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गुरुवार, 21 मार्च 2013

गरीब का बेटा

ये फोटो श्‍योपुर जिले के एक सहरिया बहुल गांव का है। यह बच्‍चा खुशकिस्‍मत है, क्‍योंकि इसके हाथ में रोटी है। गुरबत में सहरिया बच्‍चों को मवेशियों के गोबर में से उन फलों की गुठलियां बीनकर खानी होती हैं, जिन्‍हें मवेशी जंगल में खाकर लौटते हैं। अगर इस बच्‍चे और इसके मां-बाप को जंगल जाने की  इजाजत होती तो इसकी थाली में सिर्फ सूखी रोटी ही नहीं, सब्‍जी भी होती। गौरतलब है कि श्‍योपुर मध्‍यप्रदेश के सबसे कुपोषित जिले में से है।


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हां,  मैं गरीब का बेटा हूं
जिंदगी को सितम में कहता हूं
मजबूरियों में भी खुश रहता हूं
चंद बूंदों में पेट भर लेता हूं
  क्‍योंकि मैं गरीब का बेटा हूं।
कभी सब्‍जी तो कभी कुछ न मिले,
  नमक रोटी पर जी लेता हूं
जख्‍म चाहे जैसे भी हों
थोड़ी हल्‍दी मैं लगा लेता हूं
  क्‍योंकि मैं गरीब का बेटा हूं।
गम भी बहुत है, दर्द भी बहुत है दिल में
सब दबा लेता हूं
कभी अकेले तो कभी सबके सामने
आंखों से अंगूठा भिगो लेता हूं
क्‍योंकि मैं गरीब का बेटा हूं।

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बुधवार, 26 सितंबर 2012

कतरा...कतरा...

1. मेरी कविता हर उस इंसान का बयान है
जो बंदूकों के गोदाम से अनाज की ख्वाहिश रखता है
मेरी कविता हर उस आंसू की दरख्वास्त है
जिसमें आंसू हैं।

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2. तुझसे होती भी तो क्या होती शिकायत मुझको,
तेरे मिलने से मिली दर्द की दौलत मुझको।

जिन्दगी के भी कई कर्ज हैं बाकी मुझ पर,
ये भी अच्छा है न रास आई मुहब्बत मुझको।

तेरी यादों के घने साए से रुखसत चाहूं,
फिर बुलाती है कहीं धूप की शिद्दत मुझको।

सारी दुनिया मेरे ख्वाबों की तरह हो जाए,
अब तो ले दे के यही एक है हसरत मुझको।

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3. खींच लो यह खंजर
जो धंसा है मेरी पीठ पर
मुझे जीने दो
बाहर निकाल लो मेरी त्वचा से अपनी गंध।
मुझे एक अवसर दो
कि मैं मिल सकूं एक नई दोस्त से
कि मैं अपनी डायरी से मिटा दूं तुम्हारा नाम
कि मैं काट दूं तुम्हारे बालों के गुच्छों  को
जो बनी हुई हैं मेरी गर्दन की फांस।

मुझे एक अवसर दो
कि मैं नई राहों की खोज कर सकूं
ऐसी राहें जिन पर कभी चला नहीं तुम्हारे साथ
ऐसे ठिकाने तलाशूं
जहां कभी बैठा नहीं तुम्हारे संग
उन स्थलों का उत्खनन करूं
जिन्होंने विस्मृत कर दिया है तुम्हारी स्मृति को।

मुझे एक अवसर दो
कि उस स्त्री को खोज सकूं
जिसे मैंने देखा नहीं तुम्हारे लिए
और तुम्हारे लिए हत्या कर दी उसकी।

मैं फिर से जीना चाहता हूं
एक अवसर दो मुझे
बस एक।
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4. थाम लो मुझे थपकियां दो मुझे
आज की रात दर्द भरे हैं सारे पत्थर
सहेज लो मुझे अपने सीने में
ताकि मैं टहल सकूं आराम से
सितारे सलेटी हैं राख की मानिंद
और उन तक जाने वाली सड़क
रोशनी से सराबोर।


मनुष्य सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही बार उस रोज़ जन्म नहीं लेते जब उनकी माताएं उन्हें पैदा करती हैं ... जीवन बार-बार उन पर अहसान करता है कि वे स्वयं को जन्म दें...





