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बुधवार, 3 जुलाई 2013

बरबाद गुलिस्‍तां के सजग प्रहरी

इस साल पानी खूब बरस रहा है। मेरे शहर भोपाल में तो अभी तक 50 सेंटीमीटर से ज्‍यादा पानी बरस चुका है। लोग खुश हैं। उधर, उत्‍तराखंड में अचानक आई बाढ़ ने काफी तबाही मचाई। सैकड़ों मौतें हुईं। अब तक हायतौबा मची हुई है। हालांकि यह बाढ़ अचानक नहीं आई। उत्‍तराखंड विकास कर रहा है और इस छोटे से राज्‍य के नीति-निर्धारकों का मानना है कि विकास कुदरती चुनौतियों से पार पाकर ही हो सकता है। यानी कुदरत की संरचनाओं से छेड़छाड़। आधुनिक विकास के दो प्रमुख मानक हैं, सड़क और बिजली। पहाड़ों के बीच से सड़क निकालनी है तो चट्टानों को बारूद से तोड़ना होगा। जंगल साफ करने होंगे। नदियों से बिजली बनानी है तो बड़े बांध चाहिए। इसमें भी जंगल डूबेंगे, सो उनका सफाया करना होगा। जिस उत्‍तरकाशी के दुर्गम इलाकों में बाढ़ आई, वहां कुल 182 प्रोजेक्‍ट्स चलाए जा रहे हैं, जिनमें सड़क की 91 और पनबिजली के 9 प्रोजेक्‍ट्स शामिल हैं। सड़के बन रही हैं, ताकि बाहर से सैलानी आसानी से पहुंच सकें और सरकार की आय बढ़े। जाहिर है सैलानियों को ठहराने के लिए होटल और उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए बाजार भी चाहिए। सो होटेल और रिसॉर्ट्स भी बन रहे होंगे। बेज़ा कब्‍जे भी। और कई जगहों पर अवैध निर्माण भी। सैलानियों की गाड़ियों से रोज़ाना हज़ारों टन कार्बन डायऑक्‍साइड निकलता है, जिसे सोखने के लिए जंगल चाहिए। लेकिन उत्‍तराखंड सरकार तो जंगलों का सफाया कर रही है। कभी उत्‍तराखंड का 78 फीसदी हिस्‍सा जंगलों से भरा था। अब यह आंकड़ा 54 फीसदी रह गया है।

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उत्‍तराखंड में तबाही की वजह इस नक्‍शे में नजर आते प्रोजेक्‍ट्स की संख्‍या को देखकर जानी जा सकती है। 

विज्ञान अभी तक कुदरत को चुनौती नहीं दे पाया है। दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अमेरिका भी बवंडरों से जूझ रहा है। इसके बावजूद हम कुदरत के साथ तालमेल बिठाकर जीना नहीं सीख सके। शायद हम ऐसा करना भी नहीं चाहते। नीचे इस नक्‍शे को गौर से देखिए। पता चलेगा कि किस तरह उत्‍तराखंड में विकास के नाम पर कुदरती संतुलन बिगाड़ा जा रहा है। फिर सोचिए कि आपके शहर, गांव, कस्‍बे में क्‍या हो रहा है ? कहीं यही हाल आपके आसपास भी तो नहीं है ?


अब देखिए कि जब जरूरत जान से बढ़कर हो जाती है तो लोग इसके लिए किस तरह के जतन करते हैं। बीते रविवार को एक आयोजन में विख्‍यात गांधीवादी, चिंतक और लेखक अनुपम मिश्र को सुनने का मौका मिला। उन्‍होंने राजस्‍थान में समाज की जल संरक्षण परंपराओं और तकनीक पर बेहद सुंदर प्रजंटेशन दिया। अनुपम जी इतना मीठा बोलते हैं कि मन करता है, अपनी पूरी जिंदगी उनके सान्‍निध्‍य में रहूं। मिठास भरी उनकी बातें दिल की गहराइयों में उतर जाती हैं। उनके इस प्रजंटेशन को मैं उन स्‍लाइड्स में से ली गई तस्‍वीरों के जरिए आप तक पहुंचाने की कोशिश करता हूं।



