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शुक्रवार, 31 मई 2013

मुंबई एक नशा है...

मुंबई। मायानगरी।


भारत के गांवों से हजारों लोग रोजाना आंखों में ढेरों सपने और दिल में असंख्‍य अरमान लिए चले आते हैं इस शहर में। हीरो-हीरोइन बनने। भारतीय सिनेमा को शुरू हुए 100 साल बीत चुके, पर संघर्ष की यह दास्‍तां और ज्‍यादातर के लिए हाशिए तक का रास्‍ता अभी तक नहीं बदला। सैकड़ों किलोमीटर दूर से। ट्रेन के सामान्‍य दर्जे में ठूंसे हुए। कंधे पर एक बैग। जेब में कुछ हजार नोट। किसी ने जमीन गिरवी रख दी तो कोई अपनी पत्‍नी के जेवर रहन रख आया। इस उम्‍मीद के साथ कि मुंबई शहर किसी को भूखा नहीं रखता। तो मेहनत करता है, जिसमें हुनर है उसे यह शहर रातों-रात कामयाबी के सातवें आसमान पर ले जाता है। 

वहां तक पहुंचने के लिए हर तकलीफ मंजूर है, हर कुर्बानी जायज़ है, हर समझौता मंज़ूर है। 



कभी भूखे पेट सोना पड़े, कभी चप्‍पल फट जाए, कभी रात तन्‍हा गुजारनी पड़े। सब मंजूर है। उस एक चकाचौंध भरी रात के लिए, जो रह-रहकर सपनों में आती है, अपनी ओर खींचती है। चारों ओर चमकती तेज रोशनी है। आगे लाल कालीन है और मंजिल वह रुपहला परदा है, जहां सिर्फ मैं ही मैं हूं और कोई नहीं। 



जरा ज़ुल्‍फें संवार लूं, थोड़ा आइने को समझा लूं। खूबसूरत तो मैं हूं। हां, मौका मुझे ही मिलेगा। बेशक। 



बस एक चांस। बस एक चांस मिल जाए.... और मैं दुनिया जीत लूं। 


रेडी...टेक 4....सीन....1......कट। यूं ही शाम हो गई। क्‍या कहूं, क्‍या गुजरी। कोई बात नहीं। सागर मेरे आंसुओं का गवाह है। हां, वह इन आंसुओं का ही तो सैलाब है। सुबह उन्‍हीं आंसुओं में नहाकर फिर डट जाऊंगा मैदान में। 



लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जयजयकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
- हरिवंश राय बच्‍चन 



फिर वही शाम। वही गम, वही तन्‍हाई है। आज फिर भूखे पेट सोना पड़ेगा। कल एक जगह बुलावा आया है। पैसे खर्च नहीं कर सकते। कोई बात नहीं। पानी पीकर सो जाएंगे।



और एक दिन.... इस शहर की 1.80 करोड़ से ज्‍यादा की आबादी में खो जाएंगे।