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रविवार, 18 जनवरी 2015

संडे डायरी: अपनी ही कौम का गला घोंटती मीडिया

वर्तमान की बुनियाद अतीत के धरातल पर टिकी है। 2015 के आगाज के पीछे 2014 की एक बड़ी परिवर्तनकारी घटना है (याद कीजिए 26 मई को क्‍या कुछ बदला था)। बीती 15 जनवरी को इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन की सक्रिय कार्यकर्ता और आम आदमी पार्टी का ‘उजला’ चेहरा रहीं किरण बेदी बदल गईं। उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। उन्‍हें अरविंद केजरीवाल के इमानदार चेहरे का भाजपाई जवाब मान लिया गया। मैंने 16 जनवरी को अपने फेसबुक वॉल पर उन 10 सवालों की फेहरिस्‍त वाली हिंदुस्‍तान टाइम्‍स की एक रपट रखी, जो करण थापर ने उनसे 2007 में तब पूछे थे, जब किरण ने टेलीविजन इंटरव्‍यू के लिए हामी भरने के बाद भी एंकर का सामना नहीं किया। कुल मिलाकर एक लाइक। यह स्‍वीकारने में कोई हर्ज नहीं कि सोशल मीडिया में मेरा कोई वजूद नहीं। दिलचस्‍प बात यह कि एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार ने अपने अंदाज में उसी दिन इन्‍हीं 10 सवालों को उठाया। उन्‍हें 530 लाइक्‍स मिले, लेकिन उनके स्‍टेटस पर एक भी प्रतिक्रिया उस विमर्श की दिशा में नहीं रही, जिसकी उन्‍होंने उम्‍मीद की होगी।

कमोवेश यही हाल हमारी मुख्‍यधारा की मीडिया का भी है। यह शू-लेदर रिपोर्टिंग (फील्‍ड वाली: इसे सूटेड-बूटेड से न जोड़ें) से कुर्सी पर बैठकर भाषण पेलने वाली पत्रकारिता में बदल चुकी है। ज्‍यादा पुरानी बात नहीं है। पिछले साल अक्टूबर में दिल्‍ली (मीडिया के धाकड़ यहीं बैठते हैं) के त्रिलोकपुरी इलाके में दंगे हुए। ढेर सारे अखबारों, चैनलों ने दंगों की तस्‍वीरें सोशल मीडिया से उठाईं। लेकिन शायद ही किसी ने मौके पर जाकर यह देखने की कोशिश की हो कि वहां पुलिसवालों ने औरतों पर क्‍या जुल्‍म ढाए, दंगाइयों ने बेखौफ होकर कैसा उन्‍माद फैलाया। असल रिपोर्ट मुख्‍यधारा की मीडिया में नहीं, कुछ न्‍यूज एग्रीगेटर्स में नजर आईं, जब निशिता झा (पहले तहलका, अब फ्रीलांस) सरीखी पत्रकार वहां गईं, प्रभावितों से बात की और तथ्‍यों को परखा। असल में हमारी बहुसंख्‍यक कौम सूचना क्रांति के जमाने में सूचनाविहीनता के मुहाने पर बैठी है। घर वापसी कराने को बेताब हिंदुत्‍ववादी समूह बस्‍तर में चर्च जाने वाले आदिवासियों पर लगातार हमले कर रहे हैं। टाइम्‍स ऑफ इंडिया के एक रिपोर्टर को जब यह पता चला तो उसने रायपुर में कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं से फोन पर बातचीत कर स्‍टोरी ब्रेक की।

इन हालात में कोई हैरत नहीं कि किरण बेदी की इमानदार, साफ-सुथरी छवि के बेइंतेहां कसीदे पढ़े जाएं। उन पर उंगली उठाने वालों को गालियां सुननी पड़े। इसलिए, क्‍योंकि मुख्‍यधारा की मीडिया लोगों तक मैदानी सूचनाएं नहीं पहुंचा पा रही है। टेलीविजन चैनलों के इन बहानों को अगर मान भी लें कि वे लगातार घाटे में हैं, इसलिए वे अपने न्‍यूज स्रोर्स को मजबूत नहीं कर पा रहे हैं, उनकी अपनी सीमाएं हैं...वगैरह। लेकिन उस प्रिंट मीडिया का क्‍या, जो छोटे शहरों में अभी भी तेजी से बढ़ रहा है ? टाइम्‍स ऑफ इंडिया में ज्‍यादातर खबरों की शब्‍द सीमा 300 से 350 शब्‍दों के बीच है। लेकिन देशभर में 50 संस्‍करणों के साथ यही समूह 1000 से ज्‍यादा खबरें भी तो परोस रहा है। फिर डिजिटल मीडिया भी तो है। डिजिटल मीडिया के भारत में पदार्पण से लगा था कि खबरों के ऑनलाइन होने पर रिपोर्टिंग की धार तेज होगी। लेकिन अधिकांश मीडिया कंपनियों ने अपने प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के कंटेंट को ‘चाश्‍नी में डुबोकर’ ऑनलाइन कर दिया। इस पर भी जब उन्‍हें अपेक्षित हिट्स नहीं मिले तो उन्‍होंने ‘पाठकों की पसंद’ के ऐसे नए पैमाने ढूंढ़े, जिन्‍हें ‘प्रायवेसी कंटेंट’ कहना ज्‍यादा प्रासंगिक होगा। हालांकि, यह प्रयोग भी ऑनलाइन विज्ञापनदाता कंपनियों के लिए उलझन बन गया है, क्‍योंकि इनमें से 90 फीसदी चोरी के हैं। सोशल मीडिया भी काफी कुछ इसी तर्ज पर चल रहा है। कविताएं, जोक्‍स, बढ़िया प्रोफाइल फोटोज (लड़कियों के, भड़काऊ, हंसते हुए हों तो और भी अच्‍छा), एक लाइन के ट्वीटनुमा कमेंट्स यहां खूब चलते हैं। समालोचनाओं, तथ्‍यों पर आधारित टिप्‍पणियों के लिए यहां खास गुंजाइश नहीं है।

इस बदलाव से टेलीविजन न्‍यूज चैनल भी अछूते नहीं है। जैसा मैंने पहले भी लिखा है कि एक अच्‍छे रिपोर्ताज के बजाय दो या अधिक लोगों की चौपाल सजाकर विचारों को बहस की शक्‍ल में पेश करना अपेक्षाकृत सस्‍ता है। यही कारण है कि टेलीविजन चैनलों ने अपने रिपोर्टिंग स्‍टाफ की संख्‍या घटाकर प्राइम टाइम को तमाशे में तब्‍दील कर दिया है। प्रिंट ने भी इसका अनुसरण करते हुए टाइम्‍स व्‍यू, सेमी कॉलम (इंडियन एक्‍सप्रेस) जैसे प्रयोग किए हैं। लेकिन इन सबके बीच सूचनाओं का वह ‘प्राथमिक स्रोत’ गायब है, जो कभी ‘शू-लेदर’ रिपोर्टिंग की जान हुआ करता था। वजह यह कि कल तक बीट रिपोर्टर (प्राथमिक स्रोतों से सूचनाएं बटोरने वाले) रहे पत्रकार अब विशेषज्ञ बने बैठे हैं। इन्‍हें आधिकारित स्रोतों से परे कुछ नजर नहीं आता। किसी सरकारी मंत्रालय की वर्षों से रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टर को यह पता होता है कि सरकार का कौन सा फैसला या कौन सी नीति लोगों के हितों पर क्‍या असर डालेगी। लेकिन प्रिंट मीडिया के रिपोर्टर इस चुनौती से निपटने में लगातार नाकाम हो रहे हैं। याद कीजिए, कोलगेट वाला वह प्रसंग, जब कोल ब्‍लॉक्‍स के नाम पर दशकों से जारी लूट को कोई पकड़ नहीं सका। सिवाय मिंट के, जिसने अक्‍टूबर 2008 में एक रिपोर्ट पेश की थी (आप में से किसी को याद हो- पता नहीं)। उसके बाद 2012 में सरकार की ऑडिट रिपोर्ट में पूरे मसले का भांडाफोड़ हुआ और तब सभी चैनलों और प्रिंट ने बड़ी बेशर्मी से ब्रेकिंग न्‍यूज बनाकर इसे बेचा था। अब तो ‘ओपिनियन’ यानी विचार का नाम सुनते ही मीडिया घरानों के कर्ताधर्ताओं को बुखार सा आने लगता है। इंडिया टुडे के डिजिटल आउटलेट- डेली ओ को हालांकि इस घराने का ऑनलाइन प्‍लैटफॉर्म बताया गया है, लेकिन बात जब इसके कंटेंट की ओनरशिप की होती है तो नीचे लिखा मिलता है: हमारा इससे कोई सरोकार नहीं।

