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शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

ईश्वर तुम्हारे साथ है सोनाली



दुनियाभर में हर साल 1500 तेजाबी हमले होते हैं। इनमें से 80 फीसदी हमलों का निशाना होती हैं लड़कियां (वैसे आप इस आंकड़े के जाल में न उलझें। यह तो इस अपराध की भीषणता को बयां करने वाली एक छोटी सी बानगी भर है।)। एक ही तेजाबी हमले में लड़की की पूरी जिंदगी तबाह हो जाती है। अगर पुलिस केस मजबूत नहीं बनाए तो दोषी तीन साल बाद भी छूट सकते हैं। मिसाल के लिए नीचे इस तस्‍वीर को देखिए। ये है सोनाली मुखर्जी। 

तेजाबी हमले के बाद सोनाली का झुलसा चेहरा। 
धनबाद की सोनाली पर नौ साल पहले तीन लोगों ने देर रात घर में घुसकर सिर्फ इसलिए तेजाब फेंक दिया था, क्‍योंकि उसने उन लोगों की अश्‍लील हरकतों का विरोध करने की हिम्‍मत दिखाई थी। पुलिस ने दोषियों को पकड़ा, पर जानबूझकर केस कमजोर बना और तीन साल की सजा काटकर आरोपी छूट गए। इस बीच सोनाली के चेहरे के 22 ऑपरेशन हुए और तब जाकर उसकी एक आंख और कान बच पाए। नौ ऑपरेशन और होने हैं।
इस दर्द को अकेले झेला है सोनाली ने। एक बार जब दर्द बर्दाश्‍त से बाहर हो गया तो उसने झारखंड सरकार से मौत की भीख मांगी थी। हमारे कानून में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है, सो सोनाली को अपनी जिंदगी से ही मौत की भीख मांगनी थी। हालांकि उसने हालात का डटकर मुकाबला किया। सोनाली के मध्‍यमवर्गीय परिवार ने भी उसका बखूबी साथ दिया। 22 ऑपरेशन कराने में लाखों रुपए का खर्च आया और इस मामले में परिवार को कहीं से भी मदद नहीं मिली।
सोनाली को परिवार का कर्ज उतारने का बखूबी मौका मिला ‘कौन बनेगा करोड़पति’ कार्यक्रम में। हॉट सीट पर पूर्व मिस यूनिवर्स लारा दत्‍ता के साथ बैठकर उसने 25 लाख रुपए जीते हैं। अब इन रूपयों से उसके बाकी के नौ ऑपरेशन तो हो जाएंगे और हो सकता है कि तेजाबी हमले से विकृत हुआ उसका चेहरा भी कुछ हद तक ठीक हो जाए। लेकिन जो दर्द उसने बीते 9 साल में झेला है, उसका मुआवजा कोई नहीं चुका सकता। तेजाबी हमला दरअसल हमारे समाज की पितृसत्‍तात्‍मकता का बेहतरीन उदाहरण है। यह बताता है कि हमारा समाज भले ही महिलाओं को देवी का दर्जा देता हो, पर दिल में उसके प्रति सम्‍मान कभी नहीं रहा। जब कभी उसने पुरुषों के वर्चस्‍व और एकाधिकार को चुनौती देने की कोशिश की, उसे हिंसा का सामना करना पड़ा। कहीं न कहीं इस एकाधिकारवाद के कायम रहने का कारण समाज का मौन समर्थन भी है और इसीलिए तेजाबी हमले की भयावहता अभी तक कानूनी धाराओं में जघन्‍य अपराध की श्रेणी में शामिल नहीं हो सकी है। अगर कोई लड़की कॉलेज में अपने पुरुष सहपाठी के प्रेम या ऐसी किसी चाहत को ठुकरा देती है तो बदले में लड़के द्वारा गुस्‍से में उस पर तेजाब फेंकने को एक ऐसा भयंकर अपराध मानना चाहिए, जो पीड़ित लड़की की पूरी जिंदगी तबाह कर देता है। 

अपने माता-पिता के साथ आरती 
गणतंत्र दिवस से दो दिन पहले कानपुर की 18 वर्षीय आरती श्रीवास्‍तव पर उसके ही कॉलेज के एक लड़के ने प्रणय निवेदन ठुकराए जाने के बाद तेजाब फेंक दिया। महज 10 रुपए में खरीदी गई तेजाब की उस बोतल ने आरती के चेहरे को बुरी तरह झुलसा दिया। लड़के को 10 साल की सजा तो हुई, पर हर माह औसतन 20 घटनाएं अभी भी हो रही हैं। हमारे कानून में धारा 322, 325 और 326 में दोषी को सजा दी जाती है और वह भी यह देखकर कि पीड़ित के शरीर पर तेजाब का कितना असर हुआ है। केंद्र सरकार ने आपराधिक अधिनियम 2012 में इस तरह की घटनाओं को गंभीर अपराध मानने के लिए एक संशोधन विधेयक भी तैयार किया है, लेकिन संसद की मंजूरी मिले बिना इसे अमल में नहीं लाया जा सकेगा। इससे भी ज्‍यादा बड़ी चुनौती प्रस्‍तावित कानून को पुख्‍ता तरीके से लागू करने की भी है।
इस तरह की घटनाएं हमारे समाज में डर और आतंक की लहर पैदा करती हैं। गुस्‍सा पैदा नहीं करती। सरकार और व्‍यवस्‍था पर इस बात के लिए दबाव नहीं बनाती कि आरती और सोनाली जैसी और लड़कियों को ऐसे हमलों से बचाने के लिए और सख्‍त कानून बनाने का कदम उठाया जाए। आरती का मामला सामने आने के बाद श्रीवास्‍तव परिवार को ऐसे ढेरों सुझाव आए कि उन्‍होंने अपनी बेटी को कार में क्‍यों नहीं भेजा या वे अपनी बेटी को क्‍या घर पर ट्यूशन नहीं पढ़ा सकते थे। लेकिन सोनाली की घटना तो घर के भीतर हुई थी। ऐसी घटनाओं के प्रतिक्रियास्‍वरूप जो विचार सामने आते हैं, उनसे महिलाओं की स्‍वतंत्रता और उनके अधिकारों पर पहले से पड़ रहा दबाव और बढ़ जाता है। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए लोगों के पास यही उपाय नजर आता है कि किसी तरह महिलाओं को घर के भीतर रखा जाए। ऐसे विचार निश्‍चित रूप से उस आधी आबादी के लिए दमनकारी हैं, जो पहले ही बालिका भ्रूण हत्‍या, लिंग परीक्षण, बाल विवाह और ऑनर किलिंग जैसी मान्‍यताओं/ प्रथाओं से जूझ रही है।