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सोमवार, 13 अगस्त 2012

अब तो कह दो, हमें नहीं चाहिए मैडल


ड्रॉइंग रूम की वॉल कैबिनेट पर रखी ट्रॉफियों और कप्स को देखकर मेरे चौंकने पर आंटी ने बताया कि ये बिट्टू और पाखी के हैं। मैंने कहा, ‘इस वक्त भी क्या वे खेल रहे हैं ? ’ आंटी का जवाब था, नहीं। ट्यूशन गए हैं। एक आठवीं और एक दसवीं में है। पढ़ना भी जरूरी है। अच्छे मार्क्स आएंगे तो करियर बनेगा। ये चीजें (ट्रॉफियां) तो धरी की धरी रह जाएंगी। आंटी की दलील को आज के कॉम्पीटेटिव जमाने में भला कौन ठुकरा सकता है। पर सेंटर टेबल पर रखे अखबार की सुर्खियां भी मुंह चिढ़ा रही थी कि 122 करोड़ की आबादी में हमारे पास सिर्फ 6 खिलाड़ी हैं।

आधे घंटे बाद सबसे पहले पाखी आई। पाखी कभी दौड़ने में उस्ताद हुआ करती थी। मैंने पूछा, तुम क्या साइकिल में ट्यूशन गई थी ? जवाब मिला, नहीं। डैड ने स्कूटी दिला दी है। फिर पूछा, क्या अभी भी सकूल के गेम्स में हिस्सा लेती हो ? बोली, नहीं। टाइम ही कहां है। ढेर सारा कोर्स, होम वर्क और बेस्ट करने का प्रेशर। फिर फ्रेंड्स भी तो हैं। उन्हें भी टाइम देना है। आंटी ने भी जोड़ा, आजकल दोनों बच्चे खाने से कतराते हैं। पाखी तो दो रोटी भी नहीं खाती। जंक फूड्स सबसे ज्यादा पसंद हैं। बिट्टू का दौड़ते-भागते घर में घुसना अच्छा लगा। पर उसके थुलथुल शरीर को देखकर महसूस नहीं हुआ कि वह कभी फुटबॉल भी खेलता था। बैग रखकर मुझ तक आया तो हांफने लगा था।

ये हैं हमारे देश की बुनियाद। ये बच्चे अब बाजारवादी व्यदवस्था का अंग बन चुके हैं। इस व्यवस्था में आईआईटी, आईआईएम या देश के किसी नामी मेडिकल कॉलेज में सीट पा लेना किसी ओलिंपिक के मेडल से कम नहीं है। इसके लिए दौड़-कूदकर शारीरिक श्रम की नहीं, दिमागी परिश्रम की जरूरत पड़ती है। नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी में कैलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट की वैज्ञानिक मेगन बुसे का दावा है कि भारत में सकल घरेलू उत्पाद में प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से 34 पदकों की उम्मीद की जानी चाहिए। यह एक अजीबोगरीब विश्लेषण है। ठीक उसी तरह, जैसे 1988 में ब्रिटिश एथलीट सेबेस्टियन को के भारत आने पर जब इंडियन एक्सप्रेस के तत्कालीन पत्रकार शेखर गुप्ता ने उससे पूछा कि भारत ओलिंपिक से इक्का-दुक्का पदकों के साथ क्यों लौटता है तो को का जवाब था, ‘इसलिए क्योंकि तुम्हारे देश के झोलेवाले (यानी नेता) डेवलप नहीं होता चाहते। तुम अपने बाजार को विदेशी रिटेल कंपनियों के लिए नहीं खोलना चाहते।’ कभी ऐसी ही दलीलें भारत से एक के बाद एक तीन विश्व और ब्रह्मांड सुंदरियों के आगे आने पर भी दी गई थीं। लोगों ने इसे भारतीय महिलाओं को उत्पाद के तौर पर बाजार में पेश करने और अमेरिकी मल्टीनेशनल के भारत में कदम रखने के एवज में रिश्वत के बतौर देखा और अब यह लगभग सही नजर भी आता है।

एक और अमेरिकी विशेषज्ञ ओलिंपिक जैसे आयोजनों में भारत के फिसड्डीपन को खेलों की परंपराओं से जोड़ते हैं। कुछ हद तक यह बात सही भी है। ज्यादातर परंपरागत भारतीय खेल या तो टाइमपास के लिए हैं, या फिर वे लड़ाई के मैदान में बाजी मारने के मकसद से अपनाए गए। कुछ हद तक कबड्डी व मल्लखंब को छोड़कर, जिसमें संतुलन व चपलता के साथ बाजुओं की ताकत भी अहम होती है। बाकी खेल सबसे तेज, सबसे ऊंचा, सबसे मजबूत जैसे मकसद को पूरा नहीं करते। ये खेल ओलिंपिक का हिस्सा नहीं है। पर बाकी का क्या? मिसाल के लिए एथलेटिक्स, तैराकी, कुश्ती, हॉकी (बदनसीबी से हमारा राष्ट्रीय खेल है) और जिम्नास्टिक को ही लें तो हमारे पदकों की संख्या 34 से ऊपर निकल सकती है।

