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शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

बिहारी बदले तो देश बदले

भाई साहब, आप गलत देश में आ गए। बिहार कभी नहीं बदलेगा। मुगलसराय से पटना के रास्‍ते श्रमजीवी एक्‍सप्रेस में सामने बैठे मुसाफिर की इस बात को सुनकर सहसा यकीन नहीं हुआ। लेकिन अगले तीन घंटे में आंखों से जो देखा, उससे लगा कि काम-धंधे की तलाश में बिहार छोड़ने वालों को भी राज्‍य का माहौल रास नहीं आ रहा है। सात घंटे की देरी से चल रही ट्रेन अभी बक्‍सर से आगे बढ़ी ही थी कि एक हट्टा-कट्टा लड़का बाकायदा हथौड़ी लेकर स्‍लीपर बोगी के ज्‍वॉइंट यानी दो डिब्‍बों के जोड़ पर पहुंचा। वहां की प्‍लेट निकाली और हथौड़े से चोट करने लगा। थोड़ी देर में जोर की आवाज आई और ट्रेन का वैक्‍यूम खुल गया। उस लड़के के साथ करीब आठ नौजवान और थे। ट्रेन रुकते ही वे उतरे और हो-हल्‍ला करते हुए पास ही नजर आ रहे अपने गांव में घुस गए। मेरी हैरतभरी निगाहों को पढ़कर एक बुजुर्ग हंस पड़े। बोले, ये बिहार है साब। यहां राजधानी एक्‍सप्रेस को भी इसी तरह रोका जाता है। अगर गाड़ी नहीं रोकी गई तो बाहर से पत्‍थर फेंके जाएंगे। जब फोर्स चलती है तो ऐसा नहीं होता। आगे पटना के बाद इस गाड़ी का राजगीर तक कोई माई-बाप नहीं होगा। 

गुजरते साल के आखिरी पलों में इस सच्‍चाई ने मुझे गौतम बुद्ध की याद दिला दी। शाक्‍यमुनि ने इसी बिहार की धरती पर लगातार 49 दिन तक घोर तपस्‍या के बाद सत्‍य की खोज की थी। ऐसा सत्‍य जिसे जान लेने वाला सारे दुखों से मुक्‍त हो जाता है। मैं भी लंबी यात्रा से उकताकर उस ‘सत्‍य’ को जाने लेने के बाद मंजिल तक पहुंचकर दुखों से मुक्‍ति पाना चाहता था। मैंने बगल में बैठे एक शख्‍स को यह बात बताई तो बोले, ‘मेरा दुख आपसे कहीं ज्‍यादा है। पिछले 25 घंटे से इसी ट्रेन में बैठा हूं। पटना के बाद तीन घंटे का सफर और करना है।’ मुझे मालूम पड़ गया कि हम सभी उस एक सार्वभौमिक सच के सहारे ट्रेन में बैठे हैं कि वह कभी तो मंजिल तक पहुंचेगी और हमें हर 30 मिनट पर चेन पुलिंग से लगातार नारकीय होती जा रही यात्रा से निजात मिल सकेगी। बिहार में नितीश के सुशासन और विकास की बात छिड़ी तो एक ने बेरुखी से कहा, साब। बिहार सुधरेगा तभी, जब बिहारी सुधर जाएगा। बिहार के लड़के आईआईटी से लेकर यूपीएससी तक में छाए रहते हैं। यानी इंटेलीजेंस की कोई कमी नहीं है। कमी है तो मौकों की। उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र बख्‍तियारपुर के पास बन रहे रेल कोच फैक्‍ट्री की मिसाल पेश की। ऐसे कई उद्योग नितीश के आने के बाद लग रहे हैं। रोजगार के मौके बढ़ेंगे, पर ये सब तभी होगा जब ये तमाम फैक्‍ट्रियां पूरी तरह से लग चुकी होंगी। लंबे समय तक अव्‍यवस्‍था और लूट-खसोट के आलम में रहने के कारण बिहार की श्रम शक्‍ति का एक बड़ा हिस्‍सा बाहरी राज्‍यों में पलायन कर गया है। अभी भी रोज सैंकड़ों की संख्‍या में लोग बाहर जा रहे हैं। कोई रिक्‍शा चलाता है तो कोई सड़क पर खोमचा लगाकर रोजी-रोटी कमा रहा है। ये लोग अपने राज्‍य में परिजनों को पैसा भी भेजते हैं, लेकिन इससे राज्‍य का विकास नहीं हो पा रहा है। अलबत्‍ता लोगों की कुछ बुनियादी जरूरतें जरूर पूरी हो रही हैं। ऐसे में इस अप्रवास को केरल के मुकाबले रखकर नहीं देखा जा सकता, जहां के लोग सदियों से खाड़ी और हिंद महासागरीय देशों में जाते रहे हैं। पलायन, प्रवास और अप्रवास तीनों से बिहार के जीडीपी पर असर तभी पड़ेगा, जब राज्‍य में शिक्षा और कौशल का विकास हो। अभी इस मामले में नितीश सरकार का प्रदर्शन कमजोर ही रहा है। विकास की आग इंसान के पेट से नहीं जुड़ पाई है। यह उसके कपड़ों, हाथ में रखे तेज आवाज वाले मोबाइल, पैरों में लोकल ब्रांड के जूते और सड़कों पर दौड़ती चमचमाती गाड़ियों में नजर आती है।

