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सोमवार, 17 सितंबर 2012

रिटेल में एफडीआई : सरकार का धोखा, आंकड़ों का सच

सरकार का यह दावा कि वालमार्ट जैसी कंपनियों के आने से छोटे दुकानदारों की दुकानें बंद नहीं होंगी, जान-बूझ कर दिया गया गलत बयान है। अमेरिका की आयोवा स्टेट यूनिवर्सिटी का अध्ययन दिखाता है कि वहां वालमार्ट के आने के शुरुआती एक दशक में 555 गल्ले की दुकानें, 298 हार्डवेयर की दुकानें, 293 निर्माण सामग्री बेचने वाली दुकानें, 161 अलग-अलग किस्‍म के सामान बेचने वाली दुकानें, 158 महिला परिधान की दुकानें, 153 जूते की दुकानें, 116 दवा की दुकानें और पुरुषों के कपड़े 111 की दुकानें बंद हो गईं। भारत में, जहां छोटे दुकानदारों द्वारा प्रतिरोध करने की क्षमता और कम है, इससे कुछ भी अलग क्यों होगा? अमेरिका में वॉलमार्ट की दुकानों का औसत आकार 10,800 वर्ग फुट है जिनमें सिर्फ 225 लोग नौकरी करते हैं। इस लिहाज से देखें तो रोज़गार पैदा होने का सरकारी दावा धोखा नहीं लगता? भारत में रीटेल कारोबार अनुमानत: 400 अरब डॉलर का है लेकिन इसमें कॉरपोरेट हिस्सेदारी सिर्फ पांच फीसदी है। भारत में रेहड़ी-पटरी लगाने वालों को जोड़ लें तो कुल पांच करोड़ खुदरा विक्रेता हैं। इसका मतलब यह हुआ कि एक रीटेलर आठ भारतीयों की सेवा में है। चीन में यह संख्या 100 चीनियों पर एक की है। फिक्की की दी हुई सूचना के मुताबिक रीटेल कारोबार में खाने-पीने का हिस्सा 63 फीसदी है। सुपरमार्केट आने के बाद भारत में बेंगलुरु, अहमदाबाद और चंडीगढ़ के 33-60 फीसदी सब्ज़ी और फल विक्रेताओं ने ग्राहकों की संख्या में 15-30 फीसदी कमी, बिक्री में 10-30 फीसदी की कमी और आय में 20-30 फीसदी कमी की बात कही है, जिनमें सबसे ज्यादा असर बेंगलुरु में देखा गया है जहां देश के सबसे ज्यादा सुपरमार्केट मौजूद हैं।


भारत ने एक बार मल्टीब्रांड रीटेल क्षेत्र खोल दिया तो दसियों अरब डॉलर वाले विदेशी कॉरपोरेट भारतीय बाजार में हिस्सा पाने के लिए लाइन लगा लेंगे। कुछ बड़े खिलाड़ी जो भारतीय बाजार में प्रवेश के इच्छुक हैं, उनमें अमेरिका का वॉलमार्ट (9000 स्टोरों से पिछले साल की कुल बिक्री 400 अरब डॉलर), फ्रांस का कारफूर (9,500 स्टोरों से कुल बिक्री 130 अरब डॉलर), यूके का टेस्को (5,400 स्टोरों से कुल बिक्री 100 अरब डॉलर) और जर्मनी का मेट्रो (2,100 स्टोरों से कुल बिक्री 96 अरब डॉलर) हैं। पैसे की ताकत से इनके पास बरसों घाटा सहने की क्षमता है जब तक कि प्रतिस्पर्धी बाजार से बाहर ना हो जाएं। थाइलैंड का उदाहरण लें जहां सिर्फ 13 साल के भीतर विदेशी रीटेलरों ने 38 फीसदी बाजार पर कब्जा कर लिया है, जिसके चलते हजारों छोटे दुकानदार बाजार से बाहर फेंके जा चुके हैं। आज थाइलैंड इन विशाल विदेशी रीटेलरों के विस्तार और इनके द्वारा अपनाई जाने वाली एकाधिकारी नीतियों को थामने में जूझ रहा है। इन कंपनियों का कारोबारी मॉडल इस बात की ज़रूरत पैदा करता है कि वे ज्यादा मात्रा में उत्पादन करें। इसके लिए वे खरीद के दाम कम करने को मजबूर करेंगे और इसी के सहारे अपना भंडार बढ़ाते जाएंगे। यह प्रक्रिया उस हद तक जाएगी जहां स्थानीय छोटे खुदरा व्यापारियों के लिए उनसे प्रतिस्पर्धा करना असंभव हो जाएगा। यदि शुरुआत में कीमतें कम रखी गईं, तो क्या यह उपभोक्ताओं के लिए फायदेमंद होगा? एक स्तर तक, उपभोक्ताओं को लाभ तो मिलेगा। लेकिन एक बार बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया, तो उपभोक्ता उनके चंगुल में फंस जाएगा। इसी मोड़ पर उनकी कीमतें बढ़ जाएंगी और उपभोक्ता के पास अधिक पैसा चुकाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।