ऐसा नहीं कि मीडिया का अध:पतन केवल भारत में ही हुआ है। 2010 में एक अमेरिकी पत्रकार जोनाथन स्‍ट्रे ने ‘चीन के दो छात्रों द्वारा गूगल को हैक करने की ’ एक खबर को की कवरेज को मैप किया। पता चला कि गूगल पर नजर आ रहीं 800 रिपोर्टों में से 121 ही ‘कुछ अलग हटकर’ थीं। उनमें से 13 में न्‍यूनतम एक वास्‍तविक कमेंट था, जबकि केवल सात रिपोर्टों में प्राथमिक सूचना स्रोतों के आधार पर रिपोर्टिंग की गई थी। स्‍ट्रे कहते हैं कि ज्‍यादातर रिपोर्टें प्रिंट या वायर (एजेंसी-बाहरी स्रोतों) से बनीं। बीते साल नवंबर में गुजरात की सरकार ने मतदान को अनिवार्य कर दिया। गूगल न्‍यूज पर इस बारे में आईं 131 न्‍यूज रिपोर्टों में से 64 ‘कुछ हटकर’ थीं। उनमें से 16 रिपोर्टों का प्राथमिक स्रोत एक ही था। इन 16 में से 9 प्रिंट, 4 न्‍यूज एजेंसी, दो न्‍यूज चैनल और केवल एक डिजिटल स्रोत पर आधारित थी। क्‍या अब भी आप कहेंगे कि भारत में डिजिटल न्‍यूज का पदार्पण हो चुका है ? मेरा हमेशा से ही यह मानना रहा है कि पश्‍चिमी देशों के विपरीत, जहां प्रिंट की कब्र पर डिजिटल मीडिया को जीवन मिला, भारत में डिजिटल मीडिया अपने हमराह प्रिंट को दिशा दिखा सकता है। खासकर रियल टाइम न्‍यूज और ‘शू-लेदर’ रिपोर्टिंग के मामले में। इसके लिए ऑनलाइन मीडिया को प्राथमिक स्रोतों पर निर्भर खबरों का पीछा करना होगा और इसके लिए पैसा खूब चाहिए, जो मीडिया घरानों की जेब से निकल नहीं रहा। उन्‍हें सोचना होगा कि चोरी के कंटेंट के बजाय परंपरागत रिपोर्टिंग में जरूरी निवेश कल को उनकी विश्‍वसनीयता बढ़ाने में मददगार होगा और अंतत: यही दुधारू गाय बन जाएगा।

आखिर में टीओडब्‍लू सेंटर फॉर ऑनलाइन जर्नलिज्‍म कोलंबिया की एक रिपोर्ट। यह इसलिए, क्‍योंकि पश्‍चिमी मीडिया ने ऑनलाइन जर्नलिज्‍म पर खूब उम्‍मीदें लगा रखी हैं। यह रिपोर्ट कहती है कि इंटरनेट के आने से अब लोगों को ‘खबर लायक सामग्री’ भेजने को प्रेरित करना, उनके द्वारा भेजी गई जानकारियों-आंकड़ों को एकजुट कर उनका ‘एडिटोरियल चेन’ के हिसाब से समन्‍वय करना और विश्‍लेषण व पड़ताल कर सही तस्‍वीर पेश करने की बड़ी गुंजाइश है। बशर्ते कि पत्रकारों, खासकर रिपोर्टरों के पास सरकारी वेबसाइटों में पड़े आंकड़ों-रिपोर्टों को खंगालने का माद्दा हो। बहरहाल, पियू रिसर्च सेंटर 2014 की मार्च की रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका में 500 डिजिटल आउटलेट्स में 5000 मीडिया कर्मियों के होने के बावजूद ज्‍यादातर सामग्री अभी भी प्रिंट मीडिया से ही आ रही है।

भारत में अभी भी डिजिटल मीडिया की सेंध आबादी की 15 फीसदी तक भी नहीं पहुंची है। ऐसे में जन सरोकारों की रिपोर्टिंग और उन लोकसेवकों की करतूतों की रिपोर्टिंग जो लोगों पर राज करने का दावा करते हैं, पत्रकारों को अपने वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलकर जमीनी तथ्‍यों को खंगालने, लोगों से मिलने, बातचीत करने की मांग करती है। मुख्‍यधारा की मीडिया को यह मान लेना चाहिए कि वे डेस्‍क पर बैठकर या फोन घुमाकर उत्‍तर-पूर्व, दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों और आदिवासी इलाकों को कवर नहीं कर सकते। वे केवल अपनी ही कौम का गला घोंट सकते हैं।

सोमवार, 25 नवंबर 2013

किसके इशारे पर ‘रेपिस्ट ’ हो रहा है मीडिया ?

1. जांच सीबीआई की, कोर्ट सीबीआई की और फैसला भी। आरुषि-हेमराज कत्‍ल के मामले में तलवार दंपती को दोषी माना गया। पांच साल पुराने मामले में मीडिया पहले ही यही फैसला दे चुकी है। यह जानते हुए भी इस हत्‍याकांड से जुड़े कई अहम सवाल अभी अनसुलझे हैं, तलवार दंपती को ऑनर किलर के रूप में स्‍थापित किया जा चुका है।

2. तहलका की एक महिला पत्रकार की शिकायत पर मैगजीन के संपादक तरुण तेजपाल को मीडिया ने यौन उत्‍पीड़न का सिर्फ आरोपी ही नहीं, दोषी भी मान लिया। कुछ चैनल इसे ‘मनोहर कहानियां’ की तर्ज पर मिर्च मसाला डालकर परोस रहे हैं। इधर पुलिस की जांच जारी है, आरोप तय नहीं हुए और तेजपाल सूली पर चढ़ चुके हैं।

3. केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की तेजी से बढ़त के बीच अचानक एक गुमनाम से न्‍यूज पोर्टल का स्‍टिंग ऑपरेशन सामने आता है और मीडिया स्‍टिंग की सीडी को बिना जांचे-परखे शाम को फैसला सुना देती है कि भ्रष्‍टाचार के खिलाफ खड़ी हुई आम आदमी पार्टी अपनी विश्‍वसनीयता खो चुकी है।

तीनों मामलों में कोई समानता दिखाई देती है आपको ? इनके बीच एक ही कॉमन लिंक है- मीडिया का हाइपर एक्‍टिविज्‍म। मसला चाहे सैक्‍स स्‍कैंडल का हो या पोलिटिकल स्‍कूप का, मीडिया के हाइपर एक्‍टिविज्‍म, खासतौर पर तुरत-फुरत फैसला सुनाने की उसकी रणनीति के पीछे का सच वह नहीं है जो बताया जा रहा है। आइए, जानने की कोशिश करते हैं कि मीडिया का किस तरह इस्तेमाल हो रहा है और किसके इशारे पर मीडिया हाई प्रोफाइल मामलों में एकतरफा ‘ट्रायल’ के जरिए इज्‍जत को तार-तार करने में जुटा है ?

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मीडिया का बेसिक नियम कहता है, ‘खबर जितनी बड़ी और हाईप्रोफाइल होगी, उतनी ही सतर्कता से कदम बढ़ाना चाहिए।’ लेकिन सोचिए कि क्‍या ऐसा हो रहा है ? खबर जितनी बड़ी हो, मीडिया का आत्‍मसंयम उतना ही कमजोर नजर आता है। मिसाल के लिए आरुषि-हेमराज मामले को ही लें तो तलवार दंपती ने गाजियाबाद की ट्रायल कोर्ट में अर्जी लगाकर उन 14 लोगों को गवाह के तौर पर कोर्ट में पेश होने की अनुमति मांगी, जिन्‍होंने हत्‍या के इस मामले की शुरुआती जांच की थी। ट्रायल कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद तलवार दंपती ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने उन्‍हें हाईकोर्ट जाने के लिए कहा। मीडिया ने इस पूरे मसले को इस प्रकार प्रचारित किया, मानों तलवार दंपती न्‍यायिक प्रक्रिया को अपने पक्ष में मोड़ना चाहते हैं और सुप्रीम कोर्ट ने उन्‍हें ऐसा करने से रोका हो। दरअसल, मीडिया (न्‍यूज चैनल) तलवार दंपती को पहले ही सूली पर चढ़ा चुके थे। लिहाजा इस मामले से जुड़ी हर जानकारी स्‍कूप की तरह पेश की गई। यह नहीं देखा गया कि मामले की सबसे पहले जांच करने वाली उत्‍तरप्रदेश पुलिस ने गैर पेशेवराना तरीके से किस तरह सुबूतों को खत्‍म किया। मीडिया इस बात पर भी सवाल नहीं उठा सका कि तलवार के क्‍लीनिक के कंपाउंडर कृष्‍णा के कमरे में हेमराज के खून से सना गिलाफ कैसे मिला ? तलवार दंपती पर ‘ऑनर किलिंग’ तक का आरोप लगा चुकी देश की मीडिया ने इसी साल 16 अप्रैल को नैतिकता की सारी हदें तोड़कर जांच अधिकारी एजीएल कौल के उस बयान को हेडलाइन बना दिया, जिसमें दावा किया गया था कि तलवार दंपती ही आरुषि-हमेराज के असल कातिल हैं। अगले ही दिन कौल की थ्‍योरी क्रॉस एक्‍जामिनेशन में भरभराकर ढह गई, पर मीडिया ने उसे रिपोर्ट नहीं किया। बहरहाल, सीबीआई कोर्ट ने 25 नवंबर को आरुषि-हेमराज के कत्‍ल के मामले में तलवार दंपती को दोषी माना और मीडिया जश्‍न के मूड में है। 

