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रविवार, 5 मई 2013

चक्रव्यूह- 9 : छूट गए सब रिश्ते-नाते


13 अप्रैल 2010
ट्रेन में बैठे अंशु का दिल तेजी से धड़क रहा था। उसके साथ ऐसा तब होता है, जब कहीं कुछ अनहोनी होने वाली हो। उसका सिक्‍स्‍थ सेंस गजब का है। बचपन में उसे दमे की बीमारी थी। खूब इलाज करवाया, लेकिन मर्ज ठीक नहीं हुआ। दो साल का बच्‍चा और डॉक्‍टर की भारी-भरकम गोलियां। काफी दुबला हो गया था। अगले दो साल तक थोड़ा ठीक हुआ, लेकिन खेलकूद नहीं पाया। थोड़ी दौड़-भाग में ही सांस फूल जाती थी। एक दिन पिता कृष्‍णपद गांगुली उसे एक बाबा के पास ले गए।
बाबा ने उसे प्‍यार से अपने पास बुलाया। उसकी आंखों में झांका। सिर को सहलाया और कुछ देर तक अजीब तरीके से बुदबुदाते रहे। उस दिन के बाद अंशु को कभी दौरे नहीं पड़े। हालांकि, कई हैरतअंगेज बातें उसके साथ होने लगी। उसे अंधेरे में वे चीजें दिखाई देती थीं, जो अमूमन किसी को नजर नहीं आतीं। वह चेहरे के हाव-भाव से सामने वाले की मानसिकता जान जाता था। उसे अपने बेहद करीबी लोगों के भविष्‍य की घटनाएं साफ दिखाई देती थीं।
एक रोज तो गजब ही हो गया। आधी रात अपने कमरे में सोया 12 साल का अंशु अचानक चीखकर उठ बैठा। बगले के कमरे से मां-पिताजी दौड़कर आए। बच्‍चे ने अजीब का सपना देखा था। सिलिगुड़ी में रहने वाली मौसी पूरे परिवार के साथ ट्रेन में जा रही थी कि अचानक ट्रेन एक ऊंचे पुल से गिर पड़ी। बस इतना ही। अंशु पसीने से तर था। मां ने उसे सीने से लगाया तो वह दहाड़ मारकर रोने लगा। ‘मां माशी (बांग्‍ला में मौसी को इसी नाम से पुकारते हैं) के फोन लगाओ।’ केष्‍टो बाबू हैरान।
लेकिन अगले कुछ घंटों में सब साफ हो गया। शारदा देवी की सगी बहन नहीं रहीं। ट्रेन हादसे में उनका देहांत हो गया। पूरा परिवार हादसे का शिकार हो चुका था। सिर्फ सबसे छोटी बेटी पुल्‍टी बच गई। इधर, सारा घर मातम में डूबा था, वहीं मासूम अंशु पर मानों सारा बोझ खत्‍म हो चुका था। उसे लग रहा था, जैसे उसने कोई परीक्षा 100 फीसदी नंबरों से पास कर ली हो। तबसे अनाथ पुल्‍टी केष्‍टो बाबू की बेटी बनकर साथ रहती है। शारदा देवी के लिए अंशु और पुल्‍टी  में कोई फर्क नहीं।
मां जैसा ही बड़ा दिल पाया था अंशु ने। पुल्‍टी को खुश देखने के लिए उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। वह फैसला कर चुका था कि कॉलेज में फाइनल ईयर खत्‍म होते ही वह पुल्‍टी को अपने पास दिल्‍ली बुला लेगा। बढ़िया कोचिंग में दाखिला करवाकर वह उसे आईएएस अफसर बनाएगा।
लेकिन आज... उसे सब रिश्‍ते पीछे छूटते नजर आ रहे थे। उसे लग रहा था, मानों वह पुल्‍टी से कभी नहीं मिल पाएगा। क्‍यों ? इसका जवाब अंशु के सिक्‍स्‍थ सेंस को भी नहीं था। वह तो सिर्फ चला जा रहा था। दिल्‍ली पीछे छूट गई, प्रिया और अनु भी...।
गहरी सांस लेकर उसने सामने की ट्रे पर रखा वह पैकेट खोला जो अनु की मां ने स्‍टेशन पर दिया था। खाने के तीन एयरटाइट कंटेनर और एक छोटा डिब्‍बा। ‘शायद यही होगा पुल्‍टी को अनु का गिफ्ट।’ अंशु ने पुल्‍टी से वादा किया था कि अगली बार वह उसके लिए घड़ी लेकर आएगा। अंशु तो भूल गया, पर अनु को याद था। उसने ठीक वैसी ही घड़ी प्रजेंट की थी, जैसा अंशु ने सोचा था। दोनों तरफ कई बटन। लगता है मानों कोई जादुई घड़ी हो। एक बटन को दबाया तो घड़ी सैटेलाइट से नेविगेट करने लगी। यह तो जीपीएस है- अंशु हैरान था। एक और बटन खींचने पर बाहर ही आ गया। रेडियो एंटीना की तरह। घड़ी पर लिखा आने लगा नो नेटवर्क।
जासूस की जासूसी घड़ी... फीकी सी मुस्‍कुराहट के साथ बुदबुदाते हुए अंशु ने घड़ी वापस उसी बक्‍से में रख दी और लेट गया। सुबह नाश्‍ते के बाद उसने कुछ नहीं खाया था, पर न जाने क्‍यों उसे भूख नहीं थी। उसे याद आया कि प्रिया ने उसे लड़के वालों के दहेज की बात बताई थी। पाक्र बलूची में डिनर के दौरान उसकी नम आंखें सामने तैरने लगीं। प्रिया को वह इतने लंबे अरसे में भी पूरी तरह समझ नहीं पाया था। ऊचा कद, गठीला शरीर और गजब की फुर्ती। फिल्‍मों की दीवानी। बिना बात के उछल-कूद और हंगामा। ओढ़ने-पहनने के सलीके, बोलचाल की तमीज से कोई वास्‍ता नहीं। उसने शायद ही कोई बात अंशु से छिपाई हो, सिवाय अपने जीवनसाथी की पसंद के बारे में। उसे पैसे से बेपनाह मुहब्‍बत थी। हाल में उसे किसी पंजाबी फिल्‍म के डायरेक्‍टर ने बैंक में हीरोइन बनाने की पेशकश की। वो फौरन दौड़कर अंशु के क्‍यूबिकल में आई और बोली, ‘क्‍या में हीरोइन बन सकती हूं ? अंशु ने उसे सिरे से देखा और कहा, ‘किस बेवकूफ की पेशकश है ? और तुम क्‍या सारे कंप्रोमाइज कर लोगी ?’ प्रिया ने भी खीझकर कहा, ‘यू ब्‍लडी कंजर्वेटिस्‍ट।’ प्रिया ने उस डायरेक्‍टर को मना कर दिया और शाम को मुंह सुजाए फिर अंशु के पास चली आई। अंशु ने उसे उसकी पसंदीदा ड्रेस स्‍कर्ट और वेलेंशिया स्‍ट्रेस खरीदकर दी, तब जाकर मैडम का गुस्‍सा ठंडा हुआ। अगले तीन माह तक तकरीबन हर संडे वह अंशु के घर स्‍कर्ट पहनकर शाम तक उछलती रही। कभी डांस तो कभी तेज आवाज में टीवी चलाना। अंशु को कभी यह बुरा नहीं लगा, क्‍योंकि अपनी लाइफ में वह इन चीजों को हमेशा मिस करता रहा।
पता नहीं क्‍यों, अंशु को आज पुरानी बातें खूब याद आ रही हैं। उसे लगा कि वह अब किसी ने नहीं मिल पाएगा। रात के नौ बज रहे थे। कानपुर आने ही वाला था। वह आंखें बंद कर लेट गया। कानपुर स्‍टेशन आते ही मुसाफिरों की आवाजों ने अंशु की आंखें खोल दी। सामने की आरएसी सीट पर एक लंबा, हट्रटा कट्टा आदमी आया था। कोई 40 के आसपास उम्र होगी। बड़ी-बड़ी आंखें। ताव दी हुई मूंछें। वह एकटक अंशु को घूर रहा था, जैसे उसी की तलाश में आया हो। अंशु ने परदा लगाया तो थोड़ी राहत मिली।
दिनभर की भागादौड़ी से उसे थकान महसूस हो रही थी। खाने के कंटेनर को खोला तो भूख महसूस होने लगी। थोड़ा खाया और सीट पर पसर गया।
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सुबह आठ बजे जब आंख खुली तो वही मुच्‍छड़, मुस्‍टंडा सामने की खाली सीट पर पसरा मिला। अखबार पढ़ते हुए। अंशु को जागता पाकर फिर उसे घूरने लगा। आसपास की तमाम सीटें खाली थीं। शायद कई मुसाफिर दुर्गापुर में उतर चुके थे। उस शख्‍स ने पूछा, ‘ट्रेन सियालदह कितने बजे पहुंचेगी ?’ मुझे नहीं मालूम। आप बाहर बोर्ड पर देखिए। - अंशु ने चिढ़कर कहा।
अंशु ने लाबोनिता को मैसेज किया, ‘रीचिंग स्‍ट्रेट टू योर होम इन टाइम।’ स्‍टेशन के प्रस्‍थान गेट पर कई लोग बांग्‍ला और अंग्रेजी में आगंतुकों के नेम प्‍लेट के साथ खड़े थे। एक नाम अंशुमान गांगुली का भी था। चौंककर ठिठर गया अंशु। कमांडो जैसी नीली, छींट वाली वर्दी में लाल टोपी लगाए युवक ने फौरन आगे बढ़ते हुए कहा, ‘क्‍या आप ही अंशुमान गांगुली हैं ?
पर मैंने तो कोई गाड़ी नहीं मंगाई – अंशु हैरान था। आपने नहीं, अनुरूपा मैडम ने भिजवाया है, एट योर सर्विस। अंशु झल्‍ला पड़ा, ‘नो आई डोंट वांट एनी वेहिकल। इट्स पर्सनल। प्‍लीज टेल योर मैडम।’ घबराते हुए उस रंगरूट ने बहुत विनम्रता से आग्रह किया, ‘प्‍लीज सर। आप अभी जहां तक जाना चाहें, मैं छोड़ देता हूं। बाकी आप लॉग बुक में लिखकर दे दीजिएगा।’
अंशु को मानना पड़ा। उसने ड्राइवर से सीधे बेलघारिया चलने को कहा। गाड़ी में बैठकर उसने अपना मोबाइल टटोला। मोबाइल गायब था। उसने फौरन सबसे नजदीकी थाने में इसकी रिपोर्ट लिखवाई और अपना सिम लॉक करवाया। मोबाइल के साथ उसकी घड़ी भी गायब थी। शायद उसी मुच्‍छड़ का कमाल होगा। आजकल पाकिटमार भी राजधानी में सफर करने लगे हैं। - अंशु सोचने लगा।
