांव घोटी। गांव में कुल 3000 लोग रहते हैं, लेकिन ट्यूबवेल हैं 6000, यानी प्रति व्‍यक्‍ति दो ट्यूबवेल। इसलिए, क्‍योंकि 40 हेक्‍टेयर रकबे में खड़ी गन्‍ने की फसल को बचाना ज्‍यादा जरूरी है। ये ट्यूबवेल पिछले दो साल में खुदे हैं, क्‍योंकि उजनी बांध सूख गया है। लोगों की बेवकूफी को ‘सलाम’ करते हुए महाराष्‍ट्र सरकार ने पास में ही शकर के दो कारखाने भी लगा दिए। अब किसान गन्‍ना न उगाएं तो खाएं क्‍या ? लेकिन इसका खामियाजा उन्‍हें भुगतना पड़ रहा है। भू-जलस्‍तर 200 मीटर नीचे चला गया है। लातूर जिले में भी यही हाल है। लोग ताबड़तोड़ बोरवेल खोद रहे हैं। किसी किसान ने तो महज 2.5 हेक्‍टेयर खेत में 6 बोरवेल खोद दिए। किसी में तो पानी आएगा।

इसमें कोई शक नहीं कि इस मृत्‍युलोक में पानी ही जीवन है, पर महाराष्‍ट्र में लोग यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि पहले किसकी प्‍यास बुझाई जाए, अपनी या खेतों की ? महाराष्‍ट्र के 6 फीसदी हिस्‍से में गन्‍ने की खेती होती है और अगर कोई किसान एक हेक्‍टेयर में गन्‍ना बोता है तो उसे इतने पानी की जरूरत होगी कि खेत के बाकी हिस्‍सा सूखा ही रह जाएगा। असल में महाराष्‍ट्र के तमाम बांधों में जमा कुल पानी अकेले गन्‍ने के खेत ही पी जाते हैं। ऐसे में बाकी फसलों को पानी कैसे मिले ? अगर उन्‍हें पानी नहीं मिले तो फसल कैसे पैदा हो और चारा कहां से आए ? महाराष्‍ट्र के सूखाग्रस्‍त इलाकों में चारे की कीमत गन्‍ने से चार गुनी ज्‍यादा हो गई है। 1999 से लेकर अब तक महाराष्‍ट्र में चार अलग-अलग रिपोर्टों में सरकार से गन्‍ने की खेती को बढ़ावा न देने और फलियों व तिलहन जैसी परंपरागत फसलों की खेती की सिफारिश की गई, पर ये सारी रिपोर्टें कूड़ेदान में हैं। वजह- राज्‍य के 30 मंत्रियों में से 13 या तो शकर कारखाने के मालिक हैं, या फिर वे शकर की सहकारी समितियों के कर्ताधर्ता हैं। नतीजा- 1999 में महाराष्‍ट्र में 119 शकर कारखाने थे। अब 200 हैं। सारी शकर निर्यात होती है। एक टन गन्‍ने की पिराई में 400 लीटर पानी खर्च होता है। यानी खेत तो पानी पी ही रही है, शकर कारखाने भी जमकर पानी पी रहे हैं। बांधों का 90 फीसदी पानी दोनों मिलकर पी जाते हैं। शकर ने सिर्फ पानी पर ही नहीं, गांव की समूची व्‍यवस्‍था पर डाका डाला है। गांव में कौन सरपंच होगा, किसको ठेके मिलेंगे, पानी पर हक किसका होगा सारी बातें शकर लॉबी तय करती है। इस साल सूखा है तो क्‍या ? शुगर लॉबी के पसंदीदा ठेकेदार खाली थोड़े ही बैठे हैं। उन्‍हें पशु चारा बांटने का ठेका मिला है। इससे समझा जा सकता है कि गांव के स्‍तर से भ्रष्‍टाचार की नाली कैसे अजित पवार जैसे नेताओं के बंगले तक पहुंचती है। पुणे की संस्‍था प्रयास की रिपोर्ट बताती है कि 2010 तक महाराष्‍ट्र सरकार ने बांधों का 54 फीसदी पानी उद्योगों को दिया है। पीने के लिए जो 46 फीसदी पानी दिया गया है, उसमें भी 96 फीसदी हिस्‍सा शहरों का और एक प्रतिशत गांवों का है।

इन सबके बावजूद महाराष्‍ट्र सरकार राज्‍य के इन्‍हीं सूखाग्रस्‍त इलाकों में 140 थर्मल पावर प्‍लांट की रूपरेखा तैयार कर चुकी है। इनसे कुल 55000 मेगावॉट बिजली बनेगी। लेकिन अगर इस साल भरपूर बारिश नहीं हुई तो न सिर्फ चंद्रपुर सुपर थर्मल प्‍लांट, बल्‍कि स्‍टील प्‍लांट भी बंद होने की कगार पर होंगे। कुछ उद्योगों ने अपना निजी बांध और वॉटर हार्वेस्‍टिंग के जतन शुरू किए हैं। कुछ उद्योग तो टैंकरों से पानी मंगवा रहे हैं। इन हालात में राज्‍य सरकार ने भी वर्धा के इर्द-गिर्द लग रहे नए उद्योगों, खासकर थर्मल पावर प्‍लांट को दूषित जल को रिप्रोसेस करने का प्‍लांट लगाने को कहा है, ताकि पानी बचाया जा सके।

फिर भी आने वाले दिन पूरे महाराष्‍ट्र के लिए बेहद मुश्‍किल भरे हैं। सीएम पृथ्‍वीराज चौहान ने तो मुंबई पुलिस को चौबीसों घंटे मुस्‍तैद रहने के लिए कहा है, ताकि पानी के लिए किसी तरह के झगड़े से निपटा जा सके। राज्‍य के कृष्‍णा और गोदावरी बेसिन में भूजल स्‍तर लगातार गिर रहा है। लेकिन हैरत है कि पवार जैसे नेता अभी भी बांध में पेशाब करने जैसा आपत्‍तिजनक बयान दे रहे हैं और मूर्ख लोग उसकी बात पर बजाय जूते मारने के हंस रहे हैं। यह महाराष्‍ट्र में ही नहीं, मध्‍यप्रदेश में भी होता है। तभी शिवराज सिंह चौहान जैसे नेता की जय जयकार होती है, बिना यह जाने कि यहां पानी के नाम पर किस तरह जेबें भरी जा रही हैं। ऐसे ही नेताओं ने सूखे को हर हाल में अवश्‍यंभावी बना दिया है।