अब आते हैं दूसरे मामले पर। तहलका के संपादक तरुण तेजपाल ने ‘कथित’ यौन उत्‍पीड़न की शिकायत सामने आने के बाद ई-मेल कर अपनी गलती मानी। वे ‘पश्‍चाताप के बहाने’ छह माह के लिए अपने पद से हटे, माफी मांगी और कानून को पूरी मदद देने का भरोसा दिलाया। मीडिया तो मानों ऐसा ही कोई मौका ढूंढ़ ही रही थी। आरुषि केस की तरह ही मीडिया ने फौरन उन ‘लीक्‍स’ को जुगाड़ना शुरु किया, जो यह साबित करने में मददगार होते कि असल में तरुण ही दोषी हैं। पीड़ित लड़की के ई-मेल को फौरन ऑनलाइन किया गया और यहां तक कि ‘निजता के उल्‍लंघन की सारी हदें पार करते हुए’ कुछ प्रिंट माध्‍यमों ने उसे छापा भी। आरुषि मामले में भी मीडिया ने ‘मनोहर कहानियां’ की तर्ज पर 14 साल की लड़की द्वारा अपने दोस्‍तों को भेजे ई-मेल को बेशर्मी से प्रचारित किया था। इस तरह की अनैतिक हरकतों के पीछे अगर वाकई टीआरपी की जंग जिम्‍मेदार है तो फिर मीडिया को तेजपाल की नैतिकता पर सवाल दागने का कोई हक नहीं। दूसरों से आगे निकलने की फिक्र में न्‍यूज चैनलों को यह भी ध्‍यान नहीं रहा कि गोवा पुलिस अभी मामले की जांच कर रही है, आरोप तय नहीं हुए हैं और इन हालात में तेजपाल को आरोपी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन मीडिया जब तय कर ले कि उसे अपना फैसला सुनाना है तो वह किसी भी माध्‍यम को अपना सकती है। यहां बहस का माध्‍यम अपनाया गया और जानबूझकर ऐसे लोगों को बुलाया गया, जो कहें कि तरुण ही दोषी हैं। 

मीडिया चाहती तो जेसिका लाल हत्‍याकांड की तरह आरुषि मामले का फॉलोअप कर ज्‍यादा से ज्‍यादा सुबूत जुटाकर पुलिस और कोर्ट की मदद कर सकती थी, लेकिन इसके बजाय मीडिया ने सीबीआई की परोक्ष मदद ही की। उसने अपनी बात को साबित करने वाली उन खबरों को जानबूझकर दबाया, जो इस मामले की सीबीआई जांच पर सवाल खड़े करती हैं। उदाहरण के लिए आरुषि के शव की पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट में रेप होने की पुष्‍टि नहीं हुई। पोस्‍टमार्टम करने वाले डॉक्‍टर ने भी यही कहा। लेकिन चूंकि सीबीआई और मीडिया दोनों इसी ‘बिकाऊ थ्‍योरी’ पर चल रही थी, इसलिए सात सदस्‍यीय मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को भी दबाया गया। रिपोर्ट में साफ नजर आ रहा था कि हत्‍याकांड में कोई बाहरी व्‍यक्‍ति भी शामिल है, लेकिन मीडिया ने इस पर कभी सवाल नहीं उठाया। यही बात आम आदमी पार्टी (आप) के मामले में भी लागू होती है। सीडी जारी होने के समय से लेकर इसमें दर्ज सुबूतों की असलियत परखने की जरूरत मीडिया ने कभी नहीं समझी। ‘आप’ के मामले में मीडिया का रवैया कुछ इस प्रकार का रहा, मानों उसे किसी ने यह कह रखा हो कि असलियत चाहे कुछ भी हो, पर कहना वही है जो ‘हम’ चाहते हैं।



कौन है मीडिया के इस कदलते चलन के पीछे ? पढ़िए भाग -2.

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

मीडिया का गला घोंटने की साजिश

मीडिया के लिए आने वाले दिन दिक्‍कत वाले हैं। खासतौर पर न्‍यूज चैनलों के लिए। टीवी 18 में एकमुश्‍त 350 से ज्‍यादा पत्रकारों, कैमरामैन और तकनीशियनों की एक ही दिन में की गई छंटाई कोई अप्रत्‍याशित घटना नहीं थी। फर्क सिर्फ इतना है कि इन सभी को एक साथ नौकरी से निकाला गया। निश्‍चित तौर पर यह कत्‍लेआम है। कत्‍लेआम इसलिए, क्‍योंकि पिछले सितंबर में 50 से ज़्यादा पत्रकार एनडीटीवी से निकाले गए, दैनिक भास्कर से 16 पत्रकारों, आउटलुक समूह की तीन पत्रिकाओं (मैरी क्लेयर, पीपुल इंडिया और जियो) के बंद होने से 42 पत्रकार झटके में बेरोज़गार हुए।

टीवी 18 ने आधिकारिक रूप से मीडियाकर्मियों को निकालने के पीछे जो दलील दी, वह बहुत लचर है। कहा गया कि 1300 कर्मचारियों में से 30 फीसदी की कटौती इसलिए की गई है, क्‍योंकि कंपनी घाटे में है और पुर्नसंरचना यानी रिस्‍ट्रक्‍चरिंग के चलते यह सब किया गया। लेकिन थोड़ा पीछे जाएं तो मालूम चलेगा कि मीडिया कंपनियों में निवेश करने वाले तीन बड़े औद्योगिक समूहों, आदित्‍य बिड़ला, रिलायंस और ओसवाल समूह ने दावा किया था कि आने वाले दिनों में मीडिया का बाजार और बुलंद होगा। जानकारी के लिए बता दें कि आदित्‍य बिड़ला समूह ने लिविंग मीडिया इंडिया के साढ़े सत्ताईस फीसदी शेयर खरीद लिए हैं। ओसवाल समूह ने 24.24 करोड़ रुपए निवेश करके एनडीटीवी के 14.2 फीसदी शेयर खरीदे हैं। इस तरह तीन बड़े कॉर्पोरेट घरानों ने मीडिया में पैसा लगाया है और इसका नतीजा बड़ी संख्‍या में मीडियाकर्मियों की छंटनी के रूप में सामने आ रहा है। लिविंग मीडिया इंडिया भी रिस्‍ट्रक्‍चरिंग की कगार पर है और माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में वहां भी 250 से ज्‍यादा मीडियाकर्मियों की छंटनी हो सकती है।

पहला सवाल : क्‍या टीवी 18 की हालत वाकई पतली है ?

