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रविवार, 24 जून 2012

सफरनामा


जंगल जो कभी हरे थे

जंगल की अपनी रौनक होती है। चारों ओर पक्षियों की अजीब आवाजें। अचानक पत्‍तियों की सरसराहट, जैसे चुपके से कुछ गुजरा हो। हर कदम पर रोमांच, गतिशीलता। वो दिल का तेजी से धड़कना, चपल हिरणों को देखकर उतावला होता मन या पंख फैलाकर प्रेम की विनती करते मोर को देखकर अरमानों के मीटर का दौड़ने लगना। कान्‍हा, जिम कॉर्बेट, कांजीरंगा, बांधवगढ़ और सतपुड़ा के जंगलों में इन सभी का आभास होता है। लेकिन कूनो-पालपुर सैंक्‍चुअरी इन सबसे एकदम अलग है। मध्‍यप्रदेश सरकार यहां एशियाटिक लायन यानी गिर के बब्‍बर शेर लाने का ख्‍वाब संजोए हुए है। गुजरात की काफी ना-नुकुर के बाद सरकार ने इरादा बदलकर नामीबिया से अफ्रीकी चीते लाने की योजना बनाई। उसे भी सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि योजना बनाई शेर लाने की, इसके नाम पर 31 करोड़ रुपए का बजट भी बना दिया और अब कहते हो कि चीते लाएंगे।
मैं, मंजीत, रोशन और अश्‍विनी जी। फोटो : नीलेश कालभोर
मध्‍यप्रदेश सरकार के लिए कूनो पालपुर में शेरों की बसाने की योजना किस कदर गले की फांस बन चुका है, यह यहां के जंगल को देखकर समझा जा सकता है। वन विभाग ने शेरों के नाम पर 24 गांवों के 1535 सहरिया परिवारों को नाममात्र के मुआवजे पर जंगल से खदेड़ तो दिया, लेकिन उसके बाद कोई जमीनी तैयारी नहीं की। प्रोजेक्‍ट टाइगर के तहत सरकार को पहली किस्‍त के रूप में मिले 19 करोड़ रुपए वन विभाग के भ्रष्‍टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया है कि उसने जंगल को शेरों के लिए तैयार किया है, मगर हकीकत में ऐसा कहीं नजर नहीं आता। डिस्‍कवरी और एनीमल प्‍लैनेट जैसे पसंदीदा चैनलों का दर्शक यह आसानी से बता सकता है कि शेरों को शिकार करने के लिए ओपन स्‍पेस चाहिए, जो कूनो में कहीं उपलब्‍ध नहीं है। 
मैं बड़े दावे के साथ यह बात इसलिए कह सकता हूं, क्‍योंकि 12 से 16 जून 2012 तक का ज्‍यादातर वक्‍त मैंने इसी जंगल में बिताया। करीब 43 डिग्री तापमान और तेज लू के बीच 345 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले जंगल का हर कोना हमने देखा, पर कहीं कोई ओपन स्‍पेस नहीं मिला। अलबत्‍ता शेरों के लिए बाड़े जरूर मिले। वन विभाग शेरों को इन्‍हीं बाड़ों में कैद कर उनका प्रजनन कराने और बैठे-बिठाए खाना परोसकर उन्‍हें पालतू और आलसी बनाने की योजना पर काम कर रहा है।
सूखा जंगल

