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सोमवार, 29 जुलाई 2013

मेरी डायरी -2 : कोलकाता : तोमाके चाई बोले बांची

फिल्‍म ‘खामोशी’ का एक गाना है, गुलजार का लिखा और किशोर दा का गाया : ‘वो शाम कुछ अजीब थी...’। 1969 की इस फिल्‍म में राजेश खन्‍ना और वहीदा रहमान पर शूट हुआ यह गाना हावड़ा ब्रिज की एक हल्‍की सी झलक दिखलाता है। हावड़ा ब्रिज दरअसल सिर्फ एक पुल नहीं, ख्‍वाब है। इसमें छिपी रुमानियत को हावड़ा ब्रिज पर चढ़कर नहीं, हुगली नदी पर नाव की सवारी करके महसूस किया जा सकता है। हावड़ा ब्रिज एक कैंटीलिवर सस्‍पेंशन पुल है। 1943 में शुरू होने पर इसकी ऊंचाई 82 मीटर और लंबाई 1500 फुट थी। फिलहाल रोजाना 1.50 लाख गाड़ियां और 50 हजार लोग इस पुल के आर-पार होते हैं। इसका रखरखाव करने वाले कोलकाता पोर्ट ट्रस्‍ट ने हावड़ा ब्रिज को खूबसूरत लट्टुओं से सजा दिया है। रात को यह लंदन के हार्बर ब्रिज या मैनहटन के ब्रुकलिन ब्रिज जैसा जगमगाता है। 

सत्‍तर के दशक की शुरुआत में नदी के रास्‍ते हावड़ा और कोलकाता को जोड़ने के लिए नाव ही इकलौता सहारा था। अब इनकी जगह भारी-भरकम फेरियों ने ले ली है। इंजन की गड़गड़ाहट के बीच 150 से ज्‍यादा मुसाफिरों के शोर में वह रुमानियत कहीं खो जाती है। इसमें वह मजा कहां, जो नाव में है। लहरों की कल-कल पर चप्‍पू की थाप। एक अजीब की खामोशी। नाव का सफर महंगा है, पर फेरी का नहीं। हावड़ा से बागबाजार तक चलने वाली फेरी पुल के नीचे से होकर जाती है। एक व्‍यक्‍ति का दोतरफा किराया है महज 13 रुपए। आप फिर कहेंगे, इतना सस्‍ता। जी, बंगाल में आम आदमी से जुड़ी चीजों पर आसानी से फैसला नहीं हो पाता। चाहे मेट्रो और ट्राम कहें, शहर की बसें या फिर फेरी। कंडक्‍टर ने अगर अठन्‍नी भी कम दी तो झगड़े की नौबत आ जाएगी। टिकट देना अनिवार्य है। नहीं दी तो लोग झगड़कर लेंगे। एक और बात। महिलाओं को सम्‍मान देना बंगाली भद्र मानुष बखूबी जानता है। ट्राम हो या बस, अगर बगल में कोई महिला खड़ी हो तो पुरुषों का सीट छोड़ देना सभ्‍यता का प्रतीक माना जाता है। नहीं किया तो कोई और आकर स्‍त्री को उसका हक दिला देगा। 

हावड़ा स्‍टेशन की जेट्टी से बागबाजार तक के नदी के रास्‍ते में नदी के दाईं तरफ आपको कुमारटुली नजर आएगी। यह बंगाल के खाटी कुम्‍हारों का गढ़ है। गंगा की चिकनी मिट्टी और इनकी कल्‍पनाशीलता मिलकर जीवंत प्रतिमाओं का निर्माण करती हैं। इस पर बंगाली कलाकारों की कूची से निकले रंग और साज-श्रृंगार इतना अद्भुत है कि मानों साक्षात मां दुर्गा सामने खड़ी हों। कुमारटुली का इतिहास बहुत पुराना है। ब्रिटिश ईस्‍ट इंडिया कंपनी ने कोलकाता को अपनी राजधानी बनाते समय स्‍थानीय कारीगरों के पेशों के आधार पर जिले बनाए। इनमें कुमारटुली भी एक था। लेकिन अगले 100 साल बाद उन्‍हें वहां से खदेड़ा जाने लगा। लेकिन अपनी अद्भुत जिजिविषा के चलते इन कुम्‍हारों ने मिट्टी के खूबसूरत बर्तन और देवी की प्रतिमाएं बनानी शुरू की। वे अपनी जड़ जमाते गए और फिर उत्‍तरी कोलकाता का यह इलाका उनकी मेहनत से दुनियाभर में मशहूर हो गया। बंगाल में अभी भी माना जाता है कि देवी की तीसरी आंख बनाना सबसे मुश्‍किल है। मशहूर लेखक सुनील गंगोपाध्‍याय के अनुसार, 19वीं सदी की शुरुआत में बंगाल के अधिकांश लोग कुम्‍हारों को दुर्गा पूजा से महीनों पहले अपने घर में बुला लेते थे। एक-डेढ़ महीने में प्रतिमा पूरी तो हो जाती, पर मां की तीसरी आंख को साकार करने में कुम्‍हारों के पसीने छूट जाते। वे घंटों देवी दुर्गा का ध्‍यान करते और फिर एकाएक उठकर एक लय में प्रतिमा को पूरा कर देते।  
बागबाजार से ही बेलूर मठ तक के लिए हर आधे घंटे में एक फेरी सेवा उपलब्‍ध है। बेलूर रामकृष्‍ण मिशन आश्रम का राष्‍ट्रीय मुख्‍यालय है। बेलूर मठ का आर्किटेक्‍चर गजब का है। स्‍वामी विवेकानंद ने बेलूर मठ की कल्‍पना आधुनिक, मध्‍यकालीन, गोथिक और रेनेसॉ टाइप के आर्किटेक्‍चर के मिश्रण से तैयार भव्‍य मंदिर की तरह की थी। मंदिर के सामने वाले हिस्‍से का ऊपरी सिरा गुरुद्वारे जैसा है तो मेहराबें राजपूत और मुगल स्‍थापत्‍य कला से ली गई हैं। प्रवेश द्वार के ऊपर गोथिक और रेनेसॉ स्‍टाइल का निर्माण है, जबकि छज्‍जे मध्‍यकालीन शैली के हैं। इस मंदिर को घंटों एकटक निहारने का मन करता है। अंदर हॉल में रामकृष्‍ण परमहंस की भव्‍य प्रतिमा है। स्‍वामी विवेकानंदर का मंदिर वहीं बना है, जहां उन्‍होंने 39 साल की उम्र में 4 जुलाई 1902 को शरीर छोड़ा था। बेलूर आएं तो एक बार शाम की आरती में जरूर शामिल हों। मन शांत हो जाएगा। 


