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मंगलवार, 26 मार्च 2013

होली में हारे तो भी जीते


क्‍या आप 122 करोड़ की आबादी में असल हिंदुस्‍तान को तलाश सकते हैं ? ज्‍यादा सोचने की जरूरत नहीं। जवाब बहुत सरल है। इस देश में दो ही पर्व ऐसे हैं, जो थोड़े संसाधनों में ही ढेर सारी खुशियां देते हैं। होली और दीवाली। थोड़ा सा अबीर चेहरे की रौनक बढ़ाने के लिए, देश की संस्‍कृति में एकाकार होने को काफी है। दीवाली में एक दीया आपके चेहरे को रोशन कर देता है। एक तरफ दौलत, शोहरत, रसूख और दूसरी ओर सिर्फ और सिर्फ गुरबत। बीच में रंगों की बाल्‍टी। न जात-पात और न वर्ग-संप्रदाय। सभी के चेहरे पर रंग, यानी खुशियां। अपनी ब्‍यूटी के लिए रंगों, यानी खुशियों की कुर्बानी देने वाली ब्‍यूटीफुल महिलाओं से मेरी हमेशा विनती रही है कि होली के दिन कमरे में बंद होकर रहने के बजाय कभी दूसरों के चेहरे पर अबीर लगाकर देखें। जो खुशी मिलेगी, उससे यकीनन उनकी ब्‍यूटी थोड़ी बढ़ ही जाएगी, घटेगी नहीं।



खैर, होली की कई यादें हैं। उनमें से एक है ब्रज की होली। बड़े दिनों बाद थोड़ी फुरसत है तो कुछ यादें आपके लिए समेट लाया हूं। ब्रज का नाम सिर्फ होली के कारण ही मशहूर नहीं है। इसकी दो और वजह हैं : गाय और प्रजातंत्र। दिल्‍ली से निकलकर 100 किलोमीटर चलने के बाद ही गायों के दर्जनों झुंड यहां-वहां घास चरते या मंडराते दिखते हैं। ब्रज में गौवंश को बेटियों का दर्जा दिया गया है। अभी भी कहा जाता है कि ब्रज में जितनी सेवा गायों की होती हैं, उतनी बाहर किसी भी अंचल में नहीं होतीं। तेजी से बदलती जलवायु, सूखे और खेती में मशीनरी के इस्‍तेमाल से गायों के लिए चारा कम होता जा रहा है। गांवों में बच्‍चों को ठीक से दूध नहीं मिलता। यमुना तेजी से सिकुड़ती जा रही है। यमुना एक्‍सप्रेस वे ने बड़ी संख्‍या में जमीन छीनी है। सड़क के दोनों ओर बड़े टाउनशिप बनाने की योजना पर काम चल रहा है।

ब्रज में रामायण काल से प्रजातांत्रिक व्‍यवस्‍था थी। यहां अंधक और वृष्‍णि दो संघ हुआ करते थे। ये परोक्ष मताधिकार से अपना शासक चुनते थे। उग्रसेन अंधक के शासक थे। कंस उनका ही बेटा था। कंस को लोकतंत्र पर यकीन नहीं था। गद्दी संभालने के बाद उसने बहुसंख्‍यक यादवों का दमन शुरू किया। बौद्ध अनुश्रुति के अनुसार बुद्ध ने मथुरा आने पर अपने शिष्य आनंद से कहा, यह वही राज्य है, जिसने अपने लिए राजा (महासम्‍मत) चुना था। फिलहाल ब्रज मंडल, यानी उत्‍तर में हरियाणा के पलवल, दक्षिण में ग्‍वालियर, पश्‍चिम में भरतपुर और पूर्व में एटा से लगती हैं। यानी ब्रज मंडल को किसी एक दल के अधीन नहीं माना जा सकता।

खैर, होली का मौका है तो बात रंगों की, खुशियों की और इंसान से प्रकृति के रिश्‍ते की करेंगे। टेसू के फूलों से बने रंग। फूल ही फूल। फूलों की होली। पुराणों में ब्रज को चारागाह के रूप में भी परिभाषित किया गया है। इसका मतलब है कि यहां घास के मैदान थे। खेती आबाद थी। जहां हरियाली होगी, वहां फूल भी होंगे। प्रकृति का इंसान से यही इकलौता रिश्‍ता है। कुदरत कुछ मांगती नहीं, सिर्फ लुटाती है। उसे मनुहार की जरूरत नहीं होती। मौसम के अनुसार वह अपनी चूनर बदलती है, नए रंग भरती है। इसके लिए अलग से मनुहार की जरूरत नहीं होती।