सोमवार, 24 सितंबर 2012

मैं उड़ता जाऊंगा


तुम दर्ज कर सकती हो मेरा नाम इतिहास में
अपने तीखे और विकृत झूठ के साथ
कुचल सकती हो मुझे गंदगी में
लेकिन फिर भी धूल की तरह
मैं उड़ता जाऊंगा

जैसे उगते हैं चांद और सूरज
जैसे निश्चिंतता से उठती हैं लहरें
जैसे उम्मीदें उछलती हैं ऊपर
उठता जाऊंगा मैं भी।

क्या टूटा हुआ देखना चाहती थी तुम मुझे ?
झुका सर और नीची निगाहें किए ?
आंसुओं की तरह नीचे गिरते कंधे
अपने भावपूर्ण रुदन से कमजोर।

क्या मेरी अकड़ से ठेस पहुंचती है तुम्हें ?
क्या तुम पर बहुत भारी नहीं गुजरता ?
कि यूं कहकहे लगाता हूं मैं
गोया मेरे घर के पिछवाड़े हो सोने की खदान।

तुम शब्दों के बाण चला सकती हो मुझ पर
चीर सकती हो मुझे अपनी निगाहों से
अपनी नफरत से कर सकती हो क़त्ल
फिर भी हवा की तरह
मैं उड़ता जाऊंगा।

इतिहास के शर्म के छप्परों से
मैं उड़ता हूं
दर्द में जड़ जमाए अतीत से
मैं उगता हूं।

एक स्याह समंदर हूं मैं उछालें मारता और विस्तीर्ण
जज़्ब करता लहरों के उठने और गिरने को
डर और आतंक की रातों को पीछे छोड़ते
मैं उड़ता हूं
आश्चर्यजनक रूप से साफ़ एक सुबह में
मैं उगता हूं।

उन तोहफों के साथ जो मेरे पुरखों ने मुझे सौंपा था
मैं उठता हूं
मैं ही हूं सपना और उम्मीद गुलामों का
मैं उड़ता हूं
मैं उगता हूं
और मैं ही उठता हूं।

शनिवार, 8 सितंबर 2012

कुछ जागे हुए से सपने


मैं खुद को तैयार कर रहा था
अपमान और सीने में दर्द लिए,
अनकटे बालों को कांटों की तरह
परिरेखाओं पर खड़ा करके,
अज्ञात मोड़ों पर चांद और नीली पहाड़ियों पर,
बादलों का जीर्णोद्धार करते हुए,
वृक्षों पर जलरंग बिखराते हुए,
उधर कोई समाधि-स्थल पर तूफान मचा रहा था,
पीले कमरे में एक फकीर के पदचिन्ह थे,
जो रहस्योद्धाटन के बाद
आंखें बन्द कर शमशान में चलता था,
उसके चीथड़ों की पूजा होती थी,
बाद के सालों में उसकी टेक लगी देह के
अन्धेरों से रोशनी दमकने लगी थी।
गुलाब ही गुलाब चहुंओर,
वो जल्लाद से कह रहा था गीत के स्वर में,
कि खम्बे कितने ऊंचे थे !



शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

क्‍यों करे समर्पण...

आहत मन, 
करे मंथन, 
क्‍यों करे समर्पण। 
जब किया नहीं कुछ गलत, 
फिर क्‍यों मन हुआ आहत।
कुछ रिश्‍ते टूटे, कुछ समेटे, 
अब भी बंद थी मुट्ठी,
एक आस थी बाकी।
शायद बदल गया हो कुछ, 
भावनाओं के दबाव में, 
संवेदनाओं की आग में, 
शायद बन गए हों रिश्‍ते,
हीरे की मानिंग, 
पर ये क्‍या ?
आज जब खोली मुट्ठी,
निकला कोयला, 
शायद धीमी पड़ गई हो, 
संवेदनाओं की आंच,
कम हो गई हो,
भावनाओं की आंच। 
कैसे माफ करूं खुद को,
कैसे साफ करूं उसे वैमनस्‍य को, 
जिसपे कमजोर किया रिश्‍तों को। 
धीमे-धीमे काटी वह डोर,
जिससे नजर आती थी,
जीवन का अंतिम छोर। 
सोच रहा हूं एकांत में,
तैर रहा हूं एकांत के बवंडर में,
इस यकीन के साथ,
कि खोज निकालूंगा कुछ के जवाब, 
फिर बांधूंगा अपनी मुट्ठी,
तलाशूंगा रिश्‍तों की नई डोर।