कोलकाता में ऐतिहासिक इमारतें कई हैं। विक्‍टोरिया मेमोरियल पैलेस और गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर का घर जोराशांको (ठाकुर बाड़ी) इनमें सबसे दर्शनीय है। ब्रिटिश महारानी विक्‍टोरिया को समर्पित 56 मीटर ऊंचे इस विशाल महल को बनाने में अंग्रेजों का एक पैसा भी नहीं लगा। अंग्रेजी राज को मान्‍यता देने वाले राजा-महाराजाओं, चापलूस जमींदारों ने कंपनी सरकार को इसके लिए चंदा दिया। महल बनने के बाद इसे जीत यानी विक्‍ट्री का प्रतीक माना गया। हालांकि, यह भवन महारानी विक्‍टोरिया की 1901 में मृत्‍यु के बाद बनाया गया। मातृत्‍व, बुद्धिमानी और ज्ञान का प्रतीक उत्‍तरी द्वार और कला, स्‍थापत्‍य, न्‍याय और दयालुता का प्रतीक बीच का बुर्ज अंग्रेजों की शानदार डिजाइन की अभी भी सराहना करते हैं। अंदर बड़े हॉल में ब्रिटिश राज के वायसरॉय, गवर्नरों की तस्‍वीरें और म्‍यूजियम है। इसमें हिंदुस्‍तान के गौरव को रौंदने में इस्‍तेमाल किए गए साजो-सामान और संसाधन दिखाए गए हैं। इन चीजों को अभी भी इस कदर सावधानी से सहेजा गया है कि आप भारत के अतीत में उतरते चले जाते हैं। विक्‍टोरिया मेमोरियल के बाहर का पार्क थकान मिटाने की बढ़िया जगह है। आप चाहें तो परिसर के छोटे से कैंटीन में 50 रुपए में भरपेट नाश्‍ता कर सकते हैं।


  

कोलकाता आने के बाद ट्राम और मेट्रो चढ़ना न भूलें। दिल्‍ली मेट्रो के समान कोलकाता मेट्रो की 27 में से बहुतों में एयरकंडीशन नहीं है। खुली खिड़कियों से छनकर आती हवा और उस पर बड़ी-बड़ी आंखों वाली बंगाली बालाओं की खिलखिलाहट। पल्‍लू से पसीना पोंछती महिलाएं और ठोड़ी को भींचकर स्‍टॉपेज का धैर्य से इंतजार करते भद्र मानुष। कोलकाता वासियों को ये कमियां बिल्‍कुल नहीं खलतीं। एयरकंडीशन डिब्‍बों से टपकता पानी भी नहीं। ‘तोमार शुर, मोनेर शुर, सृष्‍टि कोरूक कोइको शुर’ अभी भी बंगालियों को गौरवान्‍वित करता है। यही हालात ट्राम सेवा के भी हैं। जब से हावड़ा ब्रिज पर ट्राम बंद हुई है, तभी से यह सेवा अपने आखिरी दौर में है। खस्‍ताहाल डिब्‍बे और सड़कों पर कछुए की रफ्तार। कोलकाता वासी देश की इस इकलौती सेवा को बरकरार रखना तो चाहते हैं, पर विकास की कीमत चुकाकर नहीं। ट्राम लाइनें टूट रही हैं। इनके कारण सड़कों की मरम्‍मत नहीं हो पा रही है। लोगों के पास विकल्‍प ज्‍यादा हो गए हैं, लेकिन गरीब अवाम के लिए पांच रुपए किराए वाली ट्राम अभी भी सबसे सस्‍ती सेवा है।  

जोराशांको पहुंचने के लिए आपको थोड़ी मशक्‍कत करनी होगी। पहले गिरीश पार्क मेट्रो स्‍टेशन पर उतरें और फिर वहां से टैक्‍सी या रिक्‍शा लें। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का जन्‍म इसी ठाकुरबाड़ी में हुआ था। 18वीं सदी में उनके दादा प्रिंस द्वारकानाथ टैगोर का बनाया मकान आज भी जीवंत है। अंदर म्‍यूजियम में दाखिल होते ही आपको रवींद्र संगीत की धुन हर कमरे में सुनाई देगी। गुरुदेव का पलंग, उनके कपड़े, महिलाओं का कमरा, उनकी इस्‍तेमाल की गई हर चीज महफूज रखी है। वह कमरा भी, जहां गुरुदेव ने आखिरी सांस ली थी। लगता है मानों वक्‍त ठहर गया। आगे गुरुदेव की बनाई पेंटिंग्‍स और किताबों के साथ उन्‍हें मिले तोहफे और कई चीजें नजर आती हैं। 

वैसे कोलकाता मछली-भात के लिए मशहूर है, पर यहां के मिष्‍टी दोई को चखना ही चाहिए। एस्‍प्‍लैनेड, रवींद्र सारणी, रासबिहारी एवेन्‍यू आदि कई जगहों पर मिष्‍टी दोई मिल जाएगा। लेकिन जो स्‍वाद एस्‍प्‍लैनेड के केसी दास रेस्‍त्रां में है, वह कहीं नहीं। बंगाली रसगुल्‍ले के साथ मीठे दही का मेल गजब ढा देता है। इस कदर कि आप डायबिटीज भी भूल जाएं। भारत के दूसरे सबसे बड़े शहर में खाना अभी भी बहुत सस्‍ता है (हालांकि 12 रुपए में पेट नहीं भर सकता)। फिश करी और चावल 30 रुपए में मिल जाता है। औसत भोजन 80 रुपए में भी मुमकिन है। दिल्‍ली की तरह कोलकाता में भी बिहारियों की बड़ी संख्‍या है। साथ में दक्षिण भारतीय भी जा बसे हैं। मद्रास होटल, वैष्‍णो होटल जैसी जगह शाकाहारियों का पेट भर सकती है। सड़क के एक तरफ लिट्टी-चोखा खाएं तो खोमचों में नेपाली लड़के सस्‍ता चायनीज खिलाएंगे। कोलकाता में कुछ बिहारी तो पुश्‍तों से रिक्‍शा ही चलाते हैं। बिसेसर पासवान कोलकाता में ही पैदा हुए और जवान होते ही घोड़े की तरह रिक्‍शा थामकर दौड़ने लगे। बेटा, दामाद सब मिलकर रिक्‍शा चलाते हैं और 16वीं सदी के इस जापानी साधन में जानवरों की तरह जुतकर 16 लोगों का पेट भरते हैं। 

इन सबके बावजूद एक बार नहीं, बार-बार कोलकाता आने का दिल करता है। इस शहर में एक अजीब ही मस्‍ती है, बेफिक्री है। क्‍या हुआ, अगर इस शहर के 75 हजार लोग फुटपाथ पर सोते हैं। कोलकाता आने वाले हर शख्‍स को इस शहर से इश्‍क हो सकता है। इसीलिए तो इस शहर का गान है, ‘तोमाके चाई बोले बांची (मैं जीता हूं, क्‍योंकि मैं तुम्‍हें पसंद करता हूं)।’ कोलकाता वासी अपने शहर को शिद्दत से चाहते हैं और यही उनके उल्‍लास का राज़ है। 



- अगली किस्‍त पहाड़ों की सैर

यहां देखिए फिल्‍म खामोशी का वह गाना -  https://www.youtube.com/watch?v=IKlqrmJ7r60

रविवार, 28 जुलाई 2013

मेरी डायरी -1 : सैर कर दुनिया की गाफ़िल, जिन्देगानी फिर कहां ?