उसने ड्राइवर से किसी बड़े मोबाइल शॉप पर गाड़ी रोकने को कहा। नया मोबाइल और सिम खरीदने में पूरे डेढ़ घंटे लग गए। लाबोनिता के घर बेलघारिया पहुंचने में अभी 40 मिनट और लगने थे। उसे लगा कि ड्राइवर को हां करके उसने कुछ गलत नहीं किया।
लाबोनिता के अपार्टमेंट के सामने उतरकर अंशु ने ड्राइवर से सख्‍त लहजे में कहा कि वह अपनी मैडम (अनुरूपा) को सूचित कर दे कि मैं सकुशल पहुंच गया हूं। मोबाइल गुम हो गया है। शाम तक नया नंबर मिलते ही बात कर लूंगा। उसे परेशान होने की जरूरत नहीं। ऑफिस का काम निपटाकर मैं खुद घर चला जाऊंगा। ड्राइवर एक स्‍वामीभक्‍त की तरह सिर हिलाता रहा।
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14 अप्रैल 2010
लाबोनिता की मां को गुजरे आज चौथा दिन था। कॉल बेल बजते ही लाबोनिता ने ही दरवाजा खोला। सफेद साड़ी, खुले बाल, सुर्ख आंखें (मानों रातभर रोई हो) और मुरझाया चेहरा। अंशु के अंदर आते ही उससे लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ी लाबोनिता। अंशु के लिए यह अपेक्षित था। पूरे घर में अकेली एक लड़की, जिसके सिर से मां का साया अभी-अभी उठा हो। अंशु ने लाबोनिता के सिर पर हाथ फेरा तो उसका रोना कुछ कम हुआ। बोली, ‘अब मेरा क्‍या होगा ? मैं कहां जाऊं ? कैसे जिउंगी ?
अंशु ने बड़ी शांति ने उसे एक चटाई पर बिठाया (घर में गमी होने पर तेरहवीं तक जमीन में बैठने की परंपरा है।) और फ्रिज में रखी बोतल एक गिलास में उड़ेलकर उसे देते हुए कहा, ‘मैं हूं ना। सब ठीक हो जाएगा।’
लाबोनिता : तुम्‍हें मालूम है, मैंने खुद इन हाथों से मां को मुखाग्‍नि दी। कोई नहीं था उस समय। सिवाय पड़ोसियों के। अब मेरा इस दुनिया में कोई नहीं। अब जल्‍दी से अगर पुश्‍तैनी मकान नहीं बिका तो मुझे सड़क पर भीख मांगनी पड़ेगी।
ऐसा कुछ नहीं होगा। तुम निश्‍चिंत रहो। मुझ पर भरोसा रखो। - अंशु ने यह कह तो दिया, पर उसे खुद नहीं मालूम था कि वह लाबोनिता की खोई हुई मुस्‍कान कैसे लौटाएगा।
अंशु को अभी बहुत से काम करने थे, बिना अपने परिवार को बताए कि वह कोलकाता आया है और लाबोनिता के घर पर है। उसे लाबोनिता की मां की अस्‍थियां घर लानी थी। दशगात्र पर पूजा-पाठ करवाना था। लेकिन लाबोनिता ने कहा कि वह अपने पिता की संपत्‍ति को बेचने के बाद ही वे सारे संस्‍कार करवाएगी, क्‍योंकि तभी मां की आत्‍मा का चैन मिलेगा।
उसने कहा, ‘तुम मां की अस्‍थियों को शमशान के लॉकर में रखवा दो। लौटकर मैं खुद उन्‍हें लेने जाऊंगी।’ बेटी की भावनाओं के आगे बहस करने की अंशु में हिम्‍मत नहीं थी। वाजिब भी था। जिस लड़की को इस बुरे वक्‍त में तमाम रिश्‍तेदारों में से किसी का सहारा नहीं मिला, उसके लिए सारी परंपराएं आडंबर ही तो बन जाती हैं।
उसने अंशु से नहाकर आराम से बैठने को कहा और किचन में घुस गई।
अंशु ने मां के कमरे के अंदर झांका तो उनका बिस्‍तर गायब था। शायद उनके साथ ही चला गया था। बगल के कमरे में पलंग (तखत जैसा) को पलटाकर जमीन पर बिस्‍तर लगा था।
नहाकर अंशु उसी बिस्‍तर में पसरा और आंखें मूंद लीं। पंखे की ठंडी हवा उसे सुकून दे रही थी। तभी लाबोनिता आकर बगल में बैठी। माथे का पसीना पोंछकर बोली, ‘क्‍या सोच रहे हो ? घर पर बताया कि नहीं ?
अंशु ने उसे बताया कि वह मां की बीमारी का बहाना बनाकर आया है, सो छुट्टी को लेकर निश्‍चिंत रहे। लौटते समय वह अपनी मां से मिलेगा।
तभी लाबोनिता ने उससे पूछा, ‘तो तुम मुझे छोड़कर चले जाओगे ?’ उसकी आंखें छलक आई थीं। इस एक जुमले ने अंशु पर जादू सा असर किया। लगा जैसे उसके सीने पर एक बड़ा बोझ हट गया है। उन सारे सवालों का जवाब मिल गया है जो उसे लगातार परेशान कर रहे थे। उसका तेजी से धड़कते दिल ने थोड़ी देर के लिए मानों काम करना बंद कर दिया।
अंशु ने सांस रोके ही कहा, ‘नहीं। हम साथ जाएंगे। जब तक तुम अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती, मैं तुम्‍हारे साथ हूं।’
इतना सुनना था कि लाबोनिता की आंखों ने एक बार फिर गंगा-जमुना बह निकली। ‘शोत्‍ती... ? ? कहकर वह अंशु ने लिपट गई।’
इस बार लाबोनिता की सांसें अंशु की नाक से टकरा रही थीं। उसके दिल की धड़कनें उछल-उछलकर बता रही थीं कि वह अंशु की इस बात से किस कदर खुश हुई। दोनों थोड़ी देर तक यूं ही लिपटे रहे। अचानक किसी चीज के जलने की बदबू से चौकन्‍ना हुए अंशु ने पूछा, ‘गैस पर कुछ चढ़ाया तो नहीं था ?
‘ओ मां...’ कहकर लाबोनिता फौरन भागी। लेकिन थोड़ी देर में चाय का प्‍याला उसके हाथों में था। दूध उफन गया था। ज्‍यादा नहीं गिरा। लो, चाय पीयो।
लाबोनिता की आंखें अभी भी गीली थीं। अंशु उसके सांवले चेहरे को गौर से देखने लगा। शर्माकर लाबोनिता ने पूछा, ‘यूं क्‍या देख रहे हो ?
कुछ नहीं। पहले से ज्‍यादा कमजोर हो गई हो। कुछ खा-पी नहीं रही हो ना ?
लाबोनिता : पिछले तीन दिन से कुछ नहीं खाया। आज तुम आए हो तो घर में चूल्‍हा जला है। तुम चाय पीयो और मैं फटाक से कुछ पकाकर आती हूं।
अंशु इस 26 साल की लड़की की दिलेरी देखकर भौंचक्‍का था। चाय पीकर वह किचन में घुसा। पूछा, कुछ मदद करूं ?
लाबोनिता ने मुस्‍कुराकर कहा, ‘रहने दो। हाथ कट जाएगा।’
अंशु ने कहा, ‘मैं आजकल शाम का खाना खुद पकाता हूं। आदत हो गई है।’
लाबोनिता : शादी के बाद भी रहेगी या खत्‍म हो जाएगी ? अंशु मुस्‍कुराकर रह गया।
लाबोनिता : सच कहूं तो बीते एक हफ्ते में तुम्‍हारे आने के बाद पहली बार हंसी हूं मैं। अगर एक-दो दिन और देरी करते तो शायद मैं भी मां के पास होती।
अंशु ने लाबोनिता का मुंह बंद कर दिया। कहा, ‘ऐसी अशुभ बातें नहीं करते। मुश्‍किलों में ही अपनों की पहचान होती है। सब ठीक हो जाएगा। प्रॉपर्टी ही तो बेचनी है।’
खाना बन चुका था। लाबोनिता ने अंशु से कहा कि वह नहाकर आती है। फिर दोनों साथ खाना खाएंगे। अभी पूरा दिन पड़ा था। अंशु फिर आराम से पसर गया।
करीब आधे घंटे बाद उसे बगल के कमरे से कुछ गुनगुनाने की आवाज सुनाई दी।
हड़बड़ाकर उसने झांका तो लाबोनिता लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी पहने भगवान के सामने कुछ गुनगुना रही थी...’तोमाय की दिए पूजिबो बोलो कि आछे आमार...’। अंशु के कदमों की आहट सुनकर वह पलटी और मुस्‍कुराई।
अंशु हैरान था। लाबोनिता ने आंखों में काजल लगाया था। बड़ी कजरारी आंखें और खुले बाल। साफ, सांवला रंग और माथे पर घूंघट। हाथ जोड़कर वह भी उसके करीब बैठ गया। लाबोनिता ने ‘रक्‍त जबा’ (लाल रंग का फूल जो मां काली पर ही चढ़ता है) का एक फूल अंशु के माथे से छुआकर मां के चरणों में रख दिया।
अंशु अपनी मां शारदा देवी के पास भी यूं कभी नहीं बैठा था। वे सुबह पांच बजे उठकर दो घंटे तक पूजा करती थीं। पता नहीं आज उसे क्‍या हो गया ? शायद लाबोनिता की वही कशिश...
लाबोनिता ने संथाली स्‍टाइल से साड़ी पहनी थी। घुटनों तक। पूजा करने के बाद उसने अंशु से कहा, ‘मैं चेंज करके आती हूं।’
अंशु : बहुत खूबसूरत लग रही हो। रहने दो। घर पर ही तो हैं।
चटाई पर ही थाली-कटोरियां सज गईं। लाबोनिता ने अंशु से पहला कौर खिलाने की जिद की। काफी ना-नुकुर के बाद अंशु को बात माननी पड़ी।
लेकिन यह क्‍या!  लाबोनिता ने अंशु को अधूरा कौर खिलाया और बाकी खुद खा लिया।
अंशु : दिमाग तो ठीक है तुम्‍हारा ?
लाबोनिता : मैंने अपने खेवनहार को भोग चढ़ा दिया है। प्रसाद खुद खाया। इसमें गलत क्‍या है ? मेरी नैया तो तुम्‍हारे ही भरोसे है अंशुमान बाबू।
अंशु की आंखें डबडबा आईं। लेकिन लाबोनिता की आंखों में अजीब सी चमक थी। मानों ग्रहण काल खत्‍म हो चुका था। आसमान फिर चांद की रोशनी में जगमग था।
पर क्‍यों ?

