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रविवार, 20 दिसंबर 2015

हमने केवल अपराध दर्ज करना ही सीखा है, अपराध से निपटना नहीं


दिल्‍ली के निर्भया कांड को तीन साल गुजर चुके हैं। शुक्रवार को दिल्‍ली हाईकोर्ट ने इस मामले के नाबालिग अभियुक्‍त की रिहाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। इस पर पीड़िता के परिजनों ने भावुक होकर कहा कि वे हार गए और अपराध जीत गया। इंसाफ के लिए इंतजार कर रहे पीड़ित परिवार का दर्द तो समझा जा सकता है, लेकिन इस वीभत्‍स घटना के बाद भी देश की कानून व्‍यवस्‍था ने सिवाय अपराधों को दर्ज करने के, और कुछ नहीं सीखा। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्‍यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि 2010 से 2014 के बीच देशभर में नाबालिगों द्वारा किए गए अपराधों में 47 फीसदी का इजाफा हुआ है। लेकिन इस आंकड़े को अगर देश में कुल दर्ज अपराधों के अनुपात में देखें तो किशोर अपराधों की संख्‍या 1.2 प्रतिशत आती है। इस पर भी किशोरों द्वारा दोबारा अपराध करने की दर इसी अवधि में घटकर आधी से भी कम रह गई है।

इसके बावजूद हर स्‍तर पर बहस इस बात को लेकर है कि विशेषकर दुष्‍कर्म जैसे मामलों में 18 साल से कम उम्र के नाबालिगों पर भी वयस्‍कों की तरह मुकदमा चलाकर उन्‍हें सख्‍त सजा देने की पहल क्‍यों नहीं होनी चाहिए ? निर्भया कांड के बाद यह बहुत भावुक सवाल बन चुका है। लेकिन अदालतों में भावनाओं के आधार पर फैसले नहीं लिए जाते। हमारे कानून ने यह स्‍वीकार किया है कि अनुचित व्यवहार के लिये किशोर बालक स्वयं नहीं, बल्कि उनकी परिस्थितियां जिम्‍मेदार होती हैं। इसी वजह से भारत समेत अनेक देशों में किशोर अपराधों के लिए अलग कानून और न्यायालय और न्यायाधीशों की वयवस्‍था है। किशोर अपराधियों को “सुधार गृह” में रखा जाता है, जहां उनकी दूषित मानसिकता को सुधारने का प्रयत्न करने के साथ उनके साथ उनके भीतर उपज रही नकारात्मक भावनाओं को भी समाप्त करने की कोशिश की जाती है। हालांकि, बीते अक्‍टूबर में आई क्‍विंट की रिपोर्ट में निर्भया कांड के दोषी नाबालिग के वकील के हवाले से कहा गया है कि अब 20 साल के हो चुके युवक के चेहरे पर अभी भी कोई शिकन नहीं है। यह किशोर न्‍याय अधिनियम की उस मूल भावना की नाकामी है, जिसमें कहा गया है कि बाल अपराधी को दंडित नहीं, बल्‍कि उसे सुधारने की जरूरत है। हालांकि, बीते तीन साल में उसे अलग कक्ष में रखा गया। उसके लिए एक शिक्षक का भी इंतजाम था, लेकिन कहीं न कहीं परिवार और समाज से दूरी ने उसके मन को कठोर ही बनाए रखा।