भारत का एक जिला ऐसा भी है, जहां सालभर में सिर्फ 16 सेंटीमीटर या कभी-कभी तो इससे भी कम पानी बरसता है। यह है थार मरुस्‍थल का जैसलमेर। पानी कम है, इसलिए कभी-कभार बरसने वाले बादलों की हर बूंद को सहेजने के इंतजाम हैं। ये इंतजाम सदियों पुराने हैं। इसे बताने के लिए किसी आयोग, प्राधिकरण या कोई और संवैधानिक-वैधानिक संस्‍था ने फरमान जारी नहीं किया और न ही कोई गाइडलाइन जारी हुई। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हर बूंद की अहमियत बताई गई, ताकि जिंदा रहा जा सके। रेगिस्‍तान में अमूमन बादल आते हैं और उड़ जाते हैं। कुछ आकर ठहरते भी हैं। और कुछ बरस जाते हैं। बादल का हर टुकड़ा एक उम्‍मीद लेकर आता है। इसीलिए स्‍थानीय समाज ने इनके नाम भी रखे हैं। कौन सा बादल पानी गिराने का सिर्फ वादा करता है और चला जाता है, एक बादल चुपचाप आकर पानी गिरा देता है।

ये 60 फुट ऊंचा चबूतरेनुमा ढांचा 2000 साल पुराना है। करीब 40 फुट गहरे टैंक में एक लाख लीटर पानी स्‍टोर करने वाले इस ढांचे को बनाने के लिए किसी जलग्रहण मिशन की जरूरत नहीं पड़ी। ये उस प्‍यासे समाज ने अपने आप बनाया, जिसके लिए पानी की हर बूंद बेशकीमती है। जरा इसकी साफ-सफाई देखिए और अपने यहां के सार्वजनिक नलों और बावड़ियों को देखें। नीचे जो छेद नजर आ रहे हैं, उन्‍हीं में से बरसात की हर बूंद रिसकर टंकी में पहुंचती है। पानी भी ऐसा कि डिस्‍टिल वॉटर भी फीका पड़ जाए। जरा सोचिए ऐसी किसी संरचना को हमारे इसी समाज ने 2000 साल पहले बिना किसी सरकारी ढांचे, पीडब्‍लूडी या पीएचई के इंजीनियरों की मदद के बगैर कैसे बनाया होगा। इसकी सफाई, इसका ढाल एकदम वैज्ञानिक यानी फूल प्रूफ है। बाल्‍टी से छलककर जो पानी गिरता है, वह वहां ऊपर एक जगह इकट्ठा होकर प्‍यासे पंक्षियों के पीने के काम आता है। यानी हमारे इसी समाज ने पशु पक्षियों की भी फिक्र की थी। आज यह अहसास कहां है ?



दूसरे ढांचे में सीढ़ियों की डिजाइन अलग है। देखिए पहली सीढ़ी में एक हौदी बनी है। पास में खेत हैं। यानी किसान पहले अपने हाथ पैरों की मिट्टी धोएगा, फिर इसी पानी से खेती के औजार धोने के बाद ऊपर पानी भरने जाएगा। 


यहां देखिए। गांव के मकानों की छतों का पानी किस तरह टंकी में इकट्ठा हो रहा है। बड़े महानगरों में करोड़ों के मकान बनाने वाले बिल्‍डरों के लिए यह एक सबक है, जो अभी भी जल संरक्षण के उपायों से कन्‍नी काटते हैं। पर यहां कोई बाय लॉज नहीं। समाज ने स्‍वेच्‍छा से इन ढांचों को बनाया है। 



यह है जयगढ़ का किला। यहां 400 साल से रेन वॉटर हार्वेस्‍टिंग का काम चल रहा है। यह इस तकनीक का उपयोग करने वाला दुनिया का सबसे पुराना ढांचा है। यहां सालभर में 3 करोड़ लीटर पानी इकट्ठा होता है। 15 किलोमीटर लंबी नहरों से पानी इस टंकी में जाता है। एकदम साफ पानी। अगर मिनरल वॉटर की एक बोतल थोक के भाव 8-10 रुपए की आए तो जरा गिनती लगाइए कि हर साल कितनी कीमत का साफ पानी यह ढांचा प्‍यासी आबादी को दे रहा है। यह अपने संसाधनों को सहेजने की पारंपरिक जुगत है। हमारे समाज ने यह बखूबी सीखा है। इसे कहते हैं जल दर्शन। यह दर्शन राजा से लेकर रंक तक एक ही है। राजा और प्रजा एक सा पानी रोकें और वही पानी पीएं। लेकिन सरकारों ने इसे नहीं अपनाया। वे बड़े शहरों में 60-70 किलोमीटर दूर से पानी लाने की योजना बनाते हैं। करोड़ों खर्च करके। इसलिए, क्‍योंकि अपने आसपास पानी के जो ढांचे समाज ने बनाए थे, उन्‍हें तो उसी ने जानबूझकर तबाह किया है और वह भी शहरीकरण और विकास के नाम पर। 1975 में जब जयपुर घराना भारत सरकार के साथ नहीं आया तो उसने गुप्‍त खजाने की तलाशी के लिए किले की टंकी में भरा 3 करोड़ लीटर पानी उलीच दिया। तब शहर में अभूतपूर्व जलसंकट छा गया था। वरना यह टंकी आज तक किसी को प्‍यासा नहीं रखती।