(शेष अगले अंक में) 

सोमवार, 11 मार्च 2013

चक्रव्यूह: 8 - अंजान रोशनी के पीछे भागता पतंगा


अप्रैल 2010
दिनभर की मीटिंग के बाद अंशु ने अपना मोबाइल ऑन किया तो लगातार छह मिस्‍ड कॉल के नोटिफिकेशन और दो मैसेज दिखे। लाबोनिता के थे। ‘मॉम इज नो मोर।’, ‘डोंट नो व्‍हाट टू डू। इन डीप ट्रबल। प्‍लीज हेल्‍प।’ अंशु को घबराहट सी हुई। बीते तीन महीने में लाबोनिता से कई बात बात हुई। हर बार यही सुना कि मां का इलाज चल रहा है। सब ठीक है। अब यूं अचानक...
उसका सिर भारी हो रहा था। एक कप कॉफी से राहत मिलती, पर उसे तेजी से सूने हो रहे दफ्तर की कैंटीन में बैठने के बजाय किसी सड़क किनारे ठीहे पर गर्मागर्म कॉफी पीना ठीक समझा। वहां लाबोनिता से बात भी हो सकती थी। अंशु ने गाड़ी स्‍टार्ट की और ठीहे की ओर चल पड़ा।
दादा, एक कप बढ़िया कॉफी देना...बिसनिया दादा अंशु को देखकर मुस्‍कुराकर बोले, ‘थोड़ा टाइम लगेगा बबुआ’
अंशु को कोई दिक्‍कत नहीं थी। कोई 12 साल हुए, सीवान से अपनी पोलियोग्रस्‍त बेटी का इलाज करवाने दिल्‍ली आए थे बिसनिया दादा। कई हफ्तों तक सड़क पर पड़े रहने के बाद इलाज तो मिला, पर गांव में पत्‍नी और बेटे को मलेरिया ने लील लिया। इस घटना के बाद बिसनिया दिल्‍ली में ही बस गए। बेटी स्‍कूल जाती है। उनकी बेमिसाल कॉफी के किसी दरियादिल दीवाने ने अंसारी नगर में दो कमरों की एक खोली उन्‍हें दे रखी है। गुजारा हो जाता है। बिसनिया हमेशा हंसते हैं, लेकिन उनकी हंसी के पीछे के दर्द को अंशु जैसे चंद लोग ही महसूस कर पाते हैं।
एक स्‍टूल पर बैठकर अंशु ने लाबोनिता को फोन लगाया। कॉल वेटिंग में रहा देर तक। थोड़ी देर बाद लाबोनिता की भारी आवाज सुनाई दी। मानों देर तक रोई हो।
अंशु की धड़कनें तेज हो रही थीं। उसने पूछा, ‘सॉरी, मैं दिनभर मीटिंग में रहा। पर यूं अचानक ?
मां को गले का कैंसर था। पिछले एक माह से दवाएं असर नहीं कर रही थीं। हार्ट पर असर पड़ा और कल रात धड़कनें बंद हो गईं।
अंशु : कैसे मैनेज किया ये सब ? अंशु को अचानक अहसास हुआ कि वह कुछ ज्‍यादा ही कठोर हो रहा है। लेकिन अब तो जुबां फिसल चुकी थी।
‘दूर के मौसा-मौसी यहां रहते हैं। बाकी मोहल्‍ले के लोग तो थे।’
अंशु : तुम तो बिल्‍कुल अकेली हो गई ?
‘हां। पर ये तो एक दिन होना ही था। फिक्र है शिबसागर के पुश्‍तैनी मकान की। रिश्‍तेदारों की भी उस पर नजर है। अगर उस पर कब्‍जा हो गया तो मेरे पास गुजारे के लिए फिलहाल कुछ नहीं होगा। नौकरी मिलने में वक्‍त लगता है। सर्वाइवल का सवाल है।’
अंशु : तो मुझसे क्‍या मदद चाहती हो ? न चाहते हुए भी सख्‍त हो रहा था अंशु। शायद जुबां आज साथ नहीं दे रही थी।
‘मैं अकेली ये सब नहीं कर सकती। क्‍या तुम मदद करोगे? तीन-चार दिन में मामला सैटल हो जाएगा। तुम्‍हारा एहसान कभी नहीं भूल सकूंगी।’
अंशु : ‘पर अभी छुट्टी के लिए कोई वजह बतानी होगी। नए कारोबारी सीजन की शुरुआत है। टारगेट सेट हो रहे हैं। खैर, मैं देखता हूं।’
‘कैसे भी मैनेज कर लो। प्‍लीज...’
अंशु : ओके। कल बात करता हूं। अपना ध्‍यान रखना। बाय।
कॉफी का स्‍वाद कुछ कड़वा था। बिसनिया दादा ऐसी कड़क कॉफी नहीं बनाते। लेकिन उन्‍होंने शायद अंशु के चेहरे पर बढ़ते तनाव को पढ़ लिया था। अंशु को कॉफी अच्‍छी लगी।
पर उसके लिए आगे का सवाल और उलझाने वाला था। छुट्टी कैसे मिलेगी। घर में क्‍या बताए। यूं अचानक क्‍यों आए? आए हो तो घर पर रहो, बाहर क्‍यों ? अनु कैसी है ? बात होती है कि नहीं ? आगे का क्‍या सोचा ?
मां के ढेर सारे सवाल... कॉफी का असर खत्‍म हो चुका था।
दिल्‍ली आते ही अनु अपने काम में व्‍यस्‍त हो गई थीं। बीच में ई-मेल कर उसने बताया था कि वह किसी खास ‘मिशन’ में है। आईबी वालों से इससे ज्‍यादा कुछ पूछा भी नहीं जा सकता। अक्‍सर अंशु को अनु की फिक्र होती है। काफी समझाया कि डेस्‍क वर्क ले लो। पर वह तो फील्‍ड की दीवानी है। मेडल जो हासिल करना है...
सोच में डूबा वह गाड़ी में बैठा। उसे प्रिया की याद आई। ऐसे कई नाजुक मौकों पर उसी ने राह दिखाई थी।
अंशु ने फोन मिलाया, ‘कहां हो ?
प्रिया : जनकपुरी मार्केट में।
अंशु : अगर दिक्‍कत न हो तो हम कहीं मिल सकते हैं ?
प्रिया : तुम तो खुदा के बंदे की तरह टपके। मैं सोच ही रही थी कि इतनी सारी शॉपिंग के बाद कोई लिफ्ट मिल जाए...
अंशु : भाड़ा लगेगा और सर्विस टैक्‍स भी।
प्रिया : अब फटाफट आ भी जाओ।
करीब 45 मिनट बाद अंशु जब वहां पहुंचा तो प्रिया को ढेर सारे सामानों से लदा-फदा पाया। रसोई के सामान, कपड़े, बाल्‍टी, टंबलर.... शायद ही कुछ छोड़ा हो। अंशु को देखते ही खुशी से बेहाल हो गई प्रिया।
गाड़ी में प्रिया चहकी जा रही थी। देखो मैंने बहन के लिए यह खरीदा... ये पापा के लिए...बहुत मोलभाव करना पड़ता है....वरना ये जालिम लूट ही लें...
अंशु को इससे कोई दिलचस्‍पी नहीं थी। उसे लगा वह टैक्‍सी ड्राइवर है। उसे मेमसाब को छोड़ना है... बस।
