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बुधवार, 19 दिसंबर 2012

मजे के बहाने...

हरजीत आज शाम मजे के मूड में घर से निकला था। पापा की होंडा कार उठाई, रास्‍ते में बियर के पांच कैन खरीदे और निकल पड़ा दिल्‍ली के सुनसान रास्‍तों पर। बाहरी रिंग रोड के एक बस स्‍टॉप में उसे एक अकेली लड़की खड़ी दिखाई दी। 21 साल से हरजीत ने ठीक उसके सामने गाड़ी रोकी और कहा, ‘आती क्‍या ?’ लड़की ने नफरत से मुंह फेर लिया। हरजीत हंस पड़ा। थोड़ी दूर पर स्‍कूल की एक लड़की पीठ में बस्‍ता लादे तेज कदमों से घर की दूरी नाप रही थी। हरजीत ने उससे थोड़ी दूर पर कार रोकी और सड़क की रोशनी में उसे नख से सिर तक घूरने लगा। पास आने पर लड़की बोली, ‘क्‍या देख रहे हो ?’ हरजीत बोला, ‘देखने के पैसे लगते हैं क्‍या ?’ लड़की ने गुस्‍से से पास पड़ा एक पत्‍थर उठा लिया। अब तक बियर का नशा हरजीत के सिर चढ़ चुका था। ताव खाकर उसने लड़की के हाथ से पत्‍थर छीना और खींचकर कार में बिठा लिया। शीशे चढ़ाए और कार आगे बढ़ निकली। सुबह अखबार की सुर्खियों में दिल्‍ली एक बार फिर दागदार हो चुकी थी।

दिल्‍ली और दिल्‍ली वाले शायद इस तरह की घटनाओं के आदी हो चुके हैं। कैलेंडर की तारीखें बदलती हैं और लोग पिछली घटना को भूलकर नई को याद करना शुरू कर देते हैं। 16 दिसंबर की रात चलती बस में पैरा मेडिकल की छात्रा से रेप की घटना भी कोई ऐसी अनोखी नहीं थी, जिसकी गूंज संसद में गूंज उठे। फिर भी पूरा देश लड़कियों के खिलाफ बढ़ते अपराध पर गुस्‍से से पागल हो उठा है। यकीनन ये गुस्‍सा कुछ ही दिनों में ठंडा भी हो जाएगा और मीडिया में किसी नई सुर्खी पर लोग चर्चा शुरू कर देंगे। सब-कुछ यूं ही चलता रहेगा। रैलियां, धरने-प्रदर्शन, बयानबाजी और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भड़ास का सिलसिला चलेगा, लेकिन रेप बंद नहीं होंगे। असल में इस समस्‍या का इलाज किसी के पास नहीं है, सिवाय कड़ी से कड़ी सजा, इंडिया गेट पर फांसी सरीखे रटे-रटाए जुमलों के। यह घटना अगर रविवार को न हुई होती और दिल्‍ली के बजाय देश के और किसी शहर या गांव में होती तो लोग शायद इसे अनदेखा ही कर देते। यह है हमारा समाज, जो सख्‍त हालात में और निर्मम हो जाता है। खासकर महिलाओं और बच्‍चों के प्रति। युवा, नौकरीपेशा लड़कियों और स्‍कूली छात्राओं के लिए यह थोड़ा और निर्मम है, क्‍योंकि अगर वे घर से बाहर न निकलें तो उनका वजूद ही खत्‍म हो जाए। पुरुषवादी व्‍यवस्‍था का दबाव उन्‍हें हमेशा के लिए घर में ही कैद कर दे।



अकेले दिल्‍ली में 2010 में रेप के 535 मामले दर्ज हुए और वह भी प्रति 100 वर्ग किमी में 5500 से ज्‍यादा पुलिसवालों की नाक के नीचे। ध्‍यान रखें कि ये मामले दर्ज हुए, क्‍योंकि दर्ज न होने या किए जाने वाले मामले इसमें शामिल नहीं हैं। इनमें से 96 फीसदी मामलों में आरोपी पीड़ित महिला को जानते थे, परिचित थे। फिर भी एक साल के भीतर सिर्फ 34 फीसदी मामलों में ही आरोपियों को सजा हो सकी। मध्‍यप्रदेश में इसी दौरान 3135 मामलों में सारे आरोपी यानी 100 फीसदी पीड़िता के परिचित थे, पर सालभर में सजा मिल सकी सिर्फ 28 फीसदी को। यह तो है हमारी न्‍याय व्‍यवस्‍था। आपको बता दें कि 1973 में रेप के आरोपियों को सजा का प्रतिशत 44 था। इसे यूं भी समझ सकते हैं कि रेप करने वाले हर दूसरे आरोपी को एक साल में सजा मिल जाती थी, जो अब घटकर 26 फीसदी से कुछ ज्‍यादा है। हमारा समाज कसाब और अफजल गुरु की फांसी के लिए जोरदार बहस कर सकता है, पर किसी बलात्‍कार पीड़ित लड़की को इंसाफ दिलाने के लिए ऐसी बहस का कोई उदाहरण नहीं मिलता।

