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बुधवार, 5 सितंबर 2012

बुंदेलों-हरबोलों से सुनी कहानी पुरानी थी। जो अब देखी, मान-मर्यादा की कुरबानी थी।

अगस्‍त की 30 तारीख। मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पन्‍ना में 89 के मुकाबले 83 सेंटीमीटर बारिश हो चुकी है। यानी सिर्फ 6 सेंटीमीटर कम। इस हिसाब से खेतों में फसल दिखनी चाहिए, किसानों को खेत पर होना चाहिए। लेकिन सतना से पन्‍ना के बीच 70 किलोमीटर के रास्‍ते में इक्‍का-दुक्‍का खेतों में ही फसल नजर आएगी। सिंचाई के लिए नहरें बहुत कम हैं। बुंदेलखंड पैकेज का 70 फीसदी पैसा भ्रष्‍टाचार की भेंट चढ़ चुका है। बारिश का पानी बह रहा है, क्‍योंकि उसे रोकने के कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। अभी भी ट्यूबवेल और कुएं से ही सिंचाई होती है। ये ट्यूबवेल और कुएं फरवरी से सूखने लगेंगे। किसानों को फिक्र इसी बात की है कि तब पानी कहां से आएगा। इसी वजह से वे खरीफ के सीजन को दांव पर लगाने को तैयार हैं। यानी घर बैठे बारिश का मजा लो या फिर मजदूरी के लिए कहीं निकल जाओ।


बरसात के सीजन में भी बुंदेलखंड के ज्‍यादातर खेत ऐसे वीरान मिलेंगे। 
सात साल तक भीषण सूखा झेल चुके बुंदेलखंड में यह सीजन परंपरागत रूप से तिली (तिल), ज्‍वार, बाजरा, तुअर, मूंग का है। इन फसलों के लिए यह अंचल कभी विख्‍यात भी रहा है। पर बहुत कम किसान ही इन्‍हें उगाते हैं, क्‍योंकि बाजार में उन्‍हें कम कीमत मिलती है। मध्‍यप्रदेश सरकार ने इस सूखे अंचल में भी गेहूं को बढ़ावा दिया है, सो सारे किसान इसी एक फसल की फिक्र में खरीफ के सीजन को खाली छोड़ देते हैं। सीधे तौर पर कहें तो यह ठीक-ठाक बारिश के बावजूद सूखे जैसी स्‍थिति है।
कैसे खत्‍म होगा सूखा ?
समूचे बुंदेलखंड (मध्‍यप्रदेश के 6 और यूपी के 7 जिले) के लिए यह एक ज्‍वलंत सवाल है। कभी 15 से 20 फीट खोदने पर पानी उगलने वाले इस अंचल में भूमिगत जल स्‍तर 200 फीट से भी नीचे चला गया है। अच्‍छी बारिश से कुएं और हैंडपंप कुछ हरे जरूर हो जाते हैं, लेकिन फरवरी तक ही। उसके बाद उनमें पानी नहीं रहता। पन्‍ना और छतरपुर कभी बड़े तालाबों के लिए मशहूर थे। इन प्राकृतिक संरचनाओं में अगर लगातार पानी आता रहे और पर्याप्‍त संख्‍या में नहरें व स्‍टॉप डैम बनाए जाएं तो खेती के लिए सिंचाई की कोई समस्‍या नहीं होगी। लेकिन पन्‍ना में कल्‍याणपुर जैसे सैंकड़ों गांव कुछ दूसरी कहानी कहते हैं। सुनारा पंचायत के अधीन कल्‍याणपुर गांव के कर्ण सिंह यादव पांच एकड़ खेत होने पर भी चार लोगों के परिवार का पेट नहीं भर पाते। खेत से लगी उनकी झोंपड़ी से लगा है बड़ा सा तालाब, जो सूखा है। तालाब के नजदीक एक नाला है, लेकिन उसका पानी तालाब तक पहुंचाने का कोई इंतजाम नहीं है। अगर ऐसा हो जाए तो आसपास के 200 हेक्‍टेयर जमीन की सालभर सिंचाई हो सकेगी। इसकी जगह खेतों में कुएं खोदे गए हैं। चार खेत के बीच एक कुंआ। गेहूं की एक फसल को छह-छह घंटे के लिए दो बार पानी की जरूरत होती है। इस तरह चार खेतों को आठ बार पानी देना एक दुश्‍वारी भरा काम है। बकौल कर्ण सिंह, ‘कुंए इस कदर सूख जाते हैं कि बमुश्‍किल तीन खेतों को ही सींचा जा सकता है।’ पूरे जिले में तीन-चार एकड़ काश्‍त वाले छोटे किसानों का यही हाल है। सुनारा पंचायत में ही कल्‍याणपुर जैसे चार टोले हैं, जिसमें 400 से 500 परिवार बसते हैं। सिंचाई तो दूर, इन्‍हें पीने के पानी के लिए भी डेढ़ किलोमीटर तक चलना पड़ता है।
सूखे का असर यह भी :
साहूकारों के कर्ज और कुछ बैंक लोन के चक्‍कर में लोगों को पशुधन बेचना पड़ रहा है। खेती के लिए अच्‍छी नस्‍ल के बैल नहीं बचे, सो किराए के ट्रैक्‍टर से काम चलाना पड़ रहा है। एक ट्रैक्‍टर एक बार में 500 रुपए के खर्च पर अधिकतम पांच एकड़ ही जोत पाता है। खाद-बीज व कीटनाशकों के आम खर्च को छोड़ दें तो सिंचाई के लिए पंप सेट का किराया (400 रु.), डीजल का खर्च (छह घंटे के लिए) आदि को मिलाकर पूरा खर्च 1200 से 1400 रु. तक पड़ जाता है। यह ऊपरी खर्च है, क्‍योंकि जमीनी इंतजाम नाकाफी हैं। ऐसे में प्रति एकड़ फसल उत्‍पादन की लागत ही 2200 रुपए तक आती है। मध्‍यप्रदेश सरकार गेहूं पर प्रति क्‍विंटल 1385 रुपए का समर्थन मूल्‍य देती है (बोनस के साथ)। बुंदेलखंड के छोटे और सीमांत किसान एक एकड़ में 7-8 क्‍विंटल गेहूं ही उगा पाते हैं। इस तरह किसान की जेब में सालाना 40 हजार रुपए ही आ पाते हैं। इसी में उसे कर्ज भी चुकाना है और परिवार का पेट भी पालना है। सालभर में और कोई अनाज पैदा नहीं होगा, क्‍योंकि सिंचाई के लिए पानी नहीं है। नतीजतन घर में जब फाके पड़ते हैं तो किसान अपने परिवार के साथ मजदूरी पर निकल जाता है। पूरे बुंदेलखंड की यही कहानी है। इससे भी बुरी स्‍थिति उन किसानों की होती है, जिनका गेहूं बिचौलिए 700 से 900 रुपए प्रति क्‍विंटल के भाव पर खरीदते हैं। बहुतेरे किसानों के पास फसल के भंडारण और उसे मंडी तक ले जाने का इंतजाम भी नहीं होता और न ही इसके लिए पैसे होते हैं। लिहाजा वे बिचौलियों को बहुत सस्‍ते में आनाज बेच देते हैं।


ऐसे होते हैं पान के बरेजे। यह नजारा छतरपुर के महाराजपुर का है। देख सकते हैं बरसात की जरा सी धूप में ही पत्‍ते कुम्‍हला गए। 
सूख गए पान के बरेजे
