जी न्‍यूज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जी न्‍यूज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 28 नवंबर 2012

पत्रकारिता का स्तर गिरा ही क्यों ?

आज दोपहर एक वरिष्‍ठ महिला पत्रकार का किसी काम से दफ्तर आना हुआ। छूटते ही उन्‍होंने मुझसे पूछा, ‘अब तो संपादक भी गिरफ्तार होने लगे। पत्रकारिता का कोई स्‍तर है भी या नहीं ?’ मंगलवार 27 नवंबर 2012 की रात जी न्‍यूज के दो वरिष्‍ठ संपादकों के गिरफ्तार होने के बाद यह सवाल वाजिब था। पूरा मीडिया जगत कहीं शोक तो कहीं समालोचना के दौर में है। इस सवाल का वाजिब जवाब ढूंढ़ पाता कि शाम को एक जूनियर साथी का फोन आया। फलां संपादक ने मेरी दर्जनभर खबरें सिर्फ इसलिए रोक रखी हैं कि विज्ञापन विभाग ‘पार्टी’ से रकम ऐंठने की पोजीशन में है। डील होगी तो खबरें नहीं छपेंगी, वरना कॉपियों को डेस्‍क लेवल पर ‘डल’ करके छापा जाएगा।

पत्रकारिता में 18 साल गुजारने के बाद ये बातें मुझे अब कतई नहीं चौंकातीं। पर असल सवाल वह है, जो दोपहर को वरिष्‍ठ पत्रकार साहिबा ने पूछा था, ‘पत्रकारिता का कोई स्‍तर है भी या नहीं ?’ इससे पहले कि सवाल का जवाब तलाश करने की कोशिश की जाए, पिछले दिनों एक जाने-माने पत्रकार के साथ हुई विजिट का वाकया याद आ रहा है। (नाम पूछने की जुर्रत न कीजिएगा) गाड़ी में बैठे पत्रकार साहब को एक फोन आया। कुछ एडमिशन का लफड़ा था। लेन-देन की डील हुई। कुल 48 हजार रुपए की रकम ‘पार्टी’ को देनी थी। बातचीत खत्‍म होने के बाद मेरे चेहरे पर उमड़ रहे सवालों को ताड़कर उन्‍होंने फरमाया, ‘हमें तनख्‍वाह मिलती ही कितनी है ?’ जितनी हाथ में आती है, उससे कहीं ज्‍यादा तो दिल्‍ली का खर्च है। ये तो मेहनत की कमाई है। पहचान की भी तो कीमत होती है न ? मैं मुस्‍कुराकर रह गया। एक और वाकया – इसी महीने की एक दोपहर पुराने खेल पत्रकार मित्र रास्‍ते में टकरा गए। लंबे अरसे के बाद मिलना हुआ था, सो चाय के दौर शुरू हुए। तभी उनके सेलफोन की घंटी बजी और एक फोटोमय विज्ञप्‍ति के बारे में बात होने लगी। ‘हां मिल गई है। लग जाएगी। ...लेकिन मेरा फोन अभी तक रिचार्ज नहीं हुआ। बैलेंस बिल्‍कुल नहीं है। आपको 500 के रिचार्ज का कहा था। शाम तक करवा दीजिएगा। एसटीडी लगानी है।’ उधर से पक्‍का आश्‍वासन मिलने के बाद ही वे संतुष्‍ट हुए। मैंने पूछा, ‘सब ठीक तो चल रहा है न ? बोले, हां पर आजकल रेट थोड़े कम हो गए हैं। अक्‍सर पेज खाली होने पर ‘घाटा’ उठाना पड़ता है।’