भारत की 40 फीसदी आबादी 18 साल से कम उम्र की है। किशोर न्‍याय अधिनियम को 2000 में लागू ही इसलिए किया गया था कि किशोर अपराधियों को बाल अधिकारों के ढांचे में ही पुनर्वासित किया जा सके। 2006 में आए संशोधित कानून और उसके अगले साल समेकित बाल संरक्षण योजना में भी बाल अधिकारों को ही मूल में रखा गया है। ऐसा इसलिए, क्‍योंकि वैज्ञानिक प्रमाणों के अनुसार किशोर अवस्‍था में आवेगों को नियंत्रित कर पाना और अपने हम उम्र साथियों के दबाव को झेल पाना अमूमन बहुत कठिन होता है। फिर भी चूंकि उम्र के इस दौर में दिमाग का विकास जारी रहता है, इसलिए अपराध की ओर उन्‍मुख किशोरों को समझा-बुझाकर एक जिम्‍मेदार नागरिक बनाया जा सकता है। हकीकत यह है कि समेकित बाल संरक्षण योजना को अमल में लाने की जिम्‍मेदारी 9 विभागों को है, जिसमें से महिला-बाल विकास और सामाजिक न्‍याय विभाग को छोड़कर बाकी किसी विभाग को न तो बाल अधिकारों के संरक्षण में कोई दिलचस्‍पी है और न ही बाल अधिकारों के अंतरराष्‍ट्रीय समझौते की मूल भावना का पता है। जस्‍टिस मदनमोहन लोकर की अध्‍यक्षता में गठित सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि देश के सरकारी बाल सुधार गृहों में 40 फीसदी बच्‍चे बेहद चिंताजनक परिस्‍थितियों में रहते हैं। उनके साथ शोषण, उत्‍पीड़न जैसी घटनाएं आए दिन होती हैं। एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न राज्यों में स्थित बाल गृहों में यौन उत्पीड़न के 39 मामलों में से 11 सरकारी सम्प्रेक्षण गृह, बाल गृह, आश्रय गृह और अनाथालयों के हैं।

बाल सुरक्षा के लिए काम करने वाली संस्था "आंगन" का 31 बाल संप्रेक्षण गृहों में सर्वे बताता है कि 72 फीसदी लड़कों को किशोर न्‍याय बोर्ड में पेशी से पहले पुलिस लॉकअप में रखा जाता है। इनमें से 38 फीसदी बच्‍चों ने बताया कि उन्‍हें कई बार तो 7 से 10 दिन तक हवालात में बाकी मुजरिमों के साथ बंद रखा जाता है। 45 प्रतिशत बच्‍चों ने माना कि लॉकअप में उनके साथ बेरहमी से पिटाई कर उस अपराध को सवीकार करने पर मजबूर किया गया, जो उन्‍होंने कभी किया ही नहीं। इस प्रकार की वयवस्‍था में हमें अपराध के आरोप में गिरफ्तार किसी भी किशोर के विधि सम्‍मत पुनर्वास और देश का जिम्‍मेदार नागरिक बनने की उम्‍मीद तो नहीं करनी चाहिए।

आजादी के 68 साल बाद भी देश बाल अधिकारों पर संयुक्‍त राष्‍ट्र के समझौते को जमीन पर लागू करने में नाकाम रहा है। नाबालिग अपराधियों की लगातार बढ़ती संख्‍या बदलते समाज में मूल्‍यों की गिरावट और संवाद की कमी को उजागर करती है। न तो समाज और न ही हमारी व्‍यवस्‍था किशोर उम्र के भावनात्‍मक आवेगों और जरूरतों को समझ पा रही है। हमें तो केवल अपराधों का ग्राफ कम करने की फिक्र है, अपराधों को रोकने की नहीं। इस साल अगस्‍त में पेश किशोर न्‍याय (बाल देखभाल व संरक्षण) विधेयक 2014 इसी की एक बानगी है, जिसमें किशोर की उम्र को 18 से घटाकर 16 साल करने का प्रस्‍ताव है। केवल बाल अधिकार ही नहीं, बल्‍कि संविधान में दिए गए बराबरी और जीवन के अधिकार का भी प्रस्‍तावित कानून सरासर उल्‍लंघन करता है। इसके लिए जो आधार पेश किया गया है, वह भी उतना ही खोखला है जितना कि सरकार की बाल संरक्षण नीतियां। इसमें हत्‍या के कुल मामलों में किशोरों की 1.2 फीसदी और दुष्‍कर्म के मामलों में 3 फीसदी की नुमाइंदगी के साथ कानून बदलने की सिफारिश की गई है। यह भी नहीं देखा गया कि यौनिक अपराधों से बच्‍चों को संरक्षित करने वाले 2012 के कानून में आयु सीमा को 16 से बढ़ाकर 18 साल किया गया है। इसका मतलब यह हुआ कि किशोर उम्र में सहमति से हुए यौन संबंध भी अपराध के दायरे में आ जाएंगे। यौन अपराधों के प्रति समाज की जागरूकता बढ़ने के कारण दुष्‍कर्म के दर्ज मामलों में वैसे ही 151 फीसदी का इजाफा हो चुका है। एनसीआरबी के आंकड़ों को गहराई में देखें तो अपराधों में दोषी पाए गए 56 फीसदी किशोर वंचित परिवारों से हैं, जिनकी सालाना आय 25 हजार के लगभग है, जबकि 53 प्रतिशत किशोर या तो अनपढ़ हैं या फिर प्रायमरी पास है। तय है कि प्रस्‍तावित कानून का सबसे बुरा असर वंचित परिवारों पर ही पड़ना है।

