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रविवार, 13 दिसंबर 2015

तबाही से आधा डिग्री दूर खड़ी दुनिया



हम भारतीयों को सिर झुकाकर इस बात को मानना होगा कि ‘गोरी चमड़ी वाले, अशिष्‍ट और असंस्‍कारी पहले और दूसरी दुनिया के लोग’ अपने आसपास की बदलती जलवायु को लेकर हमसे कहीं संवेदनशील हैं। इसलिए नहीं कि उनकी गोरी त्‍वचा ज्‍यादा गर्मी बर्दाश्‍त नहीं कर सकती और हमें पसीना बहाने में मजा आता है, बल्‍कि इसलिए कि वे हम भारतीयों से कहीं ज्‍यादा शिक्षित और जागरूक हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो पूरा देश हाल में डूबती चेन्‍नई को सिर्फ प्राकृतिक आपदा मानकर घड़ियाली आंसू बहाने और हायतौबा मचाने का दिखावा नहीं कर रहा होता। खासतौर पर तब, जबकि पेरिस में जलवायु सम्‍मेलन के बीच में भारत के चार महानगरों में से एक चेन्‍नई अभूतपूर्व बारिश में लबालब हो गया और भारतीय वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और पर्यावरणविदों के साथ हमारे ‘महान खोजी’ मीडिया को इसमें जलवायु परिवर्तन की बू तक नहीं आई।

बहरहाल, अब वक्‍त ऐसी मूर्खता का नहीं है, क्‍योंकि इस दुनिया में जिंदगी और तबाही के बीच केवल आधा डिग्री का फासला रह गया है। छह साल पहले कोपेनहेगन में नाकाम रहे जलवायु सम्‍मेलन के बाद पेरिस में पहली बार इस सच्‍चाई को सभी ने स्‍वीकार किया कि धरती के तापमान में जिस 2 डिग्री के इजाफे को मानवता के लिए बड़ा खतरा माना गया था, उस तबाही का आधा रास्‍ता हम तय कर चुके हैं। यानी दुनिया के तापमान में एक डिग्री की बढ़त हो चुकी है। सम्‍मेलन का प्रारूप मसौदा इस बात पर असमंजस में है कि इस सदी के आखिर तक दुनिया के तमाम देश तबाही को कितना रोकें, यानी बढ़ते तापमान को 1.5 डिग्री तक बढ़ने से रोकें या उससे आगे 2 डिग्री तक बढ़ने दें और तब जाकर ब्रेक लगाएं।

सम्‍मेलन में 100 से ज्‍यादा विकासशील देशों का मत बढ़ते तापमान को 1.5 डिग्री पर ही रोक देने का है, लेकिन तकरीबन सभी जाने-माने पर्यावरणविद इस लक्ष्‍य को पाने के प्रति आशंकित हैं। उनका कहना है कि सालाना 36 गीगाटन कार्बन डाइऑक्‍साइड पर्यावरण में भेजने वाली दुनिया अगले 20 साल में करीब 600 गीगाटन कार्बन डाइऑक्‍साइड उत्‍सर्जित कर चुकी होगी। उनका कहना है कि अगले 20 साल में दुनिया को जीवाष्‍म ईंधन की खपत को पूरी तरह से रोककर वर्तमान में खड़े जंगल में हरेक पेड़ को बचाना होगा, साथ ही ऊर्जा के परंपरागत व प्राकृतिक स्रोतों का पूरा उपयोग सुनिश्‍चित करना होगा।