मुझे याद आता है 15 साल पहले का वह दौर, जब मीडिया संस्‍थानों के बाहर चाय, पान, समोसे और चाय की ढेर सारी रेहड़ियां हुआ करती थीं। विज्ञप्‍तियां लिए लोग पहले ही बाहर खड़े रहते थे। चाय-समोसे की चुस्‍कियों के साथ पार्टी बड़े अदब से प्‍लीज इसे ‘देख’ लीजिएगा.... यह कहकर एक लिफाफा पकड़ा देते थे। खोलने पर उसमें 100 का पत्‍ता गिरता। महंगाई बढ़ी तो रेट तय हो गए। 100 मतलब सिंगल कॉलम... और इसी के मुताबिक रेट बढ़ते जाते। फोटो के लिए 100 रुपए अलग। यह तो हुई डेस्‍क वाले की कमाई। मीडिया की आपसी प्रतिस्‍पर्धा के चलते जब एक्‍सक्‍लूसिव खबरों का दबाव बढ़ा तो फील्‍ड रिपोर्टर भी कमाने लगा। बीट पर जितनी पकड़, उतनी ज्‍यादा कमाई। नगर निगम से लेकर क्राइम तक में रिपोर्टरों के पास पैसा आने लगा। तनख्‍वाह कम थी, सो पत्रकारों की ज्‍यादातर भूख ऊपरी कमाई से मिटने लगी। कुछ अखबार तो नाममात्र की तनख्‍वाह के साथ प्रेस कार्ड थमाकर यह नसीहत भी देते थे कि ‘इससे ज्‍यादा जितना कमा सको, कमा लो पर संस्‍थान पर उंगली न उठे इसका ध्‍यान रखना। वरना कहीं के नहीं रह जाओगे।’ मैंने अपने ही संस्‍थान के एक क्राइम रिपोर्टर को रोज रात एक बजे के बाद थाने में जमानत की सेटिंग करते देखा है। उनकी एक रात की कमाई ही कभी-कभी 10 हजार रुपए को पार कर जाया करती थी।

जी के दो संपादकों, सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया ने ऐसा क्‍या कर दिया कि पत्रकारिता का स्‍तर अचानक गिर गया ? पिछले एक दशक की बात करूंगी तो संपादक नाम की संस्‍था ज्‍यादातर मीडिया संस्‍थानों में सिर्फ इसलिए खत्‍म कर दी गई, क्‍योंकि मालिक को एक लाख रुपए से ज्‍यादा की तनख्‍वाह पर किसी को खामख्‍वाह उस पद पर बिठाए रखना गवारा नहीं था। इस दौरान मीडिया संस्‍थानों में तनख्‍वाह तो बढ़ी, लेकिन कंटेंट के मामले में मैनेजमेंट का दखल बढ़ जाने पर हर पत्रकार की काबिलियत का निर्धारण इस तरह से किया जाने लगा कि उससे कितने लोगों का काम एक साथ लिया जा सकता है। इस मापदंड पर संपादक एक निहायत ही नाकारा और बोझ किस्‍म का व्‍यक्‍ति मान लिया गया। लेकिन प्रिंट लाइन में किसी का नाम देने की मजबूरी (बलि का बकरा) के चलते यह एक अनिवार्य प्रक्रिया थी, सो उस पर लायजनिंग का अतिरिक्‍त बोझ भी डाल दिया गया। मीडिया संस्‍थान के नए मापदंड 30 हजार के एक पत्रकार से हरफनमौला खिलाड़ी की तरह बैटिंग व बोलिंग के साथ फील्‍डिंग और विकेटकीपिंग तक की उम्‍मीद कर देते हैं। पहले जो काम तीन लोगों की टीम किया करती थी, वह एक ही व्‍यक्‍ति करता है। नतीजतन गलतियां होती हैं, पर संपादक इस मामले में कुछ खास नहीं कर सकता। इसलिए, क्‍योंकि उसे तो लायजनिंग से ही फुर्सत नहीं मिलेगी।

