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बुधवार, 5 सितंबर 2012

बुंदेलों-हरबोलों से सुनी कहानी पुरानी थी... (2)


पन्‍ना शहर बहुत छोटा सा है। दो हिस्‍सों में बंटा हुआ। नया पन्‍ना तो थोड़ा-बहुत शहर कहलाने लायक है, लेकिन पुराने पन्‍ना में जाएं तो लगेगा मानों 18वीं सदी के गांव में पहुंच गए हैं। पन्‍ना शहर में रोजगार बिल्‍कुल नहीं है। अगर आपको अपनी गाड़ी के टायर बदलने हों तो अच्‍छी कंपनी तलाशने के लिए 70 किलोमीटर दूर सतना या 60 किलोमीटर दूर छतरपुर जाना होगा। कुल चार रास्‍तों में दाएं-बाएं तीन-चार किलोमीटर चलने पर ही शहर खत्‍म हो जाता है। शहर की हालत देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि कभी यह महाराज छत्रसाल की राजधानी रहा होगा। छोटी-छोटी खोपचेनुमा दुकानें और उसमें गिनती के सामान। स्‍थानीय मीडिया में मेरे एक दोस्‍त ने बताया कि हर दूसरी दुकान कुंआरों ने खोल रखी है। यह दिखाने के लिए कि उनके पास कोई काम-धंधा है, वरना निकम्‍मों को कौन अपनी लड़की सौंपेगा। इधर शादी हुई और उधर दुकान बंद। फिर कोई दूसरा कुंआरा किराए पर दुकान चलाने लगेगा।
छत्रसाल के पन्‍ना शहर में कभी 15 बड़े तालाब हुआ करते थे। अब तीन बड़े और दो छोटे तालाब ही बचे हैं। इनमें से एक है लोकपाल सागर, जिसका पानी पूरे शहर के लोग पीते हैं। ऐतिहासिक इमारतों की बात करें तो ठीक-ठाक हालत में पन्‍ना स्‍टेट (रियासत) का महल, जिसमें अभी कलेक्‍ट्रेट लगता है और संगमरमर का प्राणनाथ मंदिर (सन 1795 में बना) ही बचा है। बाकी इमारतें खस्‍ताहाल हैं। हां, चंद होटल काफी बेहतर हैं। ये होटलें या तो पन्‍ना के ठाकुर राजपरिवारों की हैं या उनके वंशजों ने दूरगामी सोच के साथ बनाई है। दूरगामी सोच से मेरा आशय डायमंड सिटी से है। पन्‍ना में देश का 85 फीसदी हीरा निकलता है। मान्‍यता है कि महाराज छत्रसाल को एक फकीर ने वरदान दिया कि वे एक बार में अपने घोड़े पर बैठकर जिन जगहों से निकलेंगे, वहां की जमीन हीरा उगलेगी। अब आलम यह है जगह-जगह खेत खुदे पड़े हैं। महज 300 रुपए में कोई भी 25 बाय 25 वर्गफुट की लीज पा सकता है। चार मजदूरों की 150 रुपए रोज की दिहाड़ी यानी 600 रुपए रोज के हिसाब से 15 दिन खोदने पर यदि हीरा न मिले तो गम न कीजिएगा। यह तो एक जुआ है। अगला खेत आपके इंतजार में है। एक भी हीरा मिल जाए तो सारा खर्च वसूल। सूरत, अहमदाबाद से हीरा व्‍यापारी डील करने यहां आते हैं और रजवाड़ों के होटल में ठहरते हैं। गर्मी के सीजन में इन होटलों का किराया आसमान छूने लगता है। वैसे, सिर्फ हीरा ही नहीं, पन्‍ना के होटल ऑफ सीजन में भी महंगे ही मिलेंगे।
पन्‍ना शहर से सात किलोमीटर दूर से शुरू हो जाता है टाइगर रिजर्व का बफर जोन। इसके भीतर एनएमडीसी की खदानें भी हैं और यहां-वहां खोदे गए खेत भी नजर आते हैं। पन्‍ना में किसी से भी पूछें कि टाइगर रिजर्व में कितने बाघ हैं तो जितने मुंह उतनी बातें। 10, 20, 23, 34 (इससे ज्‍यादा झेला नहीं गया)। असल में 542 वर्ग किमी के कोर एरिया और 1002 किमी के बफर जोन वाले इस खूबसूरत जंगल में कुल 13 बाघ हैं। पन्‍ना शहर का समूचा वजूद अब इन्‍हीं बाघों के चलते है, क्‍योंकि बफर जोन में आने के कारण हीरा खनन तकरीबन बंद है। एनएमडीसी की जो खदानें कोर एरिया में थीं, उनमें खनन पहले ही बंद हो चुका था। कभी एनएमडीसी सालाना एक लाख कैरेट हीरा निकाल लेती थी। उसकी लीज अगले आठ साल के लिए बरकरार है, लेकिन कोर और बफर एरिया के झमेले में सारा कामकाज ठप है और 1000 कर्मचारी बेकार बैठे हैं। हीरा उत्‍पादन घटने से पन्‍ना शहर पहले से और बेजान और वीरान होने लगा है।
