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रविवार, 26 मई 2013

अग्निपथ...अग्निपथ....अग्निपथ

गोंडी भाषा में भविष्‍य के लिए कोई शब्‍द ही नहीं है, क्‍योंकि जल, जंगल, जमीन और आहार सब कुछ तो बस्तर के आदिवासियों के पास है। लेकिन मौजूदा हालात अब उन्‍हें भविष्‍य के लिए कोई शब्‍द ढूंढ़ने को जरूर उकसा रहे हैं... 

जिसे भी गोंडी भाषा आती हो वह सलवा जुडूम का अर्थ ‘स्वच्‍छता की खोज’ बताएगा, न कि शांति अभियान (जो कि अंग्रेजी मीडिया बार-बार गलत तरीके से अनुवादित करती है)। बताया जाता है कि सलवा जुडूम अभियान 6 मई 2005 को छत्‍तीसगढ़ में दंतेवाड़ा के केरकेली गांव में तब शुरू हुआ था, जब एक आदिवासी परिवार की लड़की को अपने दल में भरती कराने के लिए नक्‍सली उसे लेने गांव पहुंचे (नक्‍सली प्रत्‍येक आदिवासी परिवार के एक सदस्‍य को अपने दल में अनिवार्य रूप से भरती करते हैं। स्‍वेच्‍छा से हां कहो तो ठीक, वरना जबर्दस्‍ती ले जाया जाता है)। गांववालों ने विरोध किया और नक्‍सली चुपचाप चले गए। इससे उत्‍साहित लोगों ने नक्‍सलियों के विरोध में एक छोटा सा दल बना लिया। हालांकि, कुछ जानकार सलवा जुडूम के पीछे नक्‍सलियों द्वारा तेंदू पत्‍ते के व्‍यापार का बहिष्‍कार करने के ऐलान को भी कारण मानते हैं। इससे बस्‍तर के गरीब लोगों के पास आय का और कोई साधन नहीं बचा और उन्‍होंने नक्‍सलियों का विरोध करने का फैसला किया।





गांव वालों के इस गुस्‍से को महेंद्र कर्मा ने खूब भुनाया। उन्‍होंने बस्‍तर में बड़ी रैली कर लोगों से नक्‍सलियों के विरोध में हथियार उठाने को कहा। जन जागरण अभियान के नाम से कर्मा ने दंतेवाड़ा के गांवों में रैलियां कीं। उनके इस अभियान को छत्तीसगढ़ के सीएम रमण सिंह ने व्‍यापक समर्थन दिया और इस तरह गांववालों के हाथों में बंदूकें थमाई गईं। हजारों की संख्‍या में लोग सलवा जुडूम में शामिल हुए। कुछ 16-17 साल के बच्‍चे भी थे। हथियार चलाने की देशी ट्रेनिंग देकर इन्‍हें विशेष पुलिस अधिकारी (स्‍पेशन पुलिस ऑफिसर) का दर्जा दिया गया और साथ यह वादा भी कि उन्‍हें आगे चलकर पुलिस की वर्दी मिलेगी। सलवा जुडूम की बैठकें जिस गांव में होती थीं, उसके आसपास के गांवों के लोगों को उसमें बुलाया जाता था। जो नहीं आ पाते थे, उन्‍हें अगले रोज से प्रताडि़त करने, जान से मारने की धमकी देने का सिलसिला शुरू होता था। पीयूसीएल और पीयूडीआर समेत देश के कई मानवाधिकारवादी संगठनों ने 2005 के बस्‍तर दौरे के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सलवा जुडूम की बैठकों में आने के बाद लोगों के पास इसके सिवा और कोई विकल्‍प नहीं बचता था कि वे इस अभियान का समर्थन करें। ज्‍यादातर परिवारों को नक्‍सलियों की मुखबिरी करने के काम में लगाया जाता तो कुछ हट्टे-कट्टे आदिवासी युवाओं को सुरक्षा बल नक्‍सल विरोधी अभियान में खींच लेते। मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा, प्रभात खबर के संपादक हरिवंश और समाजशास्‍त्री नंदिनी सुंदर की टीम ने 2006 में दंतेवाड़ा का दौरा करने के बाद कहा कि दंडकारण्‍य में नागरिक प्रशासन पूरी तरह से ध्‍वस्‍त हो चुका है। सलवा जुडूम एक गैर जवाबदेह संगठन बन गया है, जिसमें ढेरों अपराधी जा घुसे हैं और उन पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है। सलवा जुडूम और नक्‍सलियों के दबाव का खामियाजा मासूम आदिवासियों को भुगतना पड़ा। दोनों तरफ के हमले में उनके झोंपड़े जले, निर्दोषों की जान चली गई और महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्‍कर्म हुए। लेकिन स्‍थानीय मीडिया ने प्रशासन के भारी दबाव में सिर्फ नक्‍सलियों के हमलों को ही छापा। बीजापुर के एक पत्रकार कमलेश पैंकरा ने जब सलवा जुडूम के हमलों और उनकी ज्‍यादतियों को छापा तो सलवा जुडूम के लोगों ने उस पर हमला किया।