कहते हैं, जन्‍नत का रास्‍ता दोज़ख यानी नर्क से होकर जाता है। भोपाल से कोलकाता जाने के लिए अगर दिल्‍ली का रूट लेना पड़े तो यह कहावत आपको सच ही लगेगी। खासकर बरसात के इस चिपचिपे मौसम में। आज से डेढ़ दशक पहले देश के खूबसूरत शहरों में शुमार रही दिल्‍ली अब गंदगी से बजबजा रही है। नई दिल्‍ली स्‍टेशन पर उतरते ही आपको इस बात का अहसास होगा। देश की राजधानी के सबसे प्रमुख स्‍टेशन में अगली ट्रेन के लिए तीन घंटे से ज्‍यादा काटना भारी पड़ेगा। उच्‍च श्रेणी के वेटिंग रूम में नहाने के लिए आपको लंबी लाइन में लगना होगा। फिर इस बात की कोई गारंटी नहीं कि बाथरूम में पानी आ रहा हो। मुमकिन है दरवाजा टूटा हो और आपको गाना गाकर काम चलाना पड़े। जैसे-तैसे निपटकर बाहर आए तो ऑटो वालों से उलझें। शीला दीक्षित सरकार ने दिल्‍ली के 55 हजार ऑटो रिक्‍शा को नए इलेक्‍ट्रॉनिक मीटर और जीपीएस (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) से लैस किया है। नए मीटर को देखकर मैंने कौतूहलवश ड्राइवर से पूछा तो पता चला कि सरकार ने इसे जबर्दस्‍ती उन पर थोपा है। खुले बाजार में इसी तरह का मीटर महज 5000 रुपए में बिक रहा है। लेकिन सरकार दिल्ली मल्टीमॉडल ट्रांजिट सिस्टम (डिम्ट्स) के मीटर लगाने पर ही परमिट दे रही है। ड्राइवर का सीधा आरोप था कि इस कंपनी में शीला दीक्षित के रिश्‍तेदारों का काफी पैसा लगा है। वैसे दिल्‍ली हाईकोर्ट ने सुरक्षा की नजर से दिल्‍ली के सारे ऑटो रिक्‍शा में जीपीएस लगाने को कहा था, साथ ही सवारियों को रसीद देने के निर्देश भी दिए थे। हालांकि, इसे अभी अमल में लाया जाना बाकी है। बरसात के मौसम में जब भी दिल्‍ली जाएं तो दो चीजें हमेशा साथ रखें। एक अपनी नाक ढंकने के लिए रूमाल और दूसरा चिपचिपाहट कम करने के लिए टैलकम पाउडर। इनके बिना हर पल यातनाभरा होगा। ज्‍यादा परेशानी हो तो नई दिल्‍ली स्‍टेशन से सीधे राजीव चौक का मेट्रो पकड़ें और बगल के पालिका बाजार में जाकर विंडो शॉपिंग करें या एसी का मजा लें। दिल्‍ली से कोलकाता के लिए कोलकाता राजधानी से बेहतर और कोई ट्रेन नहीं। करीब 1450 किलोमीटर की दूरी महज 17 घंटे से भी कम समय में। दिल्‍ली की सारी थकान ट्रेन में उतारी जा सकती है। शाम को चले और सुबह पहुंचे। 
  
बंगाल में निजाम बदल गया, लेकिन उसके निशां इक्‍का-दुक्‍का पोस्‍टरों को छोड़कर बाकी कहीं नजर नहीं आते। फ्रांसीसी लेखक डोमिनिक ला-पियर के ‘सिटी आफ जॉय’ उपन्यास का शहर आज भी तकरीबन वैसा ही है। वही पीली एम्‍बेसडर टैक्‍सियां, नई इमारतों के बीच सिर उठाए खड़ी अतीत की यादें और शहर का वही मिजाज़। ब्रिटिश व्यापारी जॉब चार्नाक ने आज से लगभग 300 साल पहले सवर्ण चौधरियों से तीन गांव खरीद लिए थे-कोलकाता, सूतानुटी तथा गोबिन्दपुर। इन्हीं तीन गांवों को लेकर कलकत्ता शहर बना। लेकिन ज़रा ठहरिए। इस शहर में घूमते हुए, लोगों से बात करते हुए आपको बदलाव की सुगबुगाहट भी मिलेगी। जाने-माने पत्रकार स्‍वपन दासगुप्‍त कहते हैं, ‘क्रांति की नर्सरी के रूप में कोलकाता एक ऐसा प्रहसन था, जो 50 सालों तक जिंदा रहा- 'बंदूक की नली' की पूजा के मुहावरे को 'मां, माटी, मानुष' के रहस्यवादी आह्वान में धीरे-धीरे तब्दील करने के लिए काफी लंबा और पर्याप्त समय था। बंगाली होने का अर्थ सनातन आक्रोशित रहना होता था। चिड़चिड़ापन और चिंतित होने का मेल अगर मीठी चाय की अनगिनत प्यालियों, सस्ती सिगरेट और दुनियावी सफलता के प्रति स्वाभाविक अरुचि के साथ हो जाए तो यह आदर्श मिश्रण बनाता है।’ कोलकाता अब शहरी दुस्वप्न नहीं रहा। कम-से-कम औसत मध्यवर्गीय शहरियों के लिए यह शहर अब रहने के लिहाज से काफी आकर्षक है। इसमें नए मुख्यमंत्री का योगदान बहुत ज्‍यादा नहीं है। हां, तृणमूल कांग्रेस के राज्‍यसभा सांसदों के सांसद निधि कोष से सड़कों पर लगाए गए उन हजारों त्रिशूलनुमा लैंपपोस्ट का शुक्रिया जरूर अदा किया जाना चाहिए, क्योंकि कोलकाता अब देश के सबसे अच्छे रोशनी वाले शहरों में गिना जा सकता है। सड़कों की हालत में सुधार, मेट्रो का व्यापक नेटवर्क और शहरभर में किफायती फ्लैटों का कुकुरमुत्ते की तरह उग आना कोलकाता को सामान्य स्थिति में ला रहा है, जो उसके लिए कम-से-कम नई है और नागरिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना पर केंद्रित है। एक नया कोलकाता उभर रहा है। यह दीवार पर बने चित्रों और हमेशा बंद की मार झेलने से मुक्त है। यह शहर 1967 में शुरू हुई 'दिक्कतों' के बाद भुला दी गई एक चीज को दोबारा सीख रहा है- खुद अपना लुत्फ उठाने की कोशिश। 



