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रविवार, 15 फ़रवरी 2015

मैंने कहा था (15): वो आखिरी मुलाकात

मुंबई का बांद्रा-कुर्ला टर्मिनस। शाम के कोई चार बजे दिल्‍ली राजधानी के प्‍लैटफॉर्म पर आने की सूचना के साथ ही हलचल अचानक बढ़ गई। अंचिता ने बड़े करीने से चांदी हुई जा रही जु़ल्‍फों को कान के पास यूं समेटा, मानों जिंदगी की किताब के किसी छूटे जा रहे पन्‍ने को मोड़कर सहेजा जा रहा हो। चश्‍मा नाक के नीचे भटक रहा था, उसे रास्‍ते पर लाया गया। अंचिता ने कोई बेताबी नहीं दिखाई। चुपचाप अपने बैग और बड़े से हैंडबैग को संभालकर डिस्‍प्‍ले के ठीक सामने जरा सी खाली जगह पर आकर खड़ी हुई। सामने एक जोड़ा नई शादी की मस्‍ती में गुम था। लड़की की कलाइयों में लाल-सफेद चूड़ियों का सेट बता रहा था कि शादी के बाद शायद वह पहली बार अपने घर जा रही थी। लड़के ने खातिरदारी की कोई रस्‍म नहीं छोड़ी। बड़ा सा बैग, साथ में खाने-पीने का सामान। बार-बार हाथों से जुड़ते हाथ और लबों से निकलती आवाजें, ‘पहुंचते ही फोन करना अन्‍नू! आई विल मिस यू अ लॉट।’ ‘मी टू। तुम अपना ख्‍याल रखना हां। मैंने बाई को सब समझा दिया है। अपनी सेहत का ध्‍यान रखना।’

अंचिता के लिए ऐसा नजारा नया नहीं था। सुबह-शाम लोकल ट्रेन से लेकर गली-मुहल्‍लों के कोने में प्‍यार बांटते जोड़ों की कमी नहीं थी। ‘हुह। ट्रेन छूटी नहीं कि लड़का सीधे अपनी गर्लफ्रेंड के पास जाएगा।’ अक्‍सर ऐसे गर्म हवा के झोंके अंचिता के मन की तह में उस अंधेरे कोने के कपाट को खोल देते, जहां हर जर्रे पर एक स्‍याह दास्‍तान छिपी थी।

उसने जोड़े की तरफ से नजर फेरी ही थी कि ट्रेन की दहाड़ ने उसे भीतर से हिला दिया। हड़बड़ाकर उसने सामान पर पकड़ मजबूत की और गाड़ी के रुकने का इंतजार करने लगी। चश्‍मा बार-बार ढल चुकी उम्र का अहसास दिलाता फिसल जाता था। अंचिता भी जिद्दी नहीं थी। अपने ईगो को नाक के सबसे ऊपर सेट करने के रखना उसे बखूबी आता था। धक्‍का-मुक्‍की उसके बस में नहीं थी। गाड़ी चलने में अभी 25 मिनट बाकी थे। थोड़े इंतजार के बाद उसने राह पकड़ी और थोड़ी जद्दोजहद के बाद सीधे अपनी सीट पर जा बैठी। सामने और अगल-बगल की दोनों सीटों पर अभी कोई दावेदार नहीं था। उसने सोचा, ‘पता नहीं, कैसे मुसाफिर होंगे।’ उसे याद आया। पिछले सफर में एक नौजवान उसे रात भर घूरता रहा था। डर के मारे पूरी रात उल्‍टी करवट सोई थी अंचिता।
तभी एक बुजुर्ग महाशय ने हांफते हुए पूछा, बेटा, सीट नंबर 31 यही है ना ? हड़बड़ा बोली अंचिता, ‘हां...हां। यही तो है।’ एक झटके में जैसे वह अपना ही सीट नंबर भूल गई थी। उसे 32 पर जाना था। अपर बर्थ। और वह लोअर में अपना सामान फैलाने जा रही थी।

उसने सूखते होंठों पर हल्‍की मुस्‍कान बिखेरते हुए पूछा, ‘मे आय हेल्‍प यू टू सैटल योर लगेज ?’ नहीं बेटा। हम कर लेंगे। ‘हम’ शब्‍द के अपनेपन को सुनकर अंचिता खुश हो गई। हिंदी का एक ऐसा शब्‍द, जो एकवचन और बहुवचन दोनों के लिए एक समान इस्‍तेमाल होता है। हालांकि, कहीं-कहीं यह कुलीनता सूचक भी माना जाता है और इसीलिए अंचिता को इस शब्‍द का भारीपन सुहाता है। अंचिता खुश थी कि अब बाकी दो सीटों पर भी कोई ऐसे आ जाएं, जिससे उसकी रात की नींद खराब न हो।
गाड़ी चलने में अभी 15 मिनट बाकी थी। उसने उस बुजुर्ग महोदय से पूछा, ‘आप यूपी के लगते हैं ? हांथों की कंपकपाहट को छिपाने की हर मुमकिन कोशिश में नाकाम होते उस बुजुर्ग ने कहा, ‘हां। हम जौनपुर के हैं। और तुम बेटा ? जी, हम बनारस के। बुजुर्ग की उंगलियां थरथराते हुए मोबाइल पर कोई नंबर ढूंढ़ने लगीं।

अचानक डिब्‍बे में कुलियों की चंद आवाजें आईं, ‘एक तरफ हटिए...रास्‍ता दीजिए।’
एक व्‍हील चेयर तकरीबन घिसटती हुई आई। उस पर एक महिला। उम्र होगी कोई 40 पार। आंखों के नीचे गहरे काले धब्‍बे। गौर वर्ण चौड़े माथे पर सिंदूर का गोल टीका जैसे चेहरे की तेजस्‍विता को बढ़ा रहा था। तभी पीछे एक महाशय भी आ पहुंचे।
अरे ! अमित। अंचिता जैसे जड़ हो गई थी।

कुलियों ने सहारा देकर उस महिला को अंचिता के ठीक सामने की सीट पर लिटा दिया। अमित ने दोनों बड़े बैग को सीट के नीचे ठूंसा और अंचिता से कहा, ‘एक्‍सक्‍यूज मी। क्‍या आप थोड़ा जगह देंगी। मैं इनका बेड तैयार कर दूं।’
स्‍तब्‍ध अंचिता को कुछ समझ नहीं आया। वह सीट से उछलकर खड़ी हो गई।
अमित ने उस महिला को आहिस्‍ता से सहारा देकर उठाया और सामने की सीट पर बिठा दिया। फटाफट बेड रोल, सिरहाना और रजाई लाकर बिछाया और महिला को दोबारा आहिस्‍ता से सुला दिया।

जड़वत खड़ी अंचिता को अचानक तेज झटका लगा। गाड़ी सरकने लगी थी।
अमित ने अंचिता का शुक्रिया अदा किया और थर्मस निकालकर जूस के साथ एक दवा उस महिला को दी। सिरहाने पर हौले से हाथ फेरते हुए वह कुछ बुदबुदाया। महिला ने भी उसके हाथ को चूमकर आंखें बंद कर लीं।
गाड़ी अब सरपट दौड़ने लगी थी। अंचिता लगातार उस महिला को देखे जा रही थी। मन में न जाने कितने ख्‍याल उमड़ रहे थे। कौन है ? क्‍या रिश्‍ता है अमित से ? उनकी तो एक ही बड़ी बहन है ? क्‍या कोई रिश्‍तेदार ? नहीं। यूं हाथ का चूमना.....क्‍या अमित ने शादी कर ली ?

वॉशरूम से लौटकर अमित ने अपना बिस्‍तर बिछाना शुरू कर दिया था। तभी महिला ने आवाज दी, सुनिए। जरा मैगजीन निकाल देंगे ?
एक मिनट जाया किए बगैर अमित ने ट्रैवलर जैसी कोई मैगजीन उठाकर दे दी। कहा, ‘कुछ चाहिए हो तो अलार्म बजाना। मैं ऊपर ही हूं।’
जवाब में महिला ने फिर मुस्‍कुराते हुए उसके हाथों को हौले से दबाया।
अंचिता का सिर फटा जा रहा था। उसने बगल में देखा तो बुजुर्ग महाशय उनींदे हो रहे थे। उसने कहा, ‘सॉरी अंकल। आप सो जाएं। मैं अपनी सीट पर जाती हूं।’

एसी 2 टीयर के डिब्‍बे में ऊपर की सीट पर इतनी जगह होती है कि आराम से बैठकर पढ़ा जा सके। अमित ने बैकपैक से निकाल अपना टैब अभी चालू ही किया था कि मोबाइल पर अलार्म बजा। उसने नीचे झांका तो लाइट बंद करने का इशारा मिला। अमित ने अंचिता को अनदेखा करते हुए लाइट स्‍विच ऑफ कर दिया। अंचिता हड़बड़ाई। उसने अभी पूरी तरह से अपना बेडरोल बिछाया भी नहीं था।
वो बुदबुदाई, ‘स्‍टूपिड, ऑलवेज।’

हैंडबैग, मोबाइल, सिरहाना, रजाई.... संभालते हुए उसने पलटकर देखा। अमित अभी भी अजनबियों की तरह टैब में गुम थे, जैसे उसे पहचाना ही न हो !
कभी ढाई साल तक एक-दूसरे में खुद को ढूंढ़ने वाले दो लोग अब वाकई अजनबी थे। संवाद के बिना प्रेम कहां ? इस बीच सात साल भी तो गुजरे।
अंचिता के जीवन के वे सबसे सुनहरे पल थे। साथ घूमना, मोबाइल पर घंटों बतियाना, दर्द बांटना। अंचिता ने अपने जीवन के हर राज अमित के सामने खोल दिए थे। कुछ छिपा नहीं था दोनों के बीच। दोनों के इस रिश्‍ते को जाने-अनजाने निकले कुछ कड़वे शब्‍दों इस कदर खोखला कर दिया था कि इतने अरसे के बाद मिलने पर भी अजनबियों सा बर्ताव था।

गंदा आदमी ! अंचिता के ये आखिरी शब्‍द थे।

आधी रात को ट्रेन रतलाम स्‍टेशन पर खड़ी थी। अंचिता की आंखों में नींद का अता-पता नहीं था। कनखियों से बार-बार अमित को देखती। इस उम्‍मीद में कि शायद उसकी नजरें उसकी ओर घूमें। लेकिन वह तो टैब में गुम था।
चैटिंग ? हम्‍मममम! ‘दुनिया के सारे मर्द एक जैसे होते हैं’, अंकिता ने इस यकीन के साथ करवट बदल ली।