प्रिया : क्‍या हुआ बाबू मोशाय ? आज सदमे में लग रहे हो। बॉस ने हड़काया क्‍या ?
अंशु : नहीं यार। मां की तबीयत गड़बड़ है। घर की याद आ रही है। पर बॉस जालिम है। यूं आसानी से छुट्टी नहीं देगा।
वाकई आज अंशु की जुबां साथ नहीं दे रही थी। बेवजह मां को बीच में घसीटा। पर अब कुछ नहीं हो सकता था। बात जुबां से निकल चुकी थी।
प्रिया : डिनर करवा रहे हो तो एक आइडिया दे सकती हूं। खोपड़ी तो पेट पूजा के बाद ही चलेगी।
अंशु : नो इश्‍यू। क्‍या आइडिया है ? उसने गाड़ी हौज खास की तरफ मोड़ी।
प्रिया : एक क्‍लाइंट है कोलकाता में। शिपिंग बिजनेस है। अग्रवाल हैं। अरबों का कारोबार। जहाज चलते हैं। बैंक को करोड़ों का बिजनेस देते हैं। अब दिल्‍ली में कारोबार फैलाना चाहते हैं। डील हो सकती है।
अंशु मानों उछल पड़ा। उसे लगा कि वह फौरन संकटमोचक प्रिया को गले लगा ले। लेकिन फिर संयत होकर कहा, ग्रेट। क्‍या नंबर है उनका ?
प्रिया ने अपना नोटबुक निकाला। ये रहा....अंशु की एक बड़ी उलझन दूर हो चुकी थी। उसके लिए उस क्‍लाइंट से डील करना बाएं हाथ का खेल था।
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हौज खास का पार्क बलूची रेस्‍त्रां। अमूमन विदेशी यहां आते हैं या फिर दिल्‍ली के धनाढ्य प्रेमी जोड़े। शाम ढलने के साथ फिजा नशीली हो जाती है। मद्धम संगीत के बीच कहीं आंखों में बात होती है तो कहीं जिस्‍मों की छुअन दिल की आवाज बन जाती है।
हालांकि, अंशु के यहां आने की सबसे बड़ी वजह बेहतरीन नॉन वेज डिशेज हैं। प्रिया के साथ आज वह पहली बार यहां आया है। इसे देखकर अचकचाए मैनेजर ने फौरन सबसे कोने का टेबल आवंटित कर दिया। सुर्ख गुलाब के एक कॉम्‍पलीमेंट्री बुके के साथ।
शॉपिंग के बाद बेहाल हो चुकी प्रिया बुके पाकर फूले नहीं समाई।
टेबल पर बैठकर उसने नैपकीन से आंख के पोरों को पोंछा। शायद खुशी के आंसू थे। उसे बिना वजह ऐसी खुशी अंशु के साथ ही मिलती है।
काफी देर तक बुके को निहारने के बाद वह बोली, ‘यू नो। आज मैं बहुत टेंशन में थी। दो दिन पहले लड़के वाले देखकर गए हैं। दहेज और शादी का खर्च मिलाकर कुल 12 लाख का बजट बनता है। पापा तैयारी में जुटे हैं और मैं शादी न करने पर अड़ी हूं। बहनों की पढ़ाई पूरी करवानी है मुझे।’
नैपकीन अभी भी उसके हाथ में था। शायद जरूरत थी। यह दो पीढ़ियों, दो विचारधाराओं के बीच की कश्‍मकश थी। भारतीय समाज में शादी को अटूट बंधन कहा जाता है, पर यह स्‍त्री को हमेशा के लिए बांधने वाला ही होता है।
चेहरे पर हमेशा मुस्‍कुराहट लेकर चलने वाली प्रिया का यूं अचानक भावुक हो जाना अंशु के लिए अजीब सा था। सो उसने माहौल को हल्‍का करने के लिए कहा, ‘तो बाल्‍टी-टंबलर लेकर ससुराल जाओगी ?
खीझकर प्रिया ने अंशु को चिकोटी काटी। बोली, ‘उड़ा लो मजाक। शादी करके रोहतक चली जाऊंगी, फिर आना वहां आइडिया लेने।’
अंशु मुस्‍कुराया। बोला कुछ नहीं। उसने मेन्‍यू कार्ड प्रिया की ओर बढ़ाया और कहा, ‘बकरा हलाल होने की इजाजत मांगता है जनाब।’
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दो दिन बाद :
कल रात से अंशु की बाईं आंख फड़क रही थी। बंगाल में इसे किसी अनहोनी की आहट माना जाता है। घर पर मां ऐसे में फौरन नजर उतारती हैं। पर दिल्‍ली में ऐसा करने वाला कोई नहीं था। अंशु का दिल जोरों से धड़क रहा था। पहली बार सबसे झूठ बोला था उसने। उस एक लड़की के लिए, जिसे मिले बमुश्‍किल चार महीने भी नहीं हुए थे।
उसे पता नहीं था कि वह लाबोनिता की बात पर इतना कैसे यकीन कर लेता है। पर उसके हर फोन पर एक अजीब सी कुलबुलाहट महसूस करता है अंशु। क्‍यों ? इस सवाल का जवाब नहीं ढूंढ़ सका है वह। जवाब तलाशने की चाह भी दिलचस्‍पी पैदा करती है और शायद अंशु इसीलिए पतंगे की तरह विस्‍मृत कर देने वाली रोशनी के पीछे भागने पर मजबूर था।
पैकिंग के बाद उसने लैपटॉप ऑन कर अनु को मेल किया। बस इतना ही लिखा, ‘विल बी इन कोलकाता फॉर 3-4 डेज। इट्स ऑफिशियल।’
आधे घंटे में जवाब भी आ गया। मिष्‍ठी के लिए एक घड़ी खरीदी है। अगले हफ्ते कोलकाता जाकर खुद देने की सोच रही थी। तुम जा रहे हो तो दे देना। मां को बोल देती हूं स्‍टेशन पर तुम्‍हें दे देंगी।
अंशु को यह और उलझन में डाल गया। घड़ी देने तो घर जाना होगा और वहां जाना मतलब कहीं और निकल नहीं सकते। उसने जवाबी मेल करना चाहा पर नहीं कर पाया। क्‍या कहता ?

ट्रेन में बैठकर अंशु को न जाने क्‍यों लग रहा था मानों कुछ बड़ी घटना होने वाली है। क्‍या होगा ? मां-बाबूजी ठीक तो हैं ? अंशु ने घर फोन लगाया। सब हैरत में ? ठीक है सब-कुछ।
फिर भी दिल धड़क रहा है। उसने सुबह से कुछ नहीं खाया, पर भूख नहीं लग रही थी।
उसने सोचा, जो होगा देखा जाएगा।

ट्रेन चल पड़ी थी...
(अगले अंक में : क्‍या है अंशु के दिल की धड़कनों का राज... क्‍या वाकई आगे कुछ बुरा होने वाला है ?