शेरों के आशियाने, कीमत : 41 लाख 
जंगल में पानी के प्राकृतिक स्रोत सिर्फ चार महीने ही कायम रहते हैं। पूरब में नहाल कुंडा और गंगई नाला मार्च में सूख जाता है। बाकी दिनों में इकलौता सहारा केर खो का झरना है, जहां से 23 किलोमीटर लंबी पाइप लाइन डालकर 15 से 20 छोटे तालाबों को भरा जाता है। फिर भी पानी कम पड़े तो दो टैंकर भी रखे हैं। यानी सिर्फ इंसानों को ही नहीं, जानवरों को भी टैंकर का पानी पिलाया जा रहा है।
सूखता तालाब
दूसरी समस्‍या घास की है। शेर, बाघ और चीते जैसे बिल्‍ली प्रजाति के जानवर घात लगाकर शिकार करते हैं। कुछ एक निश्‍चित फासले से छलांग लगाकर शिकार को दबोचते हैं तो कुछ दौड़कर। पर तीनों ही छिपकर घात लगाने के लिए लंबी घास का इस्‍तेमाल करते हैं। कूनो के 25 फीसदी हिस्‍से में ही लंबी घास नजर आई। इस घास को भी अब विस्‍थापितों के छोड़े हुए चौपाए चट कर रहे हैं। हालांकि वन विभाग का दावा है कि कूनो में हाथी घास के साथ ही और भी कई प्रजातियों के घास हैं। लेकिन, फिलहाल जंगल में मवेशियों और शाकाहारी चौपायों की तादाद ज्‍यादा होने से घास कुछ ही स्‍थानों पर नजर आती है। ऐसे दर्जनों आवारा मवेशी जंगल में चरते मिल जाएंगे। हमारे यंग गाइड रोशन ने फक्र से कहा कि ये चौपाए ही असल में आने वाले मेहमानों (पता नहीं शेर, बाघ कब आएंगे) के आसान शिकार हैं।
कूनो में घुसने के वैसे तो आधिकारिक रूप से तीन गेट हैं (टिकटोली, अहेरा और पीपल बावड़ी), पर रोशन ने बताया कि ऐसे और भी कई खुफिया रास्‍ते हैं जहां से लकड़ी काटने वाले और शिकारी बेरोकटोक जंगल में घुस आते हैं। जंगल के चारों ओर पत्‍थरों की 4 फीट ऊंची कच्‍ची दीवार में कई सूराख साफ जर आए।
श्‍योपुर मध्‍यप्रदेश का सबसे ज्‍यादा कुपोषित जिला है। यहां सिर्फ बच्‍चे ही नहीं, जंगली जानवर भी कुपोषित हैं। गाड़ी से जंगल के कोर एरिया में जाते समय एक तालाब से कुछ जंगली सुअर तेजी से हमें देखने के लिए बाहर निकले। सबसे आखिर में था, यह मरियल सा सुअर। भीषण गरमी का मारा, कीचड़ में लिपटा यह प्राणी लड़खड़ाते हुए निकला और गाड़ी के सामने आकर धड़ाम से चारों खाने चित हो गया। गोया प्रेमिका के ना को बर्दाश्‍त न कर पाने पर जान देने चला हो। बहरहाल, हमारे ड्रायवर से चुस्‍ती दिखाते हुए फौरन गाड़ी घुमा ली और हम उस दीवाने को वहीं छोड़कर आगे बढ़ गए। हां, बाद में हमारे गाइड रोशन ने फॉरेस्‍ट चौकी में बाकायदा इसकी रिपोर्ट की।
लागी छूटे ना
आगे केर खो के झरने तक पहुंचने के लिए तीन किमी तक पैदल चलना पड़ा, लेकिन पानी और हरियाली के चलते गर्मी कम लगी। झरने में पानी पीकर थोड़ा सुस्‍ताने के बाद तरावट आई। यहां बंदरों की बहुतायत है, पर जंगली जानवर नहीं मिले।
केर खो का झरना
रास्‍ते में हमें एक जगह बारहसिंगा, जंगली सांड और गिद्ध की जुगलबंदी नजर आई। शायद नजदीक ही किसी का शव पड़ा था। सांड रक्षक मुद्रा में था तो वेजिटेरियन बारहसिंगा दूर खड़ा गिद्ध की घृणित चाल को समझने की कोशिश कर रहा था। हमारी टीम में शामिल डीडी न्‍यूज के श्‍योपुर पीटीसी (पार्ट टाइम करस्‍पोंडेंट) अश्‍विनी बालोटिया जी अपना मूवी कैमरा लेकर गाड़ी से कूदे और नजदीक जाने लगे। हमें लगा ऐसा न हो कि सांड या बारहसिंगा में से कोई उनके नेक इरादों को गलत समझ बैठे और हमला बोल दे। भारी-भरकम होने के बावजूद बालोटिया जी पर दोनों इक्‍कीस पड़ते। खैर, ऐसा कुछ नहीं हुआ और हमें कुछ शॉट्स मिल गए।
अनोखी जुगलबंदी
रोशन ने हमें बताया था कि कूनो में राज तेंदुए का चलता है और हम शुरू से ही इस उत्‍सुकता में थे कि कहीं वह नजर आ जाए। शाम के धुंधलके में आखिर महाराज नजर आ ही गए चीतलों के झुंड का घात लगाकर पीछा करते हुए। हम करीब आधे घंटे तक उसे निहारते रहे। डीडी न्‍यूज के मंजीत और नीलेश ने पहली बार तेंदुआ देखा था। ऐसे 60 तेंदुए हैं कूनो में।
जंगल का राजा
पालपुर कूनो के बारे में : इसके शुष्‍क पतझड़ जंगल में साल-सागौन या नीम जैसे घने पेड़ नहीं, बल्‍कि खैर, तेंदू, सलई के पेड़ हैं। यहां 8582 चीतल, 952 चिंकारा, 2317 नीलगाय, 845 सांभर, 40 लकड़बग्‍धे और 28 रीछ पाए जाते हैं। 
कैसे पहुंचें : ट्रेन से ग्‍वालियर और वहां से 124 किमी की दूरी तय कर साढ़े तीन घंटे में और सवाई माधोपुर से ढाई घंटे में पहुंच सकते हैं। झांसी से कूनो की दूरी 169 किमी है। मई-जून में यहां का पारा 47 डिग्री को छू जाता है, तब 5 से 6 बजे के बीच जंगल जाएं। ठंड के दिनों में चिल्‍ला जाड़ा पड़ता है और तब कभी भी जंगल जाएं जो राजा और प्रजा सब गुनगुनी धूप में मचलते मिलेंगे।