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रविवार, 28 जुलाई 2013

मेरी डायरी -1 : सैर कर दुनिया की गाफ़िल, जिन्देगानी फिर कहां ?

कहते हैं, जन्‍नत का रास्‍ता दोज़ख यानी नर्क से होकर जाता है। भोपाल से कोलकाता जाने के लिए अगर दिल्‍ली का रूट लेना पड़े तो यह कहावत आपको सच ही लगेगी। खासकर बरसात के इस चिपचिपे मौसम में। आज से डेढ़ दशक पहले देश के खूबसूरत शहरों में शुमार रही दिल्‍ली अब गंदगी से बजबजा रही है। नई दिल्‍ली स्‍टेशन पर उतरते ही आपको इस बात का अहसास होगा। देश की राजधानी के सबसे प्रमुख स्‍टेशन में अगली ट्रेन के लिए तीन घंटे से ज्‍यादा काटना भारी पड़ेगा। उच्‍च श्रेणी के वेटिंग रूम में नहाने के लिए आपको लंबी लाइन में लगना होगा। फिर इस बात की कोई गारंटी नहीं कि बाथरूम में पानी आ रहा हो। मुमकिन है दरवाजा टूटा हो और आपको गाना गाकर काम चलाना पड़े। जैसे-तैसे निपटकर बाहर आए तो ऑटो वालों से उलझें। शीला दीक्षित सरकार ने दिल्‍ली के 55 हजार ऑटो रिक्‍शा को नए इलेक्‍ट्रॉनिक मीटर और जीपीएस (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) से लैस किया है। नए मीटर को देखकर मैंने कौतूहलवश ड्राइवर से पूछा तो पता चला कि सरकार ने इसे जबर्दस्‍ती उन पर थोपा है। खुले बाजार में इसी तरह का मीटर महज 5000 रुपए में बिक रहा है। लेकिन सरकार दिल्ली मल्टीमॉडल ट्रांजिट सिस्टम (डिम्ट्स) के मीटर लगाने पर ही परमिट दे रही है। ड्राइवर का सीधा आरोप था कि इस कंपनी में शीला दीक्षित के रिश्‍तेदारों का काफी पैसा लगा है। वैसे दिल्‍ली हाईकोर्ट ने सुरक्षा की नजर से दिल्‍ली के सारे ऑटो रिक्‍शा में जीपीएस लगाने को कहा था, साथ ही सवारियों को रसीद देने के निर्देश भी दिए थे। हालांकि, इसे अभी अमल में लाया जाना बाकी है। बरसात के मौसम में जब भी दिल्‍ली जाएं तो दो चीजें हमेशा साथ रखें। एक अपनी नाक ढंकने के लिए रूमाल और दूसरा चिपचिपाहट कम करने के लिए टैलकम पाउडर। इनके बिना हर पल यातनाभरा होगा। ज्‍यादा परेशानी हो तो नई दिल्‍ली स्‍टेशन से सीधे राजीव चौक का मेट्रो पकड़ें और बगल के पालिका बाजार में जाकर विंडो शॉपिंग करें या एसी का मजा लें। दिल्‍ली से कोलकाता के लिए कोलकाता राजधानी से बेहतर और कोई ट्रेन नहीं। करीब 1450 किलोमीटर की दूरी महज 17 घंटे से भी कम समय में। दिल्‍ली की सारी थकान ट्रेन में उतारी जा सकती है। शाम को चले और सुबह पहुंचे। 
  