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

चक्रव्यूह -7 : गुजरता वक्त थमता नहीं, थम जाए तो गुजरता नहीं


आज पुल्‍टी की शादी है। सुबह से उसका चेहरा उतरा हुआ है। खाते-पीते घर में ब्‍याहे जाने के बाद भी लड़की को नैहर छूटने की पीर देर तक सताती है। चेहरा तो अंशु का भी उतरा हुआ है। उसे पुल्‍टी की विदाई के गम से ज्‍यादा कल के हादसे की फिक्र सता रही है। कहीं अनु को असलियत मालूम तो नहीं पड़ गई ? किसका हाथ होगा इसके पीछे ? निशाना कौन था मैं या अनु ?
अंशु का दिल जोरों से धड़कने लगा। उसने अनु को मैसेज किया, ‘आर यू ओके ?
‘फाइन, डोंट वरी।’ स्‍माइली के साथ अनु का जवाब देखकर अंशु की घबराहट थोड़ी कम हुई।
शादी वाला घर। ढेर सारा काम पड़ा था। शादी रात को होटल में होनी थी। उससे पहले वरमाला और रिसेप्‍शन था। ... और फिर काल रात्रि...। (बंगाल में फेरों के बाद दूल्‍हा-दुल्‍हन को सारी रात जागना पड़ता है। इसे संकट की रात कहते हैं, जब बुरी शक्‍तियां हावी होती हैं। सुबह देव दर्शन के बाद ही बाकी की रस्‍में पूरी की जाती हैं।)
तैयारियों में अंशु इस कदर उलझा कि उसे वक्‍त का ध्‍यान ही नहीं रहा। ठीक चार बजे अनु ने फोन किया, ‘कहां हो ? मुझे तुमसे बात करनी है।’
‘क्‍क्‍क क्‍या ? मैं रिसेप्‍शन वेन्‍यू में हूं। तुम यहीं आ जाओ।’ अंशु का दिल फिर धड़कने लगा था।
मुझसे क्‍यों बात करना चाहती है अनु ? कहीं उसे.... ? ... ओ मां...
उसने घबराकर लाबोनिता को फोन लगाया, पर उसने रिसीव नहीं किया।

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आधे घंटे बाद रिसेप्‍शन स्‍थल पर लाल बत्‍ती सफारी आकर रुकी। एके-56 रायफलों से लैस सादे कपड़ों में दो हट्टे-कट्टे जवानों ने दरवाजा खोला और अनु बाहर उतरी। अंशु इस सिक्‍योरिटी की वजह समझ चुका था।
अनु ने छूटते ही कहा, ‘तुम अब अपनी कार से कहीं नहीं जाओगे। तुम भी उनके निशाने पर हो सकते हो। ये गाड़ी और गार्ड अब चौबीसों घंटे साथ होंगे।’
‘पर बात क्‍या है ?
वो तुम नहीं समझोगे। जो पकड़े गए हैं, उन्‍हें यहां कुछ सपोर्ट मिल रहा है।

यह बात चौंकाने वाली थी। अनु के पास इसके पीछे ठोस आधार जरूर था। मसला अंशु की उम्‍मीद से कहीं ज्‍यादा सीरियस था। जब खुद की गर्दन भी फंसी हो तो इंसान के पास विरोध के विकल्‍प सीमित हो जाते हैं। लाबोनिता का राज खुलने के डर से अंशु ने कोई ना-नुकुर नहीं की।
अनु घर जा रही थी। उसने ड्रायवर से कहा कि उसे ड्रॉप करने के बाद वह सीधे गाड़ी लेकर यहीं आ जाए। लेकिन अंशु नहीं चाहता था कि अनु अकेली घर जाए और मां को कल के हादसे के बारे में कुछ बता दे। कई सवालों से बचने के मकसद से उसने अनु के साथ चलने का फैसला किया।

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पुल्‍टी भट्टाचार्य (पूरा नाम पुलोमा भट्टाचार्य, मां पुल्‍टी बुलाती हैं) अंशु की मौसेरी बहन है। तीन बहनों में सबसे छोटी और लाड़ली। कोई भाई नहीं, सो अंशु ही इकलौता भाई है। लिहाजा अंशु का पूरा परिवार ब्‍याह वाले घर के लिए तय समय से दो घंटे पहले ही निकल पड़ा था। अनु को लेकर घर पहुंचने पर अंशु को रसोइए राखाल के सिवा और कोई नहीं मिला। उसने मां को फोन किया तो वजह समझ आई। शारदा देवी ने बेटे से कहा कि वह अनुरुपा को लेकर जल्‍दी आ जाए।


घर के अंदर आकर अंशु ने अनु से पूछा, ‘अब बताओ, असल बात क्‍या है ?
‘तुम इतने परेशान क्‍यों हो ? पकड़े गए चारों लोगों ने कुबूला है कि उनका नाता हूजी से है। वे यहां क्‍यों हैं, क्‍या करने आए हैं, किनसे उनके लिंकेजेस हैं इन सबके बारे में पूछताछ चल रही है। बस इतना ही बता सकती हूं।’
कोई खतरा तो नहीं – घबराए अंशु ने तसल्‍ली करने के लिए पूछा।
‘नहीं, पर सुरक्षा जरूरी है।’
इतना कहकर अनु तैयार होने चली गईं। अंशु का सिर दर्द कर रहा था। उसने राखाल से फटाफट दो गर्मागर्म कॉफी और कुछ पकौड़े लाने को कहा ही था कि फोन बजने लगा।
लाइन पर लाबोनिता थी। ‘हाय, सॉरी। फोन साइलेंट पर था, सो देख नहीं पाई। यू नो मां इज नॉट वेल।’
‘मुझे तो बस फिक्र हो रही थी इसलिए फोन किया था... सब ठीक तो है न ?’ अंशु ने अपनी घबराहट छिपाने की पुरजोर कोशिश की, लेकिन लाबोनिता ने पहचान ही लिया।
‘क्‍यों ? क्‍या हुआ ? सब ठीक तो है न ? तुम घर पर हो या शादी के मंडप में ?’ ढेर सारे सवाल। पर अंशु ने सबको टालते हुए कहा, ‘अखबार में पढ़ा होगा, कल चार आतंकी गिरफ्तार हुए हैं शहर में...इसीलिए’
‘मैं भी किसी आतंकी से कम नहीं हूं।’
‘ओके, टेक केयर, बाय।’
राखाल ने कॉफी के दो प्‍याले और गर्मागर्म पकौड़े मेज पर रख दिए। पूछा, ‘दीदी मोनी के डाकबो ? (क्‍या दीदी यानी अनु को बुला दूं ?)’
साठ की उम्र को पार कर चुके राखाल गांगुली परिवार में काम करने वाली तीसरी पीढ़ी की नुमाइंदगी करते हैं। अंशु को उन्‍होंने गोदी में खिलाया था। कोलकाता में अब बहुत कम ही ऐसे घर बचे हैं, जहां एक ही परिवार के साथ रहते काम करते किसी शख्‍स की तीन पीढ़ियां गुजर चुकी हों। इतना मान और सहारा कम ही लोग दे पाते हैं कि सैंकड़ों मील दूर किसी गांव में एक नौकर की बेटियां ब्‍याह दी जाएं और घर में किसी चीज की कोई कमी न हो।
अंशु के हां करने पर राखाल ने दीदी मोनी को आवाज लगाई। जवाब मिला, ‘टिंकू के पाठाओ बाबा। (टिंकू को बुला दो।)’


अब क्‍या हुआ ? कॉफी ठंडी हो रही है.... इतना कहते हुए मां के कमरे में दाखिल होते ही अंशु को जोर का झटका लगा... और वह घबराकर बाहर आ गया। उसका दिल जोरों से धड़कने लगा।
अंदर से अनु ने आवाज लगाई.... कम ऑन...मेरी साड़ी का पल्‍लू फंस गया है यार। मदद करो।
‘पर... तुम... नहीं’, अंशु ने लगभग घिघियाते हुए कहा।

भारत में साड़ी पहनने के 18 (शायद इससे भी ज्‍यादा हों) तरीके प्रचलित हैं। बंगाल में साड़ी को कमर में लपेटने के बाद पल्‍लू को सामने से लाकर बाईं ओर से लपेटकर दाईं ओर किया जाता है। इससे शरीर का कोई भी हिस्‍सा नहीं झांक पाता। पल्‍लू को घूंघट बना लें तो उसके सरकने की संभावना भी कम ही रहती है।
लेकिन अनुरुपा 5 गज की नई बालुचरी साड़ी (बंगाल की सबसे महंगी साड़ियों में से एक) को कुछ अलग ही तरीके से पहनने की कोशिश में थी। नतीजा, झुंझलाई हुई अनु ब्‍लाउज पहने मदद की गुहार लगा रही थी और अंशु उसे इस हालत में देखकर अंदर जाने की हिम्‍मत नहीं कर पा रहा था।
‘कम ऑन, गेटिंग लेट यार। हेल्‍प मी।’
धड़कते दिल से अंशु कमरे के अंदर गया तो उसे हंसी आ गई। स्‍लीवलेस, लो कट ब्‍लाउज पहने अनु पीठ पर अटके पल्‍लू को खींचकर निकालने की नाकाम कोशिश में थी।
‘बिल्‍कुल भूतनी लग रही हो तुम’, यह कहते हुए अंशु ने उसे सीधे खड़े रहने को कहा और फिर अटके ‘मसले’ को सुलझाने में जुटा।
खींचतान में सिल्‍क की साड़ी के रेशे मुसीबत में पड़ गए थे और अनु के नेकलेस की पिन बुरी तरह से टेढ़ी हो गई थी। अंशु ने बड़ी होशियारी से उसे अपने दांतों से सीधा किया तो अनु के शरीर में बिजली सी दौड़ गई। इतने साल में पहली बार उसे अपने स्‍त्री होने का अहसास हुआ था। यह छुअन कुछ अलग ही थी। मन के तारों को झकझोरने वाली।
उधर, अंशु ने उलझन को सुलझाने के बाद भोलेपन से कहा, ‘लो अब सब ठीक है।’
अनु को अब पल्‍लू जमाने में दो मिनट भी नहीं लगे।
उसने अंशु की ओर पलटकर कहा, ‘क्‍या अब भी भूतनी लग रही हूं।’
अंशु ने उसकी डबडबाई आंखों में झांका और फिर एकाएक उसे अपनी बांहों में ले लिया।
वे दो पल शायद दोनों की जिंदगी में सबसे लंबे पलों में से थे। अनु की आंखों से काजल धुल रहा था तो अंशु ने भी भर्राई आवाज में कहा, ‘सॉरी, यू आर मोस्‍ट प्रेशियस। आई वाज जोकिंग।’
अनु एक सुसंस्‍कृत लड़की थी। उसने मामला संभालते हुए कहा, ‘जाओ, तैयार हो लो। बहन की शादी है। बन-ठनकर चलना है।’
‘और कॉफी ?
‘उसकी अब जरूरत नहीं है’, अनु ने मुस्‍कुराकर कहा।