मालिक को जमीन चाहिए। बिजनेस का डायवर्सिफिकेशन करना है। उसे कालेधन को सफेद करना है, सो छापों से भी बचाना होगा। उसे लाइसेंस चाहिए, सरकारी सुविधाएं चाहिए और साथ में सरकार के विज्ञापन भी। कहीं किसी मालिकान को संसद में जाने की खुजली होती है तो कोई अपने भाई को एमएलए बनाना चाहता है। संपादक का अधिकांश समय ‘जुगाड़’ में बीतता है। करीब एक दशक पहले की बात है। मेरे अखबार की रीलांचिंग थी। मैं प्रेजेंटेशन हाथ में लिए मालिक के कमरे के बाहर इंतजार कर रहा था। तभी संपादकजी आते दिखाई दिए। मुझसे नजरें मिलाए बिना वे सीधे मालिक यानी एमडी के कमरे में चले गए। कमरे का दरवाजा कुछ ढीला था, सो पूरी तरह से बंद नहीं हुआ। अंदर का सारा नजारा बाहर से साफ दिख रहा था। मालिक ने संपादकजी को बेहद भद्दी गालियां देनी शुरू कर दीं। उस दिन का अखबार उनके मुंह पर उठाकर फेंक दिया। प्रतिक्रिया स्‍वरूप कोई जवाब नहीं आया। फिर उन्‍होंने अपने पीए को बुलाया। डिक्‍टेशन देते हुए बोले, ‘संपादक जी एक महीने के लिए स्‍टेट का एक ऑर्डर लेकर आएंगे... जिसकी कॉस्‍ट आपको मार्केटिंग हेड बताएंगे...’ संपादकजी के बाहर आने के कई दिनों बाद मुझे पता चला कि वह डील करोड़ों की थी। उनके संस्‍थान छोड़ने के बाद एक बेहद अनौपचारिक में उन्‍होंने बताया कि ‘उस दिन’ उन्‍हें गुडबाय कहने के लिए बुलाया गया था।

सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया के खिलाफ शिकायत में जी समूह के मालिक सुभाष चंद्रा का भी नाम है। पुलिस का दावा है कि दोनों संपादक अपने साथ विज्ञापन की बुकिंग का फॉर्म भी ले गए थे। बताया गया है कि 100 करोड़ रुपए के विज्ञापनों की यह डील कोयला घोटाले में सांसद व उद्योगपति नवीन जिंदल के खिलाफ लगे आरोपों से संबंधित खबर रुकवाने के लिए की जा रही थी। पिछले दिनों स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले में नीरा राडिया समेत मीडिया जगत के कई दिग्‍गजों के नाम उछलने के बाद पत्रकारिता के अवमूल्‍यन पर काफी हल्‍ला मचा था। उस समय भी पत्रकारिता के गिरते स्‍तर पर चिंता जताई गई थी। लेकिन अभी यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि पत्रकारिता का स्‍तर पहले कितना ऊंचा था ? वह गिरा तो क्‍यों ? किसने गिराया ? एडिटर को मैनेजिंग एडिटर किसने और क्‍यों बनाया ? भ्रष्‍टाचार या अनियमितता की खबर छपने के बाद किसके हित सबसे ज्‍यादा प्रभावित होते हैं ? अखबार के या संपादक के ? मीडिया संस्‍थानों के मालिकान के लिए अखबार/चैनल अहम है या उनके बाकी व्‍यवसाय ? राडिया प्रकरण में मीडिया के स्‍व नियंत्रण पर भी बड़ी बहस हुई थी। लेकिन यहां भी बेहद अहम सवाल यह है कि जब प्रेस की आजादी के नियम-कानून पहले ही बने हुए हैं, कौन सी खबर पेड है और कौन सी अनपेड यह भी साफ दिखता है तो इस स्‍व नियंत्रण की निगरानी का जिम्‍मा कौन उठाएगा ? क्‍या सिर्फ प्रेस कौंसिल जो अभी जी-न्‍यूज का लाइसेंस रद्द करने की मांग कर रहा है और जिसके पास मांग/सिफारिश करने के सिवा और कोई अधिकार नहीं ? या फिर वही एडिटर्स गिल्‍ड, जिसमें मीडिया के लोग ही बैठे हैं ? अगर मीडिया का वाकई शुद्धिकरण करना है तो हमें ऊपर से शुरुआत करनी होगी। उन स्‍तंभों से बाजार और व्‍यावसायिकता की बेल छांटनी होगी, जो निचले स्‍तर के मीडियाकर्मियों को गाहे-बगाहे लपेटकर उन्‍हें अपने इशारों पर नाचने को मजबूर कर रही हैं। यह काम नामुमकिन तो नहीं, पर फिलहाल मुमकिन नहीं लगता।