कुछ देर बाद अमित हौले से नीचे उतरे। महिला के माथे को ऐसे छुआ, मानों बुखार चेक कर रहे हों। तसल्‍ली होने पर उठने लगे तो महिला ने हाथ थाम लिया। कुछ बुदबुदाई। अमित ने मुस्‍कुराते हुए हौले से उसके हाथ को तसल्‍ली देने के अंदाज में दबाया। महिला फिर नींद के आगोश में चली गईं और अमित ने वॉशरूम का रुख किया।

अंचिता से रहा नहीं गया। अमित के जाते ही वह अपनी सीट से उठी और डिब्‍बे के दरवाजे के पास आकर खड़ी हो गई। वॉशरूम से बाहर आते ही अमित उसे खड़ा देखकर अचकचा गए। कोच अटेंडेंट इन सबसे बेखबर सो रहा था। कोटा आने में अभी दो घंटे थे।
अंचिता ने बड़ी हिम्‍मत जुटाकर वॉशबेसिन में हाथ धोते अमित से कहा, ‘हाय’।
‘कैसी हो ?
तो जनाब मुझे पहचानते भी हैं, अंचिता ने अपनी चिरपरिचत शैली में चिढ़ाने के अंदाज में कहा।
अमित का तीखा सा जवाब था, ‘पता नहीं, हम कल अजनबी थे या आज हैं।’
अंचिता को ये शब्‍द तीर की तरह लगे। फिर भी खुद को संभालती हुई बोली, ‘बाय द वे, ये औरत कौन है ?
मेरी पत्‍नी। अमित के इन दो शब्‍दों ने अंचिता की आंखों पर सब्र का बांध तोड़ दिया। खुद पर काबू करते हुए वह एनक को ‘नाक के ऊपर’ चढ़ाते हुए बोली, ‘कांग्रेट्स। लेकिन उसे हुआ क्‍या है ?
कैंसर। टर्मिनल स्‍टेज। शायद 3 से 4 माह और...।
अमित का चेहरा भावशून्‍य था। मानों जिंदगी के ज़ख्‍मों ने उसे पत्‍थर बना दिया था। अंचिता की आंखों से पहली बूंद छलक आई थी।
‘दिल्‍ली में ट्रीटमेंट के लिए ?’, अंचिता ने आखिरी सवाल दागा।
‘नहीं। उसके आखिरी पलों के इंतजार में...’, इतना कहकर अमित ने दरवाजा खोला और भीतर चले गए।

अंचिता जैसे जड़ हो गई थी। पुरुषों को लेकर उसकी तमाम धारणाओं पर आज बड़ा सवाल था। आज पहली बार जिंदगी की एक बेहद कड़वी सच्‍चाई ने उसे भीतर से झकझोर दिया था। उसे लगा कि वह अपने भीतर ढेर सारी गंदगी छिपाए हुए है। जैसे-तैसे उसने खुद को संभाला और वॉशरूम में घुस गई।
सीट पर पहुंचने पर पता चला कि अमित की आंखें लग चुकी थी।

सुबह के आठ बजे कोच के अटेंडेंट ने तीखी आवाज में ऐलान कर दिया कि दिल्‍ली आने ही वाला है।
डिब्‍बे में शोर बढ़ा तो चौंककर उठी अंचिता। न जाने कब उसकी आंख लगी। सिर अभी भी भारी था। बोझिल।
सिरहाने पर सफेद तकिए की एक पोर गीली थी। शायद ! उसकी आंखें सोई नहीं थीं।
नीचे देखा तो अमित अपनी पत्‍नी की तीमारदारी में जुटे थे। थर्मोस खुला था। दवाओं का बड़ा सा डिब्‍बा। ढेर सारी दवाएं। उम्‍मीदें। दुआएं।
कसमसाते हुए नीचे उतरी। मोबाइल चेक किया और खिड़की की ओर मुंह करके बैठ गई। उसे मंजिल पर पहुंचने की बेताबी हो रही थी।
अमित सामान पैक करने में जुटे थे। लेकिन अंचिता ने उसकी ओर ध्‍यान नहीं दिया। उसे लग रहा था जैसे उसने गंदा, बदबूदार कंबल ओढ़ रखा है। वह उसे जल्‍द से जल्‍द उतारना चाह रही थी।

अमित का मोबाइल बजा। ‘हां, बस पहुंचने ही वाले हैं...। बोगी नंबर ए3...’
शायद! प्‍लैटफॉर्म पर कोइ्र इंतजार कर रहा था। गाड़ी की स्‍पीड धीमी हो गई थी। जल्‍द ही प्‍लैटफॉर्म भी नजर आने लगा।

गाड़ी के रुकते ही अंचिता ने देखा, प्‍लैटफॉर्म पर एक व्‍हील चेयर खड़ी थी। साथ में दो पैरामेडिकल स्‍टाफ, एक महिला और एक व्‍यक्‍ति।
उसने अपना हैंडबैग संभाला। बैग को लगभग घसीटते हुए बाहर भागी। वह डिबबे की घुटन से बाहर निकलना चाहती थी।

मुसाफिरों के उतरने के बाद अंचिता ने देखा कि अमित ने अपनी पत्‍नी को बड़े जतन से प्‍लैटफॉर्म पर उतारकर व्‍हीलचेयर पर बिठा दिया था। आईवी फ्लूड लगी व्‍हील चेयर तेजी से बाहरी निकास गेट की ओर दौड़ने लगी। पीछे अमित और बाकी लोगों का कारवां।
अंचिता पीछे छूट गई थी...


10 साल बाद
अल सुबह मोहल्‍ले के पार्क में टहलते अंचिता को बेंच पर एक बुजुर्ग नजर आए। सफेद दाढ़ी में छिपा चेहरा और उसी से मेल खाते छितराए बाल। गर्मी की नर्म धूप में अखबार पढ़ते उस शख्‍स का चेहरा कुछ पहचाना सा लगा अंचिता को। कॉलोनी में पहली बार देखा था उसने।
थोड़ी दूर पर एक डंडा हाथ में लिए खड़े चौकीदार से उत्‍सुकतावश पूछ लिया तो पता चला, दो माह पहले ही भाड़े पर मकान लिया है इन्‍होंने। कोई लेखक हैं। किसी से मिलते नहीं। घर पर ही कैद रहते हैं।

अंचिता भी बड़े दिनों बाद पार्क में टहलने आई थी। कौन हैं ? लेखक ? घर में कैद रहकर क्‍या लिखते होंगे भला ? बिना मेलजोल के भी साहित्‍य सृजन हो सकता है क्‍या ? अंचिता जितना सोचती, दिमाग उतना ही उलझता। चौथे चक्‍कर में हांफती हुई वह उसी बुजुर्ग की बेंच पर आ बैठी।
‘एक्‍सक्‍यूज मी...’, अंचिता की पुकार पर कोई जवाब नहीं मिला। बुजुर्ग व्‍यक्‍ति की आंखें अखबार पर गड़ी हुई थीं।
‘मैंने कहा, एक्‍सक्‍यूज मी....’, इस बार अंचिता लगभग चीखते हुए बोली।
‘ओह हां। कहिए...’, बुजुर्ग ने अखबार से आंखें हटाए बिना जवाब दिया।
‘आप यहां नए आए हैं ? बात बढ़़ाने के अंदाज से अंचिता बोलीं।
‘जी।’ इस छोटे से जवाब के बाद भी बुजुर्ग की नजरें अखबार से नहीं हटीं।
‘मैं वहां दूसरी मंजिल पर बी 1 में रहती हूं। और आप ?
‘पता नहीं। यहीं कहीं सामने ही...’, बुजुर्ग के ऐसे टके से बेरुखी भरे, उलझे जवाब की अंचिता को उम्‍मीद नहीं थी।
उसने सोचा, शायद डिस्‍टर्ब हो रहे हैं। हाथ हिलाकर बाय कहते हुए वह चलती बनी।

दो दिन बाद अंचिता ने सुबह पार्क में फिर उसी बुजुर्ग को बेंच पर बैठा पाया। इस बार साथ में एक डायरी भी थी। अखबार पढ़ते हुए वे कुछ लिखते भी जा रहे थे। अंचिता ने पहले मिजाजपुर्सी के बारे में सोचा, फिर पहली मुलाकात ध्‍यान आते ही आगे बढ़ चली।

पूरे एक माह तक यही सिलसिला जारी रहा। अंचिता जब भी बेंच पर बैठे बुजुर्ग से बात करने की सोचती, उसका ऐनक नाक से नीचे आ जाता।

वैशाख लगने को था। चिपचिपी गर्मी रात को भी चैन से सोने नहीं देती थी। लेकिन आज अंचिता ने अलसुबह बहुत बुरा सपना देखा और चौंककर उठ बैठी। दिल बैठा जा रहा था। फटाफट कॉफी बनाई और सोचा कि सुबह पार्क की सैर कर लें।

लेकिन बेंच पर बुजुर्ग नजर नहीं आए। सोचा, शायद शहर से बाहर होंगे।
शाम को दफ्तर से लौटी तो डी ब्‍लॉक के सामने एंबुलेंस और भीड़ जमा दिखी। किसी आशंका से घबराकर उसने जल्‍दी कदम बढ़ा लिए। पता चला कि कोई शर्मा जी थे। अकेले रहते थे। उनका इंतकाल हो गया।

अंचिता ने चूल्‍हे पर चाय चढ़ाई ही थी कि कॉल बेल बजी। कौन होगा ? आशंकित दिल से उसने दरवाजा खोला। सामने मिसेज मोहिते खड़ी थी।
अंचिता ने मुस्‍कुराकर कहा, ‘किस्‍मतवाली हैं आप। अभी चाय चढ़ाई थी।’
‘पता है, हमारी बाई ही उन शर्मा जी के यहां खाना, बर्तन करती थी। आज शाम दरवाजे की घंटी बजाई। जब देर तक दरवाजा नहीं खुला तो उसने मुझे आवाज दी।’ मिसेज मोहिते कहती ही जा रही थीं। ‘मैंने डी ब्‍लॉक के वरूण को बुलाया। उसने खिड़की से झांककर देखा तो पाया शर्मा जी बिस्‍तर से नीचे औंधे पड़े हैं। हमने पुलिस को बुलाया। शायद हार्ट अटैक था। कहते हैं, उनकी आंखें खुली हुई थीं।’
अच्‍छा ! चौंककर कहा अंचिता ने।
‘हां, अकेले थे बेचारे। पत्‍नी की कैंसर से मौत हुए 10 साल बीत गए। फिर यहां-वहां भटकते हुए इस मकान में आए थे।’
कैंसर ? ? ? ? अंचिता ने हड़बड़ाकर पूछा, ‘उनका पूरा नाम क्‍या था ?
‘अमित शर्मा...’