जवाब : इतनी नहीं कि छंटाई की नौबत आए। मुकेश अंबानी ने जब राघव बहल के नेटवर्क-18 में करीब 1700 करोड़ रुपए निवेश किया, उस समय वह लगभग 500 करोड़ रुपए के कर्ज में डूबा था। ओसवाल ग्रुप ने एनडीटीवी के शेयर उस वक्त खरीदे, जब संस्थान करीब 10 करोड़ रुपए से ज्‍यादा के नुकसान पर था। अंबानी के पैसे से बहल ने ईटीवी को खरीद लिया। लेकिन दिलचस्‍प बात यह है कि अंबानी ने पिछले दरवाजे से एक अन्‍य कंपनी (जेएम फायनेंशियल) के जरिए ईटीवी को पहले ही खरीद लिया था। बहरहाल, अंबानी के पैसे से बहल की कंपनी कर्जमुक्‍त हो जानी चाहिए थी। लेकिन बताया यह गया कि ईटीवी को खरीदने में बहल को 2100 करोड़ रुपए लगाने पड़े, यानी घाटा काटकर 900 करोड़ रुपए का बोझ ज्‍यादा पड़ा। इससे बहल पर आर्थिक बोझ इतना ज़्यादा हो गया कि उन्‍हें आईबीएन-7 और सीएनएन-आईबीएन सहित सीएनबीसी आवाज़ को चलाने में दिक़्क़त आने लगी। इस पर मुकेश अंबानी ने 1,600 करोड़ रुपए और लगाए। इस लिहाज से भी बहल को 700 करोड़ का मुनाफा होता है। टीवी 18 ने इस साल जून में 19 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया था। विज्ञापनों से कमाई भी 6 फीसदी बढ़कर 227 करोड़ पर आ गई है। एक साल के भीतर कंपनी ने दोगुना मुनाफा कमाया है। तो फिर घाटा कहां है ? वैसे अंबानी ने इस चैनल में कुल 4800 करोड़ रुपए लगाए हैं। इसका कुछ हिस्‍सा नकद और कुछ संपत्‍तियों के रूप में है।

दूसरा सवाल : 10 प्‍लस 2 का हौव्‍वा

जवाब : यह भी फिज़ूल की दलील है। छंटनी के पीछे भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के उस आदेश की दुहाई दी जा रही है कि एक अक्‍टूबर से चैनल वाले एक घंटे में सिर्फ 12 मिनट ही विज्ञापनों के लिए दे सकते हैं। इसमें से भी 10 मिनट कमर्शियल्‍स के लिए और दो मिनट प्रोमो के लिए आरक्षित होंगे। इस आदेश से पहले ही हफ्ते में चैनलों को 300 करोड़ रुपए का चूना लगने की उम्‍मीद है। रिसर्च फर्म ईडलवीस सिक्‍योरिटीज के अनुसार चैनलों की 71 फीसदी कमाई विज्ञापनों से होती है। समाचार चैनल एक घंटे में 15 मिनट से ज्‍यादा का स्‍लॉट विज्ञापनों के लिए रखते हैं, जो प्राइम टाइम में बढ़कर 30 मिनट तक हो जाता है। 10 मिनट का एक स्‍लॉट 40 हजार रुपए में बिकता है। घाटे की भरपाई के लिए टीवी चैनलों के पास दो ही रास्‍ते बचे हैं। या तो वे अपने ऑपरेशनल यानी संचालन खर्चों में कटौती करें या फिर विज्ञापनों की दरें बढ़ाएं। जी टेलीफिल्‍म्‍स ने विज्ञापनों की दरें 15 फीसदी बढ़ाई हैं। फिर भी इससे फिलहाल कोई राहत नहीं मिलने वाली। मंदी के इस दौर में शायद ही किसी कंपनी को विज्ञापन की बढ़ी हुई दरें पसंद आएं। हालांकि, ट्राई ने डेढ़ साल पहले ही तकरीबन सारे चैनलों को अक्‍टूबर से दरें बढ़ाने की सूचना दे दी थी। बावजूद इसके, चैनलों ने इससे निपटने की तैयारी करने के बजाय अपने एसोसिएशन के जरिए ट्राई के आगे आदेश को दिसंबर 2014 तक स्‍थगित करने की गुहार लगाई। जब विज्ञापनों की दरें बढ़ाकर घाटे की भरपाई की जा सकती है तो फिर आदेश का हवाला देकर पत्रकारों को एकमुश्‍त बाहर का रास्‍ता दिखाना नाइंसाफी है।

फिर असल वजह क्‍या है ?

असल में पिछले महीने ही टीवी 18 ने एक सेंट्रल न्‍यूज रूम बनाकर डिजिटल और ब्रॉडकास्‍ट विभागों को एकजुट कर दिया था। अब इसी कड़ी में आगे हिंदी और अंग्रेजी न्‍यूज चैनल को भी एकजुट करने की कार्रवाई की जा रही है और इसके पीछे राजदीप सरदेसाई का दिमाग बताया जाता है। छंटाई के शिकार हुए एक मीडियाकर्मी का कहना है कि इंडीपेंडेंट मीडिया ट्रस्‍ट के जरिए पैसा लगाने वाले अंबानी ने चैनल के स्‍टाफ और संचालन को अंतरराष्‍ट्रीय मानकों के मुताबिक करने की जिद की है। यानी सबको एक बड़े से कमरे में बंद कर बाकी बचे लोगों को बाहर कर दो। पत्रकारिता को कभी न सुहाने वाली ऐसी बेतुकी योजनाएं कॉर्पोरेट ही बनाता रहा है और टीवी 18 की छंटनी से यह साफ हो गया है कि मीडिया घरानों की साख को भुना रहे कॉर्पोरेट घरानों के लिए पत्रकारिता का कोई मूल्‍य नहीं। वे चैनल के कंटेंट पर अपनी पकड़ बनाने के मकसद को साधने के लिए बेरहमी की हद पार कर सकते हैं, क्‍योंकि उनके ऐसे कदम पर मीडियाकर्मियों या उनके संगठनों की तरफ से प्रतिरोध नाममात्र का होता है। मीडिया इंडस्‍ट्री मे ज्‍यादातर पत्रकार इस समय अनुबंध पर नियुक्‍त किए जाते हैं। इनकी ज़ुबां खामोश रखने के लिए किसी भी तरह के एसोसिएशन या लेबर यूनियन जैसी गतिविधियों में शरीक होने की मनाही है। कॉर्पोरेट घरानों का दखल बढ़ने से मीडिया कंपनियों की एचआर नीति इस कदर सख्‍त हो रही है कि अगर कोई पत्रकार नियम विरुद्ध किसी भी निर्देश की अवमानना करने की जुर्रत करे तो उसकी शुरुआती उपेक्षा लंबी अवधि में उसे छंटनी का शिकार बना देती है।

इस तरह की बेज़ा प्रक्रियाओं को मीडिया घरानों में बैठे संपादकों या संपादकीय सलाहकारों का मौन समर्थन हासिल है, क्‍योंकि कॉर्पोरेट घराने ही उन्‍हें नामित भी करते हैं। मीडियाकर्मियों की भी अपनी मजबूरी है। उन्‍हें अपने दामन में बगावती दाग से परहेज है। एक बार यह दाग लगने के बाद दूसरे मीडिया संस्‍थान में नौकरी पाने की गुंजाइश कम ही रहती है। बाकी और कोई भी ‘दाग’ हो, लिंकेजेस के सहारे किसी न किसी तरह मैनेज हो ही जाता है। अगर कोई अदालती लड़ाई लड़ता भी है तो बात कोर्ट के बाहर समझौते पर आकर खत्‍म हो जाती है। हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं की न्‍यूज रिपोर्टिंग और पैकेजिंग एक ही छत के नीचे कराने का प्रयोग प्रिंट में सबसे पहले नवभारत टाइम्‍स ने शुरू किया था, जो जल्‍दी ही धराशायी हो गया। अब अंबानी ने इलेक्‍ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया में इसे अपनाने की ज़िद छेड़ी है। जाहिर है यह टवी चैनलों में पहले से ही कमजोर कंटेंट की क्‍वालिटी को और कमजोर करेगा। लेकिन, विडंबना यह है कि न तो कॉर्पोरेट घरानों को और न ही उनके नुमाइंदे बनकर रह गए संपादकों को अब कंटेंट से ज्‍यादा लेना-देना रह गया है। इसने विश्‍वसनीयता का सवाल भी खड़ा किया है। वास्‍तव में मीडिया घरानों में यह चिंतन अभी से शुरू हो जाना चाहिए कि दिसंबर 2014 तक जब देशभर में डिजिटाइजेशन का काम पूरा हो जाएगा और इस बात की कमान दर्शक के हाथ में होगी कि वह कौन सा चैनल देखे और कौन सा नहीं, तब कमजोर कंटेंट वाले चैनल कहां जाएंगे ?