जीवन में कई मौके ऐसे आते हैं, जब मन करता है वक्‍त को रोक लें। लेकिन ऐसा होता नहीं है। दोनों ने वक्‍त से यही गुजारिश की थी, लेकिन वह थमा नहीं। वह अपनी रफ्तार से बढ़ रहा था, सारी रुमानियत, जज्‍बातों को समेटे हुए।

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दोनों के बाहर निकलते ही जवान मुस्‍तैद हो गए। सफेद टाटा सफारी में एक आगे और दूसरा पीछे, वॉकी-टॉकी और बंदूक से लैस।
गाड़ी में अनु ने हौले से अंशु का हाथ थाम लिया।
अंशु की हिचकिचाहट भांपकर वो बोली, ‘ये कमांडो हैं। इन्‍हें किसी से कोई मतलब नहीं। जब तक हम साथ हैं, कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मैं तुम्‍हारे लिए भगवान से भी लड़ सकती हूं। बस हमेशा मेरे साथ रहना।’
उसकी आंखें एक बार फिर डबडबा आई थीं।
‘मैं हमेशा तुम्‍हारे साथ हूं। दूर होकर भी...हमेशा पास’, आज अंशु की जुबां उसके काबू में नहीं थी।

पिछले चार दिनों में उसने अनु को बचपन की बिछड़ी सबसे अच्‍छी दोस्‍त के रूप में देखा था। मगर आज बात कुछ और थी। अनु एक बेहद खूबसूरत लड़की है। इतनी खूबसूरत कि उसे पाने की हसरत हर जवां मर्द करे। अंशु में यह बदलाव शायद बीती रात के हादसे के बाद आया था। गहरी सांस लेकर उसने टाई की नॉट कसी और इत्‍नीमनान से बैठ गया। दुनिया के सबसे खुशनसीब इंसान की तरह।
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शादी में सभी की कौतूहल का केंद्र अनु ही थी। शारदा देवी ने अपने कीमती गहने उसके लिए ही छोड़े थे। फोन पर उन्‍होंने सख्‍त हिदायत दी थी, ‘संवरने में कुछ भी कमी न हो।’
... और अनु ने भी मां का कहना मानने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शारदा देवी ने उसे देखते ही एक छोटा सा काला टीका लगा दिया।
अनु को देखकर उससे लिपट गई पुल्‍टी। रोते हुए बोली, ‘दीदी, आप कहीं नहीं जाओगी। विदाई तक कहीं नहीं जाने दूंगी।’
मेहमानों का आना शुरू हो चुका था। गांगुली और बोस परिवार के साथ अनु इस कदर जा घुली थी कि कोई नहीं कह सकता था कि उसके लिए ये आयोजन बेगाना है। हर मेहमान उसे देखकर केष्‍टो बाबू या शारदा देवी से पूछता, ‘एई मे टा के ? (ये लड़की कौन है ?)’
सबको एक ही जवाब, ‘मेरी बेटी है।’

बंगाल की परंपराएं, अपनापन, रिश्‍तों की अहमियत और बेपनाह प्‍यार इसकी सरहद से बाहर विरले ही नजर आता है। ऐसे लाखों प्रवासी बंगाली परिवार होंगे, जिन्‍हें अपनी मिट्टी से जुदाई का दर्द हमेशा सालता है। शायद इसी वजह से लाख मुफलिसी के बावजूद बंगाली भद्र मानुष अपनी मिट्टी से जुदा होने की सोच भी नहीं पाते। अनु भी प्रवासी बंगालियों की जमात में शामिल थी, सो उसके लिए सब-कुछ बड़ा ही दिलचस्‍प और मोहित कर देने वाला था।


थोड़ी देर बाद सवाल उठा कि दुल्‍हान के साथ स्‍टेज पर कौन बैठेगा। पुल्‍टी से पूछा गया तो उसने झट से ख्‍याली (बड़ी बहन) और अनु का हाथ थाम लिया। भौंचक्‍की अनु कुछ बोल भी नहीं पाई। बारात बस आने ही वाली थी। वरमाला का समय भी हो चला था। पंडाल में शहनाई की मीठी धुन अनु के सपनों को सातवें आसमान को छूने लगी।
उधर शारदा देवी ने यहां-वहां मंडराते अंशु को झाड़ लगाई और अनु के साथ रहने को कहा और दुल्‍हन के कमरे में चली गईं।

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बारात के आगमन की सूचना आसमान में छूटती आतिशबाजियों ने दे दी थी। अनु ने मुस्‍कुराते हुए कसकर अंशु का हाथ कसकर पकड़ लिया। सपने गर आंखों के सामने सच होने लगें तो इंसान अपने यकीन पर यकीन नहीं कर पाता। कुछ ऐसा ही हाल अनु का था। उसके बचपन का ‘दूल्‍हा’ पास खड़ा था, हाथों में हाथ डाले। बात भले ही अंशु की बहन के सपनों में रंग भरने की थी, लेकिन उन रंगों के छींटे अनु के ख्‍वाबों की दुनिया को भी रंगीन बना रहे थे।

अभी रात बाकी थी... और वक्‍त अब जाकर ठहर सा गया था।


(आगे पढ़ें : क्‍या अंशु लाबोनिता फिर लाबोनिता से मिलेगा ? क्‍या वाकई आतंकियों का निशाना अनु थी या कोई और ?)

Disclaimer: इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं पूर्णत: काल्‍पनिक हैं। किसी के व्‍यक्‍तिगत जीवन या उससे जुड़ी बातों से इनका कोई लेना-देना नहीं। किसी के लिए यथार्थ और काल्‍पनिकता के बीच बेहद महीने फर्क हो सकता हैलेकिन इसके लिए लेखक की कल्‍पनाशीलता और रचनात्‍मकता कतई जिम्‍मेदार नहीं है।   

© इस कहानी का किसी भी स्‍वरूप में पुन: प्रस्‍तुतिकरण कॉपीराइट के नियमों का उल्‍लंघन माना जाएगा।

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

चक्रव्यूह -6 : कौन शिकार और शिकारी कौन ?


शारदा देवी को अनुरुपा में शायद अपनी बहू नजर आ रही थी। उसके जाते ही बोलीं, ‘की लोक्‍खी मे’ (लक्ष्‍मी जैसी लड़की है)। अंशु हंस पड़ा तो मिठू ने टोका, ‘दादा को भी पसंद है...’। लेकिन मां कुछ नहीं बोलीं। उठकर किचन की ओर चली गईं और इधर अंशु अपनी दोनों बहनों और बाबू के साथ पुल्‍टी शादी मिलने निकल पड़ा।

शारदा देवी का मन आज रसोई में नहीं लग रहा था। राखाल को जिम्‍मा सौंपकर वह सीधे केष्‍टो बाबू के पास आईं और बोलीं, ‘शुनछो, मे टा की खूब भालो। टिकूर संगे बेश भालो लागबे। (सुनते हो, लड़की बहुत अच्‍छी है। टिकू : अंशु के बचपन का नाम : के साथ खूब जंचेगी)’। केष्‍टो बाबू अब तक अखबार का आखिरी पन्‍ना पढ़ने तक जमकर धूप सेंक चुके थे। वे पड़ोस के मित्रा बाबू के घर शतरंज की एक बाजी जमाने की सोच ही रहे थे कि पत्‍नी आ धमकीं। टालने के अंदाज से वो बोले, ‘जो तुम ठीक समझो करो। मैंने तो उसे हमेशा अपनी बेटी माना है। बहू होगी तुम्‍हारी। मेरे लिए तो बेटी ही रहेगी।’

