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गुरुवार, 14 नवंबर 2013

सड़क पर बुलंद होती हक की आवाज

सिस्‍टम की बदइंतजामी का मारा मध्‍यवर्ग गुस्‍से से उबल रहा है। उसे अब यह कतई गवारा नहीं कि वह बेवजह दूसरों की गलती की सजा भुगतता रहे। मुंबई की कैम्‍पा कोला सोसायटी के रहवासियों की जीत सही मायनों में मध्‍यवर्ग की पहली फतह है। इस वर्ग को इंतजार है राजनीतिक नुमाइंदगी का, ताकि उसकी बात सत्‍ता के शीर्ष तक पहुंच सके। 


आप प्‍लीज हमें उजड़ने से बचाओ। मुंबई की कैम्‍पा कोला सोसायटी के गेट पर खड़ी एक असहाय महि‍ला ने एक मीडि‍याकर्मी से गुहार लगाई। महि‍लाओं से धक्‍का-मुक्‍की करते हुए भीड़ को खदेड़ती मुंबई पुलि‍स और भीमकाय बुलडोज़रों को तोड़-फोड़ का आदेश देते बीएमसी के पीली टोपी वाले। समूचा नजारा बेहद अमानवीय, वीभत्‍स था। अचानक पास पलटा और एक महि‍ला ने आकर देश की शीर्षस्‍थ अदालत के आदेश की जानकारी दी कि‍ अवैध नि‍र्माण को गि‍राने पर रोक लग गई है। लोग खुशी से नाचने लगे, मि‍ठाइयां बंटने लगीं। 

नाइंसाफी के खि‍लाफ मध्‍यवर्ग की यह पहली जीत नहीं है। याद कीजि‍ए 16 दि‍संबर के दि‍ल्‍ली रेप कांड के बाद सड़कों पर उमड़े जनाक्रोश को और उससे पहले कभी बड़े बांधों के खि‍लाफ, कभी जबर्दस्‍ती जमीन छीनने तो कभी परमाणु बि‍जली घर के वि‍रोध में कि‍ए गए प्रदर्शनों को। सबसे अहम बात यह है कि‍ ये सभी बीते तीन साल के दौरान हुए हैं और इन सभी में जन अधि‍कारों की ही जीत हुई है। कैम्‍पा कोला सोसायटी के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट की उसी खंडपीठ ने अपने फैसले के अमल को रोक दि‍या, जि‍सने भवन की पांचवीं मंजि‍ल से ऊपर बनी सभी मंजि‍लों को गि‍राने के आदेश दि‍ए थे। फैसला देने वाली जस्‍टि‍स जीएस सिंघवी की बेंच ने अमल पर यह कहकर रोक लगाई कि‍ कानूनी मसले के साथ यह एक मानवीय मसला भी है। मीडि‍या इस ‘मानवीय कोण’ पर यह कहकर अपनी पीठ थपथपा सकती है कि‍ कोर्ट ने उसकी रि‍पोर्टों पर वि‍चलि‍त होकर रोक के आदेश दि‍ए।

सवाल यह है कि‍ व्‍यवस्‍था के अंदर और बाहर ‘मानवीय कोण’ झंडे बेनरों के साथ आम आदमी के सड़क पर उतरने के बाद ही क्‍यों नजर आता है ? कैम्‍पा कोला सोसायटी का ही उदाहरण लें। अस्‍सी के दशक में बनी बि‍ल्‍डिंग के लि‍ए छह मंजि‍लों की ही अनुमति‍ थी। लेकि‍न बि‍ल्‍डर ने एक में 17 और दूसरे में 20 मंजि‍लें तान दीं। हम सभी जानते हैं कि‍ महानगर पालि‍का (बीएमसी) के अफसरों की मि‍लीभगत के बगैर ऐसा नहीं हो सकता। बि‍ल्‍डर ने भी इस उम्‍मीद में दोगुनी से ज्‍यादा मंजि‍लें तान दीं कि‍ बाद में वह ‘लेन-देन’ कर अवैध को वैध कर लेगा। बि‍ल्‍डिंग बनते समय बीएमसी के अधि‍कारि‍यों ने बि‍ल्‍डर को दो बार नि‍र्माण रोकने के नोटि‍स दि‍ए, पर यह देखने की जहमत नहीं उठाई कि‍ काम रूका या नहीं। हमारे देश में इस तरह की व्‍यवस्‍थागत चुनौति‍यों से पार पाने की कला हर चौथे व्‍यक्‍ति‍ को आती है। मि‍साल के लि‍ए दशहरे-दीवाली के समय अगर ट्रेन में जगह न मि‍ले तो दलाल को ज्‍यादा रकम देकर टि‍कट जुगाड़नी पड़ती है। हम जानबूझकर एक अजनबी से टि‍कट लेने का जोखि‍म उठाते हैं, यह नहीं देखते कि‍ कहीं टि‍कट फर्जी तो नहीं ? सफर के दौरान यदि‍ टीसी आपको यह कहकर ट्रेन से उतार दे कि‍ टि‍कट नकली है तो आपके पास वि‍रोध दर्शाने का इसके सि‍वा और क्‍या चारा रहेगा कि‍ आप ‘मानवीय कोण’ को प्रमुखता से पेश करें। 