ये हैं टी-सीरीज की पहली बाघिन, यानी टी-1. चिड़ियाघर की इस खूबसूरत बाघिन ने चार बच्‍चे पैदा किए। एक साथ में है। 
लेकिन शहरवालों का गुस्‍सा इस समय बफर जोन को लेकर उबल रहा है। पन्‍ना जिले के सूखाग्रस्‍त दर्जनों गांवों के लोगों को दिहाड़ी देने वाली पत्‍थर खदानें बफर जोन की चपेट में आ चुकी हैं। अगस्‍त में मध्‍यप्रदेश सरकार ने 1002 वर्ग किमी के बफर जोन का सीमांकन करते समय बड़ी चतुराई से कुछ रसूखदारों की पत्‍थर खदानों (वैध कम, अवैध ज्‍यादा) को बफर जोन से बाहर कर दिया है। लिहाजा 75 फीसदी लोगों को मजदूरी मिलती रहेगी, पर काम के सम्‍मानजनक हालात में नहीं। ये खदानें सफेद सैंड स्‍टोन उगलती हैं, जिनकी क्‍वालिटी एशिया में सबसे अच्‍छी मानी जाती है। लेकिन ये खदानें पत्‍थरों के साथ मौत भी उगलती हैं। सिलिकोसिस के रूप में। पत्‍थर तोड़ते समय उड़ने वाली धूल मजदूर की नाक से होकर फेफड़ों में चली जाती है। साल-डेढ़ साल में इस धूल के कारण मजदूर की सांस उखड़ने लगती है। खांसी, बलगम के साथ खून आता है। थकान, बुखार के कारण मरीज मजदूरी करने लायक नहीं रह जाता। इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। यहां तक कि पन्‍ना में इसकी पहचान भी नहीं हो पाती। डॉक्‍टर इसके मरीजों को टीबी की दवा यानी डॉट्स देते हैं, जो कोई असर नहीं करती। राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने एक याचिका पर गुजरात सरकार को सिलिकोसिस के हर मरीज को 3 लाख रुपए मुआवजा देने के आदेश दिए थे। इस पर पुनर्विचार कर मुआवजे को बढ़ाकर 13 लाख रुपए करने की गुजारिश कोर्ट से की गई है। मामला कोर्ट के हवाले है।
किनकी है अवैध खदानें ?
पन्‍ना के मीडिया हल्‍कों और स्‍थानीय नेताओं से इस बारे में बात करें तो कई नाम सामने आते हैं। मिलते-जुलते जो नाम उभरते हैं, वे हैं खुन्‍ना, पप्‍पू, पाठक, उपेंद्र सिंह और श्रीकांत दीक्षित। इनमें श्रीकांत दीक्षित को अवैध खदान माफिया का सरगना माना जाता है। पन्‍ना जिले में यहां-वहां फैलीं लगभग 5000 अवैध खदानों में से ज्‍यादातर इन्‍हीं माफियाओं के कब्‍जे में हैं।
पन्‍ना में बीमार पड़े तो खैर नहीं!
इस मामले में ईश्‍वर हमेशा लगातार छह बार मेरे साथ रहा। बीमार पड़ जाता तो लेने के देने पड़ जाते। पन्‍ना में एक भी प्रायवेट अस्‍पताल नहीं है। सरकारी अस्‍पताल जरूर हैं, पर यहां के डॉक्‍टर उसी मर्ज के शिकार हैं, जिस पर उन्‍होंने महारत हासिल की है। मिसाल के लिए ऑर्थोपेडिक्‍स वाले डॉक्‍टर साब खुद लंगड़े हैं। अगर दाएं हाथ में फ्रैक्‍चर हो तो बाएं में प्‍लास्‍टर चढ़ा देंगे। ईएनटी में दो डॉक्‍टर हैं। एक को कम दिखता है और दूसरे ऊंचा सुनते हैं। अलबत्‍ता झोला छाप डॉक्‍टर हर गली में मिल जाएंगे। कुछ पैदल तो कुछ साइकिलों पर घूमते हैं। मेडिकल स्‍टोर के अगल-बगल बैठते हैं। मरीजों की भीड़ मक्‍खियों की तरह भिनभिनाती है इनके सामने। हर मर्ज की दवा है इनके पास, कीमत 200 रुपए।
बाघ से किसे फायदा ? पन्‍ना या खजुराहो को ?