कोलकाता में परफॉर्मिंग आर्ट्स पर एक पत्रिका की संपादक रहीं गौरी चटर्जी कहती हैं, ''जो दिख रहा है, वह पीढ़ियों का बदलाव है।'' गौरी ने ठीक ही कहा। वाम शासन इस बदलाव को समझने में नाकाम रहा। पार्क सर्कस में क्‍लब लाइफ शबाब पर है, कॉलेज स्‍ट्रीट कॉफी हाउस में तब्‍दील हो चुका है। फुचका की जगह चाउमीन की प्‍लेटें हैं और शाम होते ही जींस-टॉप में युवतियां उन पर टूट पड़ती हैं। विश्व भारती यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति रजत कांत रे कहते हैं, 'यह तकरीबन वैसी ही आजादी है, जो रूस में गृह युद्ध के खात्मे यानी 1919 और 1927 में स्टालिन के कब्जे के बीच थी। बेशक, राज्‍य की मानसिकता 'चोलबे ना' वाले दिनों की तुलना में काफी बदल चुकी है, लेकिन अब भी पेशेवर कार्यकर्ताओं की एक सुप्त फौज मौजूद है, जो हर तरह के पूंजीवादी उद्यम को खून चूसने वाली साजिश के रूप में ही देखती है। 



बहरहाल, इन बातों को किनारे रखकर सबसे पहले चलें कालीघाट। यह मंदिर 16वीं शताब्‍दी की शुरुआत में राजा मानसिंह ने बनवाया था। उस समय यह बहुत छोटा सा मंदिर हुआ करता था। मौजूदा मंदिर 200 साल पुराना है। इसे बानिशा इलाके के सबर्न रॉयचौधरी परिवार के संरक्षण में बनाया गया। मंदिर में मां काली की प्रतिमा अधूरी है। यानी सिर्फ मां का चेहरा ही है। इसमें तीन बड़ी आंखें साफ नजर आती हैं। मां के चार हाथ, खड्ग, सोने की जीभ और शिव की प्रतिमा बाद के वर्षों में बनाए गए। माना जाता है कि यहां सती की एड़ी गिरी थीं। आज भी मां को स्‍नान करवाते समय मंदिर के पुजारी अपनी आंखों पर पट्टी बांध लेते हैं। प्रतिमाओं को बनाने वाले ब्रह्मानंद और आत्‍माराम गिरी की समाधि मंदिर में ही बनी है। मंदिर में एक चबूतरे पर षोष्‍ठी, शीतला और मंगला चंडी के पिंड रखे हैं।

मंदिर के एक पुजारी ने बताया कि सैकड़ों साल पहले एक व्‍यक्‍ति को भगीरथी नदी के तल पर कुछ रोशनी सी दिखाई दी। गोता लगाने पर पता चला कि वह एक पत्‍थर है, जिस पर एड़ी जैसे निशान बने हैं। पास में ही एक और पत्‍थर शिव लिंग जैसी मिला। बस, तभी से वहां मंदिर बनाकर मां काली की आराधना शुरू हुई। यह मंदिर नाथ/ सिद्ध परंपरा का है। चौरंगी नाथ इसी परंपरा के थे। वे गुरु गोरखनाथ के शिष्‍य थे। बंगाल नरेश देवपाल के बेटे चौरंगीनाथ की सौतेली मां ने अपने बेटे को राजपाठ दिलाने के लिए उनके हाथ-पैर काट दिए। लेकिन काफी साल बाद योग साधना से चौरंगी ने अपने अंगों को वापस पा लिया। उन्‍हीं के नाम पर कोलकाता शहर के उत्‍तर-दक्षिण का केंद्र बिंदु चौरंगी पड़ा।

जैसा ही भारत के तकरीबन हर मंदिर में होता है, कालीघाट मंदिर के तिराहे पर पहुंचते ही पंडों के दर्शन हो जाते हैं। गले में कैमरा लटकाए व्‍यक्‍ति को देखते ही वे पहचान लेते हैं कि यह बाहर से आया है। वे आपको घेरेंगे, मिन्‍नतें करेंगे, दादा-दीदी, काकी मां, माशी मां जैसे संबोधन आपके कदम रोकेंगे। लेकिन रुकना नहीं। एक दुकान तलाशिए। वहां अपने जूते-चप्‍पल, कैमरा (मंदिर के भीतर ले जाने की मनाही है) रख दें और अपनी हैसियत के अनुसार प्रसाद खरीद लें। पंडा अगर साथ चलने (सिर्फ 20 रुपए की फीस पर) की जिद करे तो ना कर दें। आराम से दर्शन करें। पंडे मंदिर के भीतर भी मिलेंगे। वे आपसे विशेष पूजा का आग्रह करेंगे। ना मानें।



मंदिर से बाहर निकलकर आपको बंगाल के मशहूर देवी मुख (दुर्गा का चेहरा) की दर्जनों दुकानें मिलेंगी। कहीं धान की बालियों से सजावट तो कहीं जरी का साज-श्रृंगार। कला की कोई हद नहीं और बंगाली कलाकार ऐसी किसी हद को मानते भी नहीं। इन दुकानों में 40-200 रुपए के बीच देवी मुख की कई विविधताएं मिल जाएंगी। साथ में और भी कई कलाकृतियां। कालीघाट मंदिर से दाहिने चलकर बाएं मुड़ने पर मदर टेरेसा की कर्मस्‍थली निर्मल ह्यदय नजर आता है। मां आदिशक्‍ति के बगल में मदर का वास। बहुत ही प्रेरक। फिर दाएं मुड़ने पर कुछ झोपड़ियों में विधवा, बेसहारा बुजुर्ग महिलाएं धोती लपेटे नजर आएंगी।

इन्‍हें उनके परिजनों ने घर से बेदखल कर दिया। वे दोनों माताओं की शरण में दर्शनार्थियों की भीख और भोग पर निर्भर हैं। इससे कुछ आगे बढ़ने पर एक गंदा, बदबूदार नाला दिखता है। असल में यह आदि गंगा है। कालीघाट पहले भगीरथी (हुगली) के तट पर था। हावड़ा ब्रिज बनाते समय नदी का रुख मोड़ा गया, जो पुल बनने के बाद भी वैसा ही बना रहा। तब इस शक्‍तिपीठ की महिमा को बरकरार रखने के लिए नदी से एक नहर काटकर मंदिर के पास से निकालते हुए आदि गंगा नाम दिया गया। फिलहाल शहर का सीवेज इसी से होकर जाता है। नहर एक नाले का रूप ले चुकी है।