फर्क केवल इतना है कि‍ वयवस्‍था के सताए इक्‍का-दुक्‍का इंसानों के वि‍रोध से न तो सत्‍ता हि‍लती है और न ही न्‍यायपालि‍का का दि‍ल पसीजता है। इस साल फरवरी में मुंबई की मानखुर्द इलाके की झोंपड़ि‍यां तोड़ी गई। नि‍गम अमले ने रहवासि‍यों के बर्तन-भांडे, कपड़े सब जब्‍त कर लि‍या। ठंड और भोजन न मि‍लने से तीन साल के एक बच्‍चे ने जब दम तोड़ दि‍या तो एक पुलि‍स अधि‍कारी ने कहा, ‘पि‍ता को अपने सारे कपड़े बच्‍चे को पहचानकर नंगा घूमना चाहि‍ए था।’ जाहि‍र है इस घटना की मीडि‍या कवरेज नहीं हुई तो ‘मानवीय कोण’ भी नहीं उभरा और न ही मामला कोर्ट के संज्ञान में आया। मुंबई के कुल जमीनी इलाके के छह फीसदी पर झोपड़पट्टि‍यां बसी हैं। दि‍ल्‍ली में 19 फीसदी, कोलकाता में 19 फीसदी और चेन्‍नई के क्षेत्रफल का 26 फीसदी हि‍स्‍सा झोपड़पट्टी के रूप में दर्ज है। इसी साल जनवरी में मुंबई के ही 10 हजार लोगों ने मोर्चा नि‍कालकर बि‍ल्‍डरों की तानाशाही, उत्‍पीड़न और शोषण का घोर वि‍रोध करते हुए मोर्चा नि‍कालकर एक अदद ‘छत’ के लि‍ए सोशल हाउसिंग की वकालत की।

यह सभी उदाहरण उस एक बात की ओर इशारा करते हैं कि‍ देश के 15 करोड़ मध्‍यमवर्गी परि‍वारों के सब्र का बांध छलक रहा है। उनका वि‍रोध प्रबल हो रहा है। टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं, बल्‍कि‍ एकजुटता के साथ एक आवाज में वे शांति‍पूर्ण अपनी बात कह रहे हैं। बस ये कोई राजनीति‍क मुद्दा नहीं बन पा रहा है, क्‍योंकि‍ दकि‍यानूसी वि‍चारधारा वाले हमारे राजनेताओं के लि‍ए शि‍क्षि‍त मध्‍यवर्ग की ‘राजनीति‍क प्रति‍बद्धता’ नि‍श्‍चि‍त नहीं है। यह वर्ग शहरी गरीब वर्ग से अलग है, जो सरकारी या नि‍जी जमीन पर झोपड़ि‍यों में रहता है और थोक में वोट ‘न्‍योछावर’ करता है। इसीलि‍ए जब भी यह वर्ग अपने हक की बात उठाता है तो उसे राजनीति‍क मुद्दा बनने में देर नहीं लगती। सरकारी कर्मचारि‍यों का वर्ग भी कुछ इसी तरह का है। लेकि‍न मध्‍य वर्ग को अपने मामले में राजनीति‍क दखलंदाजी बि‍ल्‍कुल पसंद नहीं। कैम्‍पा कोला मसले पर भी अदालती रोक के आदेश के बाद सहानुभूति‍ और समर्थन जताने आए नेताओं को स्‍थानीय रहवासि‍यों ने खदेड़कर भगा दि‍या। उन्‍हें पता चल चुका है कि‍ ऐन मौके पर घड़ि‍याली आंसू बहाने वाले नेता कभी भी रंग बदल सकते हैं।