नाम सुनते ही अंचिता के हाथों से चिमटा छूटकर नीचे जा गिरा। मिसेज मोहिते ने हड़बड़ाते हुए उसे संभाला और बाहर कुर्सी पर बिठा दिया।
‘क्‍या तुम जानती थी उन्‍हें ?
हां...नहीं तो ! अंचिता ने नीचे गिरी ऐनक को उठाकर टेबल पर रखते समय आंसू पोंछ लिए।
क्‍या हुआ ? सब ठीक तो है ? – मिसेज मोहिते ने पूछ ही लिया।
‘बस कुछ नहीं। आंखों में कुछ चला गया था।’ अंचिता की जुबां साथ नहीं दे रही थी। आज सुबह उसने कुछ इसी तरह का बुरा सपना देखा था।
‘आंखें खुली हुई थीं....... आंखें खुली हुई थीं....... आंखें खुली हुई थीं.......’
बस यही शब्‍द उसके जेहन में बार बार उभर रहे थे।
‘आंखें खुली हुई थीं.....’ का क्‍या मतलब होता होगा ? बात को घुमाने के अंदाज में उसने मिसेज मोहिते से पूछ लिया।
‘पता नहीं। शायद उन्‍हें आखिरी समय तक किसी का इंतजार रहा हो। सुना है, ऐसे लोगों की रुहें भटकती हैं।’ मिसेज मोहिते अपनी चाय खत्‍म कर चुकी थी।
‘अब मैं चलती हूं। अपना ध्‍यान रखा करो। 50 पार कर चुकी हो...’ कहते हुए मिसेज मोहिते ने घर की राह पकड़ ली।
‘आंखें खुली हुई थीं.....’, ‘शायद उन्‍हें आखिरी समय तक किसी का इंतजार रहा हो।’
दोनों शब्‍दों ने अंचिता को हिलाकर रख दिया था। उसका मन हो रहा था कि वह बुक्‍का फाड़कर रोए। तभी उसे पुलिस की गाड़ी की आवाज सुनाई दी। वह बाहर भागी। दौड़कर डी ब्‍लॉक तक पहुंची।

अमित का आखिरी सफर शुरू हो चुका था। स्‍ट्रेचर पर लेटे उस बुजुर्ग की आंखें बंद थीं। सीने पर हाथ रखे बेफिक्री की नींद सोए थे अमित...
(समाप्‍त)


Disclaimer: इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं पूर्णत: काल्‍पनिक हैं। किसी के व्‍यक्‍तिगत जीवन या उससे जुड़ी बातों से इनका कोई लेना-देना नहीं। किसी के लिए यथार्थ और काल्‍पनिकता के बीच बेहद महीन फर्क हो सकता हैलेकिन इसके लिए लेखक की कल्‍पनाशीलता और रचनात्‍मकता कतई जिम्‍मेदार नहीं है।   

रविवार, 14 अक्तूबर 2012

मैंने कहा था (14) : ‘ नाऊ, यू आर नथिंग टू मी ’

अमित को ठीक से याद नहीं। हां ! शायद मार्च का आखिरी सप्‍ताह रहा होगा। अमित को आज मुंबई रवाना होना है। अंचिता के शहर। बीती रात ही उसने पैकिंग कर ली थी। अंचिता की पसंदीदा चॉकलेट रखना नहीं भूला। और हां, उसके लिए हेडफोन जैक भी। अंचिता के हेडफोन जैक को चूहे कुतर गए थे।
शाम तक चार फोन आ चुके थे अंचिता के। उसे अमित के आने में संदेह था। हर बार वही सवाल, ‘ट्रेन कितने बजे की है ? घर से कब निकलेंगे ?’ और साथ में हिदायतें भी, ‘दादर उतरकर वेस्‍टर्न लाइन पकड़नी है। कोई दिक्‍कत हो तो मुझे फोन कर देना....वगैरह।’ जब शहर बड़ा लगने लगे तो बाकी दुनिया छोटी लगती है। अंचिता को डर लग रहा था कि कहीं अमित भटक न जाएं।
शाम को रेलवे स्‍टेशन के लिए निकलते समय अमित ने अंचिता को मैसेज किया। मूविंग टुवर्ड्स स्‍टेशन... सी या इन मुंबई टुमॉरो...। स्‍टेशन पहुंचने के बाद अंचिता का मैसेज आया, ‘विल यू प्‍लीज रिचार्ज माय नंबर ?’ अमित ने अपने एक दोस्‍त को फोन लगाया और उसे अंचिता का नंबर रिचार्ज करने को कहा।
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ट्रेन सही वक्‍त पर दादर पहुंची। अमित ने लाव लश्‍कर के साथ लोकल के फर्स्‍ट क्‍लास का फुल डे टिकट (पास) कटवाकर वेस्‍टर्न लाइन का रुख किया। अभी डेढ़ घंटे का सफर बाकी था। अंचिता का फ्लैट स्‍टेशन से पांच मिनट के वॉक पर था। उसने कह रखा था कि वो स्‍टेशन आ जाएगी।
लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उसे देर हो गई थी। अमित ने फोन लगाया तो वो रास्‍ते में थी। थोड़े इंतजार के बाद अंचिता अचानक प्रकट हुई। बेहद छुईमुई सी, शर्माते हुए उसने पूछा, ‘रास्‍ते में कोई प्रॉब्‍लम तो नहीं हुई ?
18 साल की उम्र से अकेले देश की खाक छान चुके अमित ने मुस्‍कुराकर कहा, ‘नहीं। मुंबई मेरे लिए नया नहीं है।’  

अंचिता का घर एकदम साफ सुथरा था। दरवाजा खोलते ही वह बड़ी नजाकत से बोली, ‘ये है मेरी छोटी सी दुनिया।’ कुल जमा दो कमरे। बीच में किचन और उसके ठीक सामने गुसलखाना। मार्च के मौसम में भी मुंबई चिपचिपाहट भरी गर्मी से बेहाल थी और अमित भी। अंचिता के मकान में खिड़कियां तो बहुत थीं, पर बंद। पसीने से नहा रहे अमित ने फौरन सामान अनपैक कर अंचिता को चॉकलेट भेंट की और नजराने में हेडफोन जैक भी। बड़े नाजों-नखरे के बाद अंचिता ने उसे यूं एक तरफ रखा मानों कोई जबर्दस्‍ती थोपी हुई चीज हो।
अमित को अंचिता का स्‍वभाव मालूम था, लिहाजा उसने ज्‍यादा बहस नहीं की। गर्मी से निजात पाने अमित फटाफट गुसलखाने की ओर भागा। बाहर निकला तो देखा अंचिता पूजा कर रही है। पहली बार ईश्‍वर के सामने सिर झुकाते देखना अमित के लिए चौंकाने वाला था। अंचिता फोन पर अक्‍सर कहती, ‘मेरा भगवान पर से भरोसा टूट गया है।’ हालांकि सोमवार का व्रत वह किसी भी कीमत पर जरूर करती।
यह विरोधाभास अंचिता के व्‍यवहार में भी झलकता था। छोटे से मसले को भी अबूझ पहेली बना देना, कभी हां तो कभी ना के बीच एक अजीब सी उलझन झलकती थी उसमें। उसे खुद पर यकीन नहीं था। अतीत की उस काली परछाई के लिए स्‍वयं को ही दोषी मानती थी और यही उसके अविश्‍वास की बड़ी वजह भी थी। उसे ऐसा कोई नहीं मिला था, जो उसके खोए हुए आत्‍मविश्‍वास को वापस पाने में मदद करता।

