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रविवार, 17 मार्च 2013

माल है तो मॉल है

क्‍या आपको पता है कि देश के सबसे बड़े शॉपिंग मॉल लुलु के खुलने के बाद केरल में अगले 3 साल में 50 बड़े मॉल खुलने जा रहे हैं ? कुल 3.3 करोड़ की आबादी। उसमें से लगभग आधे ही शहरों में रहते हैं (2011 की जनसंख्‍या), जबकि लुलु शॉपिंग मॉल में कामकाजी दिनों में आने वालों की संख्‍या एक लाख से ऊपर है। ऐसे में 50 और बड़े मॉल का क्‍या मतलब ? 




मतलब चौंकाने वाला है। पिछले पांच साल में केरल की प्रति व्‍यक्‍ति आय में 75 फीसदी इजाफा हुआ है। हालांकि, इससे भी ज्‍यादा चौंकाने वाली बात यह है कि अमूमन कृषि प्रधान राज्‍य माने जाने वाले केरल में खेती से होने वाली आय घटी है। वहीं, निर्माण और उत्‍पादन के क्षेत्र में दोगुनी बढ़ोतरी यह दर्शाती है कि बाजार में मांग तेजी से बढ़ रही है। लगभग 38 हजार वर्ग किलोमीटर (भारत के जमीनी भूभाग का 1.8 फीसदी) से कुछ ज्‍यादा दायरे में समंदर से घिरी देवताओं की यह धरती सालभर लाखों सैलानियों को अपने यहां आने पर मजबूर कर देती है। केरल के बारे में हम सभी जानते हैं कि यहां सबसे ज्‍यादा शिक्षित हैं। केरल के लोग दशकों से मध्‍य एशियाई देशों में जाकर नौकरियां करते रहे हैं। ये लोग वतन में अपने परिजनों को अच्‍छी खासी रकम भेजते हैं, जो फिलहाल 50 हजार करोड़ रुपए के आसपास है, यानी राज्‍य के सकल घरेलू उत्‍पाद 1004 करोड़ से 50 गुना ज्‍यादा। साल 2007-08 से 2011-12 के बीच केरल के सकल घरेलू उत्‍पाद में 400 गुना इजाफा हुआ है, वहीं इसी दौरान प्रति 100 की आबादी में पांच लोग ही बढ़े। इतनी तेज आर्थिक तरक्‍की और आबादी की सबसे धीमी रफ्तार भारत के किसी भी राज्‍य के लिए सुखद है। लेकिन इसी में अगर पर्यटन को भी जोड़ दिया जाए, जिसके कारण केरल की कमाई 2012 में 21 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है तो फिर इस बात में कोई शक नहीं रहता कि अप्रवास और पर्यटन की इस राज्‍य के दौलतमंद होने के सबसे प्रमख कारण हैं।

तो केरल में खूब पैसा आ रहा है। बाहर से और सैलानियों के आने से भी। लेकिन खर्च के मामले में मलयाली पहले से थोड़े किफायतमंद रहे हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वे फिजूलखर्ची बिल्‍कुल पसंद नहीं करते। अगर आप केरल में सांस्‍कृतिक और पारंपरिक रूप से सबसे पुरातन माने जाने वाले नायर समुदाय की किसी शादी में शरीक हुए हों (मुझे एक बार मौका मिल चुका है) तो आपको पता चलेगा कि वे कितने सादगी पसंद होते हैं। एक मंगलसूत्र, तोहफे में साड़ी-ब्‍लाउज और दावत में चंद मेहमान या परिवार के लोग। उत्‍तर भारतीय परिवेश से बिल्‍कुल अलग यह एक बेहद संक्षिप्‍त सामाजिक समारोह होता है। नाच-गाना, बारात, बैंड बाजा जैसा कुछ नहीं। लेकिन अगर आप शादी की तैयारियों में झांकें तो पता चलेगा कि लड़की वाले अपनी बेटी की शादी के लिए असल में बरसों पहले से तैयारी करते हैं और वह भी सोना खरीदकर। सोने के ये भारी भरकम जेवर स्‍वेच्‍छा से दिए जाते हैं, इसलिए इन्‍हें दहेज के रूप में नहीं गिना जा सकता। विशुद्ध रूप से यह शादी के बाद लड़की के लिए आर्थिक सुरक्षा के तौर पर देखे जाते हैं। केरल में मुथूट फायनेंस जैसी गोल्‍ड लोन कंपनियां सालाना करीब एक लाख करोड़ रुपए के लोग इन्‍हीं गहनों को गिरवी रखकर बांटती हैं। जाहिर है, सोने के आसमान छूते दाम को देखते हुए इन्‍हें खरीदने और बाद में इन्‍हीं से परिवार की हिफाजत करने से बेहतर दूसरा और कोई जरिया नहीं। हर परिवार या खानदान के जेवर एक खास डिजाइन के बने होते हैं। उनमें की गई नक्‍काशी और कलाकृतियां बीते कुलों से जुड़ी होती हैं। 