शहरी मध्‍य वर्ग की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि‍ इसकी अपनी कोई स्‍पष्‍ट राजनीति‍क वि‍चारधारा नहीं है। करप्‍शन, सि‍स्‍टम को बदलने, राजनीति‍क सुधार और महंगाई जैसे मुद्दों पर यह वर्ग मुखर तो है, पर राजनीति‍क मंच पर इन वि‍षयों की नुमाइंदगी करने वाला कोई नहीं। अब तक सड़क, पानी, बि‍जली, मकान, सुरक्षा और रोजगार जैसे रोजमर्रा के मसलों में सि‍मटा मध्‍यवर्ग अपने व्‍यापक दृष्‍टि‍कोण को सत्‍ता के सामने लाने के मकसद से एक फोरम की तलाश में है। यह फोरम आम आदमी पार्टी जैसा कोई राजनीति‍क दल हो सकता है या फि‍र कर्नाटक में कई कामयाब जनांदोलनों के बाद उभरकर आई लोकसत्‍ता जैसा कोई राजनीति‍क संगठन। ये भी न मि‍ले तो फि‍र एकला चलो रे की तर्ज पर एकजुटता के साथ अपनी ताकत दि‍खाने में भी कोई बुराई नहीं। कैम्‍पा कोला सोसायटी के लोगों की जीत फि‍लहाल इसे ही रेखांकि‍त कर रही है।

शुक्रवार, 31 मई 2013

मुंबई एक नशा है...

मुंबई। मायानगरी।


भारत के गांवों से हजारों लोग रोजाना आंखों में ढेरों सपने और दिल में असंख्‍य अरमान लिए चले आते हैं इस शहर में। हीरो-हीरोइन बनने। भारतीय सिनेमा को शुरू हुए 100 साल बीत चुके, पर संघर्ष की यह दास्‍तां और ज्‍यादातर के लिए हाशिए तक का रास्‍ता अभी तक नहीं बदला। सैकड़ों किलोमीटर दूर से। ट्रेन के सामान्‍य दर्जे में ठूंसे हुए। कंधे पर एक बैग। जेब में कुछ हजार नोट। किसी ने जमीन गिरवी रख दी तो कोई अपनी पत्‍नी के जेवर रहन रख आया। इस उम्‍मीद के साथ कि मुंबई शहर किसी को भूखा नहीं रखता। तो मेहनत करता है, जिसमें हुनर है उसे यह शहर रातों-रात कामयाबी के सातवें आसमान पर ले जाता है। 

वहां तक पहुंचने के लिए हर तकलीफ मंजूर है, हर कुर्बानी जायज़ है, हर समझौता मंज़ूर है। 



कभी भूखे पेट सोना पड़े, कभी चप्‍पल फट जाए, कभी रात तन्‍हा गुजारनी पड़े। सब मंजूर है। उस एक चकाचौंध भरी रात के लिए, जो रह-रहकर सपनों में आती है, अपनी ओर खींचती है। चारों ओर चमकती तेज रोशनी है। आगे लाल कालीन है और मंजिल वह रुपहला परदा है, जहां सिर्फ मैं ही मैं हूं और कोई नहीं। 



जरा ज़ुल्‍फें संवार लूं, थोड़ा आइने को समझा लूं। खूबसूरत तो मैं हूं। हां, मौका मुझे ही मिलेगा। बेशक। 



बस एक चांस। बस एक चांस मिल जाए.... और मैं दुनिया जीत लूं। 


रेडी...टेक 4....सीन....1......कट। यूं ही शाम हो गई। क्‍या कहूं, क्‍या गुजरी। कोई बात नहीं। सागर मेरे आंसुओं का गवाह है। हां, वह इन आंसुओं का ही तो सैलाब है। सुबह उन्‍हीं आंसुओं में नहाकर फिर डट जाऊंगा मैदान में। 



लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जयजयकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
- हरिवंश राय बच्‍चन 



फिर वही शाम। वही गम, वही तन्‍हाई है। आज फिर भूखे पेट सोना पड़ेगा। कल एक जगह बुलावा आया है। पैसे खर्च नहीं कर सकते। कोई बात नहीं। पानी पीकर सो जाएंगे।



और एक दिन.... इस शहर की 1.80 करोड़ से ज्‍यादा की आबादी में खो जाएंगे।