इसी बीच, बस्‍तर की अकूत प्राकृतिक संपदा पर बड़े उद्योगों की भी नजर पड़ चुकी थी। उन्‍हें भी सलवा जुडूम का दमन रास आ रहा था, क्‍योंकि इन जुल्‍मो-सितम से डरकर लोग अपना गांव छोड़कर भाग रहे थे। उनके झोंपड़े जलाए जा रहे थे और उन जलते झोंपड़ों में वे बेशकीमती दस्‍तावेज भी जलते थे, जो उनकी जमीन और रहवास के सुबूत थे। मीडिया चुपचाप इसे देख रही थी, क्‍योंकि हर पत्रकार को 5-5 लाख रुपए ‘कुछ न देखने, कुछ न लिखने’ के लिए दिए गए थे। इसके बावजूद सब-कुछ खत्‍म नहीं हुआ था। जगदलपुर के वकील प्रताप अग्रवाल उनमें से थे, जिन्‍होंने बड़े उद्योग घरानों की करतूतों को कोर्ट में चुनौती देने की ठानी। उन्‍होंने दो और लोगों के साथ मिलकर टाटा स्‍टील और एस्‍सार की इस्‍पात और खनन परियोजनाओं के खिलाफ अदालती मोर्चा खोला। करीब एक-डेढ़ साल के अरसे में सलवा जुडूम ने 350 लोगों की जान ले ली और 700 गांवों को फूंक दिया। लोग भागे और उनमें से ज्‍यादातर सुकमा-कोंटा राजमार्ग के दोनों तरफ बने शिविरों में आ टिके। हजारों लोग पड़ोसी आंध्रप्रदेश, महाराष्‍ट्र और मध्‍यप्रदेश की ओर कूच कर गए। राहत शिविरों में पीने के साफ पानी और शौचालय का कोई इंतजाम नहीं था। पहले तो सरकारी राशन ठीक-ठाक मिलता रहा, फिर अचानक राशन का कोटा घटकर आधा रह गया। बच्‍चे भूख से बिलबिलाते। शिविर से बाहर जाने की जिद करते, पर सलवा जुडूम, सीआरपीएफ और नागा बटालियन के पहरे और बाहर नक्‍सलियों के खौफ ने लोगों के सब्र का बांध जल्‍द ही तोड़ दिया।

लेकिन अब तो लोगों के पास न तो अपनी जमीन थी और न ही जीने की आजादी। नक्‍सलियों की सप्‍लाई रोकने के नाम पर सुरक्षा बलों ने गांव के हाट-बाजारों को भी उजाड़ दिया था। असल में स्‍थानीय लोगों को अपने ही लोगों से लड़ाने और उनकी एकजुटता को तोड़ देने की यह सरकारी रणनीति थी, जिसे महेंद्र कर्मा ने बखूबी अंजाम दिया। एक ओर बस्‍तर के आदिवासी आपस में लड़ते रहे और दूसरी ओर उनकी पीठ पीछे छत्‍तीसगढ़ सरकार बड़े उद्योग घरानों के लिए जमीन तैयार करने में जुटी थी। उसने कुछ तो सलवा जुडूम और कुछ सुरक्षा बलों की मदद से सैकड़ों गांवों को जलाया, फर्जी एनकाउंटर किए, महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्‍कर्म किए गए और इस तरह आदिवासियों को डराकर उनके गांव से भगाया गया। गांव खाली हुए तो टाटा और वेदांता जैसे घरानों को 45 फीसदी वन क्षेत्र में पैर पसारने का मौका मिला। न गांव बचे, न ग्रामसभा और न ही मुआवजा लेने वाले आदिवासी। ऐसे में रोकता भी कौन। जहां ग्रामसभा जैसी कोई संस्‍था थी, वहां बंदूकों के जोर पर सहमति बनाई गई। फर्जी हितग्राही तैयार किए गए। मनमर्जी से मुआवजा बांटा गया। अगर किसी ने मुआवजे का चेक लेने से इनकार कर दिया तो उसे जान से मारने की धमकी दी गई। रमण सिंह सरकार बॉक्‍साइट और लोहे की खदानों को देखकर इस्‍पात उद्योग के लिए 6.6 अरब डॉलर के निवेश का समझौता कर चुकी थी।

इस बीच केंद्र सरकार ने भी माना कि नक्‍सली समस्‍या का हल बंदूकों से नहीं, बल्‍कि स्‍थानीय स्‍तर पर लोगों के जीवन स्‍तर में सुधार और विकास से ही निकलेगा। लेकिन किस तरह का विकास ? इस पर अभी तक देशभर में आम राय कायम नहीं हो सकी है। एक ओर छत्‍तीसगढ़ सरकार राज्‍य के औद्योगिक विकास में बस्‍तर की बेहतरी का ख्‍वाब संजोए है, वहीं स्‍थानीय स्‍तर पर लोग चाहते हैं कि उन्‍हें उनकी जमीन पर खेती और जंगलों से वनोपज इकट्ठा करने का हक मिले। राज्‍य सरकार लोगों को जमीन का हक दे पाने में अभी तक नाकाम रही है। जहां तक वनोपज पर हक की बात है, तो रमण सरकार ही नहीं, नक्‍सल प्रभावित देश के हर राज्‍य की सरकार इसे आदिवासियों को ‘रियायत’ के रूप में खैरात मानती है। दोनों ओर से दृष्‍टिकोण के इस भ्रम ने नक्‍सलियों को मजबूती से पैर पसारने का मौका मिला, जिन्‍होंने भूमि सुधार का नारा बुलंद किया।