बिहार की ऐतिहासिक धरोहर, पटना का किला
अब बात करें सुशासन की। अमूमन यही कहा जाता है कि नितीश के आने के बाद लोगों में कानून के प्रति भरोसा कायम हुआ है। पर क्‍या सरकार का भरोसा पुलिस की कार्यक्षमता पर मजबूत हुआ है ? इस सवाल का जवाब हमें 31 दिसंबर और एक जनवरी की रात देखने को मिला। पटना शहर के लगभग सारे बाजार शाम 6 बजे बंद हो गए। मुझे बड़ी हैरत हुई। मीडिया के साथियों से पूछा तो पता चला कि ऐसा हर साल होता है, ताकि हुड़दंगी या तो घर में कैद रहें या फिर कहीं किसी ठीहे पर बैठकर जश्‍न मनाएं पर सड़कों पर न उतरें। हालांकि, कुछ दुकानें खुली भी थीं। बताया गया कि ये दुकानें माफियाओं के हैं। इन्‍हें निशाना बनाने की हिम्‍मत किसी में नहीं। दिल्‍ली रेप कांड का असर पटना शहर पर भी पड़ा। सुबह से लेकर दोपहर तक जहां महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने और दुष्‍कर्मियों को फांसी पर चढ़ा देने की मांग को लेकर जुलूस व रैलियां निकलती हैं तो अंधेरा छाते ही आधी आबादी घरों में दुबक जाती है। हिंदुस्‍तान में काम करने वाले मेरे एक पत्रकार साथी ने बताया कि पटना शहर असल में एक खुला जंगल है। यहां बफर जोन और कोर एरिया भी है। बफर जोन में महिलाएं कम ही आती हैं, क्‍योंकि वहां ‘शिकारी’ घूमते हैं। जो पसंद आ गई, उसे सशरीर उठा लेने में वे थोड़ा भी नहीं हिचकते। जंगल के कोर एरिया यानी जहां पुलिस का पहरा रहता है, वहां यदा-कदा महिलाएं देर शाम तक शरमाती, सकुचाती घूमती तो हैं लेकिन एक डर के साथ। राज्‍य में औसतन हर दिन रेप की तीन घटनाएं हो रही हैं। ये वैसे मामले हैं जिसकी प्राथमिकी थाने में दर्ज होती है। ऐसे मामलों की तादाद दर्ज प्राथमिकी से कहीं ज्यादा होती है जिसे लोकलाज और दूसरे वजहों से लोग थाने तक नहीं ले जाते। राज्य में दस महीने में रेप के 823 मामले पुलिस ने दर्ज किये। ये जनवरी से अक्टूबर के बीच दर्ज आंकड़े हैं। 