फिलहाल केंद्र का विधेयक लोकसभा में पारित होकर राज्‍यसभा में लंबित है। माननीय सांसदों के सामने बाल अधिकारों के संरक्षण की दिशा में अब तक किए गए काम और किशोर न्‍याय अधिनियम को उसके मौजूदा स्‍वरूप में पूरी तरह लागू करने के रास्‍ते में अड़चनों को दूर करने का अभी भी समय है। निर्भया कांड ने आम लोगों के गुस्‍से को उभारा, जिसके मूल में असुरक्षा की भावना ही है। ऐसे में यह सोचना जरूरी है कि क्‍या केवल किशोरों की आयु सीमा घटाने से ही व्‍यवस्‍था में सुधार हो जाएगा ?

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

‘रक्त-बीजों’ के बीच एक अकेली ‘तंदूरी मुर्गी’

शर्म आती है यह बताते हुए कि हम एक सभ्‍य समाज में रहते हैं। रोजाना सामने आतीं दुष्‍कर्म की दर्दनाक खबरें। मन विचलित है। मीडिया के जरिए सड़कों से छन-छनकर आती आवाजें, फांसी दो, नपुंसक बना दो, सख्‍त से सख्‍त सजा दो...। यूपी सरकार पुलिस को दबंग और सिंघम जैसी फिल्‍मों से प्रेरणा लेने की बात करती है, जबकि उसी राज्‍य के एक मंत्री पार्टी कार्यकर्ताओं को तवज्‍जो न दिए जाने पर खाकी वर्दी उतरवाने की धमकी देते हैं। दुष्‍कर्म के सबसे ज्‍यादा मामले वाले मध्‍यप्रदेश में कांग्रेस के एक बड़े नेता यह कहते हैं कि जब तक औरत तिरछी नजर से नहीं देखेगी, तब तक कोई उसे छेड़ेगा नहीं। टीवी पर बहस के दौरान एक विद्वान का तर्क था कि बॉलीवुड समाज में अश्‍लीलता फैला रहा है। फिल्‍म दबंग-2 का एक गाना देखिए, ‘मैं तो तंदूरी मुर्गी हूं यार, गटकले सैंयां यार अल्‍कोहल से’। इस तरह के गानों के चलन से रेप होंगे ही। यह खाप पंचायतों की मानसिकता है। खाप ने चाउमीन से लेकर मच्‍छर तक को बढ़ते रेप का कारण बताया है। खाप में बैठे लोग मूर्ख हैं, अशिक्षित हैं पर टीवी पर बहस करने वाले जाने-माने समीक्षक हैं। एंटी रेप बिल पर लोकसभा में 12.15 बजे से शाम 7.40 बजे तक चली बहस में एक सांसद ने कहा कि कंडोम के विज्ञापन बेहद भड़काऊ और रेप के लिए जिम्‍मेदार हैं। ऐसे तर्क उस सच से मुंह छिपाने का सबसे आसान तरीका है, जो यह दिखाता है कि समस्‍या हमारे समाज के भीतर काफी गहरे समा चुकी है। रक्‍तबीज इसी समाज में फैले हैं। इनकी शक्‍ल भोली-भाली हो सकती है और जानी-पहचानी भी। इन रक्‍तबीजों की संख्‍या को कम करने का कोई समाधान अभी तक सामने नहीं आया है। 