अगस्‍त 2010 में रमण सरकार को राहत शिविरों में रहने वाले नक्‍सल प्रभावित लोगों का मुकम्‍मल पुनर्वास करने को कहा। लेकिन दिल्‍ली स्‍कूल ऑफ इकोनॉमिक्‍स की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर कहती हैं, कोर्ट के बार-बार आदेशों के बावजूद रमण सरकार टस से मस नहीं हुई। नंदिनी के पास छत्‍तीसगढ़ के तत्‍कालीन मुख्‍य सचिव का वह ई-मेल आज भी रखा हुआ है, जिसमें लिखा है कि राज्‍य में एक भी सलवा जुडूम कैंप नहीं है। नलिनी सुंदर वही हैं, जिन्‍होंने 2007 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर राहत शिविरों में चिकित्‍सा, सफाई, शिक्षा और सबसे अहम सुरक्षा इंतजामों पर सवाल उठाए थे। बीजापुर और दंतेवाड़ा प्रशासन ने राहत शिविरों में रहने वाले लोगों को स्‍वर्ण जयंती ग्राम स्‍वरोजगार योजना (एसजीएसवाय) के तहत काम देने का प्रस्‍ताव किया। दोनों जिलों के प्रशासन ने लोगों को ट्रेनिंग देकर उन्‍हें बाहरी राज्‍यों में निजी क्षेत्र में रोजगार दिलाने की ठानी। असल में एसजीएसवाय का मकसद गांवों में स्‍वसहायता समूह बनाकर लोगों को आय के साधन दिलाना है। इस तरह प्‍लंबर, इलेक्‍ट्रीशियन और सिक्‍योरिटी गार्ड की ट्रेनिंग देकर करीब 1000 लोगों को आंध्रप्रदेश, दिल्‍ली और उड़ीसा भेजा गया। इंजेराम, दोरणापाल, एर्राबोर और जगरगुंडा के शिविरों में रहने वाले सैकड़ों लोगों ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर शिक्षा, राशन और अस्‍पतालों का इंतजाम करने को कहा। अर्धसैन्‍य बल स्‍कूलों में रुकते थे, सो नक्‍सलियों ने बड़ी संख्‍या में स्‍कूल जला दिए। बस्‍तर के गांवों में दूर-दूर तक एक भी एमबीबीएस डॉक्‍टर नहीं मिलेगा। राशन दुकान अगर गांव से 30 मील दूर हो तो गांव जाने का कोई मतलब नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में सलवा जुडूम पर रोक लगा दी। तब से नक्‍सलियों का गढ़ बन चुका है छत्‍तीसगढ़। सीआरपीएफ और राज्‍य की पुलिस भले ही सैकड़ों जवानों से घिरे अपने कैंप में बैठकर बीजापुर और दंतेवाड़ा में नक्‍सलियों की समानांतर सरकार की बात मानने से इनकार करे, लेकिन असल में वहां टोल टैक्‍स भी नक्‍सली ही वसूलते हैं। वह भी बाकायदा रसीद देकर, जिसमें लिखा होता है ‘छत्‍तीसगढ़ सरकार’। शनिवार 25 मई 2013 को नक्‍सलियों का कांग्रेसी नेताओं पर भीषण हमला और महेंद्र कर्मा की मौत छत्‍तीसगढ़ में माओवादियों के बढ़ते दबदबे का पुख्‍ता प्रमाण है। पेसा कानून में आदिवासियों का प्राकृतिक संसाधनों पर हक माना गया है। लेकिन अभी तक देश के किसी भी राज्‍य ने इस कानून को जमीन पर लागू करने की कोशिश नहीं की है। नक्‍सली समस्‍या की जड़ यही है। एक बार अगर बस्‍तर के आदिवासियों को उनका नैसर्गिक हक दे दिया जाए तो नक्‍सल समस्‍या का आधे से ज्‍यादा हल निकल आएगा। अंग्रेजी राज में भी तत्‍कालीन सरकार ने आदिवासी इलाकों को अलग रखा था। ऐसा इसलिए, क्‍योंकि आदिवासियों की अपनी परंपरागत प्रशासनिक व्‍यवस्‍थाएं हैं। इन्‍हें अधिकारसंपन्‍न बनाने की कोशिश कभी नहीं की गई। अब तो इसके पीछे राजनीतिक ही नहीं, बड़े औद्योगिक घरानों के व्‍यावसायिक हित भी जुड़ गए हैं। ऐसे में लगता नहीं है कि बस्‍तर का यह अग्‍निपथ जल्‍द ठंडा होकर फिर से सघन, हरे-भरे दंडकारण्‍य का रूप ले पाएगा।