बुद्ध के देश में 

हमारे यहां राजनीति का स्‍वरूप समावेशी है। यह अपराध और अपराधियों को अस्‍पृश्‍य नहीं मानती। इसकी नजर में शुचिता का मतलब यही है कि जो भी अपने बलबूते पर सत्‍ता पाने में सक्षम हो, उसे जोड़ लो। नितीश की जनता दल यूनाइटेड भी इस विचारधारा से अछूती नहीं है। मोकामा के एमएलए और छोटे सरकार के नाम से कुख्‍यात बाहुबली अनंत सिंह इसकी मिसाल हैं। कभी पटना की एक गली में छोटे सरकार की बैठक लगा करती थी। शहर के तमाम दुकानदार वहां आकर चौथ अदा करते थे। अक्‍टूबर-नवंबर 2007 की एक घटना के बाद मीडिया ने भी नितीश की इस विचारधारा को सहज स्‍वीकार कर लिया कि अगर कही गलत हो रहा है, उसे देखकर भी अनदेखा करो। इसलिए, क्‍योंकि गलत करने वाले सत्‍ता के करीब हैं, उन्‍हें सत्‍ता और सरकार का समर्थन प्राप्‍त है। हुआ यूं कि रेशमा खातून नाम की एक लड़की के साथ सामूहिक दुष्‍कर्म कर उनकी हत्‍या कर दी गई। शक अनंत सिंह के सहायक मुकेश सिंह और बॉडीगार्ड पर था। रेशमा ने मौत से पहले सीएम को लिखी चिट्ठी में दोनों पर दुष्‍कर्म का आरोप लगाते हुए अपने लिए सुरक्षा मांगी थी। हत्‍या के बाद भी मीडिया का एक बड़ा तबका खामोश रहा। अनंत सिंह को सीएम का खासमखास माना जाता रहा है। लेकिन एनडीटीवी के पटना ब्‍यूरो चीफ प्रकाश सिंह अपने साथ कैमरामैन हबीब अली को लेकर सुबह अनंत सिंह के ‘दरबार’ में पहुंच गए। बाकी पत्रकारों को भी खबर मिली तो वे भी दबे पांव बाहुबली की मांद में जा पहुंचे। प्रकाश ने पहला सवाल यही दागा कि आरोपी आपका खास मुकेश सिंह है। क्‍या आपको उनके बारे में कोई जानकारी है ? इतना सुनना था कि अनंत सिंह के इशारे पर लाठी-रॉड से लैस दर्जनों लोगों ने पत्रकारों पर हमला कर दिया। प्रकाश को पहले तो डंडे से बेरहमी से पीटा गया। बाकी पत्रकार भाग गए। हबीब ने किसी तरह जान बचाकर तत्‍कालीन डीजीपी आशीष रंजन सिन्‍हा को सूचना देनी चाही तो बाहर खड़े संतरी ने कहा कि वो पहले पुलिस में रिपोर्ट लिखवाएं। इसके बाद हबीब ने सचिवालय थाने में घटना की रिपोर्ट दर्ज कराई। करीब तीन घंटे बाद प्रकाश को अपहर्ताओं के चंगुल से रिहा कराया जा सका। लेकिन इस दौरान उसके साथ कई लोगों ने अप्राकृतिक दुराचार किया। उन्‍हें गंभीर हालत में अस्‍पताल में भर्ती कराया गया, जहां लंबे इलाज के बाद वे घर आ सके। इस बीच नितीश ने मामले की सीबीआई जांच की सिफारिश जरूर की, पर कुछ नहीं हुआ। 2002 में खुद सीबीआई ने ही अनंत सिंह के खिलाफ एक मामले में सुबूतों के अभाव में खात्‍मे की रिपोर्ट बना दी थी। अनंत सिंह के रसूख का ही कमाल है कि 1994 से उसके खिलाफ कोई मामला दर्ज ही नहीं हो सका।