इसकी सबसे प्रमुख वजह यह है कि हममे से कोई भी इस समस्‍या की जड़ तक पहुंचने की कोशिश नहीं कर रहा। दुष्‍कर्मी रातों-रात समाज में पैदा नहीं हुए। वे सदियों से हमारे बीच रहते आए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि 16 दिसंबर 2012 में दिल्‍ली रेप कांड से पहले इस तरह के मामले सिर्फ एक धटना मानकर नजरअंदाज कर दिए जाते थे। ज्‍यादातर में तो थाने में रिपोर्ट तक दर्ज नहीं होती थी। अब लोगों में इंसाफ के प्रति ललक जगी है। मीडिया का दबाव बना है। दिल्‍ली के गांधीनगर रेप कांड में पुलिस ने पीड़ित परिवार को जिस तरह 2000 रुपए लेकर चुप रहने को कहा, उससे यह बात साफ होती है। चूंकि पीड़ित पांच साल की बच्‍ची थी और उसे आरोपियों ने ठीक उसी तरह भयंकर यातना दी थी, जिस तरह निर्भया को दी गई थी, सो भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। मीडिया के लिए इस तरह की जनभावनाएं ब्‍लैंक चेक की तरह होती हैं। इसे चौबीसों घंटे भुनाया जा सकता है। पर असल में मीडिया को भी न तो दुष्‍कर्म की बढ़ती घटनाओं के पीछे की वजह पता है और न ही वह इन्‍हें रोकने का हल बता सकी है।

दरअसल रेप की घटनाओं को सिर्फ एक अपराध की नजर से नहीं देखा जा सकता। न ही इसे सिर्फ फांसी या बधियाकरण जैसी कठोरतम या तालिबानी किस्‍म की सजाओं से रोका जा सकता है। इन घटनाओं का तानाबाना एक व्‍यक्‍ति के जीवन चक्र से जुड़ता है। उसकी तमाम परवरिश, बचपन से लेकर जवानी तक का माहौल, अपराध की रोकथाम के प्रति समाज व व्‍यक्‍ति विशेष का नजरिया, राजनीतिक विचारधारा, सांस्‍कृतिक व नैतिक मूल्‍य, हमारी शिक्षा प्रणाली सबको समान रूप से देखने की जरूरत है। कोई भी मां अपनी कोख से किसी दुष्‍कर्मी को जन्‍म नहीं देती। हमारा समाज ऐसे लोगों को पैदा कर रहा है और करता रहेगा। हमारी पुलिस ऐसे लोगों को बढ़ावा दे रही है और देती रहेगी, जब तक कि उसे महिला अधिकारों के प्रति संवेदनशील न बनाया जाए। हमारी दलगत राजनीति दुष्‍कर्मियों को यूं ही संरक्षण देती रहेगी, जब तक कि उन्‍हें निहित स्‍वार्थों के लिए अपराधी किस्‍म के लोगों से मदद लेने से रोका न जाए। दुष्‍कर्म विकसित देशों में भी होते हैं। ब्रिटेन में 2011-12 के दौरान 14767 दुष्‍कर्म हुए, जिसमें से 10 फीसदी से भी कम, यानी 1058 मामलों में ही आरोपियों को सजा हुई। दुनिया के सबसे विकसित और महिला अधिकारों के प्रति उदार देशों में से एक अमेरिका में तो रेप के 100 में से 3 मामलों में ही आरोपी जेल के सींखचों तक पहुंचता है। भारत में 2011 के दौरान 14423 रेप हुए, जिसमें 4072 लोगों को सजा हो सकी। इस साल एक जनवरी से 15 अप्रैल के बीच अकेले दिल्‍ली में 463 रेप के मामले दर्ज हुए। ये बीते साल इसी दौरान दर्ज मामलों से 158 प्रतिशत ज्‍यादा हैं। महिलाओं के खिलाफ उत्‍पीड़न के मामलों में 600 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज हुई है। जरा सोचिए कि रेप के हर मामले की जांच के बाद कोर्ट (चाहे वह फास्‍ट ट्रैक कोर्ट ही क्‍यों न हो) में चार्जशीट पेश करने में कितना वक्‍त और कितनी ऊर्जा की जरूरत पड़ती होगी। भारत जैसे देश में जहां हर 20 मिनट में एक महिला का रेप होता हो, वहां रोजाना 72 लोगों के अपराध को साबित कर उन्‍हें सजा (फांसी ?) के तख्‍ते तक पहुंचाना आसान काम नहीं है। खासतौर पर तब, जबकि हमारी पुलिस महिलाओं के हक के प्रति जरा भी संवेदनशील नहीं है और न ही इस तरह के मामलों की फौरी जांच के लिए प्रशिक्षित है। यह बात सरकार के ही संस्‍थान ब्‍यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च ने मानी है, जिनका कहना है कि देशभर में पुलिस प्रशिक्षण संस्‍थानों की सक्रियता नहीं के बराबर है। इस पर भी पुलिस बल की एक-तिहाई संख्‍या कहीं अफसरों के घर पर तो कहीं वीआईपी ड्यूटी पर तैनात रहती है। वर्दी उतरवाने की धमकी देने वालों की रसूखदारों की संख्‍या पुलिसबल से तीन गुनी ज्‍यादा है। सिर्फ पुलिस बल ही क्‍यों, आरोपी को सजा दिलाने के लिए फास्‍ट ट्रैक कोर्ट और जजों की बड़ी संख्‍या में भर्ती भी करनी होगी। इसके अलावा न्‍यायिक प्रणाली में भी इस तरह से बदलाव करने होंगे, जिससे एक तय समयसीमा में अपराध साबित हो और अपराधी को सजा हो सके।