याद करें बेहद चर्चित मथुरा रेप केस को, जिसने सरकार को 1983 में सीआरपीसी की धारा 114 ए को संशोधित करने पर मजबूर किया। इसमें यह प्रावधान किया गया कि अगर पीड़िता यह कह दे कि उसके साथ सहमति से सेक्‍स नहीं किया गया तो अदालत उसे सही मानेगी। 16 साल की लड़की मथुरा के साथ महाराष्‍ट्र के चंद्रपुर में देसाई गंज पुलिस थाने में दो सिपाहियों से बलात्‍कार किया। सेशंस ने दोनों आरोपियों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि मथुरा तो सेक्‍स की आदी थी। हाईकोर्ट ने आरोपियों को सजा सुनाई तो सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए उन्‍हें बरी कर दिया कि मथुरा अव्‍वल तो चिल्‍लाई नहीं और दूसरे उसके शरीर में जख्‍म के कोई निशान नहीं थे। मोहम्‍मद हबीब वि. स्‍टेट के एक केस में दिल्‍ली हाईकोर्ट ने 7 वर्षीय एक मासूम के साथ रेप के मामले में आरोपी को इसलिए बरी कर दिया कि उसके लिंग पर चोट के कोई निशान नहीं मिले। भंवरी देवी बलात्‍कार कांड में कोर्ट ने कहा कि आरोपी चूंकि उच्‍च तबके का है, सो वह भंवरी जैसी दलित महिला की इज्‍जत नहीं लूट सकता। केरल के एक मामले पर गौर करें। 16 साल की सकीना को काम दिलाने के बहाने एर्नाकुलम लाया जाता है। वहां उसे वेश्‍यावृत्‍ति करवाने वाले एक व्‍यक्‍ति को बेच दिया जाता है। 18 माह तक सकीना को एक कमरे में कैद करके रखा जाता है और रोज अलग-अलग लोग उससे बलात्‍कार करते हैं। लेकिन अदालत कहती है कि अगर कोई व्‍यक्‍ति अपनी जिस्‍मानी भूख शांत करने के लिए पैसे खर्च करता है तो वह रेप क्‍यों करेगा ? 



रेप की शिकार पीड़ित महिला को कानूनी पोस्‍टमार्टम से ज्‍यादा अदालत में वकीलों की चीर-फाड़ ज्‍यादा भारी पड़ती है। सेक्‍शन 154 (4) में बचाव पक्ष को इस बात का पूरा हक है। अगर लड़की आर्थिक रूप से कमजोर तबके की हो तो अव्‍वल पुलिस केस ही दर्ज नहीं करेगी, क्‍योंकि आरोपी रसूखदार तबके का है। यानी कानून को पहले थानेदार परिभाषित करेगा और वह भी आरोपी से मोटी रकम लेकर। अगर दबाव में केस दर्ज हो भी गया तो जांच में ही इतना झोल पैदा कर दिया जाएगा कि बचाव पक्ष के लिए कोर्ट में पीड़िता की चीर-फाड़ आसान हो जाए। पहले निचली अदालत में ही पीड़ित लड़की के शरीर पर जख्‍म गिने जाते हैं। जगह पता की जाती है कि जख्‍म कहां हैं। जज को यह जांचना होता है कि लड़की ने प्रतिरोध किया या नहीं। यानी कोर्ट में उसी लड़की का एक बार और रेप होता है। घर में या परिवार के भीतर ही छोटी बच्‍चियों के साथ रेप की घटनाएं इसीलिए साबित नहीं हो पातीं, क्‍योंकि शरीर पर हुए जख्‍मों का पीड़िता के बयान से कोई मेल नहीं जम पाता। तो हम किस आधार पर इंडिया गेट पर फांसी या सख्‍त से सख्‍त सजा की मांग करते हैं।