शारदा देवी ने पति को उन कंगनों के बारे में बता दिया, जो उन्‍होंने अनु को दिए थे। साथ ही यह भी कि वह बेटे के साथ दिल्‍ली जा रही हैं और वहां मौका मिलते ही वह चटर्जी बाबू से बात कर बाकायदा माफीनामे के साथ अनु का हाथ मांग लेंगी। मां तो मां होती है। बेटा/बेटी जवान हो जाएं तो उन्‍हें घर से बाहर हर लड़के में दूल्‍हे का अक्‍स नजर आता है। शारदा देवी पुराने ख्‍यालों की नहीं थीं। उन्‍होंने बीए पास कर रखा था। अनु को उन्‍होंने बचपन से पाला था। उसका स्‍वभाव जानती थीं वह। फिर भी उन्‍होंने बेटे और भावी बहू से इस बारे में बात करने का फैसला किया।

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19 जनवरी 2010 : अंशु को कोलकाता आए 48 घंटे से ज्‍यादा बीत चुके थे। बीते छह दिनों में उसने लाबोनिता से एक बार भी संपर्क नहीं साधा था। सुबह नींद से उठते ही अंशु को जोर की हिचकी आई। उसने लगा शायद कोई याद कर रहा है। ‘कौन हो सकता है ? शायद प्रिया या लाबोनिता ?’ उसने सेलफोन में झांका...शायद प्रिया का ही कोई मैसेज हो...। अनुमान गलत निकला तो उसने फटाफट फ्रेश होकर लैपटॉप उठाया नाश्‍ते की टेबल पर पहुंच गया। बेटे को लैपटॉप के साथ देखकर बिफर पड़ी शारदा देवी। लेकिन अंशु को कोई फर्क नहीं पड़ा। उसने देखा कि फेसबुक पर लाबोनिता ने लगातार मैसेज भेजे थे। व्‍हेयर आर यू ? आर यू ओके ? आई एम रियली वरीड... जैसे संदेश तीन दिन पुराने थे। मैसेजेस का जवाब दिए बगैर उसने फटाफट नाश्‍ता किया और अपने कमरे में चला गया।

अंशु को यूं झटपट भागते देख लिया था अनु ने। थोड़ी देर बाद कमरे में आई और बोलीं, ‘कहीं जाने की तैयारी है ?
अंशु : हां, कुछ दोस्‍तों से मिल आता हूं। तुम क्‍या कर रही हो आज ?
अनु : कुछ खास नहीं। शॉपिंग पर चलोगे ?
अंशु : शाम को चलते हैं। कोई मूवी भी देख लेंगे। उसने कह तो दिया, लेकिन उसका वादा पूरा हो पाएगा या नहीं इसके बारे में उसे पक्‍का कुछ नहीं मालूम था।

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कोलकाता शहर की घनी आबादी वाला इलाका बेलघारिया। सॉल्‍टलेक से 22 किलोमीटर का सफर बाइक पर तय करने में 35 मिनट लगे। पापा की कार वह घर पर छोड़ आया था। पता नहीं कितना वक्‍त लगे लौटने में। इस बीच घर में किसी को जाना हो तो कार रहेगी। लाबोनिता ने अनन्‍या अपार्टमेंट का पता दिया था। फ्लैट नंबर नहीं बताया। होशियारी दिखाते हुए अंशु ने बेलघारिया में ही रहने वाले अपने दोस्‍त हेमंत पाल को साथ ले लिया था, जिसने 10 मिनट में उसे बताए गए अपार्टमेंट के सामने लाकर खड़ा कर दिया। बाहर खड़े गार्ड से अंशु ने दास बाबू का पता पूछा तो उसने कहा, ‘कौन से ? यहां तो चार का सरनेम दास है।’ इस पर हेमंत ने बड़ी चालाकी से पूछा, ‘अरे वही, जो असम में रहते हैं और मां-बेटी यहां।’ गार्ड ने झट से कहा, ‘एफ 1/30 में चले जाइए।’ अंशु ने हेमंत को बाइक दे दी और थैंक्स कहते हुए घर लौटने को कहा। वह लाबोनिता को सरप्राइज देना चाहता था।

अंशु ने डोर बेल बजाई। काफी देर बाद दरवाजा खुला। चेहरे पर फेस पैक लगाए एक लड़की ने दरवाजे की सेफ्टी चेन खोले बिना अंदर से ही पूछा, ‘बोलून, की चाई मोशाय ? (कहिए, किससे मिलना है महाशय ?)’ अंशु ने अपना परिचय दिया तो सकपकाकर उस लड़की ने झट से दरवाजा खोल दिया। अंदर आने का कहकर वह ओझल हो गई। अंशु भीतर आया तो दो लोग ड्रॉइंग रूम में बैठे थे। सिगरेट की नाकाबिले बर्दाश्‍त गंध पूरे कमरे में फैली थी। उन अजनबियों में से एक ने संदिग्‍ध नजरों से घूरते हुए उसे कड़क आवाज बैठने के लिए कहा।

करीब 10 मिनट बाद वही लड़की फिर कमरे में दाखिल हुई। इस बार उसका फेसपैक धुला हुआ था। हल्‍का गेंहुआ रंग, तीखे नैन-नख्‍श और करीने से तराशे बाल। नीले चेकर्ड पजामे और लाल-सफेद जर्किन में उसका चेहरा निश्‍चित तौर पर उस लाबोनिता से मेल नहीं खा रहा था, जिसे अंशु ने फेसबुक पर दोस्‍त बनाया था। फोटो में गोरी-चिट्टी लग रही उस लड़की ने तो जैसे अंशु के दिल में घर बना लिया था। सैंकड़ों की भीड़ में भी वह उसे पहचानने की कुव्‍वत रखता था।

अंशु यह सब सोच ही रहा था कि लड़की ने फर्राटेदार अंग्रेजी में उससे पूछा, ‘कुडनॉट रिकॉग्‍नाइज यू। व्‍हेयर यू केम फ्रॉम ?’ अंशु ने अब अपना पूरा परिचय दिया तो वह असमंजस में पड़ गई। बोली ओ मां.... रियली अ बिग सरप्राइज...।

उसने दो आगंतुकों से असमिया भाषा में माफी मांगते हुए कुछ दिन बाद आने को कहा। अंशु को घूरते हुए दोनों रुखसत हुए। उनके जाने के बाद उस लड़की ने अंशु को अपना परिचय दिया, ‘हियर आई एम। लाबोनिता दास। योर एफबी फ्रेंड।’
अंशु हैरान था उसका चेहरा देखकर। प्रोफाइल फोटो और उसका चेहरा बिल्‍कुल मेल नहीं खाते थे। उसने पूछा, यू लुक डिफरेंट इन एफबी। जवाब मिला, ‘डज इट मैटर ?
असल में हैरान तो दोनों ही थे। अंशु को पूरे मामले में फरेब की आशंका हो रही थी, वहीं लाबोनिता यह सोच रही थी कि अचानक आए इस मेहमान से कैसे निपटा जाए। उसने चाय बनाने के बहाने से कुछ वक्‍त की मोहलत ले ली और किचन में घुस गई।

अंशु ने ड्रॉइंग रूम का मुआयना किया। लक्‍जरी सोफे, एंटीक फर्नीचर, डायनिंग टेबल, रेफ्रिजरेटर, एलईडी से चकाचक कमरा रईसी बघार रहा था। खिड़की के परदे से एसी झांक रहा था। परितोष सेन (विख्‍यात चित्रकार) की एक भीमकाय पेंटिंग बरबस अपना ध्‍यान खींच रही थी। कोने में मां सरस्‍वती की प्रतिमा के पास सितार और तबला परंपराओं की दुहाई देने के लिए काफी था। मेज पर फेमिना और सोसायटी के ताजा अंक। चाय के साथ हाजिर हुई लाबोनिता से अंशु ने पूछा, ‘मस्‍ट बी एन ओन्‍ड प्रॉपर्टी...।’
‘नहीं ये किराए का है। पिताजी के एक दोस्‍त का मकान है। वे जमशेदपुर में नौकरी करते हैं।’

रहस्‍य गहराता जा रहा था। लाबोनिता एक एलबम ले आई। शिबसागर का घर, चाय बागान। तकरीबन सारे फोटो में फ्रॉक पहनी बच्‍ची नजर आ रही थी लाबोनिता। अंशु को खामोश पाकर लाबोनिता ने पूछा, ‘कहीं बोर तो नहीं हो रहे हो ?
‘ऐसा तो नहीं। पर... यकीन नहीं हो रहा है कि मैं अपनी फेसबुक फ्रेंड से ही बात कर रहा हूं।’
लाबोनिता ने कहा, ‘वो फोटो मेरी नहीं है। नेट से लिफ्ट की थी। असम और बंगाल की सरहदें जुड़ी हुई हैं। हमें तबाह करने वाले अभी तक ढूंढ़ रहे हैं। मैं यूं फेसबुक पर नहीं आ सकती थी।’

वह बताती गई, पापा की कुछ और प्रॉपर्टी है वहां, मां के नाम। उन्‍हें बेचकर यहां मकान लेने का विचार है, पर कुछ लोग ऐसा नहीं होने देना चाहते। उनकी नजर उस प्रॉपर्टी पर है... अंशु चुपचाप सुन रहा था।