खौफनाक हकीकत यह है कि मीडिया में पत्रकारों पर हमले की खबर जरूर गूंजी, पर प्रकाश और हबीब के साथ हुए अनाचार का उनमें कोई जिक्र नहीं था। अनंत सिंह और उसके साथियों को बेउर जेल में बंद कर दिया गया। लेकिन इस घटना के पांच साल बाद भी प्रकाश के जेहन में अपमान के घाव नहीं भर सके हैं और न ही पत्रकार बिरादरी के दिल में बाहुबलियों की दहशत कम हुई है। यह वही छोटे सरकार हैं, जो एक मौके पर हाथ में एके-47 लहराते हुए भीड़ में घुस गए थे। दो दर्जन से ज्‍यादा हत्‍या के मुकदमों का तमगा सीने पर लगाए घूमने वाले इस शख्‍स से आंख मिलाने की हिम्‍मत पटना के बड़े पत्रकार भी नहीं कर पाते। मैंने प्रभात खबर के एक संपादक से चर्चा के दौरान अनंत सिंह का जिक्र किया तो मुस्‍कुराकर बोले, ‘वो भले ही कितना भी क्रिमिनल हो, पर कैरेक्‍टर का ढीला नहीं है।’ उनके इस बयान से यह जानकर कोई हैरत नहीं होती कि नवंबर में नितीश की महारैली के दौरान अनंत सिंह कैसे उसके इर्द-गिर्द घूमता रहा। इस हकीकत के चीथड़े अभी पटना की सड़कों पर उन होर्डिंग्‍स और बैनर में नजर आ जाते हैं, जो अनंत सिंह के रसूख को बयां करते हैं। यूं तो लालू राज में साधु यादव और उसके गुर्गों का कहर भी सड़कों पर बरपा करता था, लेकिन नितीश के आने के बाद बिहारियों की हुड़दंगी प्रवृत्‍ति पर कुछ लगाम जरूर लगी है। हालांकि, मेरे पत्रकार मित्रों में से बहुतेरे इस बात को मानते हैं कि लेट नाइट ड्यूटी से लौटते समय उन्‍हें डर लगता है। एक जनाब की गाड़ी दो बार रोकी गई। शराब पीने के पैसे मांगे गए। पहली बार तो डर के मारे दे दिए। दूसरी बार जब ना-नुकुर की तो अखबार के दफ्तर में बाकायदा एक चिट्ठी लिखकर चेताया गया कि इन जनाब का नाम ‘हिट लिस्‍ट’ में है, सो अगली बार ना कहने का मौका नहीं मिलेगा।