- शेष अगली किस्‍त में

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

खानाबदोश की डायरी : 2

सूखते दरख्‍तों के बीच अनसुनी आवाजों का आर्तनाद 

लगातार सात साल तक सूखे जैसे हालात का असर बुंदेलखंड की हरियाली पर पड़ा है। हालांकि, 18वीं और 19वीं सदी के दौरान बुंदेलखंड में हर 16 साल बाद सूखे का दौर आया, लेकिन 1968 से 1992 के बीच सूखे की अवधि में तीन गुने का इजाफा हुआ है। इसकी सबसे करारी मार अंचल के 25 फीसदी दलित और आदिवासी तबके पर पड़ा है। अंचल की 75 फीसदी आबादी जीने के लिए खेती पर निर्भर है, पर खरीफ के सीजन में आप चले जाएं तो 20 फीसदी रकबे में ही फसल नजर आएगी।

इस तरह की खबरें आए दिन सुर्खियां बनती हैं। 
बाबा के देशज ज्ञान का जवाब नहीं 
मध्‍यप्रदेश में बुंदेलखंड के 6 जिले हैं। दतिया को छोड़कर बाकी पांचों जिलों में मैं घूम चुका हूं। इनमें से चार जिलों में दो बार से ज्‍यादा यात्राएं हुई हैं और हर बार मैंने वहां की हरियाली को घटते ही देखा है। मौसमी बदलाव का जमीनी चेहरा अब साफ नजर आने लगा है। सबसे खराब हालत दतिया और टीकमगढ़ की है। अध्‍ययनकर्ता एमएन रमेश और वीके द्विवेदी की रिपोर्ट के मुताबिक अब 10 फीसदी से भी कम जंगल बचे हैं। बाकी चार जिलों सागर, छतरपुर, पन्‍ना और दमोह के 29.69 फीसदी हिस्‍से में जंगल हैं। पन्‍ना में इसका श्रेय टाइगर रिजर्व को जाता है, वरना चारों जिलों में अवैध खनन खरपतवार की तरह फैल रहा है। टीकमगढ़ से निकलकर जैसे ही छतरपुर की ओर बढ़ेंगे, आपको सड़क के दोनों तरफ खड़खड़ाते क्रेशर और उड़ती धूल नजर आएगी। इनमें से ज्‍यादा अवैध क्रेशर नेताओं और उनके गुर्गों की है। एक समय बुंदेलखंड का 37 फीसदी से बड़ा इलाका बियाबान था। यहां की पहाड़ियां लंबे, ऊंचे पेड़ों से ढंकी थी। छतरपुर में रहने वाले जाने-माने पर्यावरणविद् और आईआईटी के गोल्‍ड मेडलिस्‍ट भारतेंदु प्रकाश ने बड़े ही चिंतित लहजे में हमें बताया कि अंचल के अधिकतम और न्‍यूनतम तापमान में आया बदलाव असल में तेजी से खत्‍म होते जंगलों के कारण है। ये जंगल धरती के लाखों वर्षों के विकास क्रम का नतीजा हैं। जंगलों के लगातार सफाए के चलते भारतेंदु जी कहते हैं, इस नुकसान की भरपाई अब किसी भी सूरत में नहीं हो सकती। ये जंगल बारिश को खींचते हैं। पेड़ के हर पत्‍ते में पानी संग्रहित होता है। सूर्य की किरणें जब इन पर पड़ती है तो प्रकाश संश्‍लेषण की क्रिया के साथ ही वाष्‍पीकरण भी होता है। यह पारे की चाल पर लगाम लगाता है। उन्‍होंने कहा कि सरकार चाहे लाख दावे कर ले, लेकिन वह पहाड़ की ढाल पर दोबारा पेड़ नहीं लगा सकती। बुंदेलखंड के उत्‍तरप्रदेश वाले हिस्‍से में तो हालत और भी खराब है, क्‍योंकि वहां पांच जिलों के छह फीसदी हिस्‍से में ही जंगल बचे हैं। केवल चित्रकूट और ललितपुर में क्रमश: 18 और 11 प्रतिशत जंगल हैं। एमएन रमेश के अध्‍ययन में यह बात भी सामने आई है कि बुंदेलखंड के सभी 13 जिलों में 1991 से 2003 के दौरान जंगल सबसे तेजी से कम हुए। भारतेंदु जी कहते हैं, जंगल वह होता है, जिसमें पेड़ों के नीचे जीवन पलता है। झड़ते पत्‍तों से पैदा हुआ ह्यूमस बारिश के पानी के बहाव से खेतों तक पहुंचता है। इससे जमीन उपजाऊ बनती है। पेड़ पानी के बहाव को भी नियंत्रित करते हैं। इनके न होने से खेतों की टॉप सॉइल, यानी मिट्टी की ऊपर तह का कटाव हो रहा है। ऊपर से दूसरे विश्‍वयुद्ध के खात्‍मे के बाद टैंकों के कल-पुर्जों से बने आज के ट्रैक्‍टर खेत जोतने की जगह डेड सॉइल यानी मृत मिट्टी को नीचे से ऊपर ले आते हैं। इससे पैदावार पर असर पड़ा है। 

सिंदूर सागर तालाब। टीकमगढ़ में ऐसे 150 से ज्‍यादा तालाब हैं, जो सूखे की चपेट में आ चुके हैं। 

पुणे के इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी इंस्‍टीट्यूट का अध्‍ययन यह कहता है कि वर्ष 2100 तक बुंदेलखंड अंचल में शीतकालीन वाष्‍पीकरण घटकर 50 फीसदी से भी कम रह जाएगा। यही वह मौसम है, जब समूचे अंचल में गेहूं की खेती होती है। नमी की मात्रा घटकर आधी रह जाने का नतीजा गेहूं की पैदावार में गिरावट के रूप में सामने आएगा। भारतेंदु जी का आकलन है कि दमोह और सागर में जंगलों के होने से वहां 950 मिलीमीटर से ज्‍यादा बारिश होती है, लेकिन टीकमगढ़ और छतरपुर में बारिश की मात्रा घटकर 850 मिमी से थोड़ी ज्‍यादा रह गई है और इसमें आ रही गिरावट ही फिक्र की बात है। अब तो सितंबर में ही धूप इस कदर तेज हो जाती है कि वह जमीन की अधिकांश नमी खींच लेती है। इससे किसानों को अपनी फसल लेने के लिए सिंचाई पर ज्‍यादा जोर देना पड़ता है। दो एकड़ काश्‍त वाला छोटा किसान अमूमन इसका खर्च नहीं उठा पाता। उसकी कमर टूटने का यह एक बड़ा कारण है।

भारतेंदु जी का कहना एकदम दुरुस्‍त है कि उत्‍तराखंड में तराई के जंगल पहले हमारी जीवनदायिनी नदियों के प्रवाह को बनाए रखने का जरिया थे। कहते हैं गंगावतरण के समय यह सवाल खड़ा हुआ था कि उनके प्रबल वेग को कौन संभालेगा। तब भगवान शंकर ने गंगा को अपनी जटाओं में समाहित किया। भारतेंदुजी इन जटाओं को तराई के जंगल मानते हैं, जिसने गंगा के वेग को संभाला। वे आगे कहते हैं, 1865 में अंग्रेजों ने जंगलों का सरकारीकरण कर दिया, क्‍योंकि उन्‍हें जंगल, बारिश, वन्‍य जीवों और आदिवासियों से कोई मतलब नहीं था। वे तो सिर्फ इमारती लकड़ी चाहते थे, जिससे वे अपने यहां घर बना सकें, रेलों के लिए स्‍लीपर बिछा सके। आजादी के बाद भारत सरकार के वन मंत्रालय ने भी अंग्रेजों की देखादेखी ही की।