रविवार, 12 अगस्त 2012

तन्हा -तन्हा‍

कहीं झर न जाएं आंसू आंख से
इस डर से सिर उठाए
चला जा रहा हूं तन्हा -तन्हा‍।

दिल में कसकती टीस लिए
आज की रात हुआ फिर, तन्हा‍-तन्हा‍।
यादों में उमड़ते हैं
बसंत के मदभरे दिन
उनकी यादों के साथ
चला जा रहा हूं तन्हान-तन्हा।

कहीं झर न जाएं आंसू आंखों से
इस डर से सिर उठाए
चला जा रहा हूं तन्हा-तन्हा।

डबडबाई आंखों से
गिन रहा हूं सितारे
और कर रहा हूं याद
उमस भरे बरसात के दिन
उनकी आलस भरी यादों ने
फिर कर दिया मुझे तन्हा-तन्हा।

दिल में कसकती टीम लिए
आज की रात हुआ फिर तन्हा‍-तन्हा‍।
बादलों से भी ऊपर
चली गई हैं खुशियां मेरी
आसमां के उस पार जा बसी हैं मस्तियां मेरी
यादों में ठिठक रहे हैं
पतझर के सुहाने दिन
कानों में गूंजती है
झरती पत्तियों की मातमी धुन
ये कैसी उदास परछाइयां हैं
छिपी जा रही हैं सितारों के पीछे
ये कैसी अनमनी चांदनी है
सिमटती जा रही है चांद के पीछे
कहीं झर न जाए आंसू आंख से
इस डर से सिर उठाए
चला जा रहा हूं तन्हा-तन्हा‍।

दिल में कसकती टीस लिए
आज की रात हुआ फिर तन्हा-तन्हा‍।

मौन को न तोड़ सके

एक निस्तब्धता
हम दोनों के बीच
सदियों से छाई है।

हम दोनों साथ चलते रहे
जाने कब से मगर
इस मौन को न तोड़ सके।

वह बात
जो मैं सुनना चाहता था
तुम्हारी आवाज़ में,
उसे नज़रों की भाषा में
पढ़ न सके।

हमारी बात दिल की
दिल में ही रह गई,
एक खामोश मौन की
गहराइयों में बह गई।

तुम्हारे लबों पर,
तुम्हारे विचारों की लय पर
पहरा लगा था समाज का,
परदा पड़ा था
शर्म और लाज़ का,
पर मैं...मैं क्यों मौन रहा?
क्यों खामोशी का दामन थामे
यूं चलता रहा?

हवा के हर झोंके ने,
बादलों की हर अंगड़ाई ने
छूकर पास से,
सिरहन मचाकर तन में
मौन को तोड़ना चाहा,
पर....
सफर यूं ही खामोश कटता रहा।

आज फिर तुम्हारी नज़रों ने
संग ले इस सुहाने मौसम का
कुछ पूछना चाहा,
खामोश दर्प को तोड़ना चाहा।

नज़रों ने
नज़रों की निस्तब्धता को तोड़ा,
हम फिर भी
वैसे ही खामोश रहे,
नज़रों के सहारे ही
कुछ कहते रहे।

...और चल पड़े अगले पल
वैसे ही खामोश, मौन,
निस्तब्धता लिए।
पता नहीं कब तक
यूं अनवरत,
शायद जनम-जनम तक,
इस जनम से उस जनम तक।


रविवार, 5 अगस्त 2012

तेज कटार पर चलती औरत

तेज कटार पर चलती औरत
फिसल गई तो क्या होगा ?
एक हादसा या जश्‍न का कारण ?


खुद को वह कोई नायिका समझती है
पर दर्शकों के लिए 
वह सौ में एक नौटंकी है।


तेज कटार पर चलती औरत 
घबराहट को छुपाती मुस्कुराती है
पर वे इसको
तमाशे का ही एक पार्ट समझते हैं
और जब वह सहमी लगती है तो भी।




तेज कटार पर चलती औरत
क्या सोच रही है
अपने बच्चों को 
अपने पति को
खुद को
चौगिर्द जुड़ी भीड़ को
या भीड़ में एक चेहरे को।


तेज कटार पर चलती औरत
सोच में खो गई तो क्या होगा
वह फिसल जाएगी
वह हार जाएगी।


तेज कटार पर चलती औरत
इस बार 
तेरी जान जुए में जुती है
तेरी आन जुए में जुती है
इसलिए
तू कदमों पर ध्यान धरना
कटार पर ध्यान धरना
कदमों पर ध्यान धरना
कटार पर ध्यान धरना।