असल में जो लोग यह मांग कर रहे हैं, उन्‍हें रेप की परिभाषा तक नहीं मालूम। भारतीय कानून में रेप को 6 आधार पर परिभाषित किया जाता है। यानी अगर शारीरिक संबंध –

1. लड़की की मर्जी के खिलाफ

2. उसकी सहमति के बगैर

3. उसे डरा-धमकाकर

4. शादी का झांसा देकर, फुसलाकर

5. नशीली दवा खिलाकर, धोखे से

6. अगर लड़की 16 साल से कम की हो

सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में यह व्‍यवस्‍था भी दी है कि सेक्‍शन 375 के तहत लड़की की योनी में पुरुष लिंग का थोड़ा भी प्रवेश साबित होने पर उसे रेप माना जाएगा। लेकिन पुलिस थाने से लेकर सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट तक में इस व्‍यवस्‍था की अलग-अलग तरीके से व्‍याख्‍या होती है और सभी का एक ही मकसद होता है कि किसी तरह पीड़ित लड़की पर मानसिक दबाव डालकर यह कहलवाया जा सके कि सेक्‍स उसकी सहमति से हुआ है। यह तो हुआ न्‍याय व्‍यवस्‍था का रेप के मामलों के प्रति रवैया। अब सवाल उठता है कि हमारा समाज इस पर क्‍या सोचता है। बंगाल की रुनू की 14 साल में शादी हो जाती है। पति कोई काम नहीं करता। पूरे आठ साल तक गांव में ही लोगों के घरों में काम करने के बाद वह शहर जाने की सोचती है। दो बेटियों और एक बेटे को लेकर वह कोलकात के बदनाम सोनागाछी आ जाती है। कोई उसे काम दिलाने के बहाने वहां लाकर 15 हजार रुपए में बेच देता है। 22 साल की रुनू पूरे दो साल तक अपने जिस्‍म का सौदा कर 15 हजार रुपए चुकाने के बाद अगले दो साल में इतने ही पैसे और जमा कर किसी तरह वहां से निकलकर गांव आती है। लेकिन पति उसके पैसे छीनकर घर से निकाल देता है और वह तीनों बच्‍चों के साथ फिर सोनागाछी आ जाती है।

क्‍या हमारे शहरी सभ्‍य समाज का रवैया इससे कुछ अलग है ? बिल्‍कुल नहीं। दिल्‍ली की मोनिका अपनी सहेली को हमेशा यही सलाह देती है कि देर शाम दिल्‍ली की उसी बस में चढ़ना, जहां कम से कम 15 लोग सवार हों। लेकिन अब तो इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि बस में सवार वे लोग मोनिका की सहेली का कोई नुकसान नहीं करेंगे। हमारे देश में हर आठ घंटे में एक लड़की की आबरू लुट जाती है। हमारा पुरुषप्रधान समाज लड़कियों की पवित्रता को सबसे ज्‍यादा तवज्‍जो देता है, सिर्फ इसलिए ताकि आने वाली नस्‍ल शुद्ध हो। बाजार ने भी इस सोच को आसानी से अपना लिया है। हैदराबाद में शादी से पहले लड़के-लड़़कियां क्‍लीनिक में जाकर अपना कौमार्य चेक करवा रहे हैं। अगर सब-कुछ ओके नहीं हुआ तो कॉस्‍मेटिक सर्जरी का विकल्‍प भी मौजूद है। रेप की घटना को तो लोग आसानी से भूल जाते हैं, पर पीड़ित लड़की को नहीं। उसे ताउम्र यह सुनना पड़ता है कि उसके साथ कौन शादी करेगा। उसका सब-कुछ लुट चुका। साफ है कि ब्‍याह के बाद लड़की के पास अपने पति को तोहफे में देने के लिए अपना कौमार्य या अपनी पवित्रता ही होती है। यानी समाज की नजर में वह सिर्फ और सिर्फ मजे की, भोग की वस्‍तु है। उल्‍लेखनीय है कि 16 दिसंबर को गैंग रेप करने वाले पांचों लोग मजे के लिए घूमने निकले थे, जैसे हरजीत। इसीलिए तो आए दिन किसी कॉलेज में लड़कियों के जींस पहनने तो कहीं मोबाइल इस्‍तेमाल न करने के फरमान सामने आ रहे हैं। कोई कहता है कि लड़कियों की बचपन में ही शादी कर दो, ताकि पति एक बार उसे भोग ले, फिर चाहे कोई और या फिर पांच-दस एक साथ उसका शिकार करें। कुल मिलाकर हमारे समाज में एक लड़की को भोगने के लिए ही पैदा किया जाता है और इसका खामियाजा वह आजीवन भुगतती है।