अफसोस कि इस अहम सवालों का हल निकालने के बजाय अधिकतर बड़े मीडिया घराने अपनी ऊर्जा कॉर्पोरेट घरानों को अपनी पूंजी बेचने में खर्च कर रहे हैं। ऐसा करके वे अपनी बची-खुची विश्‍वसनीयता भी उन कंपनियों के हवाले कर रहे हैं, जो पहले ही घोटालों में लिप्‍त हैं। दरअसल यह अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता को रसूखदारों के हाथों में गिरवी रखने जैसा कदम है। इससे आने वाले वर्षों में मीडिया की विश्‍वसनीयता और गिरेगी। देश के सामने मौजूद मुद्दों की विवेचना और उन्‍हें बहस के दायरे में लाने का मकसद और पीछे चला जाएगा। और मीडिया के साथ ही मीडियाकर्मियों का कत्‍लेआम भी होता रहेगा। टीवी 18 में जो हुआ, वह सिर्फ मीडियाकर्मियों का ही नहीं, मीडिया का भी गला घोंटने की साजिश है। इसके पीछे कॉर्पोरेट घरानों के साथ कहीं न कहीं सरकार का भी हाथ है, जो जानबूझकर क्रॉस मीडिया ओनरशिप को नियंत्रित करने में ढिलाई बरत रहा है।

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

पूंजीवादी चंगुल में मीडिया

मॉनसून के सीजन में हर साल फल-सब्‍जियों के दाम अचानक बढ़ जाते हैं। इस साल तो चौतरफा बारिश हो रही है। तकरीबन पूरा देश तर है। खुले बाजार में कोई भी सब्‍जी 60 रुपए किलोग्राम से नीचे नहीं है। दिल्‍ली में टमाटर कहीं-कहीं 120 रुपए किलोग्राम बिक रहा है। शाम को मुंबई में अकेली रहने वाली मेरी एक मित्र का फोन आया तो मैंने गाहे-बगाहे पूछ लिया, टमाटर का क्‍या भाव है तुम्‍हारे यहां। बोलीं, 90 से 100 रुपए किलोग्राम। उसने टोमैटो कैचअप के ‘पिचकू’ पैक से काम चलाना शुरू कर दिया है, लेकिन मीडिया इस तरह की खानापूर्ति नहीं करता। उसे तो खबरों से लोगों को जोड़े रखना है। उसे मुद्दे की पड़ताल नहीं करनी, लेकिन सवाल जरूर पूछना है। ऐसा करने से जिम्‍मेदारी भी निभाई जा सकती है और बीच के ‘विवाद रहित’ रास्‍ते पर भी चला जा सकता है। 



मीडिया का ढांचा अक्‍टूबर 2008 में वॉल स्‍ट्रीट के ढहने के बाद से काफी कदल गया है। पिछले पांच साल में 5000 से ज्‍यादा पत्रकारों की नौकरियां गई हैं। अकेले एनडीटीवी के मुंबई दफ्तर से 250 पत्रकारों की नौकरियां गईं। इस छंटनी का सबसे बड़ा असर यह पड़ा कि खबरों में इन्‍वेस्‍टिगेशन के बजाय ‘टॉक’ यानी पैनल डिस्‍कशन आधारित कंटेंट ज्‍यादा होता है, क्‍योंकि यह मुफ्त है। एक पत्रकार को स्‍पेशल इन्‍वेस्‍टिगेशन स्‍टोरी करने के लिए भेजने में खर्च आता है, समय भी लगता है। फिर भले ही असली खबर शहर से ही क्‍यों न निकलकर आती हो। इसके बजाय स्‍टूडियो में ही चार मेहमानों को बुलाकर किसी मुद्दे पर चर्चा करवा लीजिए और उसे आप बड़ी खबर कह लें। इससे निकलकर वही आना है, जो शायद सब जानते हैं। लेकिन सत्‍ता पक्ष और विपक्ष को इस मसले पर एक-दूसरे के आमने-सामने करने से मसले पर राजनीतिक ‘तड़का’ भी लगता है। टमाटर के भाव पर एनडीटीवी संवाददाता का कहना था कि दिल्‍ली की आजादपुर सब्‍जी मंडी में यह 43.50 रुपए किलो बिक रहा है, लेकिन रिलायंस फ्रेश, मदर डेयरी और सफल जैसे स्‍टोर्स में इसके दाम 100 से 120 रुपए किलो हैं। दाम में 300 फीसदी के अंतर को समझना कोई रॉकेट विज्ञान नहीं। बीच में आढ़तियों या बिचौलियों ने दाम बढ़ाए हैं। टमाटर उगाने वाले किसान को अभी भी 10-15 रुपए प्रति किलो का भाव मिलता है। थोक बाजार तक आने पर इसमें 400 प्रतिशत और रिटेल तक 300 फीसदी और बढ़ोतरी हो जाती है। इस तरह आम उपभोक्‍ताओं को कुल 700 प्रतिशत ज्‍यादा दाम चुकाने पड़ते हैं।

यह भी समझना आसान नहीं कि हमारा रिटेल बाजार असंगठित है। यह सरकारी नियमन के दायरे में नहीं आता। खुदरा बाजार को वॉलमार्ट जैसी बड़ी कंपनियों के हवाले करने के पीछे यही तर्क दिए जा रहे हैं कि इससे रिटेल बाजार की मनमानी पर लगाम लगेगी और क्‍वालिटी भी सुधरेगी। लेकिन यह सवाल कोई नहीं उठाता कि जब गर्मी के दिनों में (दो माह पहले ही) टमाटर के भाव 15-20 रुपए किलो और कभी तो इससे भी कम हो जाते हैं, थोक बाजार में इतना टमाटर आता है कि खपत कम होने से उसे फेंकना पड़ता है, तब किसी को बरसात के इन दो महीनों की याद क्‍यों नहीं आती ? मीडिया तब सरकार से यह नहीं पूछता कि वह इन टमाटरों को कोल्‍ड स्‍टोरेज में सहेजकर क्‍यों नहीं रख रही कि दो माह बाद बाजार में दाम कम करने के लिए इन्‍हें बेचा जा सके ? मीडिया यह भी नहीं पूछती कि आखिर देश में रिटेल (खासकर फल-सब्‍जियों की) सप्‍लाई चेन को दुरुस्‍त नहीं करती ?

दुनिया के पांचवें सबसे बड़े रिटेल बाजार का 60 फीसदी हिस्‍सा खाद्य सामग्री का है। भारत के जीडीपी में 14 फीसदी की हिस्‍सेदारी रखने वाले कृषि क्षेत्र में दो करोड़ किसान फल-सब्‍जियां उगाते हैं। इसके बावजूद सरकार इस क्षेत्र को संगठित नहीं करती। भारत में श्‍वेत क्रांति के जनक वर्गीज कूरियन जरूर याद होंगे। उन्‍होंने किसानों की जैसी कोऑपरेटिव संस्‍थाएं दूध इकट्ठा करने और उन्‍हें बाजार तक लाने के मकसद से बनाईं, वही काम वे फल-सब्‍जियों के लिए भी करना चाहते थे। लेकिन बिचौलियों की बहुत ही ताकतवार लॉबी तब तक सरकार पर हावी हो चुकी थी। इस लॉबी के राजनीतिक संबंध कांग्रेस और भाजपा दोनों से ही तगड़े हैं। यह मौकापरस्‍त लॉबी है, जो अपने फायदे के लिए किसी के भी पक्ष में झुक जाती है। अफसोस कि मीडिया उस समय इस गणित को नहीं समझ पाया। फिर इस सदी के पहले दशक में जब मीडिया में कॉरपोरेट घरानों ने पैर पसारने शुरू किए, तब से बदलाव की उम्‍मीद लगातार धूमिल होती गई है।

बहुत कम ही लोगों को जानकारी होगी कि 2005 में टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने टाइम्‍स प्रायवेट ट्रीटीज (समझौता) के नाम से एक नई कंपनी खोल ली थी। असल में यह निवेशक कंपनी है, जो है तो बेनेट कोलमैन के तहत, लेकिन इसका काम चुनिंदा कॉर्पोरेट घरानों के शेयर खरीदना था। बदले में कोई पैसा नहीं दिया जाता, पर टाइम्‍स में इन घरानों के मुफ्त इश्‍तेहार छपते। साथ में इन कंपनियों की पसंद की खबरें (हाल ही में इन्‍हें पहचानकर पेड न्‍यूज कहा गया) भी छपती रहीं। फिलहाल टाइम्‍स की प्रायवेट ट्रीटीज 119 कंपनियों के साथ है। यह प्रायवेट ट्रीटीज समाचारों के साथ किस तरह की छेड़छाड़ करती है, इसकी एक बानगी देखिए। 10 मई 2008 की दोपहर 2.30 बजे बेंगलुरू में 18 माले की एक निर्माणाधीन इमारत की लिफ्ट टूटकर नीचे जा गिरी। दो मजदूर मारे गए और 7 गंभीर रूप से घायल हुए। लेकिन टाइम्‍स ने अपनी खबर में बिल्‍डिंग बनाने वाले शोभा डेवलपर्स का नाम नहीं लिया, क्‍योंकि वह उनके प्रायवेट ट्रीटीज का हिस्‍सा है।

खबर यूं लगी : Times of India reported on 12th May 2008, that:

"Lift crash leaves 2 dead, 7 hurt

Two occupants in a lift died and seven others were injured on Saturday after the lift crashed to the lower basement at the construction site of a residential apartment on Bannerghatta Road."