करीब 10 मिनट बाद अंचिता का पूजा-पाठ (अंग्रेजी के साथ संस्‍कृत में भी खासा दखल है अंचिता का) खत्‍म हुआ। उसका खुशनुमा चेहरा बता रहा था कि उसकी कोई खास मुराद आज पूरी हुई है। उनसे कहा, ‘नाश्‍ते में वड़ा-पाव चलेगा ?
अमित ने भी फौरन जवाब दिया, ‘क्‍यों नहीं। हम भी देखें कि वड़ा-पाव खाकर तुम कैसे गुजारा कर लेती हो।’ अंचिता की कॉलोनी के बाहर वड़ा-पाव की दुकान थी। कोई 11 बज रहे होंगे, पर दुकान में भीड़ थी। तेज रफ्तार वाले शहर मुंबई में जब आपको सुबह आठ बजे की लोकल पकड़नी हो तो वड़ा-पाव ही पेट भरता है। आलू की सब्‍जी को बेसन में लपेटकर फ्राई करके बने वड़े को कहीं आलू बड़ा तो कहीं आलू बंडा के नाम से हरी मिर्च के साथ चाव से खाया जाता है। लेकिन पाव यानी बन्‍स के साथ इसे खाने का अभिनव तरीका मुंबइकरों की देन है। अपने बैग में वड़ा-पाव रखकर वे बेफिक्री से दो घंटे का सफर तय कर लेते हैं। 20 रुपए में इससे बढ़िया, टिकाऊ और आसानी से ले जा सकने वाला नाश्‍ता और क्‍या होगा।
वड़ा-पाव के साथ कुछ तजी सब्‍जियां भी आ गईं। अंचिता के पास रेफ्रिजरेटर नहीं है, सो तकरीबन रोज सब्‍जियां ताजी ही खरीदी जाती हैं।
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वड़ा-पाव खाने के बाद अंचिता ने अपने कंप्‍यूटर से जुड़े प्‍लेयर में गजलें चालू कर दीं। अमित कंप्यूटर पर हिंदी टाइपिंग का की-बोर्ड इस्‍तेमाल करता है। एक खास तरह का सॉफ्टवेयर। अमित अपने साथ पेन ड्राइव में सॉफ्टवेयर साथ लाया था। उसने उसे इंस्‍टॉल कर टाइपिंग शुरू की तो अंचिता की खुशी का ठिकाना न रहा। इस सॉफ्टवेयर को लेकर अमित और अंचिता की कई बार फोन पर लंबी बहस हुई थी। अंचिता के दोस्‍तों ने उसे किसी और सॉफ्टवेयर का नाम सुझाया था और वह उसे ही सच मान बैठी थी। उसे लगा कि वह कभी हिंदी में टाइप नहीं कर पाएगी। रोमन हिंदी से की काम चलाना पड़ेगा। लेकिन अमित ने उसके सारे भ्रम आज दूर कर दिए थे। फिर भी अंचिता को यकीन तब हुआ, जब उसने धीमे-धीमे अपना नाम टाइप कर लिया।
अंचिता – वाह, मान गए जनाब। अब आप कुछ अच्‍छी गजलें और गाने मेरे मोबाइल पर डाल दो। मैं किचन संभालती हूं।
अमित – मैं भी आता हूं मदद करने।
अंचिता – आप रहने दीजिए। हम खुद पका लेंगे।
अमित – ऐसा कैसे हो सकता है। दोनों को खाना है। मिलकर पकाएंगे, तभी मजा आएगा।
अमित ने गानों का पूरा बंच पेन ड्राइव से निकालकर पहले कंप्‍यूटर और फिर अंचिता के मोबाइल में उड़ेल दिया। इसमें समय लगना था, सो वह अंचिता के किचन में जा घुसा। देखा, पुलाव की तैयारी हो रही है।
अमित – कुछ काटना, छीलना हो तो दो। अंचिता ने बेमन से उसे आलू, टमाटर, मिर्च, गाजर और शिमला मिर्च पकड़ा दिया। अमित भी खुशी के साथ अपने काम में जुट गया। लेकिन इसी बीच, उसने पुलाव बनाने की ट्रेनिंग भी ले ली। कुकर में कितना पानी और पूरी प्रोसेस उसे बड़े काम की लगी।
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अगले एक घंटे में खाना तैयार था। बाहर के कमरे में ही नीचे बिछे गद्दे पर दस्‍तख्‍वान सजा अखबार के पन्‍नों के बीच। अमित के लिए कुछ भी नया नहीं था, क्‍योंकि ऐसी अकेली जिंदगी उसे खूब भाती है। कोई नियम नहीं, कोई बंदिश नहीं। लंच के बाद अंचिता को बहुत सा काम करना था। पैकिंग, किचन की सफाई और पानी की टंकी को भरना। मुंबई में पानी मानों खैरात में मिलता है। टाइम पर उठकर पानी भर लिया तो ठीक, वरना चिपचिपी गर्मी में सिर्फ मुंह-हाथ धोकर ही काम चलाना मजबूरी हो जाती है।
खाना खाकर अमित वापस गद्दे पर पसर चुका था। ट्रेन के सफर में कभी नींद ठीक से नहीं आती, सो आंखें बोझिल हो रही थीं। लेकिन बेहद चिपचिपे माहौल ने उसे बेचैन कर रखा था। किसी तरह वह पंखे के नीचे राहत की उम्‍मीद में आंखें बंद किए बैठा रहा, फिर कब आंख लगी उसे भी नहीं मालूम।
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आंख खुली तो देखा, अंचिता अपनी पैकिंग कर चुकी थी। अमित ने भी दो दिन गुजारने लायक कपड़े और रोजमर्रा के सामान बैकपैक में रख लिया। बस के सफर में स्‍ट्रॉलीबैग ले जाना बेवकूफी ही थी, खासकर तब जबकि लोकल का सफर भी करना हो।
शिर्डी के लिए दादर से सीधे वॉल्‍वो मिलती है। अंचिता ने पहले ही बुकिंग करवा रखी थी। रातभर का सफर सुबह शिर्डी साईंधाम पहुंचाता है। दादर के रास्‍ते में अमित ने अंचिता के लिए ढेर सारी टॉफियां खरीद लीं। अंचिता को मोशन सिकनेस की शिकायत है। चलती कार या बस में उसे उल्‍टी आती है। अमित के पास वैसे दवा भी मौजूद थी, पर उसे लग रहा था कि इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी।
अंचिता ने बस की टिकट करवाते समय एक गलती कर दी थी। उसने कॉमन सीट बुक कराई थी, जिसमें दो लोग सोकर जा सकते हैं। बस में चढ़ने के बाद दोनों को इसका अहसास हुआ। पर अब क्‍या हो सकता था, क्‍योंकि कंडक्‍टर के पास पीछे की दो अलग सीटों का विकल्‍प जरूर था, पर वहां झटकों के चलते अंचिता की हालत और बिगड़नी थी, सो यथास्‍थिति रखने का फैसला हुआ। हिचकते हुए दोनों सीट पर बैठे कि बस चल पड़ी। साथ ही शुरू हुईं अंचिता की उल्‍टियां। एयरकंडीशंड बस की खिड़की आसानी से नहीं खुलती। लेकिन इन हालात में खोलनी पड़ी। तीन-चार उल्‍टियों और दवा लेने के बाद अंचिता बेजान सी लेट गई। थका-मांदा अमित भी संकोच छोड़कर उल्‍टी दिशा में जा लेटा।
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सुबह पांच बजे बस शिर्डी जा पहुंची। बस के हिचकोलों ने अमित को तकरीबन सारी रात जगाए रखा था। हालांकि, अंचिता पहले की तरह तरोताजा दिख रही थी। शिर्डी में अकेले आने वाले भक्‍तों के लिए होटल में जगह मिलना टेढ़ी खीर है। शिर्डी के विश्रामालय भी पूरे भरे हुए थे। करीब डेढ़ घंटे तक खाक छानने के बाद एक होटल में दो अलग कमरे मिले। पूरे दो दिन के पड़ाव में शनि शिंगनापुर जाना भी तय था। ऐसा माना जाता है कि वहां गए बगैर शिर्डी की यात्रा अधूरी होती है। देर शाम तक मंदिर में घूमने के बाद दोनों किसी बात पर (शायद अंचिता की कोई बात अमित को बहुत बुरी लग गई) लड़ बैठे।
अगली सुबह अंचिता ने खुद मुंह फुलाकर बैठे अमित को मनाया। दोनों ने शनि शिंगनापुर के दर्शन किए और रात वापसी की बस पकड़ी। शनि शिंगनापुर से वापसी के रास्‍ते में अमित ने अंचिता से कहा था, ‘आज मैं तुमसे कुछ पूछूंगा। उसका सही जवाब देना।’ यह सुनकर अंचिता उतावली जरूर हुई, पर अमित ने मसला वहीं पर टाल दिया।
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शिर्डी से वापसी की बस में दोनों की सीटें अलग थीं। अपना बैग रखकर अमित ने अंचिता की सीट में झांका। खामोशी से बैठी थी अंचिता। अमित ने उससे पूछा, ‘क्‍या मुझसे शादी करोगी ?
अंचिता ने जवाब देने में एक क्षण नहीं गंवाया। बोली, ‘नो।’
अमित की आंखें नम हो गईं। बस की धीमी रोशनी में वह यकायक नजर नहीं आईं। अमित ने अंचिता को धीमे से गुडनाइट कहा और अपनी सीट पर जा लेटा। उसकी आंखों से आंसू नहीं थम रहे थे। अंचिता को लेकर उसके तमाम ख्‍वाब ताश के पत्‍तों की मानिंद बिखर चुके थे।
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सुबह करीब साढ़े चार बजे जब अमित की नींद खुली तो पाया, सिरहाने रखा तकिए का कवर बहते आंसुओं से गीला हो चुका था। खिड़की से बाहर मुंबई शहर की आमद साफ नजर आ रही थी। उसे अचानक उकताहट हुई। सीट से नीचे उतरा और अंचिता को जगाया। अंचिता भड़भड़ाकर अमित को देखने लगी। उसे अमित से शायद किसी प्रतिक्रिया की उम्‍मीद थी। लेकिन उसे अमित के चेहरे पर कोई भाव नहीं दिखे।
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उसी शाम अमित को खुद स्‍टेशन छोड़ने आई थी अंचिता। उसके चेहरे से साफ झलक रहा था कि उसे अमित का लौटना बर्दाश्‍त नहीं हो रहा है। सुबह से गंभीर दिख रहा अमित चाहकर भी माहौल को हल्‍का नहीं कर पा रहा था। ट्रेन में सवार होते समय अमित का दिल जार-जार रो रहा था। उसने हौले से अंचिता को बाय कहा और अपनी सीट पर जा बैठा।
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अंचिता और अमित की वह आखिरी मुलाकात थी। घर लौटने के बाद अमित ने अंचिता को पहली लाइन यही कही थी, ‘फ्रॉम नाऊ, वी विल बी जस्‍ट ए फॉर्मल फ्रेंड। सो बिहेव विथ मी, एज ए डिस्‍टेंट वन।’ जवाब में अंचिता ने इसे फौरन नकार दिया। उसने अपनी ‘ना’ को सही ठहराने के कई कारण बताए, लेकिन अमित अपनी शर्त पर कायम था। उसके लिए इस रिश्‍ते में सारे जज्‍बात खत्‍म हो चुके थे।
उसने कहा, ‘शादी नहीं तो सगाई भी सही। इसके बिना बात नहीं बनेगी।’ उसने एक रोडमैप भी बनाकर अंचिता को बताया। लेकिन अंचिता नहीं मानी।
एक दिन बाद अंचिता ने अमित से फिर पहले जैसे दोस्‍ताना अंदाज में बात करने की कोशिश की तो अमित ने शादी की शर्त फिर सामने कर दी।
अबकी बार अंचिता ने वह बात कह दी, जिस पर यकीन कर पाना अमित के लिए ख्‍वाब में भी मुमकिन नहीं था।
अंचिता – यू वांट माय बॉडी। यू डोंट वांट अंचिता। वी कैन ओनली बी वेरी गुड फ्रेंड्स।
उसके इन शब्‍दों ने अमित की रुह को छलनी कर दिया। तमतमाए अंदाज में उसने कहा, ‘गुडबाय अंचिता। नाऊ, यू आर नथिंग टू मी। नेवर कांटेक्‍ट विथ मी अगेन।’
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इस बात को अब शायद पांच महीने या उससे ज्‍यादा हो रहे हैं। अमित आज तक अंचिता को नहीं भूल सका है और वह भूलना भी नहीं चाहता।
अंचिता ने इस दौरान कई मौकों पर अमित ने बात करने की कोशिश की, पर हर बार उसने अमित की बातों में परायापन देखा।

दोनों के लिए शायद देर हो चुकी थी। उनके रिश्‍तों में इतनी गांठें पड़ चुकी थीं कि सुलझाने में उम्र बीत जाती।

आज
अमित की जिंदगी फिर उन पटरियों पर चल रही है, जो कभी नहीं मिलतीं। और... अंचिता ?  उसके गुरुर ने अभी तक उसके दिमाग पर परदा डाल रखा है।


 समाप्‍त   


Disclaimer: इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं पूर्णत: काल्‍पनिक हैं। किसी के व्‍यक्‍तिगत जीवन या उससे जुड़ी बातों से इनका कोई लेना-देना नहीं। किसी के लिए यथार्थ और काल्‍पनिकता के बीच बेहद महीने फर्क हो सकता है, लेकिन इसके लिए लेखक की कल्‍पनाशीलता और रचनात्‍मकता कतई जिम्‍मेदार नहीं है।   

हर बार की तरह फिर एक गाना 

सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

मैंने कहा था (13) : ‘आई हैव ऑल द राइट्स’