असल में बफर जोन के विरोध का सबसे बड़ा कारण यही है। सैलानी पन्‍ना में बाघ देखने दिल्‍ली, मुंबई से आते हैं। पन्‍ना से खजुराहो की दूरी महज 42 किमी है। दुनिया का हर शख्‍स इस विश्‍व प्रसिद्ध मंदिरों की कामुक मुद्राओं को जी भरकर देख लेना चाहता है। तो खजुराहो आने के बाद वे पन्‍ना नेशनल पार्क चले जाते हैं, शहर तक नहीं आते। पन्‍ना से 15 किमी के दायरे में पांडव फॉल्‍स, बृहस्‍पति फॉल्‍स और गाथा फॉल जैसे कई बेहतरीन पिकनिक स्‍पॉट हैं। लेकिन सरकार की बेरुखी ने इन्‍हें सैलानियों से महरूम कर रखा है। जाहिर है, पन्‍ना में बाघों की आबादी फिर बढ़ेगी (अभी चार बाघ और बाकी बाघिन और बच्‍चे मिलाकर कुल 23 का कुनबा है) तो सबसे ज्‍यादा फायदा छतरपुर जिले और खजुराहो को ही होगा पन्‍ना शहर को नहीं।
खजुराहो के विश्‍वविख्‍यात पश्‍चिमी हिस्‍से के मंदिर।
पहले बाघ मारे, अब बसा रहे हैं जंगल
पन्‍ना रियासत के महाराजा यादवेंद्र सिंह ने 1914 में इस इलाके को बिजली के लट्टुओं से रोशन किया था। यानी बुंदेलखंड में सबसे पहले यही लाइट आई। मध्‍यप्रदेश का सबसे पहला एयरपोर्ट भी यहीं बना। उन्‍हीं के वंशज है महाराज लोकेंद्र सिंह। देखने पर कहीं भी महाराज नहीं लगते। मुंह में खैनी, होठों से टपकती लार। 70 की उम्र के महाराज ऊंचा बोलते हैं। ये जताने के लिए कि वे अभी भी दहाड़ सकते हैं, पर इस कोशिश में कांपता जिस्‍म साफ बताता है कि जेब के साथ शरीर भी खोखला हो चुका है। वे मानते हैं कि जवानी में उन्‍होंने बहुत से बाघों को ढेर किया। उनके बाप-दादाओं ने भी। 2008 तक पन्‍ना में 34 बाघ थे। एक साल बाद एक भी नहीं बचे। मानों रातों-रात गायब हो गए हों। खाल, हड्डियां जैसे किसी अवशेष की बरामदगी भी नहीं हो सकी। लोकेंद्र सिंह इसके पीछे ठोकिया गिरोह का हाथ मानते हैं। उनके मुताबिक उसी ने बाघों की खाल के अंतरराष्‍ट्रीय तस्‍कर संसार चंद (अब जेल में) के साथ मिलकर बाघों का शिकार किया। नव विभाग के अधिकारी भी इसमें मिले हुए थे। 2009 के आखिर में जब बाघों के गायब होने पर हल्‍ला मचा तो अगले एक साल में चिड़ियाघर की दो बाघिनों को लाकर प्रजनन करवाया गया। आज ‘टी-सीरीज’ वाली लंबी कतारें इन्‍हीं बाघ-बाघिन की संतानें हैं।
लोकेंद्र सिंह। गरजते ज्‍यादा हैं, बरसने की उम्र गई। 
टूरिज्‍म लॉबी का दबाव
पन्‍ना से खजुराहो और आगे ओरछा तक टूरिज्‍म लॉबी का बोलबाला है। मध्‍यप्रदेश सरकार चाहती है कि इस अंचल में टाइगर टूरिज्‍म बढ़े। पन्‍ना से खजुराहो की ओर बढ़ें तो केन नदी के एक ओर भीमकाय कॉटेज कुछ बने तो कुछ निर्माणाधीन नजर आते हैं। ये राज्‍य सरकार के एक मंत्री नागेंद्र सिंह के बेटे श्‍यामेंद्र सिंह, आमिर खान के भतीजे इमरान खान, दिग्‍विजय सिंह जैसे रसूखदारों के हैं। टाइगर टूरिज्‍म से इन्‍हें फायदा तो है ही, साथ में मध्‍यप्रदेश पर्यटन निगम एवं टाटा ग्रुप के ताज कॉटेज (कुल 12 कॉटेज – हरेक का किराया 30 हजार रुपए एक रात का) और दर्जनों रिसॉर्ट्स  भी टाइगर टूरिज्‍म पर आधारित हैं।