नंदगांव और बरसाना में आज भी टेसू के फूलों से बने रंग ही होली में इस्‍तेमाल होते हैं। रंग भरनी एकादशी के साथ ही वृंदावन के ही नहीं, बल्कि समूचे ब्रज मंडल के मंदिरों में होली की शुरुआत हो जाती है। होली का डांडा वसंत पंचमी को गाड़ा जाता है। रंग भरनी एकादशी के साथ ही बिहारीजी, राधा वल्लभजी, हरिदेव रंग मंदिर सहित गोदा बिहारी में भी होली का आयोजन होता है। एकादशी के दूसरे दिन गोदा बिहारी में लट्ठमार और फूलों की होली खेली जाती है। होली वाले दिन मथुरा से 53 किमी दूर कोसी के निकट स्थित एक छोटे से गांव फालेन में होली जलाने के साथ-साथ प्रह्लाद मंदिर का एक पंडा जलती हुई होली की लपटों के बीच नंगे पांव निकलता है। पंडे के होली से सकुशल निकलने के बाद ब्रज मंडल में रंग की होली शुरू हो जाती है।

मंदिरों में होली गायन-वादन का क्रम तो बसंत पंचमी से ही प्रारंभ हो जाता है। अब रंग भरनी एकादशी के साथ मंदिरों में रंग की होली भी चल पड़ी है, जो होली तक निर्बाध गति से चलेगी। मथुरा से 22 किमी दूर बलदेव (दाऊजी) में हुरंगा होता है। हुरंगा में महिलाएं स्‍थानीय पुरुषों के पुराने कपड़ों से कोड़े बनाती हैं। होली के मौके पर इन्‍हीं कोड़ों का इस्‍तेमाल ग्‍वाल बाल को पीटने के लिए किया जाता है। दूसरे दिन बठैन गांव में हुरंगा होता है। ब्रज में होली की मस्ती दुलहेड़ी से लेकर चैत्र कृष्ण पक्ष की दशमी तक चलती रहती है। जगह-जगह चरकुला नृत्य, हल नृत्य, हुक्का नृत्य, बम्ब नृत्य आदि देखने को मिलते हैं।

ब्रज की होली में अगर बरसाने की लठमार होली का जिक्र न हो तो बात अधूरी रहेगी। राधा बरसाने की थी और कृष्‍ण नंदगांव के। यह दोनों जगहों के बीच के खट्टे-मीठे रिश्‍ते को जताता है। फागुन की शुक्‍ल अष्‍टमी के एक दिन पहले नंदगांव से पुरोहित बरसाने की गोपियों को होली खेलने का न्‍योता देने आता है। अगले दिन ग्‍वालों की टोली होली खेलने बरसाना पहुंचते हैं। सबसे पहले उनकी खातिरदारी पीली पोखर में होती है। वहां से ये ब्रह्मगिरि पर्वत के शिखर पर बने मंदिर पहुंचते हैं। इस दिन लट्ठ महिलाओं के हाथ में रहता है और वे नंदगांव के गोप को मंदिर पर झंडा फहराने से रोकती हैं। ग्‍वालों को महिलाओं के लट्ठ से बचना होता है। उन्‍हें किसी भी तरह का प्रतिरोध करने की इजाजत नहीं होती। उन्हें सिर्फ गुलाल छिड़क कर इन महिलाओं को चकमा देना होता है। अगर वे पकड़े जाते हैं तो उनकी जमकर पिटाई होती है या उन्‍हें औरतों के कपड़े पहनकर पूरे बनाव श्रृंगार के साथ नाचना होता है। कहते हैं कृष्ण को बरसाना की गोपियों ने इसी तरह से नचाया था। पिटकर भी हुरियारे रसिया गाते हुए ‘रंगीली गली’ से गुजरते हैं।

होली दिल के गुबार को बाहर निकालकर अच्‍छी, खुशियों भरी यादों को मन में भरने का पर्व भी है। राधा से अटूट प्रेम के बावजूद अपने मकसद की खातिर कृष्‍ण ने उन्‍हें छोड़कर मथुरा की राह पकड़ी। आधुनिक संदर्भों में इसे ढेर सारे उपमाओं के साथ अलंकृत किया जा सकता है। लेकिन त्‍याग और प्रेम के बीच की इस नाजुक कड़ी को हमारे समाज ने समझा और राधा को कृष्‍ण से श्रेष्‍ठ दर्जा दिया। प्रेम कुछ पाने का नाम है ही नहीं। यह तो अपना सब-कुछ लुटाने की भावना है। जो प्रेम में फना हो जाए, उसे दुनिया के सभी धर्मों में ईश्‍वर के सबसे अजीज माना गया है। लट्ठमार होली को कृष्‍ण के विछोह से पैदा हुए गुस्‍से को बाहर निकालने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है। अगर ये गुबार मन से न निकले तो प्रेम के नए अंकुर पैदा भी कैसे होंगे? राधा किससे शिकायत करें। किससे कृष्‍ण की ढिठाई बताएं। श्‍याम ने तो लूट लिया। कौन सुनेगा। फागुन में सभी बौराए हैं। जो हुआ, उसका पता पहले से था। होली अधीरता का पर्व है। यहां धीरता बेइमानी घोषित है। किस-किस की कहें।