आज पूरे तीन दिन हो चुके थे अंचिता की रवानगी को। इस बीच उसका सिर्फ एक मैसेज आया था मुंबई पहुंचने के बाद। ‘आई हैव रीच्‍ड होम सेफली। अंशु वाज देयर एट स्‍टेशन।’ उधर अमित भी चार दिन से पेंडिंग पड़े काम को निपटाने में मशगूल हो गया। उसकी जिंदगी मानों हवा में उड़ रही थी। वह खुश था कि कोई उसे पसंद करता है। वह कोई ऐसी-वैसी लड़की नहीं, अंचिता थी। उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें, उसकी हंसी और शरारतें मानों अमित की यादों में हमेशा के लिए बस गई थीं।
अंचिता की विदाई के बाद उसने सबसे पहला काम झील के किनारे उतारी गईं कुछ बेहद खूबसूरत तस्‍वीरों को अपने बेडरूम की दीवार पर सजाने के तौर पर किया। पिछले दो दिन से वह देर रात तक इन तस्‍वीरों को देखकर कभी बुदबुदाता, कभी हंसता तो कभी कविताएं लिखने बैठ जाता। उसे हमेशा अहसास होता, मानों अंचिता उसके इर्द-गिर्द ही है।
कोई दो महीने बाद अंचिता मुंबई लौटी थी। क्‍या हो रहा होगा वहां ? कहीं किसी परेशानी में तो नहीं है ? फोन क्‍यों नहीं किया उसने ? इन्‍हीं कुछ सवालों के साथ सुबह की शुरुआत हुई थी अमित की। उसने अंचिता का फोन ट्राय किया तो वह अनरीचेबल आया। अंचिता रिलायंस का सीडीएमए नेटवर्क यूज करती है और मुंबई शहर के दूसरे कोने पर बने उसके फ्लैट में नेटवर्क की समस्‍या अक्‍सर आड़़े आती है। अक्‍सर ऐसा होता है कि अंचिता को सिग्‍नल के लिए खिड़की के करीब आकर बात करती है।
दोपहर को काम से फुर्सत पाकर अमित ने अंचिता को फिर कॉल किया। मैडम इस कदर गहरी नींद में थीं कि सिर्फ ऊं...ऊं.... ही सुनाई पड़ा। घबराकर अमित ने मैसेज किया, ‘व्‍हाट हैप्‍पंड, आर यू ओके ?’ कोइ्र जवाब नहीं। देर शाम अंचिता ने बताया कि गर्दन में दर्द के मारे बुरा हाल था। डॉक्‍टर ने एक पेन किलर दिया था, जिसके कारण वह कई घंटे तक सोती रही। उसने एक और बुरी खबर सुनाई : उसके अखबार का वाइंड अप हो रहा था। बड़े ही ढोल धमाके के साथ शुरू किया गया अखबार महज चार महीने के भीतर दिवालिया होने की कगार पर था।
यह सुनकर अमित का जवाब क्रूर किस्‍म का था (जिसका अहसास उसे बाद में हुआ) – अब आगे क्‍या सोचा ?
अंचिता – देखते हैं, किस्‍मत कहां ले जाती है। मैंने अपने नेटवर्क को टटोला है। उम्‍मीद है कुछ हो जाएगा।
अमित – मैं कुछ कोशिश करूं ?
अबकी बार अंचिता ने क्रूरतम जवाब दिया – रहने दीजिए। देख ली आपकी कोशिशें। अब और नहीं !
अमित को फौरन याद आया अंचिता का वह मैसेज, जो उसने रवानगी के बाद भेजा था। उसने पूछा, ‘क्‍या वाकई मेरे शहर आकर तुमने गलती की ?
अंचिता – हां। न आती तो यूं मुझे खाली हाथ लौटने का अफसोस नहीं होता।
इस जवाब के बाद बहस की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती। लिहाजा अमित ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उसने सहज ही उस अपमान को गुटक लिया, जो उसे एक तमाचे की तरह लगा था। अमित के लिए यह एक झटका था, क्‍योंकि अब वह अंचिता को काफी करीब से महसूस करने लगा था। थोड़े भारी मन से उसने मान लिया कि तनाव की स्‍थिति में अक्‍सर जुबां साथ नहीं देती। इसे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। बस अंचिता की एक बात मन में खटक रही थी। वह खाली हाथ लौटी है।
अमित सोचने लगा, ‘क्‍या अंचिता की कही बातें, वे नर्म, गुनगुने अहसास, वे आंसू क्‍या बेमानी थे ? उसे याद करने पर बढ़ती दिल की धड़कन क्‍या झूठ बोल रही है’ ?  बीते तीन महीनों में अंचिता से उसका जुड़ाव इस कदर गहराया था कि खाते समय गले में लगा ठसका भी उसे उसी की याद दिलाता। फिर कुछ ही सेकंड में अंचिता का कॉल भी आ जाता।
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अगले एक पखवाड़े तक दोनों के रिश्‍ते काफी उथल-पुथल भरे रहे। मानों, भूचाल आने के बाद कुदरत अपनी गलतियों को सुधारने की कोशिश में जुट जाती है। एक अच्‍छी बात यह रही कि दोनों के बीच खूब बातें होतीं। अमूमन अमित के फोन पर। अंचिता मानों इसकी आदी हो चली थी। गर्दन की चोट और डिप्रेशन ने उसे लाचार कर दिया था। जब कभी बोर होती, अमित को मिस्‍ड कॉल करती। अमित ने भी शायद ही कभी कन्‍नी काटी हो। खासकर देर शाम से दोनों आधी रात तक बातें करते। शनिवार और रविवार अंचिता का लगभग सारा समय बहन और उसके बेटे के साथ बीतता। अमित के लिए ये दोनों दिन सुकूनभरे थे, क्‍योंकि अंचिता उन पलों को खुलकर जीती थी।
अंचिता को अमित की बड़ी फिक्र होती। ‘नाश्‍ता, रात का खाना टाइम पर। मीठा कम खाया करें, सिगरेट, शराब न पीया करें’- जैसी हिदायतें आमतौर पर सुनने को मिलतीं। उस पर तुर्रा यह कि वह अमित को सफाई का कोई मौका नहीं देती थी।
अमित ने एक बार उसे टोका भी था, ‘तुम किस हक से मुझे ये नसीहतें देती हो ?
जवाब मिला, ‘आई हैव ऑल द राइट्स। हम आपके सबसे अच्‍छे दोस्‍त हैं और रहेंगे। इसलिए आपको हमारी बात माननी ही होगी।’
अमित – अजीब दादागीरी है। अगर न मानें तो ?
अंचिता – तो आपके शहर आकर उठा-उठाकर पटकेंगे।
लेकिन, अमित की सलाहों के लिए अंचिता दोनों कानों का इस्‍तेमाल करती थीं। एक से सुना और दूसरे से निकाल दिया। दोस्‍ती के शुरुआती दिनों से उसका यही रवैया था। रात को मैगी, दिन में वड़ा-पाव या तहरी (खास तरह की? रसेदार सब्‍जी) से काम चल रहा था अंचिता का।
अमित समझ पा रहा था कि अंचिता का खालीपन उसे हताशा के गर्त में धकेल रहा है। लेकिन वह लाचार था। उसे मालूम था कि एक अच्‍छी नौकरी के लिए अंचिता को काफी मेहनत करनी होगी। अंचिता ने बीएड किया हुआ था। एक दिन बातों-बातों में अमित ने उसे टोका, ‘तुम टीचिंग क्‍यों नहीं ऑप्‍ट करती ?
इस पर अंचिता का जवाब भी लाजवाब कर देने वाला था। ‘यू नो ? दोस्‍ती के नाम पर दगा देने वाले उस शख्‍स ने मुझे चुनौती दी थी कि मैं कुछ नहीं कर पाऊंगी। लेकिन मैं उसे गलत साबित करके रहूंगी।’
असल बात यह थी कि अंचिता अपने परिवार के सामने यह नहीं जताना चाहती थी कि उसका करियर चौपट हो रहा है, उसके पास नौकरी नहीं है और बेहतर जॉब के रास्‍ते में उसके सामने कई कठिनाइयां हैं। जब कभी मां का फोन आता, वह यही कहती, ‘सब ठीक है। थोड़ी उठापटक जरूर है, पर सब ठीक हो जाएगा। परेशान मत होना।’ मुंबई की भीड़ में अकेला होना उसे रास आ रहा था। केवल उसके जीजा अंशु उसकी परेशानियां समझते थे। अमित की तरह वे भी उसे टीचिंग फील्‍ड अपनाकर घर बसा लेने की समझाइश देते। इन बातों पर अंचिता अपने से दो साल छोटे अंशु से लड़ लिया करती।
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अंचिता अपने पहले प्‍यार ? की तरफ से पेश चुनौती को अपने तरीके से गलत साबित करना चाहती थी। उसके साथ काम करने वाले उसे दिलासा भर दे देते, मदद नहीं कर रहे थे। कुछ पुराने परिचितों के अपने ‘स्‍वार्थ’ भी थे। कोई उसे फिल्‍म का ऑफर देता तो कोई उसे ‘डेट’ पर चलने को कहता।
एक दिन अंचिता ने झल्‍लाकर फोन पर कहा, ‘एक लड़की का अकेले रह पाना बहुत मुश्‍किल है।’
अमित – तो शादी कर लो। अमित को बदले में अंचिता के जवाब का अंदाजा था। ( उसने कई बार कहा था कि वह शादी नहीं करेगी। उसे इन रिश्‍तों पर कोई यकीन नहीं रहा था। शायद वह सभी रिश्‍तों को अपने बीते कल से जोड़कर देखती थी। )
अंचिता – मैंने आज सुबह मां से आपके बारे में बात की।
अमित के लिए यह जवाब चौंकाने वाला था। ‘मेरे बारे में ? क्‍या बात की ?
अंचिता – मैं मुंबई से कभी अकेले बाहर नहीं गई। हिम्‍मत ही नहीं हुई। सोचा है कहीं घूमकर आऊं आपके साथ। इसलिए इजाजत लेनी थी।
अमित – क्‍यों एक गलती काफी नहीं है क्‍या, जो एक और करना चाहती हो ?
अंचिता – आई एम वेरी सॉरी। पर बीते दो माह में काफी कुछ बदल चुका है।
अमित – क्‍या बदला है ?
अंचिता – हम आपसे बात किए बिना, आपके बारे में सोचे बिना नहीं रह सकते। यहां तक कि.... अब आप मेरे ख्‍वाबों में भी आने लगे हैं।
अंमित – वहां भी डांट ही लगाई होगी।
अंचिता – जो भी हो। मां ने इजाजत दे दी है। हमें आपके साथ शिर्डी जाना है... और वो भी जल्‍दी।
अमित – इतनी जल्‍दी मुमकिन नहीं है। मुझे परसों एक सेमिनार में जाना है तीन दिन के लिए। मैं नेटवर्क एरिया में नहीं रहूंगा, सो बात भी नहीं होगी। लौटकर मैं टिकट करवाता हूं।
अंचिता – प्रॉमिस ?
अमित – श्‍योर।
(अमित फिर पसोपेश में था। अंचिता मेरे साथ क्‍यों जाना चाहती है ? क्‍या वाकई कुछ बदला है या फिर वही ‘दोस्‍ती’ और ‘गहरे दोस्‍त’ तक ही बात सीमित है। ऐसा नहीं है कि अमित को अंचिता से पहली बार इस कदर लगाव हुआ हो। अंचिता के भाई की शादी के समय उसे पेन किलर खाकर सारा बंदोबस्‍त खुद करते और हर छोटी-बड़ी बात का पूरा ध्‍यान रखते देखकर वह उस पर वहीं फिदा हो गया था। अमित ने अपने लिए हमेशा एक समझदार, सुसंस्‍कृत लड़की का ख्‍वाब संजोया था, जो पत्‍नी नहीं बल्‍कि एक दोस्‍त के नाते उसकी जिंदगी पर पूरा हक रखे। उसकी चाहत उस समय और जवां हो गई, जब बारात निकलने के समय बनारसी साड़ी में अंचिता ने ऊपर खिड़की से अमित की ओर झांका और हौले से मुस्‍कुराई। बनाव-श्रृंगार से अमूमन दूर रहने वाली अंचिता वह अंदाज अमित के दिल को छू गया। बचपन में बहन के साथ गुड्डे-गुड़ियों की शादी रचाते पड़ोस की मराठी लड़की हर बार इसी तरह सजकर अमित के सामने आ जाती और कहती, ‘बताओ, मैं कैसी लग रही हूं ?’ फिर एक दिन उसी लड़की ने बड़े ही भोलेपन से अमित की मां से कहा था, ‘यही मेरा दूल्‍हा है।’ छह साल की उम्र में जुदा होने के बाद भी उस लड़की का चेहरा आज तक नहीं भूल सका है अमित। मासूम बचपन का अल्‍हड़पन वर्तमान के धरातल पर कभी-कभार ही टिक पाता है। विवाह समारोह से लौटने के बाद अमित ने सीधे-सपाट शब्‍दों में अंचिता से अपने दिल की बात कह दी थी। हालांकि, उतने ही सपाट शब्‍दों में अंचिता ने उसे बड़ी बेरहमी से ठुकरा भी दिया था। )
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एक और सफर की शुरुआत। वह सफर जो झांसी स्‍टेशन से शुरू हुआ था। उस सफर के बाद अमित दो कदम आगे बढ़ा, लेकिन अंचिता ने एक कदम बढ़ाकर पीछे खींच लिए थे। शायद वह अमित की और परीक्षा लेना चाहती थी।
कॉन्‍फ्रेंस में रवाना होने से एक दिन पहले अमित ने अंचिता को फोन पर दोनों के मनमाड़ तक की बुकिंग कन्‍फर्म होने की बात कही। थोड़े नखरे दिखाने के बाद अंचिता ने बात मान ली। मनमाड़ से ढाई घंटे का सफर टैक्‍सी से पूरा होना था।
तीन दिन बाद कॉन्‍फ्रेंस से लौटते हुए अमित का फोन जैसे ही नेटवर्क पर आया, उसे धड़ाधड़ आधा दर्जन एसएमएस मिले। सब अंचिता के थे। इसी शिकायत से भरे कि उसने बीते तीन दिन में एक भी बार बात क्‍यों नहीं की ?
अमित ने उसे फोन लगाया। नेटवर्क न होने की वजह बताई। पर अंचिता मानने को तैयार नहीं थी। उसने कहा, ‘सॉरी, आई कांट गो विथ यू।’
थके-मांदे अमित को गुस्‍सा आ गया। उसने ट्रैवेल एजेंट से दो टिकट कैंसल करवा दिए।
अगले एक हफ्ते तक फोन पर खूब लड़ने के बाद अंचिता ने आखिर हार मान ली। उसने एक शर्त रखी कि अमित खुद मुंबई आए और उसे शाम की बस से शिर्डी लेकर जाए।
अमित ने बात न बढ़ाने के मकसद से हां कर दी। अंचिता ने फटाफट दादर से शिर्डी के लिए डॉल्‍फिन की दो टिकटें करवा लीं।
अमित को मुंबई के लिए निकलने में अभी एक सप्‍ताह बाकी था। .... और अंचिता की नींद हराम थी। देर रात तक वह अमित से फोन पर गाना गाने की फरमाइश करने लगी। अमित को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर अंचिता चाहती क्‍या है। वह तो जैसे किसी भंवर में घिरता जा रहा था।