लेकिन दिक्‍कत यह है कि ज्‍यादातर विकासशील देश तापमान में बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री पर रोकने के बारे में तब तक कोई वादा नहीं करना चाहते, जब तक विकसित और विकासशील देशों के बीच इस रास्‍ते पर चलने की जिम्‍मेदारियों का बंटवारा नहीं हो जाता। पेरिस सम्‍मेलन में जलवायु परिवर्तन को रोकने के समझौते का प्रारूप तैयार होना ही इस बात का संकेत है कि न केवल विकसित, बल्‍कि विकासशील देश भी इस बात को अच्‍छी तरह से समझ चुके हैं कि अब आपसी लड़ाई से किसी का भला नहीं होने वाला है। दुनिया इस मुकाम पर पहुंच चुकी है, जहां अधिकांश देशों का कार्बन बजट (एक लक्षित समय में कार्बन डाइऑक्‍साइड के उत्‍सर्जन की सहनशील सीमा) खत्‍म होने के कगार पर है। इसका सीधा मतलब यह होगा कि दुनिया में मानव विकास सूचकांक पर 135 वें नंबर के देश भारत और सबसे तेज बढ़ते चीन को भी जलवायु परिवर्तन से दुनिया को बचाने के लिए कहीं ज्‍यादा प्रतिबद्धता दिखानी होगी।





क्‍या बढ़ते तापमान को रोक पाना संभव है ?

पेरिस सम्‍मेलन में प्रतिभागी देशों ने जिस तरह की प्रतिबद्धता दिखाई है, उसे देखकर यही लगता है कि तापमान में बढ़त को 1.5 डिग्री पर रोकना तकरीबन नामुमकिन ही है। कहीं न कहीं विकसित और विकासशील देशों के बीच इस रास्‍ते में सबसे बड़ा रोड़ा अभी भी यही है कि किसने कितना प्रदूषण फैलाया और किस पर कितनी जिम्‍मेदारी आयद होनी चाहिए। इस झगड़े को अगर सुलटा भी दिया जाए तो भी तमाम प्रयासों के बावजूद तापमान को 3 डिग्री तक बढ़ने से रोक पाना संभव नहीं होगा। इस साल के आखिर तक दुनिया के तापमान में तीन डिग्री तक की बढ़ोतरी संपूर्ण मानवता पर कहर बनकर टूट सकती है।

जलवायु परिवर्तन के बड़े खतरे

कोपेनहेगन में छह साल पहले खत्‍म हुए विश्‍व जलवायु सम्‍मेलन के बाद से दुनिया का तापमान एक डिग्री बढ़ चुका है। यूरोप, ऑस्‍ट्रेलिया और एशिया में इसके प्रभाव अभी से दिखने लगे हैं। यूरोप और ऑस्‍ट्रेलिया में लंबे समय तक भीषण गर्मी (कई स्‍थानों पर तापमान 43 डिग्री तक जा पहुंचा), लू का प्रकोप और एशियाई देशों में सूखा और अप्रत्‍याशित बारिश दर्ज की गई है। 1980 से 2010 के बीच बारिश का रिकॉर्ड जहां सामान्‍य से 12 फीसदी ज्‍यादा बरसात का रहा, वहीं अब दक्षिण पूर्व एशिया में 56, यूरोप में 31 और मध्‍य अमेरिका में 24 प्रतिशत तक जा पहुंचा है। ऐसा इसलिए, क्‍योंकि जमीन से उठने वाली गर्म हवा ज्‍यादा पानी सोखती है और फिर कुछ दूरी पर बादल फट पड़ते हैं। धरती का रेफ्रिजरेटर समझे जाने वाली आर्कटिक सागर की बर्फीली परतों में 1979 से 2015 तक 13.4 प्रतिशत तक की कमी आई है। समुद्र का तापमान बढ़ने के कारण ऐसा हुआ है। जब पानी गर्म होता है तो वह ज्‍यादा जगह घेरता है। इसे थर्मल एक्‍सपांशन कहते हैं। नतीजतन महासागरों का स्‍तर बीते 100 साल में 20 सेंटीमीटर तक बढ़ा है। सालाना इसमें 3 मिलीमीटर यानी 10 साल में 3 सेंटीमीटर की बढ़ोतरी हो रही है।