पन्‍ना से 70 किलोमीटर दूर है छतरपुर। खजुराहो के बाद छतरपुर की ख्‍याति पान की फसल से है। यहां पीपट और महाराजपुर जैसे इलाकों में पान की फसल भरपूर हुआ करती थी। लेकिन जलवायु परिवर्तन और तापमान में कमी का असर यह है कि पान के बरेजे (समझ नहीं आ रहा हो तो देखें तस्‍वीर) लगातार सूख रहे हैं। पान की खेती तकनीकी रूप से बेहद जटिल है। हर तीन माह में फसल होती है और एक एकड़ में पान की फसल लेने के लिए एक लाख रुपए तक खर्च करना पड़ता है। इसके लिए ढाल वाली जमीन चाहिए। पीपट में पहाड़ की ढाल पर पान के कई खेत दिख जाएंगे। दूर से देखने पर बांस के ठूंठ नजर आते हैं। खेत की घेराबंदी की जाती है, ताकि कोई जानवर इसमें घुस न सके। बांस के पतले सरकंडों से बेलों को ऊपर चढ़ाया जाता है। धूप में झुलसने से बचाने के लिए ऊपर घास-फूस का छप्‍पर बनाते हैं। नीचे जमीन पर पानी रुकना नहीं चाहिए, इसलिए ढाल का खास ख्‍याल रखा जाता है। जैविक खाद के साथ रासायनिक कीटनाशक भी दिए जाते हैं। यह पूरा कारोबार बरसों से चौरसिया समाज के हाथ में रहा है। बंगला, देशी और मीठा पत्‍ता जैसी किस्‍में यहां पहले खूब पैदा हुआ करती थीं। आधे यूपी और दिल्‍ली को ये पान भेजे जाते हैं।
लेकिन बीते पांच-छह साल में छतरपुर के पान सूखने लगे हैं। मार्च में बेलों पर नए पत्‍ते आने के बाद अप्रैल में ही गर्मी अपने शबाब पर आने लगती है। तापमान 35 डिग्री को पार करने लगा है। जबकि इस सीजन में पारे को 32 डिग्री से ऊपर नहीं जाना चाहिए। किसान गर्मी से बचने के जतन करते हैं, लेकिन अगले ही माह सूरज आग उगलने लगता है। सबसे ज्‍यादा नुकसान लू से होता है। पान की कोमल पत्‍तियां झुलस जाती हैं, बेलें सूख जाती है। अगर गर्मी के सीजन में फसल न लें तो बरसात में नए सिरे से फसल तैयार करना बेहद चुनौतीपूर्ण काम है। जीरो से शुरू करना पड़ता है। अगर बारिश अच्‍छी हुई तो अक्‍टूबर तक पूरी फसल मिल जाती है। इसके बाद नवंबर से सर्दी का प्रकोप शुरू होता है। जनवरी तक यहां पारा शून्‍य को छूने लगता है। सर्दी में न्‍यूनतम तापमान चार डिग्री से नीचे नहीं गिरना चाहिए, वरना पाले का डर रहता है। हालांकि, साल दर साल छतरपुर के किसान दोनों सीजन में नुकसान झेलने पर मजबूर हैं। किसी साल फसल अच्‍छी हो गई तो बिचौलियों के हाथों औने-पौने दाम पर लुटने की चिंता रहती है। अच्‍छे दाम मिलें तो बंगला पान का एक पत्‍ता औसतन 40 पैसे में बिकता है। यह लागत वसूलने वाली कीमत है। इससे ऊपर कीमत जितनी बोली गई, उतना मुनाफा। चौरसिया समाज न तो अपने मुनाफे को लेकर एकजुट है और न ही मंडियों में सीधे अपना माल पहुंचाने में। लगातार नुकसान के कारण बदहाल हो चुके चौरसिया किसान एक-दूसरे की तरक्‍की से जलने लगे हैं। अगर किसी ने खाद, पानी और छांव का बेहतर इंतजाम कर लिया, उसकी फसल अच्‍छी हो गई तो उसके खेत में आग लगना तय है। हर साल मारे जलन के लिए पान के दर्जनभर खेत फूंक दिए जाते हैं और इसी के साथ जल जाते हैं एक पूरे परिवार के अरमान, भविष्‍य की हजार संभावनाएं। नतीजतन, नई पीढ़ी के दबाव में इस समाज के लोग पान की खेती छोड़कर या तो दूसरी खेती अपना रहे या फिर पलायन करने पर मजबूर हो रहे हैं। 
(क्रमश : आगे की कथा पार्ट 2 में पढ़ें)