बंगाल में निजाम बदल गया, लेकिन उसके निशां इक्‍का-दुक्‍का पोस्‍टरों को छोड़कर बाकी कहीं नजर नहीं आते। फ्रांसीसी लेखक डोमिनिक ला-पियर के ‘सिटी आफ जॉय’ उपन्यास का शहर आज भी तकरीबन वैसा ही है। वही पीली एम्‍बेसडर टैक्‍सियां, नई इमारतों के बीच सिर उठाए खड़ी अतीत की यादें और शहर का वही मिजाज़। ब्रिटिश व्यापारी जॉब चार्नाक ने आज से लगभग 300 साल पहले सवर्ण चौधरियों से तीन गांव खरीद लिए थे-कोलकाता, सूतानुटी तथा गोबिन्दपुर। इन्हीं तीन गांवों को लेकर कलकत्ता शहर बना। लेकिन ज़रा ठहरिए। इस शहर में घूमते हुए, लोगों से बात करते हुए आपको बदलाव की सुगबुगाहट भी मिलेगी। जाने-माने पत्रकार स्‍वपन दासगुप्‍त कहते हैं, ‘क्रांति की नर्सरी के रूप में कोलकाता एक ऐसा प्रहसन था, जो 50 सालों तक जिंदा रहा- 'बंदूक की नली' की पूजा के मुहावरे को 'मां, माटी, मानुष' के रहस्यवादी आह्वान में धीरे-धीरे तब्दील करने के लिए काफी लंबा और पर्याप्त समय था। बंगाली होने का अर्थ सनातन आक्रोशित रहना होता था। चिड़चिड़ापन और चिंतित होने का मेल अगर मीठी चाय की अनगिनत प्यालियों, सस्ती सिगरेट और दुनियावी सफलता के प्रति स्वाभाविक अरुचि के साथ हो जाए तो यह आदर्श मिश्रण बनाता है।’ कोलकाता अब शहरी दुस्वप्न नहीं रहा। कम-से-कम औसत मध्यवर्गीय शहरियों के लिए यह शहर अब रहने के लिहाज से काफी आकर्षक है। इसमें नए मुख्यमंत्री का योगदान बहुत ज्‍यादा नहीं है। हां, तृणमूल कांग्रेस के राज्‍यसभा सांसदों के सांसद निधि कोष से सड़कों पर लगाए गए उन हजारों त्रिशूलनुमा लैंपपोस्ट का शुक्रिया जरूर अदा किया जाना चाहिए, क्योंकि कोलकाता अब देश के सबसे अच्छे रोशनी वाले शहरों में गिना जा सकता है। सड़कों की हालत में सुधार, मेट्रो का व्यापक नेटवर्क और शहरभर में किफायती फ्लैटों का कुकुरमुत्ते की तरह उग आना कोलकाता को सामान्य स्थिति में ला रहा है, जो उसके लिए कम-से-कम नई है और नागरिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना पर केंद्रित है। एक नया कोलकाता उभर रहा है। यह दीवार पर बने चित्रों और हमेशा बंद की मार झेलने से मुक्त है। यह शहर 1967 में शुरू हुई 'दिक्कतों' के बाद भुला दी गई एक चीज को दोबारा सीख रहा है- खुद अपना लुत्फ उठाने की कोशिश। 



कोलकाता में परफॉर्मिंग आर्ट्स पर एक पत्रिका की संपादक रहीं गौरी चटर्जी कहती हैं, ''जो दिख रहा है, वह पीढ़ियों का बदलाव है।'' गौरी ने ठीक ही कहा। वाम शासन इस बदलाव को समझने में नाकाम रहा। पार्क सर्कस में क्‍लब लाइफ शबाब पर है, कॉलेज स्‍ट्रीट कॉफी हाउस में तब्‍दील हो चुका है। फुचका की जगह चाउमीन की प्‍लेटें हैं और शाम होते ही जींस-टॉप में युवतियां उन पर टूट पड़ती हैं। विश्व भारती यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति रजत कांत रे कहते हैं, 'यह तकरीबन वैसी ही आजादी है, जो रूस में गृह युद्ध के खात्मे यानी 1919 और 1927 में स्टालिन के कब्जे के बीच थी। बेशक, राज्‍य की मानसिकता 'चोलबे ना' वाले दिनों की तुलना में काफी बदल चुकी है, लेकिन अब भी पेशेवर कार्यकर्ताओं की एक सुप्त फौज मौजूद है, जो हर तरह के पूंजीवादी उद्यम को खून चूसने वाली साजिश के रूप में ही देखती है। 



बहरहाल, इन बातों को किनारे रखकर सबसे पहले चलें कालीघाट। यह मंदिर 16वीं शताब्‍दी की शुरुआत में राजा मानसिंह ने बनवाया था। उस समय यह बहुत छोटा सा मंदिर हुआ करता था। मौजूदा मंदिर 200 साल पुराना है। इसे बानिशा इलाके के सबर्न रॉयचौधरी परिवार के संरक्षण में बनाया गया। मंदिर में मां काली की प्रतिमा अधूरी है। यानी सिर्फ मां का चेहरा ही है। इसमें तीन बड़ी आंखें साफ नजर आती हैं। मां के चार हाथ, खड्ग, सोने की जीभ और शिव की प्रतिमा बाद के वर्षों में बनाए गए। माना जाता है कि यहां सती की एड़ी गिरी थीं। आज भी मां को स्‍नान करवाते समय मंदिर के पुजारी अपनी आंखों पर पट्टी बांध लेते हैं। प्रतिमाओं को बनाने वाले ब्रह्मानंद और आत्‍माराम गिरी की समाधि मंदिर में ही बनी है। मंदिर में एक चबूतरे पर षोष्‍ठी, शीतला और मंगला चंडी के पिंड रखे हैं।

