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मंगलवार, 26 मार्च 2013

और कितनी अमीना ?

अन्‍ना हटसोल, फेमेन उक्रेन


‘’ मेरा शरीर मेरा अपना है। यह किसी के सम्‍मान का स्रोत नहीं है। ‘’

अमीना (19) ने फेमेन ट्यूनीसिया के फेसबुक पेज पर अपने टॉपलेस शरीर पर फारसी में लिखा।


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उक्रेन की राजधानी कीव में रोज दर्जनों विरोध प्रदर्शन होते हैं। ऐसे में हमारी कौन सुनेगा। इसलिए हम कहते हैं, ‘मेरे स्‍तनों को देखो और बड़े मुद्दों पर बात करो।’

अन्‍ना हटसोल, उक्रेन में 2008 से चल रहे फेमेन नामक महिला अधिकार संगठन की जनक।


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दो बातें। दोनों अलग। दोनों का मकसद अलग। पर संदर्भ एक समान। उक्रेन में वेश्‍यावृत्‍ति एक व्‍यवसाय का रूप ले चुकी है। वहां बाकायद लड़कियों की तस्‍करी होती है। दिल्‍ली, मुंबई, बेंगलुरू से लेकर भोपाल तक के मसाज पार्लरों, सेक्‍स शॉप में उक्रेन की लड़कियां मिल जाएंगी।

ट्यूनीसिया मुस्‍लिम कट्टरपंथी देश है। 1956 तक फ्रांस के औपनिवेशिक शासन में रहने के बाद यह देश आजाद हुआ। बाद में हबीब बुरगुइबा ने 30 साल तक देश में राज किया। वे धर्मनिरपेक्ष थे। उन्‍होंने औरतों को राजनीतिक और समान जनतांत्रिक अधिकार देने के कई कानून बनाए। बहुविवाह प्रथा को खत्‍म किया और मुफ्त अनिवार्य शिक्षा को लागू करवाया। बाद में जिन अल आबेदिन बेन अली ने अगले चार चुनावों तक देश को बेहद तानाशाही से चलाया। उन्‍होंने कट्टरपंथियों पर दबाव बनाए रखा, लेकिन ना सुनने की उन्‍हें आदत नहीं थी। व्‍यापक असंतोष ने बेन से 2011 में गद्दी छीन ली और अरब क्रांति की नींव पड़ी। असल में इस क्रांति में कट्टपंथियों का पलड़ा भारी है। ये औरतों को घर में कैद रखने के पक्षधर हैं। ऐसे में बेन की सत्‍ता के दौरान यहां की औरतों को मिली आजादी छिन जाने से उनके भीतर गजब की छटपटाहट है। अमीना के टॉपलेस होने के पीछे यही मुख्‍य प्रसंग है।

पर ट्यूनीसिया रूस के पड़ोसी उक्रेन के समान गरीब देश नहीं है। भूमध्‍यसागर के इस रणनीतिक महत्‍वपूर्ण देश का यूरोप से काफी व्‍यापार होता है। इस देश में फिलहाल इस्‍लामिक इन्‍नहदा पार्टी की चलती है। ये खुद को कट्टरपंथ के खिलाफ बताते हैं। लेकिन मीडिया पर आए दिन दबाव बनाना इनका काम है। इन्‍होंने औरतों की आजादी को कम करने की वकालत करते हुए एक कानून का प्रस्‍ताव भी किया है।

लौटते हैं मूल सवाल पर। इस्‍लामिक इन्‍नहदा पार्टी की ताकत को समझते हुए भी 19 साल की अमीना ने यह कदम क्‍यों उठाया ? जवाब बहुत आसान है। दो दशक पहले पशु अधिकार संगठन पेटा ने एक अभियान चलाया था – ‘आई वुड रादर गो नेकेड दैन वियरिंग फर।’ फर असल में जानवरों की खाल, खासकर ध्रुवीय भालू की खाल से बना कोट होता है। पेटा के एक्‍जीक्‍यूटिव डान मैथ्‍यूज कहते हैं कि यह विशुद्ध पीआर कैम्‍पेन था, जो कामयाब रहा। उन्‍होंने पिछले साल एओएल न्‍यूज को बताया कि ‘पूरी दुनिया आकर्षक लोगों को देखना चाहती है।’