इसी साल मई में टाइम्‍स ने कच्‍छा-बनियान बनाने वाली कंपनी डायकी ब्रांड प्रायवेट लिमिटेड के 49 फीसदी हिस्‍सेदारी मुफ्त विज्ञापनों के बदले खरीदी है। दूसरी ओर टाइम्‍स की प्रतिद्वंद्वी एचटी मीडिया अपने क्‍लाइंट्स को मुफ्त विज्ञापन और पेड न्‍यूज का वादा नहीं करती। लेकिन प्रायवेट ट्रीटीज से वह भी दूर नहीं है। लेकिन 2008 में वॉल स्‍ट्रीट के ढहने से प्रायवेट ट्रीटीज के दायरे में आई कंपनियों को नुकसान हुआ और टाइम्‍स समूह पहली बार 1500 करोड़ के घाटे में आया। यह घाटा ऐसा था कि टाइम्‍स समूह अपने पाठकों को बता भी नहीं सका, क्‍योंकि सारा मामला अनैतिक था। सो प्रबंधन ने अपने रिपोर्टरों से कहा कि वे इस घटना को मंदी कहें। अब बताएं कि ऐसे में कोई रिपोर्टर भला अच्‍छी खोजपरक खबरें कहां से लाएगा ?

अब आता है 2009 का साल। तब देश के तकरीबन सभी बड़े मीडिया घरानों ने अपने घाटे की भरपाई के लिए हर वो तरीके अपनाए, जो गलत थे। उन्‍होंने अपने एडीशंस को कोटा तक बांट दिया। मराठी अखबार शकाल के हर पत्रकार-गैर पत्रकार कर्मचारी को 700 रुपए कीमत वाली तनिष्‍का मैगजीन की 100 कॉपीज बेचने का कोटा दिया गया। इससे भी पेट नहीं भरा तो पेड न्‍यूज का का सहारा लिया गया। असल में पेड न्‍यूज का पूरी तरह से पदार्पण तभी हो गया था। आप चाहें तो पेड न्‍यूज की पूरी कहानी को संसदीय स्‍थायी समिति की ऑनलाइन रिपोर्ट में देख सकते हैं। फिलहाल मीडिया की एबीसी इस प्रकार की हो चुकी है- ए माने एडवरटाइजमेंट, बी माने बॉलीवुड, सी माने क्रिकेट। यही वजह से क्रिकेट में हुए एक भी घोटाले को मीडिया ने उजागर नहीं किया। सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, मीडिया घराने भी परिवारवाद और एकाधिकारवाद के शिकार हो रहे हैं। उनके बोर्ड ऑफ डायरेक्‍टर्स में कंपनियों के नुमाइंदे घुस आए हैं। बंगाल में दो साल के भीतर 7 नए अखबार खुले। असल में ये चिटफंड कंपनियों के सेल्‍स काऊंटर थे। सुदीप्‍तो सेन का घोटाला सामने आने के बाद सबके सब औंधे मुंह गिरे। दैनिक जागरण के बोर्ड ऑफ डायरेक्‍टर्स में रियल एस्‍टेट, मैक्‍डोनल्‍ड्स, टैक्‍स कंसल्‍टेंट्स और सीए नजर आएंगे। एक बड़े हिंदी अखबार समूह के बोर्ड में मीडिया गुरू और विज्ञापन एजेंसियों के प्रतिनिधि रखे गए हैं। इन सभी को खबरों और आम लोगों के सरोकार से कोई लेना-देना नहीं। जब स्‍विटजरलैंड के दावोस में हुए वर्ल्‍ड इकोनॉमिक फोरम में भारतीय उद्योग परिसंघ और देश का वाणिज्‍य मंत्रालय 200 चुनिंदा पत्रकारों को प्रायोजित कर सकता है तो यह समझना मुश्‍किल नहीं कि कॉर्पोरेट्स आज किस हद तक मीडिया में एजेंडा सेट करने में जुटे हैं। लोकतंत्र के चौथे खंबे में विज्ञापन और कंटेंट में कोई फर्क नहीं रह गया है।

टीवी पर भी तकरीबन हर कार्यक्रम कोई न कोई कॉर्पोरेट घराना एंडोर्स करता है। हर चैनल पर आपको बिजनेस लीडर अवार्ड जैसे प्रायोजित कार्यक्रम चलते मिलेंगे। आने वाले समय में मीडिया में कॉर्पोरेट मोनापली (एकाधिकारवाद) की स्‍थिति बन जाएगी। मुकेश अंबानी के रिलायंस ग्रुप ने इनाडु, सीएनबीसी, नेटवर्क 18 और सीएनएन-आईबीएन जैसे चैनलों को खरीदकर इसकी शुरुआत कर दी है। आने वाले दिनों में अगर शेयर बाजार लुढ़के तो हालत और बिगड़ेगी। तो जनाब, टमाटर के भाव ऐसे ही सुर्ख होंगे, लेकिन मीडिया सवाल नहीं उठाएगा और न ही पत्रकार कुछ बोलेंगे। कहां से बोलें ? सभी मीडिया घराने तो पत्रकारों को अनुबंध पर नौकरी देने लगे हैं। पत्रकारों की आजादी दांव पर है। पत्रकारों के यूनियन तेजी से बंद हो रहे हैं। अगर किसी अखबार ने पत्रकार को नौकरी से निकाला तो सिवाय उसके सामने चुप रहने के और कोई विकल्‍प नहीं है।

हालात पर काबू पाने के दो तरीके हैं : एक मीडियाकर्मियों को अपना कौशल, तकनीकी समझ और नेटवर्किंग को मजबूत करना होगा, ताकि वे अपनी बात कहने के लिए डिजिटल फोरम में विकल्‍प तलाश सकें। इसी से जुड़ा दूसरा तरीका मीडिया में रहकर ही कॉर्पोरेट के एकाधिकारवाद से जूझने का है। इसके बिना पत्रकारिता को बचा पाना मुश्‍किल है। किसान खुदकुशी करेंगे, बच्‍चे भूख और कुपोषण से मरते रहेंगे और सरकार कॉर्पोरेट्स को पांच लाख करोड़ की टैक्‍स छूट देगी, पर मीडिया सवाल नहीं उठाएगा। इसलिए, क्‍योंकि हमारा मीडिया राजनीतिक रूप से आजाद तो है, पर मुनाफे के फंदे में कैद है।

इन लिंक्‍स को खोलकर जरूर पढ़ें :

http://caravanmagazine.in/reportage/supreme-being

http://thehoot.org/web/Seekingcontroversialrevenueroutes-DecodingBCCLPartIII/6433-1-1-4-true.html

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

Why I left news.