टूरिज्‍म का बाजार

बिहार का टूरिज्‍म मैप गंगा के दोनो ओर है। लेकिन सबसे ज्‍यादा सैलानी पटना के दक्षिण की ओर ज्‍यादा आते हैं। यहां एक सिरे से पटना, नालंदा, राजगीर और आखिर में बोध गया आते हैं, जबकि उत्‍तर में वैशाली, सोनपुर और मधुबनी बड़े डेस्‍टिनेशन हैं। लेकिन बोध गया को छोड़ दें तो दक्षिणी सिरे के सारे पर्यटन केंद्र बेहद अव्‍यवस्‍थित हैं। दुकानों में विदेशी क्‍या देशी सैलानियों के साथ जमकर लूट-खसोट होती है। बिहारी नहीं बदले, इस बात की सबसे शानदार मिसाल सप्‍तधारा नाम की जगह पर मिलती है जो राजगीर शहर में घुसते ही नजर आता है। यहां पहाड़ की तलहटी में सात गर्म जलधाराएं बहती हैं। सप्‍तर्णी गुफाओं के पीछे से निकली इन जलधाराओं के इर्द-गिर्द कई मंदिर हैं। नहाने के लिए कुंड बनाए गए हैं, लेकिन न तो पुरुषों-महिलाओं के नहाने के लिए कोई अलग इंतजाम हैं और न ही सैलानियों के कपड़े आदि सुरक्षित रखने की कोई जगह। ठंड के मौसम में आसपास के लोग बैग में कपड़े भरकर धोने के लिए वहां लाते हैं। कुंड का पानी इतना गंदला है कि वहां नहाने की सोचना भी बड़ी हिम्‍मत का काम है। हालांकि, लोग उसी कुंड में से एक बोतल पानी भरकर ले जाने की सलाह देते हैं। यह मान्‍यता के आधार पर कि उसे पीने से कई तरह की बीमारियां ठीक हो जाती हैं। चारों ओर गंदगी, कीचड़ और अधनंगे घूमते, मस्‍तियाते लोग। अब थोड़ा और आगे, यानी गिद्धकूट की तरह चलना हो तो तांगे की जरूरत होगी क्‍योकि यही इकलौती सवारी उपलब्‍ध है। पूरे राजगीर शहर में कहीं भी सैलानियों के लिए रेट लिस्‍ट नहीं लगी है, जिससे पता चले कि गिद्धकूट तक का किराया कितना है। कोई तांगे वाला 50 रुपए मांगेगा तो कोई 80 रुपए। मुझे गिद्धकूट में रोप वे की लंबी कतार में गिने-चुने विदेशी सैलानी ही नजर आए। वह भी दक्षिण एशिया और जापान, कोरिया जैसे बौद्ध देशों के। ऊंची पहाड़ी के ऊपर बने शांति स्‍तूप तक पहुंचने में प्रति व्‍यक्‍ति 60 रुपए का किराया लगता है। हिंडोले पर बैठकर आप करीब 25 मिनट की रोमांचक यात्रा के बाद जैसे ही ऊपर पहुंचेंगे, बिहार सशस्‍त्र पुलिस के जवानों की टुकड़ियां आपको नजर आएंगी। बिहारी इन्‍हें फोर्स कहते हैं। मेरे साथ के मीडियाकर्मी मित्र ने बताया कि फोर्स वाले पहले जमकर पीटते हैं। फिर जवाब-तलब किया जाता है। हमें दो नौजवान मिले, जिन्‍हें हाथ में रस्‍सी बांधकर एक जगह बिठा रखा गया था। पता चला कि इन्‍होंने महिलाओं से छेड़छाड़ की थी। मेरे मित्र ने बताया कि पिटाई के दर्द से दोहरे हो रहे नौजवानों को शाम तक छोड़ दिया जाएगा। यह फोर्स का ही असर है कि ऊपर आपको अनुशासित लोग मिलेंगे, साफ-सफाई और व्‍यवस्‍था का आलम नजर आएगा। 

सजावट के नाम पर बेचारे घोड़ी यानी धन्‍नो पर बोझ ही डाला जाता है।  यहां भी धन्‍नो ही पिस रही है। 
लेकिन वापसी में सीढ़ियों पर सजी दुकानों में रखी पानी की बोतलों को मिनरल वॉटर समझने की गलती कतई न करें। ये आसपास ही बनती हैं। इनमें भरा होता है नलों का अमानक पानी। अगर आपने खोमचे वालों से बहस करने की कोशिश की तो झगड़े की नौबत आ सकती है। जैसे ही आप रोप वे के जरिए पहाड़ी से नीचे उतरेंगे, लगेगा कि आप वापस बिहार में दाखिल हो गए हैं। वही कूड़ा-करकट, टूटे हुए बजबजाते शौचालय और अव्‍यवस्‍था। बहरहाल, ज्‍यादा गुस्‍सा न हों। ये सब आपको यूपी में भी मिलेगा। अगर नहीं मिलेगा तो बिहार और राजगीर का मशहूर तिलकूट, जिसकी मिठास यकीनन आपकी सारी कड़वाहट दूर कर देगी।