तो इसी की देखादेखी दुनिया में टॉपलेस क्रांति की शुरुआत हुई। अब तो GoTopless.org नाम की एक वेबसाइट भी शुरू हो चुकी है। हर साल अगस्‍त में इस क्रांति की समर्थक औरतें एक दिन के लिए टॉपलेस होती हैं। अपने टॉपलेस शरीर में वे अश्‍लील संदेश कुछ इस तरह से लिखवाती हैं, ताकि लोगों की नजर पड़े। अमीना ने भी यही किया और उसकी देखादेखी 1700 औरतों ने भी। फेमेन की 2008 में स्‍थापना के बाद से 17 देशों की 1.50 लाख से ज्‍यादा औरतें कुछ न कुछ मकसद के लिए टॉपलेस हो चुकी हैं। हाल में रोम में जब पोप के चुनाव के लिए कार्डिनल्‍स सिस्‍टीन चैपल जा रहे थे तो बाहर दो औरतें टॉपलेस होकर एकदम से प्रकट हो गईं। इस समूह की वेबसाइट कहती है - The group, Femen, is a group of women who, according to the organization's website, defend sexual and social equality with their breasts and "undermine the foundations of the patriarchal world by their intellect, sex, agility, make disorder, bring neurosis and panic to the men's world" (sic).

अमीना ने अपने सीने पर लिखा, ‘फक योर मॉरल्‍स।’ मीडिया ने इसे हाथों-हाथ लिया और हमारे भारत में कई महिलाओं को इस पर ऐतराज हो गया। वे नैतिकता की दुहाई देने लगीं। एक महिला मित्र ने मुझे उकसाया। बहस के लिए। वे मीडिया पर नाराज थीं। मीडिया की नैतिकता उसके लिए जरूरी सवाल था। एक ओर नैतिकतावादियों की रोक-टोक से नाराज अमीना इसे चुनौती दे रही थीं तो दूसरी ओर मोहतरमा बिना इस मसले की पड़ताल के भावनाओं में बही जा रही थीं। महिला मित्र पत्रकार हैं और पत्रकारों अमूमन भावनाओं में खेल जाते हैं।

कुछ और महिलावादी पत्रकार फेसबुक पर कभी दारू पीती तो कभी हुक्‍के के कश मारती फोटो खिंचवाती हैं। (ये मैंने सिर्फ सुना है। उन पत्रकारों के एफबी फ्रेंड से। मेरी इनसे दोस्‍ती नहीं रही।) कुछ ऐसी भी पत्रकार (? माफ कीजिए : संपादक) हैं, जिन्‍हें पुरुष नाम से ही धोखेबाजी और लंपटता की बू आती है। एक महिला संपादक को हमेशा भरम होता है कि पुरुष का जन्‍म ही रेप, यौन उत्‍पीड़न और ब्‍लैकमेल करने के लिए हुआ है।

बहरहाल, इस नैतिकता के दोहरे मापदंड में अमीना या टॉपलेस मूवमेंट के लिए कोई जगह नहीं। फिर भले ही मीडिया या बाजार उनके कारनामे को कितना भी भुनाए। औरत के इस स्‍वरूप को उत्‍पाद के तौर पर कैसे भी पेश किया जाए। औरत हर लिहाज से आजाद है। अपनी पोशाक के चुनाव में भी। दिल्‍ली के जेएनयू में तो बरसों पहले लड़कियों में एक जुमला ही चल पड़ा था, मैं कुछ पहनूं या न पहनूं, मेरी मर्जी। इस तरह के जुमलों या विचारधारा का बाजार हमेशा से ही पोषक रहा है। अलबत्‍ता, अपने मनपसंद साथी के चुनाव के मामले में 90 फीसदी लड़कियां पीछे मुड़कर परिजनों की ओर देखती हैं। हमारे समाज में खुलेपन के लिए हमेशा जगह रही है और रहनी भी चाहिए। थोथी नैतिकता की दुहाई देने का हक किसी को नहीं। मुझे भी नहीं।