भारतेंदु जी की बात का टीकमगढ़ के पृथ्‍वीपुर ब्‍लॉक के राजावर गांव में 77 वर्षीय एक किसान ने भी समर्थन किया। करीब 200 घर वाले राजावर गांव में ज्‍यादा कुशवाहा रहते हैं। बाबा कहते हैं, ’10 साल पहले हम इसी फरवरी में कावनी-कोदो, गेहूं, मक्‍का, ज्‍वार उगा लेते थे। अब कोदा नहीं उगता। मूंगफली लगभग गायब हो गई है, जबकि तिल इक्‍का-दुक्‍का किसान ही उगा पाते हैं।’ उन्‍होंने कहा कि पहले जेठ, यानी जून में ही बारिश हो जाती थी। आजकल सावन और भादो इन दो महीनों में भी 70 प्रतिशत से ज्‍यादा बारिश होती है। बारिश के दिन घटे हैं तो बूंदों का वेग भी बढ़ा है। भारतेंदु जी इसे थोड़ा और सरल करते हुए बताते हैं कि दरअसल पेड़ की पत्‍तियां बूंदों की तेजी को कम कर देती हैं। इससे स्‍प्रिंकलिंग इफेक्‍ट होता है। पहले खेत के चारों ओर पेड़ लगाने का रिवाज था। अब तो मेड़ भी ठीक से नहीं बनते। जीएम और संकर बीजों के आने से कीटनाशकों की खपत तीन गुनी बढ़ी है, सो मेड़ पर मिट्टी को बांधने वाली घास भी नहीं उग पाती।

जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्‍यादा असर टीकमगढ़ ब्‍लॉक पर पड़ा है। जिले के कुल 6 ब्‍लॉक हैं। उनमें से तीन की हालत भी खराब है। इसकी मिसाल है जिले का सिंदूर सागर लेक। प्राचीन गिद्धवासिनी मंदिर के पास बने इस लेक में मछली पकड़ने वाले रघुनाथ केवट बताते हैं कि 2007-08 के सूखे ने तालाब की ज्‍यादातर मछलियां निगल लीं। उस दौरान तालाब इस कदर सूख गया था कि बच्‍चे उस पर क्रिकेट खेलने लगे थे। फिलहाल पिछले दो साल की बारिश से तालाब थोड़ा भर गया है, लेकिन उसमें बंगाल से साबुत मछलियां डाली जाती हैं। बगल के पहाड़ पर लगे पानी के निशान बताते हैं कि तालाब का पानी कभी वहां तक पहुंचा करता था। पहले यहां के मछुआरों को महीनेभर में 10 से 12 हजार रुपए की आमदनी सिर्फ मछली पकड़ने से हो जाया करती थी, जो इस समय घटकर बमुश्‍किल 3 हजार को छू पाती है।

तस्‍वीर में जहां तक रेत नजर आ रही है, पहले कभी वहां तक तालाब का पानी पहुंचता था। 

पास ही बना है गिद्धवासिनी देवी का मंदिर। इसके बारे में किवंदती है कि 1100 ईस्‍वी में राजा खेतसिंह खंगार (परिहार राजपूत, जो निचली जाति के माने जाते हैं) एक ठाकुर सोहन पाल की लड़की के प्रेम में पड़ गए। ठाकुर ऊची जाति के होते हैं, सो उन्‍होंने ऐतराज जताया। लेकिन राजा तो राजा। वह जिद पर अड़ा हुआ था। ऐसे में ठाकुरों ने आत्‍मसम्‍मान की रक्षा के लिए अपनी कुर्बानी देना ठीक समझा। वे विंध्‍यवासिनी की शरण में गए। देवी के हाथ में रखे कटार से अपनी गर्दन काटनी चाही तो वे प्रकट हो गईं। उन्‍होंने कहा कि वे खुद वहां जाएंगी, पर उनकी शर्तें होंगी। सोहनसिंह की बेटी की शादी में सूबे के सारे खंगारों को बुलाया जाए। राजा मान गया। देवी गिद्ध पर बैठकर वहां पहुंचीं और अपनी कटार से सारे खंगारों को मार गिराया। एक गर्भवती खंगार महिला किसी तरह बच गईं। देवी ने उससे यह प्रण करवाया कि उसकी संतान और आगे की सारी पुश्‍तें मंदिर में चौकीदार का काम करेगी। तब से मां के मंदिर में खंगार वंश चौकीदारी करता है। बाद में सोहन पाल ने ही सन 1257 में मंदिर के पास विशाल तालाब बनवाया। कहानी के पीछे जो भी मान्‍यताएं हों, पर एक बात जो जमीन पर नजर आती है वह यह कि जिस गिद्ध पर बैठकर देवी यहां आई थीं, उसकी प्रजाति बुंदेलखंड में नाममात्र को रह गई हैं। पन्‍ना टाइगर रिजर्व में गिद्ध पालन का काम शुरू किया गया है। मुमकिन है आने वाले दिनों में आस्‍था का प्रतीक यह प्राणी इस अंचल में बचा रहेगा। टीकमगढ़ जाएं तो गढ़ कुंडार के विचित्र किले को देखना न भूलिएगा। पहाड़ी पर बना यह किला मीलों दूर से नजर आता है, पर जैसे ही आप उसके पास जाएंगे वह दिखाई देना बंद हो जाएगा। इसकी वजह है किले के ठीक सामने बना एक और पहाड़, जो इसे ढंक लेता है। किले के दोनों तरफ अगर ऊंचे पेड़ वाले जंगल हों तो यह कहीं से भी नजर न आए, लेकिन अब तो पेड़ गायब हैं सो किला नजर आ ही जाता है। महाराजा खेत सिंह ने 1180 में इस किले को बनवाया था। 1347 में मोहम्‍मद तुगलक ने इसे जीता और बुंदेलों को सौंप दिया, जो तब तक मुगलों के दोस्‍त बन चुके थे।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