यह कहना गलत नहीं होगा कि आजकल केरल की पढ़ी-लिखी मलयाली लड़कियां भी नौकरीपेशा होने के बाद सोना खरीदने को सबसे ज्‍यादा तवज्‍जो देती हैं। शायद इसीलिए कहा जाता है कि केरल में जितने ‘केरा’ यानी नारियल के पेड़ हैं, उतने ही ज्‍वेलरी की दुकानें भी। हर कुल से जुड़ी जेवरातों की दुकान में बुजुर्ग महिलाएं पारंपरिक जेवर बनवाती हैं, जबकि आधुनिक नौकरीपेशा लड़कियां गोल्‍ड और डायमंड जड़े गहने खरीदने के लिए मॉल या ब्रांडेड शॉप में जाती हैं। ये उनका इन्‍वेस्‍टमेंट है। अपने लिए और भावी साथी के लिए। पारिवारिक समारोहों में यही गहने श्रृंगार के साथ सजते हैं। ओल्‍ड फैशंड गहने तो सुरक्षा निधि की तरह जमा होते रहते हैं। शादी में अगर दूल्‍हा अपनी नई नवेली दुल्‍हन को तोहफे देता है तो वह हीरे जड़े गहनों से बेशकीमती और कुछ भी नहीं। उसी तरह लड़की भी अपने हमसफर को ब्रेसलेट, कफलिंक्‍स और पांच से दस तोले वजनी हार से नवाजती है। लेकिन मलयालियों की शॉपिंग लिस्‍ट में आजकल लक्‍जरी कारें, हाई एंड इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स और ड्यूरेबल्‍स भी आ गए हैं। कहते हैं, जहां भी पैसा आता है, उसे खींचने की बाजार में बड़ी ताकत होती है। लुलु जैसे बड़े शॉपिंग मॉल इसी के लिए बने हैं। ये लोगों को ललचाते हैं, सपने दिखाते हैं और बहला-फुसलाकर अपने जाल में फंसा ही लेते हैं। 

पिछली दीवाली में देश के छह बड़े शहरों में एक सर्वेक्षण किया गया था, यह जानने के लिए कि लोग खासकर महिलाएं कैसी खरीदारी करती हैं। क्‍या वे फिजूलखर्ची करती हैं या अपने पति, दोस्‍तों की जेब हल्‍की करने की नीयत से मॉल आती हैं। पता चला कि महिलाएं अकेली खरीदारी करते समय किफायत बरतती हैं, लेकिन पति के साथ होने पर शॉपिंग का बिल ज्‍यादा आता है। खैर, लुलु जैसे शॉपिंग मॉल इंपल्‍सिव शॉपिंग को बढ़ावा देते हैं। लिहाजा स्‍थानीय दुकानदारों को इनसे जलन होनी चाहिए। पर ऐसा नहीं हो रहा। लुलु सरीखे बड़े शॉपिंग मॉल के जवाब में केरल के 200 छोटे ब्रांड्स ने आपस में मिलकर व्‍हाइट मार्ट के नाम से ब्रांड बना लिया है। इनकी सालाना आय पिछले एक साल में 20 फीसदी बढ़ी है। व्‍हाइट मार्ट ब्रांड अब तमिलनाडु जैसे पड़ोसी राज्‍यों में जा रहा है। 

  


केरल के छोटे दुकानदारों से यह सबक पूरे देश के दुकानदारों को सीखना चाहिए और वह भी इससे पहले कि वॉलमार्ट जैसे घड़ियाल रिटेल में दाखिल हों। वैसे केरल ने एक और अहम सबक भारत को दिया है, जो बाकी लोग सीख नहीं पाए। वह है गजब की सामुदायिकता। इस राज्‍य में जातिगत और संप्रदाय से जुड़े बंधन कितने भी कठोर और कट्टर हों, लेकिन जब बात विकास की हो तो सब एकजुट हो जाते हैं। नारियल, रबड़, कई तरह के सुगंधित मसालों और चाय बागानों में फैले इस राज्‍य में कोई खाली नहीं बैठना चाहता। बैठता भी नहीं है। करने के लिए इतना कुछ जो है। यहां की समृद्ध खानपान को कई तरह की सब्‍जियां चाहिए। खेती नहीं करनी तो कोई बात नहीं। सब्‍जियां तो उगा ही सकते हैं। इस सामुदायिकता ने न सिर्फ केरल के प्रशासन को चौबीसों घंटे चौकस रखा है, बल्‍कि राज्‍य के खाद्य प्रसंस्‍करण उद्योग को विश्‍वस्‍तरीय बना दिया। लेकिन हम आम जैसे फल के इतने उपयोग नहीं कर सके, जितना एक आम मलयाली नारियल का इस्‍तेमाल करता है। हमने अपनी खाद्य परंपराओं को छोड़ा और फास्‍ट फूड, जंक फूड की तरफ भागे। सब्‍जियां हमारी थाली से लगातार गायब हो रही हैं। शायद हम चाहते भी नहीं।