आगे पढ़ें : क्‍या अमित इस सफर में अंचिता से अपने दिल की बात कह पाएगा ? क्‍या जवाब होगा अंचिता का ? हां या फिर एक और ना ?



क्रमश :  


Disclaimer: इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं पूर्णत: काल्‍पनिक हैं। किसी के व्‍यक्‍तिगत जीवन या उससे जुड़ी बातों से इनका कोई लेना-देना नहीं। किसी के लिए यथार्थ और काल्‍पनिकता के बीच बेहद महीने फर्क हो सकता है, लेकिन इसके लिए लेखक की कल्‍पनाशीलता और रचनात्‍मकता कतई जिम्‍मेदार नहीं है।  

 क्‍या खोया, क्‍या पाया : अमिताभ की प्रस्‍तुति और जगजीत की मखमली आवाज

रविवार, 16 सितंबर 2012

मैंने कहा था (12) – ये कहां की दोस्‍ती है...


कई महीनों बाद अमित की मंजिल आज भटकी हुई थी। उसे खुद पता नहीं था कि वह कहां जा रहा है। रेलवे स्‍टेशन से घर तक के 22 किलोमीटर के सफर में यूं तो कई मोड़ आते थे, लेकिन सवाल यह था कि वह क्‍यों मुड़े ? एक अजीब का खालीपन था मन में। सोचने लगा कि इसे कैसे भरा जाए। उसे याद आया कि उसके पास कैमरा है और सुबह खींची गई अंचिता की तस्‍वीरें भी। वह मुस्‍कुरा उठा। अब पहले मोड़ का मकसद था उसके पास। उसने 20 चुनिंदा फोटो फ्रेमिंग के लिए दे दिए। सोनिया को फोन लगाया। वह घर पर ही थी। अमित की आवाज में आज वो तल्‍खी नहीं थी। सोनिया अपने दादा को बखूबी समझती है। उसने कहा, ‘आप घर आ जाओ। मम्‍मी-पापा से बात कर मन हल्‍का होगा। खाना खाकर ही जाना।’ सफर के एक और मोड़ का भी मकसद मिल गया था।


खुद को बेहद थका हुआ महसूस कर रहा था अमित। लग रहा था मानों जिस्‍म की सारी ताकत चली गई हो। बोझिल कदमों से उसने फ्लैट की सीढ़ियां तय कर कॉल बेल बजाई। घर पर तेज आवाज में टीवी चल रहा था। अमित ने सोचा, ‘उसे छोड़कर सारी दुनिया टीवी सीरियलों की दीवानी है... पता नहीं क्‍या मजा आता है इन्‍हें देखकर।’ थोड़ी देर ड्रॉइंग रूम में बैठने के बाद उसे फिर बेचैनी होने लगी। उसे लगा, जैसे सारे लोग उसकी सूनी जिंदगी का मजाक उड़ा रहे हैं। सोनिया ने उसकी उकताहट को समझ लिया। बोली, ‘दादा अंदर चलिए। मेरे कमरे में बैठकर बात करते हैं।’
सोनिया – भाभी... ओह सॉरी। दीदी को ट्रेन में बिठा आए आप ?
अमित – हां। पर ये अजीब का मैसेज लेकर घूम रहा हूं, ‘मैंने शायद आपके शहर आकर गलती की।’
सोनिया ने अमित के मोबाइल पर वह मैसेज बड़े गौर से देखा। उसके चेहरे की रेखाएं बता रही थीं कि उसकी सोच भी गड्ड-मड्ड हो रही है। थोड़ी देर बाद वो बोली, ‘मुझे इस बात की उम्‍मीद थी। जब कोई किसी को पसंद करने लगे और तभी उसे दूर जाना पड़े तो वह यही कहेगा कि मुझे इस चक्‍कर में पड़ना ही नहीं था। दादा आप इतना भी नहीं समझ सके ?
सोनिया की बात में गजब की गहराई थी। उसने सही मायनों में उस संदर्भ को पकड़ा था, जिसके दायरे में मैसेज किया गया था। अमित ने मुस्‍कुराकर कहा, ‘एमबीए करने के बाद तू तो वाकई नानी बन गई है सोनू।’
सोनिया – इफ यू डोंट माइंड, हाऊ इंटीमेट यू आर ?
अमित – दिल की गांठें खुली हैं। तूने ठीक ही कहा, ‘पसंद करने लगे।’ हां, हम एक-दूसरे को पसंद करते हैं, यानी दोस्‍ती के बाद की पायदान पर हैं। पर अभी इसे चाहत कहना मेरे हिसाब से ठीक नहीं होगा।
सोनिया – इज दैट सेम विद हर ?
अमित – कांट से, बट इफ यू आर राइट दैन शी इज मिसिंग मी मोर।
सोनिया एक बड़े कॉर्पोरेट में काम करती थी, जहां बिना लाग-लपेट के दो-टूक बात की जाती है। उसने झट से आगे की तस्‍वीर को भांप लिया और बोली, ‘आगे क्‍या सोचा है दादा। ये बात तो यहीं खत्‍म नहीं होने वाली।’
अमित – ‘सब ‘नानी’ पर छोड़ दिया। वो जो कहेगी, वही होगा।
सोनिया को अमित की पिछली जिंदगी मालूम थी। उस समय वह छोटी जरूर थी, पर इतनी नासमझ नहीं कि आंखों देखी बातों को अनदेखा कर दे। हमारे देश में मिडिल क्‍लास परिवारों की लड़कियां दो बातों को लेकर हमेशा सजग होती हैं- शादी और करियर। अगर दोनों की लगाम हाथ में हो तो वे किसी की नहीं सुनती। अमूमन उनका फैसला समझदारी भरा होता है।
अमित – अगर तुम मेरी जगह होती तो क्‍या करती ?
सोनिया – आई टेक इट एज इट हैप्‍पन्‍स!  हमारी जनरेशन आप जितनी संजीदा नहीं है। यह बड़े फासले में बसे दो शहरों के बीच का मामला है। जब तक ये फासले नहीं मिटें, इस रिश्‍ते को बहुत गंभीरता से नहीं लेना चाहिए।
अमित – हालात कभी-कभी हमारी सोच को किस कदर सुस्‍त बना देते हैं।
सोनिया – ठीक कहा। हमें दूर की चीजों की अपेक्षा पास की चीजें अक्‍सर दिखाई नहीं देती।
सोनिया ने अंचिता से पूछा था कि वह अमित को कैसे जानती हैं ? इस पर अंचिता का जवाब सुनकर वह हैरान थी। अंचिता ने कहा था, ‘हम दोनों सिर्फ दोस्‍त हैं। अमित मेरे बहुत अच्‍छे दोस्‍त हैं और रहेंगे।’ सोनिया ने इस बात का खुलासा करते हुए कहा, ‘दादा। अगर यह सिर्फ दोस्‍ती है तो खालीपन क्‍यों ? ...और अगर बीते चार दिनों में यह एक पायदान ऊपर चढ़ी है तो फासले को खत्‍म करने की पहल दीदी की तरफ से भी होनी चाहिए। लेकिन उनके लास्‍ट मैसेज से यह तो नहीं झलकता। यह तो इंडिया-पाकिस्‍तान समिट के बाद दोनों पीएम के बीच का मैसेज हुआ।’
सोनिया ने अमित के कई सवालों का बेबाक जवाब दे दिया था। जरूरत थी इन पर मंथन करने की, जो अमित की पुरानी आदत थी। वह अचानक कभी राय नहीं बनाता था। पहले सुनना और फिर गंभीर मंथन के बाद राय कायम करना उसका शगल था। कभी तो कई दिनों तक वह सोचता रहता। लिखने की शुरुआत भी उसने इसी तरह से की थी।
अमित को लगा, अब चलना चाहिए। वह उठा और ड्रॉइंग रूम में पहुंचा। सीरियलों का उल्‍लास जारी था। पता चला कि सोनू की ढाई वर्षीय भांजी को एक खास सीक्‍वेंस में सीरियल देखे बिना नींद नहीं आती। ‘वाकई, मेरी और नई पीढ़ी में बड़ा फर्क है – अमित ने सोचा।’
उसने सोनू की मां से विदा लेना चाहा तो जवाब मिला, ‘ऐसे कैसे बेटा ? खाना खाकर जाओ।’
अमित – नहीं मां। भूख नहीं है। फिर कभी।
अमित की जिद से सभी वाकिफ थे, सो ज्‍यादा जोर नहीं डाला। पर सोनिया के मशविरों ने अमित का मन हल्‍का कर दिया था।