मंदिर के एक पुजारी ने बताया कि सैकड़ों साल पहले एक व्‍यक्‍ति को भगीरथी नदी के तल पर कुछ रोशनी सी दिखाई दी। गोता लगाने पर पता चला कि वह एक पत्‍थर है, जिस पर एड़ी जैसे निशान बने हैं। पास में ही एक और पत्‍थर शिव लिंग जैसी मिला। बस, तभी से वहां मंदिर बनाकर मां काली की आराधना शुरू हुई। यह मंदिर नाथ/ सिद्ध परंपरा का है। चौरंगी नाथ इसी परंपरा के थे। वे गुरु गोरखनाथ के शिष्‍य थे। बंगाल नरेश देवपाल के बेटे चौरंगीनाथ की सौतेली मां ने अपने बेटे को राजपाठ दिलाने के लिए उनके हाथ-पैर काट दिए। लेकिन काफी साल बाद योग साधना से चौरंगी ने अपने अंगों को वापस पा लिया। उन्‍हीं के नाम पर कोलकाता शहर के उत्‍तर-दक्षिण का केंद्र बिंदु चौरंगी पड़ा।

जैसा ही भारत के तकरीबन हर मंदिर में होता है, कालीघाट मंदिर के तिराहे पर पहुंचते ही पंडों के दर्शन हो जाते हैं। गले में कैमरा लटकाए व्‍यक्‍ति को देखते ही वे पहचान लेते हैं कि यह बाहर से आया है। वे आपको घेरेंगे, मिन्‍नतें करेंगे, दादा-दीदी, काकी मां, माशी मां जैसे संबोधन आपके कदम रोकेंगे। लेकिन रुकना नहीं। एक दुकान तलाशिए। वहां अपने जूते-चप्‍पल, कैमरा (मंदिर के भीतर ले जाने की मनाही है) रख दें और अपनी हैसियत के अनुसार प्रसाद खरीद लें। पंडा अगर साथ चलने (सिर्फ 20 रुपए की फीस पर) की जिद करे तो ना कर दें। आराम से दर्शन करें। पंडे मंदिर के भीतर भी मिलेंगे। वे आपसे विशेष पूजा का आग्रह करेंगे। ना मानें।



मंदिर से बाहर निकलकर आपको बंगाल के मशहूर देवी मुख (दुर्गा का चेहरा) की दर्जनों दुकानें मिलेंगी। कहीं धान की बालियों से सजावट तो कहीं जरी का साज-श्रृंगार। कला की कोई हद नहीं और बंगाली कलाकार ऐसी किसी हद को मानते भी नहीं। इन दुकानों में 40-200 रुपए के बीच देवी मुख की कई विविधताएं मिल जाएंगी। साथ में और भी कई कलाकृतियां। कालीघाट मंदिर से दाहिने चलकर बाएं मुड़ने पर मदर टेरेसा की कर्मस्‍थली निर्मल ह्यदय नजर आता है। मां आदिशक्‍ति के बगल में मदर का वास। बहुत ही प्रेरक। फिर दाएं मुड़ने पर कुछ झोपड़ियों में विधवा, बेसहारा बुजुर्ग महिलाएं धोती लपेटे नजर आएंगी।

इन्‍हें उनके परिजनों ने घर से बेदखल कर दिया। वे दोनों माताओं की शरण में दर्शनार्थियों की भीख और भोग पर निर्भर हैं। इससे कुछ आगे बढ़ने पर एक गंदा, बदबूदार नाला दिखता है। असल में यह आदि गंगा है। कालीघाट पहले भगीरथी (हुगली) के तट पर था। हावड़ा ब्रिज बनाते समय नदी का रुख मोड़ा गया, जो पुल बनने के बाद भी वैसा ही बना रहा। तब इस शक्‍तिपीठ की महिमा को बरकरार रखने के लिए नदी से एक नहर काटकर मंदिर के पास से निकालते हुए आदि गंगा नाम दिया गया। फिलहाल शहर का सीवेज इसी से होकर जाता है। नहर एक नाले का रूप ले चुकी है।



- शेष अगली किस्‍त में