पानी का स्‍टोरेज नीचे है। यहां से एक व्‍यक्‍ति दो कनस्‍तरों में पानी भरकर ऊपर लाता दिख रहा है।




यह है 800 साल पहले बसा जैसलमेर शहर। सिल्‍क रूट से यूरोप को जोड़ता एक संपन्‍न शहर। यहां नगर पालिका बाद में आई। उससे पहले ही लोगों ने छतों में से पानी सहेजने का काम पूरा कर लिया था।



ऊपर है जैसलमेर में राजा का बनाया तालाब। यह पीपीपी मोड में बनाया गया। यानी राजा का हाथ होने के साथ ही इसमें बढ़ई, लुहार, चर्मकार, दस्‍तकार सबने मिलकर सहयोग दिया। बीचों-बीच बना दरवाजा एक गणिका ने बनवाया था, जिसका नाम था टीलो। जैसे पानी का कोई रंग नहीं होता, ठीक वैसे ही पानी पीने वालों की भी कोई जात, पंथ, पेशा नहीं होता। प्‍यास की कोई जात नहीं।



यह है अमर सागर। यह अमर है। कभी न मरने वाला। यह पांच बावड़ियों वाला तालाब है। यह कभी इसलिए नहीं सूखता, क्‍योंकि बावड़ियों का पानी रिसकर फिर इस तालाब को भर देता है। यह है हम भारतीयों की इंजीनियरिंग। किसी ने इसकी विधिवत ट्रेनिंग नहीं ली, पर 500-800 साल पहले ही इन ढांचों को बना लिया।



यह है जसेरी तालाब। यह सात गांवों की सेवा के लिए बनाया गया था। जसेरी एक 10 साल की बच्‍ची थी। प्‍यास के मारे उसकी जान चली गई तो पिता ने एक ऐसा तालाब बनाने का फैसला किया, जो कभी न सूखे। कहते हैं जसेरी का ‘जस’ यानी यश कभी खत्‍म नहीं होता। यह तालाब आज तक नहीं सूखा। रेगिस्‍तान में पानी का यह विशाल तालाब ख्‍वाब सा लगता है। जसेरी तालाब इसलिए नहीं सूखता, क्‍योंकि इसका पानी जमीन में रिसता नहीं। सात लाख साल पहले थार रेगिस्‍तान को कुदरत से मिला जिप्‍सम आज वरदान बन गया है। यही जिप्‍सम पानी को सीप होने से रोकता है। सोचिए, जिप्‍सम की खोज से बहुत पहले जैसलमेर के इंसानी समाज ने इसकी उपयोगिता कैसे पहचानी होगी ? क्‍या उन्‍होंने इस पर कोई रिसर्च की ? किसी कंसल्‍टेंट को बुलाकर पूछा ? रेगिस्‍तान के सबसे गंभीर अकाल में भी किसी ने जसेरी के जस को सूखते नहीं देखा।



देखिए तालाब के वॉटर लेवल को नापने के लिए 500 साल पहले समाज ने क्‍या उपाय किया ? तीन माह, छह माह और फिर सालभर के पानी के लिए अलग अलग लेवल। सुंदर सीढ़ीनुमा संरचनाएं। कितना बारीक काम। किसी ने सिविल इंजीनियरिंग नहीं पढ़ी, पर कितना परिपक्‍व काम किया है। अब ये सफाई दिखाई नहीं देती। आज के इंजीनियर पेशेवर तरीके से काम करते हैं, पूरी तरह डूबकर नहीं। वे समाज की जरूरत को नहीं समझते, क्‍योंकि उनके और समाज के बीच कोई संवाद नहीं। वे मास कम्‍युनिकेशन के मूलभूत उपकरणों से लैस नहीं हैं। वे समाज के भीतर नहीं झांकते। इसीलिए उनकी बनाई संरचनाएं बेजान सी लगती हैं।



और ये हैं रेगिस्‍तान में जल संरचनाओं के असल शिल्‍पी। ये पढ़े लिखे नहीं, पर विनम्र हैं। इन्‍हें रेगिस्‍तान में पानी बचाना आता है। हम तो अपने शहर क्‍या, घर में ही पानी नहीं बचा पाते। तो सोचिए, कितना समृद्ध है हमारा समाज। फिर भी हमारी सरकार और योजना आयोग इस बहुसंख्‍यक समाज को मूर्ख समझता है। लेकिन उत्‍तराखंड जैसी आपदाओं के समय और सूखे की मार पड़ते ही मुंह चुराने लगता है।