दुनिया के तकरीबन हर बाज़ार में विशाल बहुराष्ट्रीय रीटेल श्रृंखलाओं ने दूसरे खिलाडि़यों को बाज़ार से खदेड़ दिया है और अपना एकाधिकार जमा लिया है। मसलन, गल्ले के कारोबार में बाजार पर इनकी हिस्सेदारी 20 से 80 फीसदी तक हो जाती है। चौंकाने वाली बात यह है कि सिर्फ एक दशक के भीतर ब्राजील में 38 फीसदी और थाइलैंड में 32 फीसदी बाजार पर इनका कब्जा कायम हो गया। विशाल बहुराष्ट्रीय रीटेलरों का कारोबारी नुस्खा है ‘‘सबसे कम में खरीदो, सबसे ज्यादा पर बेचो’’। खुदरा बाजार में अपनी शर्तें थोपने के लिए वे आकार को निशाना बनाते हैं। भारतीय किसानों को वे अच्छा दाम नहीं देंगे, ऐसा मानने के कई कारण हैं। मसलन, अमेरिका में किसानों को 1950 के दशक में सुपरमार्केट में खर्चे गए प्रत्येक डॉलर पर 40 सेंट मिलता था। यह आज 19 सेंट रह गया है। दुकानों और रोजगारों की संख्या में कटौती का अमेरिका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। यहां विशाल रीटेलरों की अबाध वृद्धि ने छोटे व्यापारियों को बाजार से बाहर फेंक दिया है। 1951 से 2011 के बीच अमेरिका की आबादी 155 मिलियन से दोगुना होकर 312 मिलियन हो गई, इसके बावजूद दुकानों की संख्या 1951 के 1.77 मिलियन से घट कर 2011 में 1.5 मिलियन रह गई। दस से कम कर्मचारियों वाली निजी दुकानों की संख्या भी इस अवधि के दौरान 1.6 मिलियन से 1.1 मिलियन होकर रह गई। कल्पना करें कि यदि भारत में ऐसा कुछ घटता है, तो बेरोजगारी की स्थिति कितनी भयावह हो जाएगी।


याद करें जब अंग्रेज ने 180 वर्षों तक हमारे नमक पर अधिकार बनाए रखा। हाल ही में अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर तेल कंपनियों और बंदरगाहों की सुविधा देने वालों को विदेशी हाथों में जाने से रोक दिया। फ्रांस में पेप्सीको ने 2006 में डैनन के अधिग्रहण का प्रस्ताव दिया था लेकिन वहां की सरकार ने योगर्ट को एक रणनीतिक उद्योग का दर्जा देते हुए पेप्सीको की इस पहल को रोक दिया। सीधा नीतिगत सबक यह है कि हमें देश की खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर विदेशी नियंत्रण का खतरा नहीं उठाना चाहिए। भारतीय नीति निर्माताओं को समय रहते ही विदेशी निगमों के लिए राष्ट्रीय खाद्य आपूर्ति श्रृंखला खोलने के प्रभावों का आकलन कर लेना चाहिए।