पर यहां आजादी और जिम्‍मेदारी के बीच झीनी चादर है। आजादी का जिम्‍मेदारीपूर्ण निर्वहन करने पर ही इसका असली मजा लिया जा सकता है। इसमें किसी भी तरह का अतिरेक जोखिमभरा हो सकता है। कानूनन स्‍त्री-पुरुष एक समान हैं। लैंगिक भेदभाव की सामाजिक दीवार अभी भी इस समानता को पचा नहीं पा रही है। इस पुरुषप्रधान समाज से निकला शासक वर्ग भी औरतों की बराबरी के हक को बुलंद इरादों से समर्थन नहीं दे रहा। फिर भी महिलावादियों का संघर्ष जारी है। रहना भी चाहिए। उनका मकसद नेक है, इरादे अटल हैं।

फिर अमीना क्‍यों ? और अमीना क्‍यों नहीं ? 2004 में जब मणिपुर में 40 महिलाओं ने मनोरमा के रेप और उसकी हत्‍या के विरोध में पूर्णत: निर्वस्‍त्र होकर सेना कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया था, तब मीडिया ने उन फोटोग्राफ्स को भुनाने की कोशिश नहीं की थी। इस घटना की देशभर में निंदा हुई और मणिपुरी महिलाओं के प्रदर्शन को विरोध के तमाम अधिकारों को खो चुकी देश की आधी आबादी की विवशताभरी पुकार बताया गया।

आज बाजार हमारे वजूद पर कब्‍जा जमाने की ओर बढ़ रहा है। हम कैसे रोएं, कब रोएं, कब हसें, कितना हंसें और कब-क्‍या पहनें सब कुछ बाजार ही तय करता है। उन 42 फीसदी आबादी, यानी मध्‍य वर्ग के लिए जिनके पास सब-कुछ है। अगर नहीं है तो अपने मुताबिक जीने का अधिकार। उनकी हालत अमीना जैसी है। उनकी छटपटाहट भी वैसी ही है। इस 42 फीसदी को उन 58 फीसदी आबादी और उसकी आधी, यानी ग्रामीण औरतों की कोई फिक्र नहीं, जिन्‍हें इंसानी जीवन के बुनियादी हक भी नहीं मिले। ये वे औरतें हैं, जो अगर जुल्‍मो-सितम के आगे मुंह खोलें (अमीना के समान) तो टॉपलेस कर दी जाती हैं। फिर उनके माथे पर अलिखित रूप से चिपका दिया जाता है कि वे बदचलन हैं।

ऐसे में कई सवाल खड़े होते हैं।

1. क्‍या भारत में भी अमीना जैसी बालाएं हैं ?

2. अगर हैं तो क्‍या उनका भी मकसद अमीना की तरह ही होगा ?

3. क्‍या मनोरमा प्रकरण की तरह महिलाओं की आजादी, सुरक्षा सुनिश्‍चित करने के लिए टॉपलेस होना ही एकमात्र रास्‍ता बचा है ?

4. क्‍या इससे 58 फीसदी ग्रामीण आबादी में शामिल महिलाओं की मुक्‍ति का रास्‍ता खुलेगा ?

5. भारत में इस तरह के किसी टॉपलेस आंदोलन में बाजार और सरकार की क्‍या भूमिका होगी या होनी चाहिए ?

6. क्‍या किसी महिलावादी कार्यकर्ता के पास समाज में बराबरी लाने का, पुरुषवादी मानसिकता को बदलने का कोई कारगर मॉडल है ?