अब आगे क्‍या

अगर ग्रीनहाउस गैसों और अन्‍य प्रदूषणकारी गैसों की मात्रा साल 2000 के स्‍तर पर स्‍थिर हो गई तो भी इस सदी के आखिर तक दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री तक बढ़ जाएगा। इस पर अगर हमने कार्बन डायऑक्‍साइड व अन्‍य प्रदूषणकारी गैसों का उत्‍सर्जन जारी रखा तो विश्‍व का तापमान 3-5 डिग्री तक बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। तब शायद दुनिया ही खत्‍म हो जाए, क्‍योंकि वैश्‍विक तापमान में 2 डिग्री की बढ़त ही गर्मी को पांच गुना तीखा कर देगी। इसी के साथ बाढ़ का खतरा भी अब से कहीं अधिक होगा। बाढ़ के कारण हर साल सवा दो करोड़ लोगों को बेघर होना पड़ रहा है। अगर दुनिया का तापमान एक डिग्री और बढ़ा तो दोगुने से भी ज्‍यादा यानी करीब पांच करोड़ लोगों को हर साल अपना आशियाना छोड़ना होगा।

तापमान में एक डिग्री की बढ़त का असर केवल यहीं तक सीमित नहीं होगा। भूमध्‍यसागर में पीने के पानी की किल्‍लत 50 प्रतिशत बढ़ सकती है। सूखे और पानी की कमी के कारण लोगों का पलायन मौजूदा स्‍तर से 20 फीसदी बढ़ सकता है। तापमान में दो डिग्री की बढ़त का मतलब आर्कटिक सागर में बर्फीले सुरक्षा कवच का पूरी तरह से खात्‍मा भी है।

दूसरे गणित भी हैं

कुछ पर्यावरणविदों का कहना है कि दुनिया का तापमान 2 डिग्री तक बढ़ जाए तो समुद्र का स्‍तर 7 मीटर तक बढ़ सकता है। इस आशंका के पीछे पश्‍चिमी अंटार्कटिक की बर्फीली पर्त में लगातार हो रही कमी को मुख्‍य कारण के रूप में देखा जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पेड़ कटने पर कुछ साल में दूसरा पेड़ लगाकर भरपाई तो कर लें, पर अंटार्कटिक की बर्फ एक बार पिघल गई तो इसे रोक पाना नामुमकिन है।

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

खानाबदोश की डायरी : 2

सूखते दरख्‍तों के बीच अनसुनी आवाजों का आर्तनाद 

लगातार सात साल तक सूखे जैसे हालात का असर बुंदेलखंड की हरियाली पर पड़ा है। हालांकि, 18वीं और 19वीं सदी के दौरान बुंदेलखंड में हर 16 साल बाद सूखे का दौर आया, लेकिन 1968 से 1992 के बीच सूखे की अवधि में तीन गुने का इजाफा हुआ है। इसकी सबसे करारी मार अंचल के 25 फीसदी दलित और आदिवासी तबके पर पड़ा है। अंचल की 75 फीसदी आबादी जीने के लिए खेती पर निर्भर है, पर खरीफ के सीजन में आप चले जाएं तो 20 फीसदी रकबे में ही फसल नजर आएगी।