घर पहुंचने के थोड़ी देर बाद अमित को अंचिता का एक और मैसेज मिला। ‘थैंक्‍स फॉर योर वॉर्म वेलकम और ऑल द हॉस्‍पिटलिटी। इट विल भी माय चांस वेरी सून।’
अमित ने घड़ी की तरफ देखा। रात के 11 बजे थे। अंचिता अभी जाग रही थी। पहले मैसेज का विरोधाभासी था यह मैसेज। ‘सोनिया ठीक कह रही थी- अमित ने सोचा’।
मुंह-हाथ धोकर कंप्‍यूटर ऑन किया तो डेस्‍कटॉप पर एक वर्ड फाइल ने उसे चौंकाया। उसमें लिखा था-
I will always blame you…
Because you deserve this. A friend in need is a friend in deed.
So, tell me what type of friend ‘U’ are?
 इन तीन लाइनों को बड़े अक्षरों से बड़े मन से सजाया गया था। अच्‍छा... तो अंचिता इसे ही छिपा रही थी... अमित ने सोचा।   
So, tell me what type of friend ‘U’ are?
इस सवाल ने अमित को फिर उलझन में डाल दिया। खदबदाहट बढ़ी तो उसने उठकर अलमारी का लॉक खोला। देखा तो रम की बोतल पड़ी थी। अमित ने मुस्‍कुराते हुए कहा, ‘सारे सवालों का जवाब इसी में है।’
रवींद्र कालिया की किताब ‘गालिब छुटी शराब’ में एक शेर है –
‘ वही है बेखुदे-नाकाम तुम समझ लेना
शराबखाने से जो होशियार आएगा। ’
जगजीत और गालिब का साथ पुराना और सबसे अनूठा है। अमित ने यही सोचकर म्‍यूजिक ऑन किया। हमेशा की तरह उसने फिर पहला जाम अपनी फाकामस्‍त जिंदगी के नाम कर संगीत के आगोश में डूबने लगा।
‘इस रात की सहर नहीं...’ उसने सोचा और आंखें मूंद लीं। सवाल वही था, ‘आखिर किस तरह का दोस्‍त हूं मैं ?

‘कहूं किससे मै के क्या है,  शब-ए-गम बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना,  अगर एक बार होता।’
-    - चचा गालिब
(तजुर्मा : मै किससे कहूं कि रात का दर्द बहुत दर्दनाक होता है। मैं तो हंसकर मर जाता, अगर सिर्फ एक ही बार मरना होता।)

क्रमश :  


Disclaimer: इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं पूर्णत: काल्‍पनिक हैं। किसी के व्‍यक्‍तिगत जीवन या उससे जुड़ी बातों से इनका कोई लेना-देना नहीं। किसी के लिए यथार्थ और काल्‍पनिकता के बीच बेहद महीने फर्क हो सकता है, लेकिन इसके लिए लेखक की कल्‍पनाशीलता और रचनात्‍मकता कतई जिम्‍मेदार नहीं है।   

मिर्जा गालिब को यहां सुनें :

रविवार, 9 सितंबर 2012

मैंने कहा था (11) : ये क्‍या हुआ, कैसे हुआ...

दोपहर के डेढ़ बजे थे। अंचिता की ट्रेन आने में अभी तीन घंटे का वक्‍त था। सोफे पर लेटे-लेटे बोर हो गया था। दो बार अखबार बांच लिए। सुबह से टीवी पर धार्मिक सीरियल और घरेलू किस्‍म के महिलाओं वाले प्रोग्राम चलते हैं। अमित को यह बिल्‍कुल पसंद नहीं। मूवीज और न्‍यूज दो ही फेवरिट हैं उसके और दोनों में ही आज कुछ खास नहीं।
अमित ने सोचा कि अंचिता को लंच के लिए पूछ लेना चाहिए। वह ऊपर अपने कमरे में गया तो देखा अंचिता चैट में जुटी है। अमित को देखकर सकपकाई अंचिता फौरन लॉग ऑफ हो गई।
अमित : ओह, सॉरी। क्‍या लंच कर लें ? सुबह से तुमने कुछ नहीं खाया और मैंने भी....
अंचिता : हां, आप चलिए मैं आती हूं।
अमित बड़ी फुर्ती से नीचे उतरा। कुछ जल्‍दी में था। सोच रहा था कि अंचिता जल्‍दी से लंच कर ले तो फिर फुर्सत में बातें हो सकती हैं।
अंचिता ने नेट बंद किया और सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी कि आखिरी पायदान पर उसका पैर मुड़ गया और रपटते हुए धम्‍म से गिरी। आवाज सुनकर अमित भी किचन से भागा चला आया। देखा अंचिता अपने पैर को जोर से पकड़कर दर्द को बर्दाश्‍त करने की कोशिश कर रही है।
थोड़ी देर के लिए अमित पसोपेश में पड़ गया कि वह करे तो क्‍या ? फिर हिम्‍मत जुटाकर उसने उसे खड़ा करने के लिए हाथ बढ़ाया तो अंचिता ने लगभग कराहते हुए कहा, ‘हम उठ नहीं पाएंगे। मोच जबर्दस्‍त है।’
इतना सुनना था कि अमित ने उसे उठा लिया और धीरे से उसके कमरे के बिस्‍तर पर बिठा दिया। इस अचानक के वाकए से अंचिता हतप्रभ थी। अमित ऊपर भागा और वॉलिनी क्रीम और क्रैप बैंडेड ले आया। अंचिता को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह अमित को क्‍या कहे ? दर्द के मारे उसका बुरा हाल था। आज ही लौटना भी था। उसे मालूम था कि मुंबई में स्‍टेशन पर कोई लेने नहीं आएगा। उसे अकेले दादर में वेस्‍टर्न रेलवे की लोकल पकड़नी होगी। टैक्‍सी के 500 रुपए वह देना नहीं चाहती थी।
अमित ने अंचिता के पैर का मुआयना किया। मोच काफी थी। हल्‍की सी सूजन भी नजर आ रही थी। अमित ने एड़ी को हल्‍के से मोड़ने की कोशिश की तो दर्द से चीख पड़ी अंचिता।
अमित को बरसों पहले कराते क्‍लास में सीखी चोट के इलाज की तकनीक मालूम थी। उसने कहा, ‘थोड़ा बर्दाश्‍त करो...’ और एक झटके से एड़ी सीधी कर दी। ‘कट’ की आवाज आई और अमित की बांछें खिल उठीं।
अंचिता की आंखों से टप-टप आंसू टपक पड़े। उसने कहा, ‘हम यहां दर्द के मारे रो रहे हैं और आप हंस रहे हो।’
अमित – अब राहत मिलेगी। मोच गई मानो।
अंचिता – ये कैसे मालूम ?
अमित – बस, यूं समझो कि वक्‍त पर इलाज मिल गया। अमित ने हौले से क्रम लगाना शुरू किया तो अंचिता को वाकई बड़ी राहत मिली। पांच-सात मिनट की मालिश के बाद अमित ने क्रैप चढ़ा दिया।
क्रीम की गर्मी और चुस्‍ती से बांधे क्रैप के कारण अंचिता को अब दर्द का हल्‍का का अहसास हो रहा था। उसने बिस्‍तर से उठकर जैसे ही चलने की कोशिश की तो गश खाकर गिरने को हुई और अमित ने संभाल लिया।
अमित – इतनी भी जल्‍दी क्‍या है। हल्‍के से पैर रखकर चलो। अभी थोड़ा आराम दो। लंच ऑर्डर कर दिया होगा। अभी आता ही होगा।
अंचिता – क्‍या मंगाया ?
अमित – तुम्‍हारा फेवरिट... चाइनीज। तुम आराम करो। मैं प्‍लेटें लगाता हूं।
इतने में कॉल बेल बजी। लंच आ चुका था।
डायनिंग टेबल तक अंचिता खुद चलकर आई। इसे देखकर अमित को बड़ी राहत मिली। उसने पूछा, ‘हाऊ यू फील नाऊ ?
अंचिता – मोच तकरीबन गायब है। थैंक्‍स, आपने मौके पर ठीक कर दिया, वह भी बिना फीस के।
अमित ने मुस्‍कुराकर कहा – फीस बाकी रही। हम उधार में इलाज नहीं करते। लंच तैयार है।