खानाबदोश की डायरी

सूखते दरख्तों के बीच अनसुनी आवाजों का आर्तनाद

बुंदेलखंड के मध्‍यप्रदेश वाले हिस्‍से को तीन तरह से पकड़ सकते हैं। सतना होते हुए आप वहां पहुंचें या फिर सागर की तरफ से। इससे पहले मैं दोनों हिस्‍सों से बुंदेलों की जमीन पर दाखिल हो चुका था। झांसी की तरफ से जाने का यह पहला मौका था। झांसी स्‍टेशन से बाहर निकलते ही आपको इस पूरे अंचल की गरीबी नजर आने लगेगी। मुझे ओरछा जाना था, क्‍योंकि वही पहला पड़ाव था। शेयरिंग टेम्‍पो में, जिसे कई जगहों पर स्‍थानीय भाषा में आपे भी कहा जाता है, बैठने का मजा ही अलग है। खासतौर पर तब, जबकि सड़क पर सरकारी एहसान के थीगड़े जड़े हों। अगर आपकी रीढ़ मजबूत नहीं है तो ओरछा तक 15 किलोमीटर के सफर में ही आप बेहाल हो सकते हैं। रानी लक्ष्‍मीबाई के शहर झांसी में बहुतेरे विदेशी सैलानी उतरते हैं। सत्रहवीं सदी में बना राजा वीर सिंह का किला और उसमें रखी कड़क बिजली तोप, रानी का महल (जो अब म्‍यूजियम बन चुका है), बरुआ सागर लेक जैसी कुछ जगहों के सैर सपाटे में दो दिन से ज्‍यादा नहीं लगते। इसके बाद विदेशी सैलानी मध्‍यप्रदेश के ओरछा का ही रुख करते हैं। हर कोई इन्‍हें जल्‍द से जल्‍द घेर लेना चाहता है।

स्‍टेशन से बाहर आते ही ओरछा-ओरछा चिल्‍लाते आपे मिलेंगे। ड्राइवर दुबले-पतले होने चाहिए, ताकि अगल-बगल दो-दो सवारियां आराम सं टंग सकें। कुल 10 सवारियों के बिना आपे हिलेगा भी नहीं। पीछे सामान रखने की जगह पर भी तीन लोग आधे किराए पर टंग सकते हैं और नजर चूकते ही आपका सामान गायब भी कर सकते हैं। खैर, झांसी शहर से निकलकर हाइवे पर आते ही हमारा आपे तूफानी रफ्तार से दौड़ने लगा। घुप्‍प अंधेरे में तीन पहियों की यह रफ्तार खौफ पैदा करती है। लेकिन बुंदेलों के सीने में डर नाम की कोई चीज नहीं। बमुश्‍किल आधे घंटे में तीन स्‍टापेज पार कर हम अपनी मंजिल, यानी ओरछा में थे। होटल तक छोड़ने के बदले डबल किराया देने का लालच ड्राइवर को भा गया और उसने बेधड़क आपे को बड़ी सफाई से संकरी गली में डाल दिया।

ओरछा के राम राजा मंदिर से लगे होटल श्री पैलेस में हमारी बुकिंग थी। अपने देश में होटलों के नाम कुछ इस तरह के होते हैं, जैसे ‘किसी दृष्‍टिहीन का नाम नैनसुख हो’। छोटे से टीले के सामने का होटल हिल्‍स व्‍यू होगा तो बदबू मारते पोखर के सामने वाला लेक व्‍यू कहलाएगा। श्री पैलेस मिश्रा जी का है। ओरछा में तकरीबन सभी होटल-ढाबे और रेस्‍त्रां पंडितों के हैं। छोटे मिश्रा लॉज, बड़े मिश्रा की दुकान वगैरह। बुंदेलखंड के सागर वाले हिस्‍से में होटल-ढाबे जैन समुदाय के हैं, जबकि पन्‍ना-छतरपुर में यादव व शिवहरे समुदाय होटल चलाता है। होटल पहुंचते ही सामना मिश्रा जी से हुआ। मिश्रा जी खब्‍बू (बाएं हाथ वाले) हैं। माथे पर तिलक, होंठों पर पान की लाली समेटे मिश्रा जी ने हमारे खाने के बारे में नहीं, बल्‍कि राम राजा के भोजन का बखान उल्‍टे हाथ की अनोखी नृत्‍य मुद्राओं से करना शुरू किया। बोलते समय उनकी बाईं आंख मिचमिचाने लगती थी। बाल भोग यानी राम राजा का नाश्‍ता, राज भोग माने लंच से लेकर डिनर तक के इस बखान के पीछे का स्‍वार्थ हमें तब समझ आया, जब फ्रेश होकर हम नीचे उतरे और सीढि़यों के नीचे झांका। मिठाई (राम राजा का प्रसाद) की दुकान उन्‍हीं की थी। छूटते ही फिर आंख मारते हुए बोले, ‘कम से कम 300 रुपए का भोग तो चढ़ा दीजिए।’ घबराकर हम आगे बढ़ गए।

राम ही राजा, बाकी सब प्रजा



ओरछा के राजा राम हैं। राष्‍ट्रपति, पीएम, सीएम और कलेक्‍टर से लेकर सिपाही तक सब उनकी प्रजा हैं। किसी को भी ओरछा में सैल्‍यूट नहीं पड़ता। कहते हैं, 1984 में तत्‍कालीन पीएम इंदिरा गांधी यहां आई थीं। तब उन्‍होंने चरणामृत की जांच करवाई थी। लोगों का कहना है कि भगवान के प्रसाद पर शक करना उन्‍हें भारी पड़ गया। इस कहानी का संबंध उसी साल हुई उनकी हत्‍या से है। मध्‍यप्रदेश के एक मंत्री के बारे में भी इसी तरह की कहानी प्रचलित है। लोग मानते हैं कि जो भी राम राजा के दरबार में उनका असम्‍मान करेगा, शक करेगा उसे जान-माल का नुकसान उठाना पड़ेगा।

किवंदती के अनुसार भगवान राम जब वनवास के लिए निकले तो पिता दशरथ पुत्र वियोग में रोने लगे। उन्‍होंने राम से कहा कि तुम्‍हे देखे बिना मैं कैसे जी पाऊंगा। इस पर राम-लक्ष्‍मण की मूर्तियां प्रकट हुईं। एक बार ओरछा की रानी गणेशी बाई (बुंदेला शासक मधुकर शाह की पत्‍नी) अयोध्‍या स्‍थित सरयू नदी में स्‍नान-ध्‍यान कर रही थीं। तभी राम लला उनकी गोद में आ गए। रानी ने उनसे ओरछा चलने को कहा तो उन्‍होंने तीन शर्तें रखीं – पुक पुक चलैहें (पग पग चलूंगा), उजाड़ देहैं (रास्‍ते में सब उजाड़ दूंगा), जित बैठें उतै उठे नहीं (जहां विराजूंगा, वहां से हिलूंगा नहीं)। रानी ने तीनों शर्तें मान लीं। इस तरह राम लला अयोध्‍या से ओरछा तक के रास्‍ते में सब-कुछ उजाड़ते हुए यहां आकर बस गए। इसके बाद रानी ने अपना सारा राजपाठ राम को समर्पित कर दिया। तभी से राम ओरछा के एकक्षत्र राजा हैं। राम राजा के दरबार में सुबह बाल भोग का प्रसाद बंटता है। इससे कई गरीबों का भला हो जाता है।