इससे भी चुनौतीपूर्ण काम है समाज को, उसकी विचारधारा को सुधारना। 2011 में रेप के जितने भी मामले सामने आए, उनमें से 93 फीसदी में आरोपी पीड़ित महिला के परिचित, संबंधी थे। यानी दुष्‍कर्मी हमारे आसपास ज्‍यादा हैं। वास्‍तव में महिलाओं के लिए सम्‍मान की बुनियाद घर पर ही पड़ती है। पत्‍नी के प्रति पति का व्‍यवहार, बहन और अन्‍य स्‍त्री किरदारों के बारे में पुरुष सदस्‍यों की विचारधारा से एक बच्‍चा सीखता है। लेकिन समय के साथ उसकी विचारधारा और पुख्‍ता होती जाती है, जब वह स्‍कूल, खेल के मैदान, मोहल्‍ले के नुक्‍कड़, कॉलेज, बाजार और आखिर में अपने दफ्तर में पुरुष बिरादरी को महिलाओं के प्रति हीन, भोगवादी नजरिए में पाता है। कहने को तो देश के सभी अहम संस्‍थानों में विशाखा गाइडलाइन लागू है, लेकिन यह दीवार पर टंगी चिप्‍पी के सिवा और कुछ नहीं। महिलाओं के साथ छेड़छाड़, अश्‍लील संवाद, मजाक, जोक्‍स सिर्फ कॉलेज में ही नहीं, बल्‍कि रोजमर्रा की जिंदगी में हर मोड़ पर शालि होती है। हम मान लेते हैं कि ऐसे मामलों में औरतें शर्म से सिर झुकाकर आगे निकल जाती हैं, शिकायत नहीं करतीं। यह हौसला बढ़ाता है। इस दृष्‍टिकोण को मजबूत करता है कि औरतें कमजोर हैं। इसे मानने में कोई बुराई भी नहीं, क्‍योंकि महिलाओं को घर पर भी पर्याप्‍त संरक्षण नहीं है। रोजमर्रा की छेड़छाड़ की घर पर शिकायत महिलाओं पर अनचाही बंदिशें लगा सकती हैं। उनका करियर, शिक्षा, स्‍वतंत्रता सब कुछ तबाह कर सकती है। परिवार के पास भी रोकथाम के कदम उठाने के कोई उपाय हैं क्‍या ? शायद नहीं। क्‍योंकि पुलिस प्रशासन ऐसे मामलों में जांच, एफआईआर और पुख्‍ता केस बनाने से कतराता है। वह तभी कदम उठाएगा, जब रेप या यौन उत्‍पीड़न जैसी घटना हो जाए। स्‍कूल-कॉलेज और ऑफिस का प्रशासन भी छेड़छाड़ और उत्‍पीड़न के मामलों में कड़ी कार्रवाई से कतराता है। इन्‍हें अपनी छवि धूमिल होने का डर है। यहां भी औरत ही एकमात्र कमजोर कड़ी निकलती है। ‘गलती उसकी भी है’, ‘उसे अपनी गरिमा का ध्‍यान रखना चाहिए’ जैसे जुमले यहीं पर लागू होते हैं। अगर आरोपी रसूखदार तबके से हो, संस्‍थान में ऊंचे पद पर हो, दौलतमंद हो तो आखिर में औरत पर ही कड़ी बंदिशों की आशंका ज्‍यादा है। तो महिलाओं को समाज में संरक्षण आखिर कहां पर है ? निर्भया रेप कांड के बाद मचे हो-हल्‍ले के बाद बीते चार महीने में एक भी ऐसा संगठन आगे नहीं आया है, जो छेड़छाड़, यौन उत्‍पीड़न और रेप जैसे मामलों में पीड़ित महिला को कानूनी, सामाजिक संरक्षण देने के साथ ही उसके पुनर्वास की बात भी करता हो।