लाबोनिता ने पूछा, ‘पर तुम अचानक कोलकाता में कैसे ?
‘नहीं। चचेरी बहन की शादी है। हफ्तेभर बाद लौट जाऊंगा। सोचा आया हूं तो तुमसे मिलता चलूं।’
लाबोनिता की आंखें भर आईं। बोली, ‘सारे काम छोड़कर सिर्फ मेरे लिए ? यकीन नहीं होता।’ उसने अलमारी की दराज से अखबार की कुछ कतरनें निकालीं। असम ट्रिब्‍यून, असम टाइम्‍स और सेंटिनल सभी अखबारों की सुर्खियां यही बता रही थी कि लाबोनिता ने झूठ नहीं बोला था।

तभी बगल के कमरे से किसी महिला की आवाज सुनाई पड़ी – के एशेछे बुबू ? (कौन आया है?)
‘आओ, तुम्‍हें मां से मिलवाती हूं ....’ और अचानक लाबोनिता ने अंशु का हाथ पकड़कर खींचा। अंदर बिस्‍तर पर अधेड़ महिला लेटी थी। बीमार सी। उम्र यही कोई 55-56 की होगी। बीमारी ने उन्‍हें वक्‍त से पहले बूढ़ा बना दिया था।
‘मां देखो, आमार बोंधु अंशुमान गांगुली।’ ... अंशु ने आगे बढ़कर प्रणाम किया। महिला ने खांसते हुए अंशु से अपने पास बैठने को कहा। थोड़ी पूछताछ के बाद बताया कि अब उन्‍हें अपनी नहीं, बेटी की फिक्र ज्‍यादा है।

सही-गलत, असली-नकली और अच्‍छे-बुरे के द्वंद्व में उलझे अंशु ने करीब आधे घंटे बाद लाबोनिता से जाने की इजाजत मांगी। वह उदास हो गई। कहा, ‘कब तक हो ?
‘अभी चार-पांच दिन और... परसों शादी है।’
‘इस बीच आओगे तो अच्‍छा लगेगा। अकेली बोर हो जाती हूं।’
अंशु ने पूछ ही लिया, ‘तुम नौकरी क्‍यों नहीं करती ?
‘बीमार मां को छोड़कर कैसे जाऊं ? डॉक्‍टर ने छह माह आराम की सलाह दी है। सारे मामले सैटल होने तक मुझे घर पर ही रहना होगा।’
अंशु ने लाबोनिता का मोबाइल नंबर पूछा तो उसने उल्‍टे उसका ही नंबर मांग लिया। इस बहाने से कि कई उल्‍टे-सीधे कॉल्‍स के बाद उसने दो दिन पहले ही अपना नंबर बदला, सो याद नहीं है।

गेट से बाहर आते हुए अंशु को वही दोनों आगंतुक गेट पर संदिग्‍ध हालत में घूमते नजर आए। उन्‍होंने लौटते हुए अंशु को फिर देर तक घूरा। इस रहस्‍य ने अंशु के जेहन में फिर उथल-पुथल पैदा कर दी। हेमंत को बीते डेढ़ घंटे के बारे में कुछ नहीं मालूम था। घर के रास्‍ते में अंशु के कुछ दोस्‍तों के घर भी आने थे। हेमंत ने उसे बताया था कि गिरीश का एक्‍सीडेंट हुआ है और वह हड्डी तुड़वाकर घर बैठा है। उसने हेमंत से गिरीश के घर चलने को कहा।


शाम ठीक चार बजे अंशु घर पहुंचा तो अनु ने बताया कि पुल्‍टी का फोन आया था। उसे कुछ शॉपिंग करनी है। अंशु ने गाड़ी निकाली और अनु के साथ पुल्‍टी के घर की ओर चल पड़ा।  

चौरंगी रोड के पास बना न्‍यू मार्केट, कोलकाता का सबसे व्‍यस्‍ततम बाजार। गाड़ी खड़ी कर अनु और पुल्‍टी को शॉपिंग करवाने ले गया था अंशु। करीब ढाई घंटे बाद बाहर निकला तो गाड़ी का पहिया पंक्‍चर नजर आया। उसके माथे पर बल पड़ गए। उसने टैक्‍सी बुलाकर अनु और पुल्‍टी को घर भिजवाया और पंक्‍चर सुधरवाने वाले को ढूंढ़ने चल पड़ा। वापस लौटा तो गाड़ी के वाइपर पर एक कागज का टुकड़ा दबा मिला। बंगाली में लाल अक्षरों में लिखा था, ‘खबरदार! जो उस लड़की से मिलने की कोशिश की...’

उसने इधर-उधर देखा। कोई नहीं मिला। संदेह गहराता जा रहा था। ‘अजीब गुंडागर्दी है... कौन हो सकता है ?  सोच में उलझे अंशु ने कागज जेब में रखा। पंक्‍चर वाले को स्‍टेपनी बदलने के पैसे दिए और पुल्‍टी के घर की ओर बढ़ा।

रात के करीब 10 बजे का वक्‍त होगा। अनु को लेकर घर लौटते समय सिटी सेंटर के पास एक सैंट्रो कार ने जानबूझकर कार को डैश किया और तेजी से निकल गया। हैरान अंशु ने गाड़ी रोकी, मुआयना किया। ज्‍यादा डेंट नहीं था। पर क्‍यों ? यह सवाल अनु के मन में भी था। उसने फौरन कंट्रोल रूम में इत्‍तिला की और इलाके के एसीपी का नंबर मांगा। अंशु समझ चुका था कि कार में मिले कागज के पुर्जे और इस घटना के बीच एक गुमनाम कड़ी है। लेकिन वह अनु को इसकी जानकारी नहीं देना चाहता था। उसे पता था कि अनु जैसी तेजतर्रार आई ऑफिसर मामले की जड़ तक पहुंचेगी।

उसने उसे रोकने के मकसद से कहा, ‘अब जाने भी दो। लगता है नशे में गाड़ी चला रहा था।’ अनु ने उसकी बात को अनसुना कर एसीपी को टक्‍कर मारने वाली गाड़ी का नंबर लिखवा दिया।
अंशु हैरान था। कुछ ही सेकंडों में गाड़ी का नंबर भी याद हो गया ? कमाल है...
‘प्‍लीज घर पर कुछ मत कहना। मैं कल डेंट ठीक करवा लूंगा। बाबा पूछें तो बता दूंगा कि पार्किंग में किसी ने भिड़ा दी होगी।’
‘ओके, पर सुबह पुलिस की पड़ताल होगी तो क्‍या करोगे ?
‘तब देखेंगे। इसीलिए तो कहा था कि फोन मत करो।’ अंशु को गुस्‍सा आ रहा था।

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सुबह का अखबार उठाते ही अंशु को मानों 10 हजार वोल्‍ट का झटका लगा। पहले पन्‍ने की सुर्खियां थीं... ‘हूजी (हरकतुल जिहाद अल इस्‍लामी – अल कायदा से जुड़ा बांग्‍लादेश का खतरनाक आतंकी संगठन) के चार आतंकी गिरफ्तार’... एक सैंट्रो कार बरामद। नंबर है....
धड़कते दिल से उसने मिष्‍ठी को आवाज लगाकर यह देखने को कहा कि दीदी (अनु) जागी या नहीं। 16 साल की नटखट मिष्‍ठी ने छेड़ते हुए पूछा, क्‍या सपने में भी दीदी दिखती हैं ?
‘सुबह दिमाग खराब मत कर। जा दीदी को बुला ला।’
अखबार देखकर रहस्‍यमय तरीके से मुस्‍कुराई अनु। ‘वेल, द टारगेट वॉज मी...’
अंशु चकराया। ‘वो कैसे ?
‘मैं यही केस डील कर रही हूं। बस तुमको ही बता रही हूं। टॉप सीक्रेट...’
‘वही कार... शायद वही नंबर... तुम तो जेम्‍स बांड हो...’
अनु बोली, ‘छोड़ो भी। मुझे कुछ काम है। शाम को मिलूंगी। मैं एसीपी को फोन कर देती हूं। कोई नहीं आएगा घर। तुम्‍हें भी पुल्‍टी के घर जाना होगा। हैव ए नाइस डे...’
अंशु – अपना ध्‍यान रखना अनु। मुझे फोन करती रहना।
‘डोंट वरी। ऐसे बहुत केसेस सॉल्‍व किए हैं।’


(आगे पढ़ें : क्‍या दोनों घटनाओं का लाबोनिता के रहस्‍य से कोई नाता है ? क्‍या अंशु अपने राज अनु से छिपा पाएगा ?)

(पाठक कृपया यह भी बताएं कि इस धारावाहिक में अंशु ने दो गलतियां की हैं। कौन सी ? क्‍या नतीजा हो सकता है इसका ?)

Disclaimer: इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं पूर्णत: काल्‍पनिक हैं। किसी के व्‍यक्‍तिगत जीवन या उससे जुड़ी बातों से इनका कोई लेना-देना नहीं। किसी के लिए यथार्थ और काल्‍पनिकता के बीच बेहद महीने फर्क हो सकता हैलेकिन इसके लिए लेखक की कल्‍पनाशीलता और रचनात्‍मकता कतई जिम्‍मेदार नहीं है।   

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