सोते हैं अयोध्‍या में 




रात 9 बजे मंदिर में राम राजा की आरती होती है। 9.30 बजे कपाट खुलते ही जयजयकार के साथ एक पुलिस वाला उन्‍हें सशस्‍त्र सलामी देता है और फिर पुजारी आरती लेकर रवाना होते हैं प्राचीन हनुमान मंदिर की तरफ। मान्‍यता है कि हनुमान खुद राम लला को आरती समेत रोज रात को अयोध्‍या लेकर जाते हैं। किस्‍मत से राम लला को सी-ऑफ करने हम भी मौजूद थे। उन्‍हें हनुमान जी के कांधे पर बिठाकर हम भोजन के लिए निकले। फिक्र थी कि तेजी से सोते शहर में कहीं ठीक-ठाक भोजन मिल जाए। पूछताछ में एक ठीहे का पता चला। भीतर दीवान सजा था। कच्‍चे मकान को बेतरतीब तरीके से तराशकर एस्‍थेटिक लुक देने की कोशिश की गई थी। दीवार पर लिखा था, फ्री वाई-फाई। बगल में इंटरनेट पर होटल के मालिक यादव साब के सुपुत्र ? लैपटॉप पर फेसबुक खोलकर लप्‍पे खा रहे थे। गाढ़ा काला रंग, पतली कमर और कान में हेडफोन ठूंसे उस विचित्र प्राणी को देखकर हमने यादव जी और उनकी पत्‍नी को निहारा तो फिर कोई शक नहीं रहा।

हमारे हर ऑर्डर पर कालूराम ओके सर कहता और जूते पहनकर किचन में घुस जाता। मेन्‍यू कार्ड में कई अजीबोगरीब डिशेज थीं। सब कालूराम का कमाल था। हमें यकीन हो गया कि जल्‍दी ही वह बड़ा नाम करेगा। कांगो, बुरुंडी जैसे किसी अफ्रीकी देश में उसके लिए अपार संभावनाएं थीं। हमने पूछा फेसबुक पर क्‍या करते हो तो मुस्‍कुराकर लाल-पीले दांतों को हिलाकर बोला- चैटिंग। बहरहाल, खाना अच्‍छा था। वापसी का रास्‍ता मंदिर के बगल से होकर जाता था। वहां देखा कि कुछ लोग ठंड में फटा कंबल ओढ़कर खुले में ही सो रहे हैं। कोई रैन बसेरा नहीं। राम राजा की प्रजा बेहाल है, यह जानकर दुख हुआ। मिश्रा जी का होटल श्री पैलेस नया बना है, सो आइना नहीं लगा। पानी अगर ऊपर की टंकी में नहीं चढ़ा तो नहाने का संकट खड़ा होगा। खैर, जीवन नाम के व्‍यक्‍ति ने हमारी बहुत मदद की। बाल्‍टियों में गर्म-ठंडा पानी ढोया। सुबह की अदरक वाली गर्म चाय उसी ने पिलाई। सुबह मिश्रा जी से तमाम अव्‍यवस्‍थाओं के बारे में पूछा तो पुराने विलेन रंजीत की तरह आंख मींचकर बाएं हाथ की नृत्‍य मुद्रा में बोले, ‘जो आज हुआ है, कल नहीं होगा।’ 


इस सुनहरे कल के इंतजार में हम चल दिए ओरछा के पुराने मंदिर और जहांगीर महल की ओर। बुंदेला राजपूत रुद्र प्रताप की रियासत रहे ओरछा की जड़ें 16वीं सदी के बुंदेला शासन में समाई हैं। बेतवा के किनारे बसे इस शहर का सबसे प्रमुख आकर्षण है जहांगीर महल। जहांगीर ने 1598 में वीर सिंह बुंदेला को हराया था। तभी से इसका नाम जहांगीर महल पड़ गया। महल में जंगी हाथियों के आने लायक दरवाजे हैं। प्राचीर पर खड़ी तोपें मुगलिया शासनकाल के फौजी इंतजामों की झलक दिखाती हैं। महल से पूरा शहर नजर आता है। 


जहांगीर से मात खाकर रुद्र प्रताप बुंदेला मुगलों के दोस्‍त बने और 5000 सिपाही भी उन्‍हें भेंट में दिए। हालांकि, किले की दीवारों पर बने असंख्‍य प्रेम त्रिकोणों में विरासत गुम होती जा रही है। जहांगीर महल में हनुमान और गणेश जी के गेरुए प्रतिमाएं देखकर हमें हैरत हुई। फिर समझ आया कि मुगलों के निकलने के बाद स्‍थानीय हिंदू आबादी ने इस पर अपना ठप्‍पा लगाने की पुरजोर कोशिश की है। किले के प्रवेश द्वार पर शीश महल नाम का होटल बना है, जहां ठहरने की जहमत विदेशी या प्रायोजित अतिथि ही उठा सकते हैं। आधे घंटे की फोटोग्राफी हम राम लला के मूल निवास, यानी रानी के महल की ओर चल पड़े। 


 
इस महल में यूं तो खास कुछ नहीं, पर राम लला की प्रतिमाएं विराजमान हैं। पुजारी जब तक फोटो खींचने के लिए मना करते, मैंने कैमरे के जूम का बखूबी इस्‍तेमाल करते हुए एक क्‍लोज अप ले ही लिया। यह पुराना मंदिर है। नया मंदिर बाद में बना, जिसमें मोबाइल, कैमरा और यहां तक कि बेल्‍ट पहनकर जाना भी मना है। अलबत्‍ता पुलिस वालों को बेल्‍ट पहनने की छूट है (वर्दी का सवाल है भाई)। हमने बाहर संतरी से वजह पूछी तो बताया कि हमारे बेल्‍ट का चमड़ा अशुद्ध है। खाकी वालों की बेल्‍ट प्‍लास्‍टिक की होती है, सो वे पहन सकते हैं। मंदिर के ठीक सामने रनिवास है। कहते हैं, वहां झरोखे से रानी रोज राम लला के दर्शन करती थीं। खैर, राय प्रवीण महल और चतुर्भुज मंदिर ओरछा की अन्‍य ऐतिहासिक विरासतों में से एक हैं। मंदिर के पास ही न्‍यूयॉर्क के ध्‍वस्‍त वर्ल्‍ड ट्रेड सेंटर की इमारतों के समान दो स्‍तंभ नजर आते हैं। ये सावन-भादो हैं। दोनों भाई थे। इनके इतिहास के बारे में यही इकलौता विवरण उपलब्‍ध है। आसपास मंडराती गाएं, दूर तक फैला कचरा और आसपास निवृत्‍त होते लोग। देश के अधिकांश पर्यटन स्‍थलों की तरह राम राजा के राज में भी भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग भी बेबस है।

 .... शेष अगली बार।