बड़ी अंतरराष्ट्रीय खेल सुविधाओं में मात खाकर लौटने के बाद अधिकांश समीक्षाओं में सुविधाओं का रोना छोड़कर अगर हम मसले की जड़ तक जाएं तो पता चलता है कि हमारे समाज ने जीवन के विकास में खेलों को कभी बुनियाद माना ही नहीं। अमेरिका में खेलना अगर शौक है तो चीन में एक परंपरा। चीनी समाज ने आत्मरक्षा के लिए मार्शल आर्ट को बढ़ावा दिया जो कई खेलों का मिश्रण है। इसमें शारीरिक लोच (जिम्नारस्टिक, तैराकी), एकाग्रता (निशानेबाजी) और घंटों तक लड़ने-जूझने की जरूरत होती है। ब्रूस ली और अब जेट ली की फिल्में साफ बताती हैं कि ऐसे खेलों के महीनों तक अभ्यास से शरीर कई दूसरे खेलों के लिए भी तैयार हो जाता है। पर शरीर के ढांचे को मजबूत बनाने के लिए हाई कैलोरी संतुलित भोजन भी चाहिए, जो जंक फूड से नहीं बल्कि प्रोटीन युक्त खाने से मिलता है। शहरों में यदि जंक फूड का जोर है तो गांवों से दालें गायब हो गई हैं। सरकार खेलों में नई प्रतिभाओं को बढ़ावा देने की बात करती हैं, लेकिन अगर रोज पोषणयुक्ति खाना ही नहीं मिले तो प्रतिभा के बीज ही कहां पनप पाएंगे।

लंदन ओलिंपिक में भाग लेने वाले 83 सदस्यीय भारतीय दल में एक-तिहाई खिलाड़ी हरियाणा से हैं। खाप पंचायतों से सजे इस परंपरागत पुरुषवादी समाज में दूध, घी, मक्खसन और पौष्टिक भोजन लगभग हर घर में उपलब्ध है। हरियाणा का समाज मेहनतकश है। खेलों को उसने सहजता से अपनाया है। मणिपुर में भी युद्धकला को समाज ने नवाजा सो मैरीकॉम का मुक्केबाजी में पदक पाना कोई हैरत की बात नहीं है। लेकिन जब हम बैडमिंटन और शूटिंग जैसे इनडोर गेम्‍स में हमारे खिलाड़ियों के प्रदर्शन को देखते हैं तो 30 करोड़ मध्यमवर्गीय समाज में उन करीब 1.8 करोड़ की आबादी सामने आ जाती है, जिसके पास खेलों के लिए खर्च करने को पैसा और समय दोनों है। गांव में रहने वाले 74 करोड़ लोग या तो पेट भरने के लिए या शहरी समाज से कदमताल के लिए जूझ रहे हैं।

हम इस बात को जानते हैं कि खेलों के मामले में हम अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, रूस और ऑस्ट्रेलिया का कभी मुकाबला नहीं कर पाएंगे। यहां तक कि हॉकी पर भी हमारी पकड़ इतनी कमजोर हो चुकी है कि इस ओलिंपिक में तो स्टिक ही हाथ से छूटती नजर आई। इसीलिए जब हमारे खेल मंत्री यह कहते हैं कि 2020 के ओलिंपिक में हम 25 मैडल लेकर आएंगे तो लोग हंसते हैं। हम खुश है कि चार साल में हमारे ओलिंपियनों की संख्या तीन से छह हो गई। लेकिन हम फिर इस बात को भूल जाते हैं कि किसी भी देश का यह मकसद नहीं होना चाहिए। अमेरिकी समाज में खेल ओलिंपिक या वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड मैडल लाने की कसौटी है। इसमें खरे नहीं उतर पाने का मतलब है कि आप सिर्फ अपने लिए खेलते हैं, देश के लिए नहीं। अफसोस कि हमारे खेल समीक्षक भी सिर्फ खिलाड़ियों के लिए सोचते हैं, देश के लिए नहीं। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह भी कि खेलों में पैसा लगाने में सक्षम हमारे कॉरपोरेट्स भी खिलाड़ियों के बारे में सोचते हैं, देश के बारे में नहीं।