मेरी दोस्‍त एलिसन बर्ड। अमेरिकी अखबारों में सात साल तक प्रिंट जर्नलिज्‍म करने के बाद जब ऊब गईं तो अखबार छोड़कर ब्‍लॉगर बन गईं। एक लड़की के लिए यह आसान फैसला नहीं होता। लोग अक्‍सर उससे सवाल पूछते कि तुमने पत्रकारिता क्‍यों छोड़ दी ? वापस आ जाओ। यह सवाल मेरे भी दिल के करीब है। आज भी कौंधता है। लेकिन आज एलिस के मेल में इस बेलाग शब्‍दों से मेरा हौसला बढ़ाया है। मेरे यकीन को और मजबूत किया है। यह पोस्‍ट मैं अपने पत्रकार मित्रों, संपादकों और मीडिया की माया में भीतर तक घुसे साथियों के लिए एलिस के शब्‍दों में बिना एडिटिंग के पेश कर रहा हूं। समय निकालकर जरूर पढ़ें।
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I get asked two questions several times a week, and I brush off both with a verbal swat.
One — because I’m in my late 20s, I suppose – is when are you getting married? And the other, because it seems like small talk, is why did you leave the newspaper?
I could answer both with a single word: Money.
But I usually deflect the marriage subject, wrongly justifying it as an acceptable passing question, with a practical reason: I’m not eager to have children. And I answer the news question with something to which my audience can nod along: “It didn’t seem like a sustainable career path.”
But that’s a cold and detached answer. I don’t feel cold and detached about news, and I only give that response under the assumption that people don’t want to hang around for the full story – ironically, the same reason newspapers aren’t really working anymore.
So here goes. This is the real reason why I left news: I finally came to accept that the vanity of a byline was keeping me in a job that left me physically and emotionally exhausted, yet supremely unsatisfied.
I started working at newspapers in 2005, the tail-end of the good days. During my first year of work, a Florida newspaper flew me down to the Mexican border to write about cocaine cartel murders back at home. We booked the first available flight, disregarding expense, and arrived before the investigators. That would not happen at a daily newspaper today.
I don’t think the Internet killed newspapers. Newspapers killed newspapers.
People like to say that print media didn’t adapt to online demand, but that’s only part of it. The corporate folks who manage newspapers tried to comply with the whims of a thankless audience with a microscopic attention span. And newspaper staffers tried to comply with the demands of a thankless establishment that often didn’t even read their work. Everyone lost.
People came to demand CNN’s 24-hour news format from every news outlet, including local newspapers. And the news outlets nodded their heads in response, scrambling into action without offering anything to the employees who were now expected to check their emails after hours and to stay connected with readers through social media in between stories.
There was never such a thing as an eight-hour workday at newspapers, but overtime became the stuff of legend. You knew better than to demand fair compensation. If any agency that a newspaper covered had refused to pay employees for their time, the front-page headlines wouldn’t cease. But when it came to watching out for themselves, the watchdogs kept their heads down.
A little more than a month after I left the newspaper, I went to Key West for a friend’s wedding. I realized on the drive home that I had never taken a vacation – aside from a few international trips – without some editor calling with a question about a story. I remember walking down Fifth Avenue in New York on my birthday a few years ago, my cell phone clutched to my ear and mascara running down my face, as an editor told me that he thought the way I had characterized a little girl with cancer needed to be sadder.
To many people, and even to me, part of the draw of news is that it never stops. You wholly invest yourself in a story – until something bigger happens.  The only guarantee in any workday is the adrenaline rush. And even when the story isn’t terribly thrilling, you’ve still got a deadline to contend with, a finite amount of time to turn whatever mess you’ve got into 12 to 15 column inches that strangers would want to read.
The flip side to the excitement is the burnout. You’re exhausted, and you’re never really “off.” You get called out of a sound sleep to drive out to a crime scene and try to talk with surviving relatives. You wake up at 3 a.m. in a cold sweat, realizing you’ve misspelled a city councilman’s name. You spend nights and weekends chipping away at the enterprise stories that you never have time to write on the clock.
Everyone works so hard for so long and for such little compensation. The results are dangerous.
We saw it with the Supreme Court health care ruling, as our national news leaders reported the decision incorrectly. We saw it with the Newtown massacre, when initial reports named the suspect’s brother as the shooter. Major news outlets are no better than bloggers if they adopt a policy of getting it out first and correcting it later. They don’t have the money to fend off the resulting lawsuits, and they don’t have the circulation numbers to allow people to lose faith in their product.
Newspapers always have been liberal places where people work hard for little pay, because they believe in the job. They always could empathize with the poor. But pay continues to dwindle to the point that I wonder what kind of person, today, enrolls in journalism school?
I took a pay cut when I moved back from Florida to Charleston, expecting to make up the difference quickly. Instead, I quit my newspaper job at 28, making less money than earned when I was 22.
I can’t imagine anyone outside of an affluent family pursuing a career with so little room for financial growth. And I wonder: Would that well-to-do reporter shake hands with the homeless person she interviews? Would she walk into a ghetto and knock on a door to speak with the mother of a shooting victim? Or would she just post some really profound tweets with fantastic hash tags?
Maybe that’s what people – editors and readers – put at a premium now. Maybe a newsroom full of fresh-from-the-dorm reporters who stay at their desks, rehashing press releases and working on Storify instead of actual stories, is what will keep newspapers relevant.
But I doubt it.
The day I announced my resignation, I had to cover the alcohol ban on Folly Beach. The photographer working the story with me said very little about my decision, except for one heartbreaking statement: “But you were made to do this.”
I had thought so, too. For so long, people had asked me what I would do if my name wound up on a future round of layoffs, if my paycheck were furloughed into oblivion.
I had spent countless hours late at night trolling online for something else that appealed to me. But covering news was the only thing I ever had wanted to do and the only thing I ever had imagined doing.
I started writing stories for my local newspaper when I was 16. I worked seven internships in college, eager to graduate and get into a newsroom. I left school early, school that was already paid for with enough scholarship money that I took home a check each semester, so that I could lug my 21-year-old life to West Palm Beach and work the Christmas crime shift alone in a bureau. And I wouldn’t change that decision for anything.
People in news like to describe a colleague’s departure, especially into a public relations or marketing job, as “going to the dark side.” When word of my resignation traveled through the newsroom, I heard “dark side” references over and over, always with a smile and a wink. I couldn’t help but resent them. But I looked over my cubicle each time and flashed my best Miss America grin instead of the middle finger poised over my keyboard.
I now write for the fundraising arm of a public hospital. Anyone who thinks that’s going to the dark side is delusional. And as my former coworkers ate farewell cake on my last day at the paper, a few of them whispered, “Do they have any other openings over there?”
I don’t know a single person who works in daily news today who doesn’t have her eyes trained on the exit signs. I’m not sure what that says about the industry, but I certainly don’t miss the insecurity.
Sure, it took me a while to get used to my new job. When I go to parties, I no longer can introduce myself as a reporter and watch people’s eyes light up. Instead, I hear how people miss seeing my byline. No one misses it more than I.
News was never this gray, aging entity to me. It was more like young love, that reckless attraction that consumes you entirely, until one day – suddenly — you snap out of feeling enamored and realize you’ve got to detach. I left news, not because I didn’t love it enough, but because I loved it too much – and I knew it was going to ruin me.

बुधवार, 28 नवंबर 2012

पत्रकारिता का स्तर गिरा ही क्यों ?

आज दोपहर एक वरिष्‍ठ महिला पत्रकार का किसी काम से दफ्तर आना हुआ। छूटते ही उन्‍होंने मुझसे पूछा, ‘अब तो संपादक भी गिरफ्तार होने लगे। पत्रकारिता का कोई स्‍तर है भी या नहीं ?’ मंगलवार 27 नवंबर 2012 की रात जी न्‍यूज के दो वरिष्‍ठ संपादकों के गिरफ्तार होने के बाद यह सवाल वाजिब था। पूरा मीडिया जगत कहीं शोक तो कहीं समालोचना के दौर में है। इस सवाल का वाजिब जवाब ढूंढ़ पाता कि शाम को एक जूनियर साथी का फोन आया। फलां संपादक ने मेरी दर्जनभर खबरें सिर्फ इसलिए रोक रखी हैं कि विज्ञापन विभाग ‘पार्टी’ से रकम ऐंठने की पोजीशन में है। डील होगी तो खबरें नहीं छपेंगी, वरना कॉपियों को डेस्‍क लेवल पर ‘डल’ करके छापा जाएगा।

पत्रकारिता में 18 साल गुजारने के बाद ये बातें मुझे अब कतई नहीं चौंकातीं। पर असल सवाल वह है, जो दोपहर को वरिष्‍ठ पत्रकार साहिबा ने पूछा था, ‘पत्रकारिता का कोई स्‍तर है भी या नहीं ?’ इससे पहले कि सवाल का जवाब तलाश करने की कोशिश की जाए, पिछले दिनों एक जाने-माने पत्रकार के साथ हुई विजिट का वाकया याद आ रहा है। (नाम पूछने की जुर्रत न कीजिएगा) गाड़ी में बैठे पत्रकार साहब को एक फोन आया। कुछ एडमिशन का लफड़ा था। लेन-देन की डील हुई। कुल 48 हजार रुपए की रकम ‘पार्टी’ को देनी थी। बातचीत खत्‍म होने के बाद मेरे चेहरे पर उमड़ रहे सवालों को ताड़कर उन्‍होंने फरमाया, ‘हमें तनख्‍वाह मिलती ही कितनी है ?’ जितनी हाथ में आती है, उससे कहीं ज्‍यादा तो दिल्‍ली का खर्च है। ये तो मेहनत की कमाई है। पहचान की भी तो कीमत होती है न ? मैं मुस्‍कुराकर रह गया। एक और वाकया – इसी महीने की एक दोपहर पुराने खेल पत्रकार मित्र रास्‍ते में टकरा गए। लंबे अरसे के बाद मिलना हुआ था, सो चाय के दौर शुरू हुए। तभी उनके सेलफोन की घंटी बजी और एक फोटोमय विज्ञप्‍ति के बारे में बात होने लगी। ‘हां मिल गई है। लग जाएगी। ...लेकिन मेरा फोन अभी तक रिचार्ज नहीं हुआ। बैलेंस बिल्‍कुल नहीं है। आपको 500 के रिचार्ज का कहा था। शाम तक करवा दीजिएगा। एसटीडी लगानी है।’ उधर से पक्‍का आश्‍वासन मिलने के बाद ही वे संतुष्‍ट हुए। मैंने पूछा, ‘सब ठीक तो चल रहा है न ? बोले, हां पर आजकल रेट थोड़े कम हो गए हैं। अक्‍सर पेज खाली होने पर ‘घाटा’ उठाना पड़ता है।’