इस तरह की खबरें आए दिन सुर्खियां बनती हैं। 
बाबा के देशज ज्ञान का जवाब नहीं 
मध्‍यप्रदेश में बुंदेलखंड के 6 जिले हैं। दतिया को छोड़कर बाकी पांचों जिलों में मैं घूम चुका हूं। इनमें से चार जिलों में दो बार से ज्‍यादा यात्राएं हुई हैं और हर बार मैंने वहां की हरियाली को घटते ही देखा है। मौसमी बदलाव का जमीनी चेहरा अब साफ नजर आने लगा है। सबसे खराब हालत दतिया और टीकमगढ़ की है। अध्‍ययनकर्ता एमएन रमेश और वीके द्विवेदी की रिपोर्ट के मुताबिक अब 10 फीसदी से भी कम जंगल बचे हैं। बाकी चार जिलों सागर, छतरपुर, पन्‍ना और दमोह के 29.69 फीसदी हिस्‍से में जंगल हैं। पन्‍ना में इसका श्रेय टाइगर रिजर्व को जाता है, वरना चारों जिलों में अवैध खनन खरपतवार की तरह फैल रहा है। टीकमगढ़ से निकलकर जैसे ही छतरपुर की ओर बढ़ेंगे, आपको सड़क के दोनों तरफ खड़खड़ाते क्रेशर और उड़ती धूल नजर आएगी। इनमें से ज्‍यादा अवैध क्रेशर नेताओं और उनके गुर्गों की है। एक समय बुंदेलखंड का 37 फीसदी से बड़ा इलाका बियाबान था। यहां की पहाड़ियां लंबे, ऊंचे पेड़ों से ढंकी थी। छतरपुर में रहने वाले जाने-माने पर्यावरणविद् और आईआईटी के गोल्‍ड मेडलिस्‍ट भारतेंदु प्रकाश ने बड़े ही चिंतित लहजे में हमें बताया कि अंचल के अधिकतम और न्‍यूनतम तापमान में आया बदलाव असल में तेजी से खत्‍म होते जंगलों के कारण है। ये जंगल धरती के लाखों वर्षों के विकास क्रम का नतीजा हैं। जंगलों के लगातार सफाए के चलते भारतेंदु जी कहते हैं, इस नुकसान की भरपाई अब किसी भी सूरत में नहीं हो सकती। ये जंगल बारिश को खींचते हैं। पेड़ के हर पत्‍ते में पानी संग्रहित होता है। सूर्य की किरणें जब इन पर पड़ती है तो प्रकाश संश्‍लेषण की क्रिया के साथ ही वाष्‍पीकरण भी होता है। यह पारे की चाल पर लगाम लगाता है। उन्‍होंने कहा कि सरकार चाहे लाख दावे कर ले, लेकिन वह पहाड़ की ढाल पर दोबारा पेड़ नहीं लगा सकती। बुंदेलखंड के उत्‍तरप्रदेश वाले हिस्‍से में तो हालत और भी खराब है, क्‍योंकि वहां पांच जिलों के छह फीसदी हिस्‍से में ही जंगल बचे हैं। केवल चित्रकूट और ललितपुर में क्रमश: 18 और 11 प्रतिशत जंगल हैं। एमएन रमेश के अध्‍ययन में यह बात भी सामने आई है कि बुंदेलखंड के सभी 13 जिलों में 1991 से 2003 के दौरान जंगल सबसे तेजी से कम हुए। भारतेंदु जी कहते हैं, जंगल वह होता है, जिसमें पेड़ों के नीचे जीवन पलता है। झड़ते पत्‍तों से पैदा हुआ ह्यूमस बारिश के पानी के बहाव से खेतों तक पहुंचता है। इससे जमीन उपजाऊ बनती है। पेड़ पानी के बहाव को भी नियंत्रित करते हैं। इनके न होने से खेतों की टॉप सॉइल, यानी मिट्टी की ऊपर तह का कटाव हो रहा है। ऊपर से दूसरे विश्‍वयुद्ध के खात्‍मे के बाद टैंकों के कल-पुर्जों से बने आज के ट्रैक्‍टर खेत जोतने की जगह डेड सॉइल यानी मृत मिट्टी को नीचे से ऊपर ले आते हैं। इससे पैदावार पर असर पड़ा है। 

सिंदूर सागर तालाब। टीकमगढ़ में ऐसे 150 से ज्‍यादा तालाब हैं, जो सूखे की चपेट में आ चुके हैं। 