पन्‍ना से 20 किलोमीटर दूर है मडला गांव। टाइगर टूरिज्‍म से इसी गांव को सबसे ज्‍यादा फायदा मिला है। गांव की 15 टैक्‍सियां (जिप्‍सी) और 30 से ज्‍यादा गाइड को काम मिला है। कुछ स्‍थानीय लोग रिसॉर्ट्स में नौकरी भी कर रहे हैं। लेकिन करीब 7000 की आबादी वाले मडला गांव के लिए यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। टाइगर टूरिज्‍म के इस कारोबार में पन्‍ना शहर के लोगों को ड्राइवर, गाइड आदि के रूप में कोई रोजगार नहीं मिला है। मडला में यादवों का दबदबा है। ज्‍यादातर नौकरियां इसी तबके को मिली हैं। मडला में घुसते ही आपको हर दूसरे घर में ट्रैक्‍टर और बाइक्‍स खड़ी मिलेंगी। लेकिन टूरिज्‍म में लगे लड़कों का कहना है कि उन्‍हें माह भर में 200 रुपए रोजाने के हिसाब से सिर्फ 10 दिन की दिहाड़ी ही मिल पाती है। ऐसा इसलिए, क्‍योंकि हर तीसरे दिन उनका नंबर आता है। गांव के पीछे केन नदी है, आगे जंगल है। ढोर-ढंगड़ों के लिए चरने की जगह नहीं। खेत हैं, जिससे आधे परिवार का गुजारा होता है। मडला में गिनती के राजगोंड (आदिवासी) बचे हैं। ज्‍यादातर पलायन कर गए। बीए और एमए तक पढ़े-लिखे लड़के खेती करने से हिचकिचाते हैं। दिल्‍ली और मुंबई जैसे शहरों में पलायन कर दिहाड़ी कमाना उन्‍हें बेहतर लगता है।
बफर जोन से क्‍या कुछ बदलेगा ?
जंगल में लोकतंत्र का क्‍या काम ? वहां तो वन विभाग का जंगल राज चलता है। पन्‍ना टाइगर रिजर्व से जबर्दस्‍ती बाहर किए गए 24 गांवों के विस्‍थापितों का हाल देखकर इस बात की असलियत पर शक की गुंजाइश बची नहीं रहती। विस्‍थापित परिवारों 10 लाख रुपए के मुआवजे की जगह सिर्फ 36 हजार मिले। पांच एकड़ जमीन सिर्फ कागजी नक्‍शे पर नजर आती है, पटवारी की नपती में 3.5 एकड़ से ज्‍यादा नहीं निकली। कोर एरिया में तकरीबन सारी जमीनें सिंचित थीं, लेकिन विस्‍थापन के बाद मिली जमीनें बंजर हैं। विस्‍थापितों के गांव सूरजपुरा और पीपरटोला की भी यही स्‍थिति है। यहां वन विभाग ने विस्‍थापितों के लिए पहले कुआं खोदा था, लेकिन पानी न निकलने पर उसमें पांच टैंकरों से पानी डाला गया। पीपरटोला में किसानों को सिंचाई के लिए वन विभाग ने ही 2003 में एक स्‍टॉप डैम बनवाया जो अगले साल ही ध्‍वस्‍त हो गया।
अब अमझिरिया, अकोला, मनकी, जरधोबा जैसे 35 गांव बफर जोन की चपेट में आ चुके हैं। पन्‍ना से महज सात किलोमीटर दूर मनकी में अभी तक लाइट नहीं पहुंच पाई है। लोगों को फिक्र इस बात की है कि बफर जोन में फॉरेस्‍ट का राज होने से वे बिजली से हमेशा के लिए महरूम हो जाएंगे। उनकी जमीनें वनभूमि का हिस्‍सा बन जाएंगी, जिसमें खेती और रहने का हक तो रहेगा पर सिंचाई, पीने के पानी, मवेशियों के चारागाह, स्‍कूल, राशन दुकान, आंगनवाड़ी जैसी सहूलियतें नहीं होंगी। वन विभाग चाहता है कि हालात से तंग आकर लोग खुद ब खुद बफर जोन से चले जाएं। सरकार की विस्‍थापन और पुनर्वास नीति को मन मुताबिक तरीके से तोड़-मरोड़कर वन विभाग ने ऐसी एक नहीं, दर्जनों नजीरें पेश की हैं और ग्रामीण इसे बखूबी समझने लगे हैं। पीपरटोला और सूरजपुरा के लोगों का तो सीधा आरोप है कि वन विभाग बफर जोन से लोगों को खदेड़कर लकड़ियों की तस्‍करी करवाना चाहता है। कोर एरिया में यह काम बदस्‍तूर जारी है और अब बफर में भी ऐसा ही होगा।
(क्रमश : इसका तीसरा और अंतिम हिस्‍सा भी है।)