हकीकत यह है कि हमारा समाज यह मानने को राजी नहीं है कि अगर औरत खुद को अभिव्‍यक्‍त करना चाहती है (चाहे वह फैशन, साज-संवार किसी भी रूप में हो) तो वह उसका हक है। अगर औरत अपनी पसंद से जिंदगी जीना चाहे तो वह भी उसका हक है। इसे रेप जैसे घृणित अपराध के लिए उकसावा कतई नहीं माना जा सकता और न ही यह कि अभिव्‍यक्‍ति और जीवन जीने की आजादी से किसी को उसका रेप करने का अधिकार मिल जाता है। इस विचारधारा को खुलेपन से स्‍वीकार करने की दिशा में पहला कदम घर से उठाना होगा। स्‍त्री के पैरों में पहली जंजीर वहीं पर टूटेगी। अब बात करें संरक्षण की। महिलाओं के हकों का संरक्षण पहले परिवार, फिर समाज और आखिर में व्‍यवस्‍था का कर्त्‍तव्‍य है। स्‍त्री हर स्‍पर्श, हर नजर, हर वाक्‍य और हर गतिविधि में अच्‍छे-बुरे का फर्क कर सकती है। यह उसकी नैसर्गिक शक्‍ति है। लेकिन वह चाहकर भी इसे अपने परिवार, संरक्षणकर्ताओं को अभिव्‍यक्‍त नहीं कर पाती, क्‍योंकि उसे इसका हक नहीं दिया गया है। उसे मर्यादा, कर्त्‍तव्‍य, गुणों और सीमाओं में बांधकर रखा गया है। इन ‘अवांछित स्‍थितियों’ पर यदि स्‍त्री को संरक्षण मिले, समाज व व्‍यवस्‍था का साथ मिले तो ही सख्‍त कानून पर ठीक से अमल हो सकेगा। लेकिन फिलहाल ये मुंगेरी सपने ही हैं। ऐसे पिता, पति, भाई कम ही होंगे, जो स्‍त्री को पूर्ण अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता देने का साहस रखते हों। जातियों, वर्ग, संप्रदाय में बंटे हमारे समाज में भी वह ताकत नहीं कि वह ‘स्‍त्री धर्म’ को ठुकराकर नए जमाने के परिवेश में औरत को देख सके। यहां तक ही मौजूदा व्‍यवस्‍था और इसे चलाने वाली सरकारें भी अपने वोट बैंक को नजरअंदाज कर महिला सशक्‍तिकरण की दिशा में चौतरफा कदम नहीं उठा सकती। महिला आरक्षण और हाल में जस्‍टिस (दिवंगत) जेएस वर्मा की रिपोर्ट को लेकर मचे घमासान से यह बात साबित हो जाती है। ऐसे में स्‍त्री को अभिव्‍यक्‍ति की पूर्ण स्‍वतंत्रता देने और उसके खिलाफ हो रहे अपराधों को रोकने की दिशा में सरकार पर दबाव बनाने में जुटे एक तबके को अब उन जड़ों पर प्रहार करना होगा, जो दुष्‍कर्मियों को हौसला दे रही हैं। ‘वो सुबह’ तभी तो आएगी।