ट्रेन आने में अभी भी पूरे दो घंटे का वक्‍त था। लंच के बाद अंचिता आइसक्रीम का कप लेकर अपने कमरे में गई। अमित फिर सोफे पर पसर गया। तभी अंचिता ने कमरे से आवाज दी, ‘विल यू प्‍लीज हेल्‍प मी ?
अमित ने देखा, अंचिता को पैकिंग में दिक्‍कत हो रही थी। उसने बिना देरी किए कपड़ों और बाकी सामान को तह कर बैग में भरने के बाद पूछा, ‘कुछ और बाकी तो नहीं रह गया ?
अंचिता ने कहा, ‘हां, आपकी फीस और ये मरीज।’ हम मरीज बनकर यहां आए थे, मर्ज लेकर जाएंगे। वहां कौन इलाज करेगा हमारा ? इतना कहते हुए वह फफककर रो पड़ी।
अब अमित के सब्र का बांध टूट चुका था। उसने अंचिता को फिर गोद में उठाया और बाहर ड्रॉइंग रूम के सोफे पर बिठा दिया। उसने अंचिता के आंसू पोंछे और कहा, ‘यूं घड़ी-घड़ी क्‍यों रो पड़ती हो ?’ तुम्‍हारे जैसी लाखों लड़कियां घर से दूर नौकरी करती हैं। सबको अपनी जिंदगी का बोझ खुद उठाना पड़ता है।
अंचिता ने अमित के पहलू में अपना सिर टिका दिया। उसका रोना जारी था।
अंचिता – आज मेरे यकीन के सारे किले धराशायी हो गए, जब आपने मुझे मोच आने पर गोद में उठाया। ‘उस हादसे’ के बाद पहली बार मुझे किसी ने छुआ। यू नो, लोकल ट्रेन या बस में पुरुषों की छुअन से भी मुझे नफरत हो गई थी। हर रिश्‍ते में स्‍वार्थ की बू आती थी। लेकिन आज नहीं। हम हमेशा के लिए आपके मरीज बन गए अमित।
अंचिता की भावनाओं का ज्‍वार मानों सारी हदें तोड़ने को बेताब था। वह अमित की गोद में जा लेटी। कहने लगी, ‘आपकी नेकनीयती ने मुझे हिलाकर रख दिया है। हम आपको तौल रहे थे। मां से झूठ बोला कि हम सोनिया के घर हैं। लेकिन एक मिनट के लिए भी आपसे दूर नहीं हो सके। हम वापस नहीं जाना चाहते, लेकिन जाना तो होगा। लग रहा है वक्‍त यहीं ठहर जाए, दो दिन और मिल जाएं।’
अंचिता कहे जा रही थी। कॉलेज में मैं लड़कों से दूर रही। एक लड़के ने मुझे प्रेम पत्र लिखा। मैंने फाड़कर फेंक दिया तो उसने एक और लेटर कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर चिपका दिया। फिर पापा से कहकर कॉलेज की बदलवा लिया। पहली बार मैं इस कदर किसी के करीब हूं। ‘उस हादसे’ के बारे में मुझे खास कुछ याद नहीं, पर यकीन मानो मैं तबाह होने से बच गई। पर आज... मुझे लग रहा है कि इस शरीर के साथ अंचिता का सारा वजूद पिघल रहा है। हम इतनी दूर आपके बगैर कैसे रह सकेंगे ?  
अमित – मैं दूर कहां हूं अंचू। तुम जब भी याद करोगी, मैं चला आऊंगा। इसमें रोने की क्‍या बात है ? डेढ़-दो घंटे में फासला तय हो जाता है।
अंचिता – हम बुलाएंगे और आप आएंगे ? प्रॉमिस ?
अमित – यकीन न हो तो बुलाकर देखो।
अंचिता – तो ठीक है, आप भी साथ चलिए हमें मुंबई तक छोड़ने। ट्रेन में खूब बातें होंगी। आप हमारी सीट पर बैठ जाना, हम सारी रात बातें करते हुए जाएंगे।
अमित – वाह!  क्‍या आइडिया तलाशा है। हुजूर, स्‍टेशन पर कुली कर लेना। तुम्‍हें आराम की जरूरत है। गर्दन की चोट अभी ठीक नहीं हुई। मैंने तुम्‍हारी बहन को फोन कर दिया है। जीजाजी होंगे स्‍टेशन पर।
अंचिता ने मुंह फुलाकर कहा, ‘वाह डॉक्‍टर साहब। चोरी-छिपे बात कर ली और हमें बताया भी नहीं।’ हमने भी आपसे एक बात छुपाई है।
अमित – वो क्‍या ?
अंचिता – हमने आपके कंप्‍यूटर से सारी गजलें और गाने अपने नए सेलफोन में डाल दिए हैं और आईपॉड में भी।
अमित हंसे बिना नहीं रह सका। उसने अंचिता के गालों पर चुटकी लेकर कहा, ‘कॉपीराइट लगेगा मैडम।’
अंचिता – ठीक है। दे देंगे, पर मुंबई में।


घड़ी की सुइयां गुजरते वक्‍त की ओर इशारा कर रही थीं। अमित बोला, ‘तो रवानगी की तैयारी की जाए।’ अंचू, तुम तैयार हो जाओ। हम पांच मिनट में आते हैं।
अंचिता – नही। बस, 10 मिनट और बैठते हैं। क्‍या हमारा टिकट कैंसल नहीं हो सकता ?
अमित – दिमाग तो खराब नहीं हुआ ? मां को क्‍या कहोगी ?
अंचिता – कह देंगे कि तबीयत अचानक खराब हो गई थी। झूठ बोलेंगे अपने लिए।
अमित – यह ठीक नहीं है। दो दिन बाद जाओ, या 15 दिन बाद। मुझे फिक्र नहीं। पर तब जाते समय दर्द नहीं होगा ?
अंचिता – हां, ये आपने ठीक कहा। हमें इस तरह गाइड करने वाला कोई नहीं।
अमित – फोन पर तो मैं हूं न !
अंचिता – हां, पर हम हैं लापरवाह। एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देते हैं। यूं पास बैठकर समझाने वाला तो कोई नहीं है न।
अमित ने कोई जवाब नहीं दिया। उसे अंचिता की छटपटाहट समझ आ गई थी। गहरी सोच में डूब गया वह। अपने भीतर अचानक एक उथल-पुथल सी महसूस हुई उसे। सब-कुछ तेजी से घट रहा था और वह भी उसके नियंत्रण से बाहर। ताउम्र उसने रिश्‍तों को बेहद सलीके से संभाला, सहेजा था। अपनी सीमा और मर्यादा के दायरे में। लेकिन, अंचिता की बातें, उसकी तड़प उसे अपने आवरण से बाहर आने को मजबूर कर रही थीं।
अंचिता की बातों से जाहिर था कि वह उसे चाहने लगी है, पर क्‍या इस रिश्‍ते पर उसका परिवार रजामंद होगा ? कौन से, कैसे सवाल उठेंगे ? क्‍या जवाब होगा उसके पास ? दोनों की उम्र में छह साल का फासला है। क्‍या यह सबसे बड़ा सवाल नहीं होगा ना कहने के लिए ?
अंचिता – फिर क्‍या सोचने लगे ? आप तो चाहते ही हो कि हम जितनी जल्‍दी हो सके यहां से खिसक लें। ठीक है, हम तैयार होकर आते हैं।


स्टेशन पहुंचने पर पता चला कि ट्रेन साढ़े तीन घंटे लेट है। दिल्‍ली में कोहरे के चक्‍कर में एधर से आने वाली सारी ट्रेनें इससे भी ज्‍यादा देरी से चलती हैं। अमित झल्‍लाया, ‘कमबख्‍त इंक्‍वायरी वाले। राइट टाइम बताते हैं और सॉरी भी नहीं कहते।’ पर अंचिता खुश थी। बोली, ‘वाऊ, मोर टाइम टू टॉक।’ रास्‍ते में दोनों ने बात नहीं की। हां, अंचिता ने ‘आंधी’ का वही गाना फिर सुनने की फरमाइश जरूर की थी।

फर्स्‍ट क्‍लास वेटिंग रूम मुसाफिरों से बजबजा रहा था। एक खाली टेबल ढूंढ़कर दोनों उसके इर्द-गिर्द पसर गए। बाकी सारे लोग अमित और अंचिता को घूरे जा रहे थे, गोया कभी किसी जोड़े को यूं देखा ही नहीं हो। सामान रखकर अंचिता बोली, ‘देखा जनाब, इतनी जल्‍दी पीछा नहीं छूटने वाला आपका हमसे।’
अमित ने भी मुस्‍कुराकर कहा, ‘हां, मेरी मुसीबतें जल्‍दी टलती नहीं।’ उसने अंशु (अंचिता के जीजा) को मैसेज किया कि ट्रेन 3.30 मिनट से ज्‍यादा भी लेट हो सकती है।
बातों का एक और दौर शुरू हुआ और फिर वक्‍त न जाने कैसे चुटकियों में गुजर गया। अमित ने अंचिता को ट्रेन में बिठा दिया। 10 मिनट का स्‍टॉपेज था। हड़बड़ी के बावजूद अंचिता ने काले शीशों से परदा हटाकर बाय किया तो अमित की आंखें भर आईं। वह सरकती ट्रेन को देखता रहा और फिर मोबाइल पर मैसेज किया, ‘हैव ए प्‍लेजेंट जर्नी। टेक केयर।’

पार्किंग लॉट से गाड़ी निकालते समय अमित का मोबाइल बोला। अंचिता का मैसेज था – ‘मैंने शायद आपके शहर आकर गलती की।’
हैरान अमित अचानक बदले मौसम का मतलब समझने की कोशिश में घर रवाना हो गया। एक खालीपन लिए।

आखिर अंचिता ने ऐसा क्‍यों कहा ?

क्रमश :


Disclaimer: इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं पूर्णत: काल्‍पनिक हैं। किसी के व्‍यक्‍तिगत जीवन या उससे जुड़ी बातों से इनका कोई लेना-देना नहीं। किसी के लिए यथार्थ और काल्‍पनिकता के बीच बेहद महीने फर्क हो सकता है, लेकिन इसके लिए लेखक की कल्‍पनाशीलता और रचनात्‍मकता कतई जिम्‍मेदार नहीं है।