पुणे के इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी इंस्‍टीट्यूट का अध्‍ययन यह कहता है कि वर्ष 2100 तक बुंदेलखंड अंचल में शीतकालीन वाष्‍पीकरण घटकर 50 फीसदी से भी कम रह जाएगा। यही वह मौसम है, जब समूचे अंचल में गेहूं की खेती होती है। नमी की मात्रा घटकर आधी रह जाने का नतीजा गेहूं की पैदावार में गिरावट के रूप में सामने आएगा। भारतेंदु जी का आकलन है कि दमोह और सागर में जंगलों के होने से वहां 950 मिलीमीटर से ज्‍यादा बारिश होती है, लेकिन टीकमगढ़ और छतरपुर में बारिश की मात्रा घटकर 850 मिमी से थोड़ी ज्‍यादा रह गई है और इसमें आ रही गिरावट ही फिक्र की बात है। अब तो सितंबर में ही धूप इस कदर तेज हो जाती है कि वह जमीन की अधिकांश नमी खींच लेती है। इससे किसानों को अपनी फसल लेने के लिए सिंचाई पर ज्‍यादा जोर देना पड़ता है। दो एकड़ काश्‍त वाला छोटा किसान अमूमन इसका खर्च नहीं उठा पाता। उसकी कमर टूटने का यह एक बड़ा कारण है।

भारतेंदु जी का कहना एकदम दुरुस्‍त है कि उत्‍तराखंड में तराई के जंगल पहले हमारी जीवनदायिनी नदियों के प्रवाह को बनाए रखने का जरिया थे। कहते हैं गंगावतरण के समय यह सवाल खड़ा हुआ था कि उनके प्रबल वेग को कौन संभालेगा। तब भगवान शंकर ने गंगा को अपनी जटाओं में समाहित किया। भारतेंदुजी इन जटाओं को तराई के जंगल मानते हैं, जिसने गंगा के वेग को संभाला। वे आगे कहते हैं, 1865 में अंग्रेजों ने जंगलों का सरकारीकरण कर दिया, क्‍योंकि उन्‍हें जंगल, बारिश, वन्‍य जीवों और आदिवासियों से कोई मतलब नहीं था। वे तो सिर्फ इमारती लकड़ी चाहते थे, जिससे वे अपने यहां घर बना सकें, रेलों के लिए स्‍लीपर बिछा सके। आजादी के बाद भारत सरकार के वन मंत्रालय ने भी अंग्रेजों की देखादेखी ही की।

भारतेंदु जी की बात का टीकमगढ़ के पृथ्‍वीपुर ब्‍लॉक के राजावर गांव में 77 वर्षीय एक किसान ने भी समर्थन किया। करीब 200 घर वाले राजावर गांव में ज्‍यादा कुशवाहा रहते हैं। बाबा कहते हैं, ’10 साल पहले हम इसी फरवरी में कावनी-कोदो, गेहूं, मक्‍का, ज्‍वार उगा लेते थे। अब कोदा नहीं उगता। मूंगफली लगभग गायब हो गई है, जबकि तिल इक्‍का-दुक्‍का किसान ही उगा पाते हैं।’ उन्‍होंने कहा कि पहले जेठ, यानी जून में ही बारिश हो जाती थी। आजकल सावन और भादो इन दो महीनों में भी 70 प्रतिशत से ज्‍यादा बारिश होती है। बारिश के दिन घटे हैं तो बूंदों का वेग भी बढ़ा है। भारतेंदु जी इसे थोड़ा और सरल करते हुए बताते हैं कि दरअसल पेड़ की पत्‍तियां बूंदों की तेजी को कम कर देती हैं। इससे स्‍प्रिंकलिंग इफेक्‍ट होता है। पहले खेत के चारों ओर पेड़ लगाने का रिवाज था। अब तो मेड़ भी ठीक से नहीं बनते। जीएम और संकर बीजों के आने से कीटनाशकों की खपत तीन गुनी बढ़ी है, सो मेड़ पर मिट्टी को बांधने वाली घास भी नहीं उग पाती।

जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्‍यादा असर टीकमगढ़ ब्‍लॉक पर पड़ा है। जिले के कुल 6 ब्‍लॉक हैं। उनमें से तीन की हालत भी खराब है। इसकी मिसाल है जिले का सिंदूर सागर लेक। प्राचीन गिद्धवासिनी मंदिर के पास बने इस लेक में मछली पकड़ने वाले रघुनाथ केवट बताते हैं कि 2007-08 के सूखे ने तालाब की ज्‍यादातर मछलियां निगल लीं। उस दौरान तालाब इस कदर सूख गया था कि बच्‍चे उस पर क्रिकेट खेलने लगे थे। फिलहाल पिछले दो साल की बारिश से तालाब थोड़ा भर गया है, लेकिन उसमें बंगाल से साबुत मछलियां डाली जाती हैं। बगल के पहाड़ पर लगे पानी के निशान बताते हैं कि तालाब का पानी कभी वहां तक पहुंचा करता था। पहले यहां के मछुआरों को महीनेभर में 10 से 12 हजार रुपए की आमदनी सिर्फ मछली पकड़ने से हो जाया करती थी, जो इस समय घटकर बमुश्‍किल 3 हजार को छू पाती है।

तस्‍वीर में जहां तक रेत नजर आ रही है, पहले कभी वहां तक तालाब का पानी पहुंचता था। 

पास ही बना है गिद्धवासिनी देवी का मंदिर। इसके बारे में किवंदती है कि 1100 ईस्‍वी में राजा खेतसिंह खंगार (परिहार राजपूत, जो निचली जाति के माने जाते हैं) एक ठाकुर सोहन पाल की लड़की के प्रेम में पड़ गए। ठाकुर ऊची जाति के होते हैं, सो उन्‍होंने ऐतराज जताया। लेकिन राजा तो राजा। वह जिद पर अड़ा हुआ था। ऐसे में ठाकुरों ने आत्‍मसम्‍मान की रक्षा के लिए अपनी कुर्बानी देना ठीक समझा। वे विंध्‍यवासिनी की शरण में गए। देवी के हाथ में रखे कटार से अपनी गर्दन काटनी चाही तो वे प्रकट हो गईं। उन्‍होंने कहा कि वे खुद वहां जाएंगी, पर उनकी शर्तें होंगी। सोहनसिंह की बेटी की शादी में सूबे के सारे खंगारों को बुलाया जाए। राजा मान गया। देवी गिद्ध पर बैठकर वहां पहुंचीं और अपनी कटार से सारे खंगारों को मार गिराया। एक गर्भवती खंगार महिला किसी तरह बच गईं। देवी ने उससे यह प्रण करवाया कि उसकी संतान और आगे की सारी पुश्‍तें मंदिर में चौकीदार का काम करेगी। तब से मां के मंदिर में खंगार वंश चौकीदारी करता है। बाद में सोहन पाल ने ही सन 1257 में मंदिर के पास विशाल तालाब बनवाया। कहानी के पीछे जो भी मान्‍यताएं हों, पर एक बात जो जमीन पर नजर आती है वह यह कि जिस गिद्ध पर बैठकर देवी यहां आई थीं, उसकी प्रजाति बुंदेलखंड में नाममात्र को रह गई हैं। पन्‍ना टाइगर रिजर्व में गिद्ध पालन का काम शुरू किया गया है। मुमकिन है आने वाले दिनों में आस्‍था का प्रतीक यह प्राणी इस अंचल में बचा रहेगा। टीकमगढ़ जाएं तो गढ़ कुंडार के विचित्र किले को देखना न भूलिएगा। पहाड़ी पर बना यह किला मीलों दूर से नजर आता है, पर जैसे ही आप उसके पास जाएंगे वह दिखाई देना बंद हो जाएगा। इसकी वजह है किले के ठीक सामने बना एक और पहाड़, जो इसे ढंक लेता है। किले के दोनों तरफ अगर ऊंचे पेड़ वाले जंगल हों तो यह कहीं से भी नजर न आए, लेकिन अब तो पेड़ गायब हैं सो किला नजर आ ही जाता है। महाराजा खेत सिंह ने 1180 में इस किले को बनवाया था। 1347 में मोहम्‍मद तुगलक ने इसे जीता और बुंदेलों को सौंप दिया, जो तब तक मुगलों के दोस्‍त बन चुके थे।