मुझे याद आता है 15 साल पहले का वह दौर, जब मीडिया संस्‍थानों के बाहर चाय, पान, समोसे और चाय की ढेर सारी रेहड़ियां हुआ करती थीं। विज्ञप्‍तियां लिए लोग पहले ही बाहर खड़े रहते थे। चाय-समोसे की चुस्‍कियों के साथ पार्टी बड़े अदब से प्‍लीज इसे ‘देख’ लीजिएगा.... यह कहकर एक लिफाफा पकड़ा देते थे। खोलने पर उसमें 100 का पत्‍ता गिरता। महंगाई बढ़ी तो रेट तय हो गए। 100 मतलब सिंगल कॉलम... और इसी के मुताबिक रेट बढ़ते जाते। फोटो के लिए 100 रुपए अलग। यह तो हुई डेस्‍क वाले की कमाई। मीडिया की आपसी प्रतिस्‍पर्धा के चलते जब एक्‍सक्‍लूसिव खबरों का दबाव बढ़ा तो फील्‍ड रिपोर्टर भी कमाने लगा। बीट पर जितनी पकड़, उतनी ज्‍यादा कमाई। नगर निगम से लेकर क्राइम तक में रिपोर्टरों के पास पैसा आने लगा। तनख्‍वाह कम थी, सो पत्रकारों की ज्‍यादातर भूख ऊपरी कमाई से मिटने लगी। कुछ अखबार तो नाममात्र की तनख्‍वाह के साथ प्रेस कार्ड थमाकर यह नसीहत भी देते थे कि ‘इससे ज्‍यादा जितना कमा सको, कमा लो पर संस्‍थान पर उंगली न उठे इसका ध्‍यान रखना। वरना कहीं के नहीं रह जाओगे।’ मैंने अपने ही संस्‍थान के एक क्राइम रिपोर्टर को रोज रात एक बजे के बाद थाने में जमानत की सेटिंग करते देखा है। उनकी एक रात की कमाई ही कभी-कभी 10 हजार रुपए को पार कर जाया करती थी।

जी के दो संपादकों, सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया ने ऐसा क्‍या कर दिया कि पत्रकारिता का स्‍तर अचानक गिर गया ? पिछले एक दशक की बात करूंगी तो संपादक नाम की संस्‍था ज्‍यादातर मीडिया संस्‍थानों में सिर्फ इसलिए खत्‍म कर दी गई, क्‍योंकि मालिक को एक लाख रुपए से ज्‍यादा की तनख्‍वाह पर किसी को खामख्‍वाह उस पद पर बिठाए रखना गवारा नहीं था। इस दौरान मीडिया संस्‍थानों में तनख्‍वाह तो बढ़ी, लेकिन कंटेंट के मामले में मैनेजमेंट का दखल बढ़ जाने पर हर पत्रकार की काबिलियत का निर्धारण इस तरह से किया जाने लगा कि उससे कितने लोगों का काम एक साथ लिया जा सकता है। इस मापदंड पर संपादक एक निहायत ही नाकारा और बोझ किस्‍म का व्‍यक्‍ति मान लिया गया। लेकिन प्रिंट लाइन में किसी का नाम देने की मजबूरी (बलि का बकरा) के चलते यह एक अनिवार्य प्रक्रिया थी, सो उस पर लायजनिंग का अतिरिक्‍त बोझ भी डाल दिया गया। मीडिया संस्‍थान के नए मापदंड 30 हजार के एक पत्रकार से हरफनमौला खिलाड़ी की तरह बैटिंग व बोलिंग के साथ फील्‍डिंग और विकेटकीपिंग तक की उम्‍मीद कर देते हैं। पहले जो काम तीन लोगों की टीम किया करती थी, वह एक ही व्‍यक्‍ति करता है। नतीजतन गलतियां होती हैं, पर संपादक इस मामले में कुछ खास नहीं कर सकता। इसलिए, क्‍योंकि उसे तो लायजनिंग से ही फुर्सत नहीं मिलेगी।

मालिक को जमीन चाहिए। बिजनेस का डायवर्सिफिकेशन करना है। उसे कालेधन को सफेद करना है, सो छापों से भी बचाना होगा। उसे लाइसेंस चाहिए, सरकारी सुविधाएं चाहिए और साथ में सरकार के विज्ञापन भी। कहीं किसी मालिकान को संसद में जाने की खुजली होती है तो कोई अपने भाई को एमएलए बनाना चाहता है। संपादक का अधिकांश समय ‘जुगाड़’ में बीतता है। करीब एक दशक पहले की बात है। मेरे अखबार की रीलांचिंग थी। मैं प्रेजेंटेशन हाथ में लिए मालिक के कमरे के बाहर इंतजार कर रहा था। तभी संपादकजी आते दिखाई दिए। मुझसे नजरें मिलाए बिना वे सीधे मालिक यानी एमडी के कमरे में चले गए। कमरे का दरवाजा कुछ ढीला था, सो पूरी तरह से बंद नहीं हुआ। अंदर का सारा नजारा बाहर से साफ दिख रहा था। मालिक ने संपादकजी को बेहद भद्दी गालियां देनी शुरू कर दीं। उस दिन का अखबार उनके मुंह पर उठाकर फेंक दिया। प्रतिक्रिया स्‍वरूप कोई जवाब नहीं आया। फिर उन्‍होंने अपने पीए को बुलाया। डिक्‍टेशन देते हुए बोले, ‘संपादक जी एक महीने के लिए स्‍टेट का एक ऑर्डर लेकर आएंगे... जिसकी कॉस्‍ट आपको मार्केटिंग हेड बताएंगे...’ संपादकजी के बाहर आने के कई दिनों बाद मुझे पता चला कि वह डील करोड़ों की थी। उनके संस्‍थान छोड़ने के बाद एक बेहद अनौपचारिक में उन्‍होंने बताया कि ‘उस दिन’ उन्‍हें गुडबाय कहने के लिए बुलाया गया था।

सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया के खिलाफ शिकायत में जी समूह के मालिक सुभाष चंद्रा का भी नाम है। पुलिस का दावा है कि दोनों संपादक अपने साथ विज्ञापन की बुकिंग का फॉर्म भी ले गए थे। बताया गया है कि 100 करोड़ रुपए के विज्ञापनों की यह डील कोयला घोटाले में सांसद व उद्योगपति नवीन जिंदल के खिलाफ लगे आरोपों से संबंधित खबर रुकवाने के लिए की जा रही थी। पिछले दिनों स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले में नीरा राडिया समेत मीडिया जगत के कई दिग्‍गजों के नाम उछलने के बाद पत्रकारिता के अवमूल्‍यन पर काफी हल्‍ला मचा था। उस समय भी पत्रकारिता के गिरते स्‍तर पर चिंता जताई गई थी। लेकिन अभी यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि पत्रकारिता का स्‍तर पहले कितना ऊंचा था ? वह गिरा तो क्‍यों ? किसने गिराया ? एडिटर को मैनेजिंग एडिटर किसने और क्‍यों बनाया ? भ्रष्‍टाचार या अनियमितता की खबर छपने के बाद किसके हित सबसे ज्‍यादा प्रभावित होते हैं ? अखबार के या संपादक के ? मीडिया संस्‍थानों के मालिकान के लिए अखबार/चैनल अहम है या उनके बाकी व्‍यवसाय ? राडिया प्रकरण में मीडिया के स्‍व नियंत्रण पर भी बड़ी बहस हुई थी। लेकिन यहां भी बेहद अहम सवाल यह है कि जब प्रेस की आजादी के नियम-कानून पहले ही बने हुए हैं, कौन सी खबर पेड है और कौन सी अनपेड यह भी साफ दिखता है तो इस स्‍व नियंत्रण की निगरानी का जिम्‍मा कौन उठाएगा ? क्‍या सिर्फ प्रेस कौंसिल जो अभी जी-न्‍यूज का लाइसेंस रद्द करने की मांग कर रहा है और जिसके पास मांग/सिफारिश करने के सिवा और कोई अधिकार नहीं ? या फिर वही एडिटर्स गिल्‍ड, जिसमें मीडिया के लोग ही बैठे हैं ? अगर मीडिया का वाकई शुद्धिकरण करना है तो हमें ऊपर से शुरुआत करनी होगी। उन स्‍तंभों से बाजार और व्‍यावसायिकता की बेल छांटनी होगी, जो निचले स्‍तर के मीडियाकर्मियों को गाहे-बगाहे लपेटकर उन्‍हें अपने इशारों पर नाचने को मजबूर कर रही हैं। यह काम नामुमकिन तो नहीं, पर फिलहाल मुमकिन नहीं लगता।