तो इसका इलाज क्‍या है ? विद्वानों से कई नायाब इलाज ढूंढ़े हैं। सबसे चौंकाने वाला है, रेप के दोषी का बधियाकरण। इसे सुझाने वालों को धारा 375 की मूल भावना ठीक से समझ लेनी चाहिए। बधिया होने के बाद भी व्‍यक्‍ति किसी का कौमार्य भंग कर सकता है। हमारे कानून में रेप का आरोप साबित होने के बाद धारा 376 के तहत सात से 10 साल की सजा होती है। यानी इस दौरान बधियाकरण के बाद भी वह रेप करने लायक तो रहेगा। इसके साथ वाला उपाय, दोषी के सारे पहचान चिन्‍हों यानी पैन कार्ड से लेकर आधार कार्ड तक में यह लिख देना कि वह बलात्‍कारी है। यह मानवाधिकार कानून के ठीक खिलाफ है। इससे हम बलात्‍कारियों को सुधरने का कोई मौका नहीं दे सकेंगे। इसी के साथ दोषी की 60 फीसदी संपत्‍ति पीड़िता को सौंप देनी चाहिए। बंगाल में ममता बनर्जी ने रेप पीड़िता को 3 लाख रुपए का मुआवजा बोल रखा है, यानी आबरू की कीमत इतनी ही है। अगर दोषी गरीब हो तो इतनी भी नहीं मिलेगी। अगर दोषी बाप, भाई, चाचा, जीजा ही हो तो आफत और बढ़ेगी। सरेआम फांसी और उसके लाइव टेलीकास्‍ट से क्‍या रेप बंद हो जाएंगे ? हां, एक उपाय बहस का विषय जरूर बन चुका है कि सेक्‍स की मांग का व्‍यावसायीकरण या इसे संस्‍थागत बना दिया जाए। यानी अगर किसी में सेक्‍स की इच्‍छा जगे और वह मजा करना चाहे तो मासूम लड़कियों की इज्‍जत से खेलने की बजाय वह सेक्‍स के बाजार में पहुंच जाए। वहां उसे छिपकर नहीं, वैधानिक तरीके से अपनी इच्‍छापूर्ति का साधन मिले। बहुतों को सुनकर हैरत होगी कि हमारे देश में वेश्‍यावृत्‍ति गैरकानूनी नहीं है। लेकिन इसके लिए कोई लाइसेंसी व्‍यवस्‍था नहीं बन सकी है। जैसे फिलीपींस, ऑस्‍ट्रेलिया, न्‍यूजीलैंड, अमेरिका के लास वेगास और थाईलैंड आदि में है। थाईलैंड में तो वेश्‍याओं को कस्‍टमर रिलेशंस ऑफिसर कहा जाता है। लेकिन सेक्‍स के इस बाजार ने वहां लड़कियों की तस्‍करी में इजाफा किया है। तो यह सुझाव भी समाज में औरतों की दशा नहीं सुधार सकेगा।



सबसे सही उपाय होगा कि हम सभी मिलकर औरतों के बारे में समाज की सोच को कैसे बदलें। औरतों को इस सोच की कैद से किस तरह आजाद करें। इसके लिए आरक्षण जैसे हल की कोई जरूरत नहीं है, क्‍योंकि जाति, वर्ग या संप्रदाय के आधार पर महिलाओं को कोटे का लाभ मिलने से भी यही संदेश जाएगा कि देश की आधी आबादी कमजोर है, लिहाजा उसे कोटे की सीढ़ी चाहिए। हमें उस बाजार को भी अपने काबू में करना होगा, जो महिलाओं को एक उत्‍पाद की तरह बेचता है, उसे व्‍यवस्‍था, रिवाजों, परंपराओं और पुरातन नियमों के अधीन बनाकर पेश करता है। स्‍त्री और पुरुष दोनों बराबर हैं- यह सोच जब तक हम स्‍कूली जीवन से दिमाग में नहीं घुसेड़ेंगे, तब तक महिलाओं के खिलाफ हिंसा में कमी नहीं आने वाली। हां, यह जरूर है कि रेप के खिलाफ कानून और सख्‍त होने चाहिए, लेकिन इससे भी ज्‍यादा जरूरत इन्‍हें अमल में लाने और पुरुषों को इसे पालन करवाने की है।