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बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

चक्रव्‍यूह :1 : टायसन और दिल्ली के कुत्ते

(नई कहानी)
जोर बाग के वन बेडरूम सेट में अंशुमान अलसाया सा लेटा था। जनवरी का पहला हफ्ता। बाहर घना कोहरा छाया था। दिल्‍ली का यह मौसम बहुत तकलीफदेह होता है। खाल को चीर देने पर उतारू सर्द गीली हवाएं अच्‍छे खासे नौजवान को भी सुस्‍त, आलसी बना देती हैं। कोलकाता से दिल्‍ली आए अंशुमान गांगुली को दो साल हो गए। फिर भी वह जाड़े के मौसम का अभ्‍यस्‍त नहीं हो सका था।
आज संडे है। ऑफिस बंद। सुबह सोचा था, प्रियंका को लेकर प्रगति मैदान जाएगा ऑटो एक्‍सपो दिखाने। बचपन से ही कारों का बड़ा शौक था उसे। बैंक में नौकरी लगी तो फौरन कार लोन के लिए एप्‍लाई कर दिया। बड़ा नाज था उसे अपनी होंडा सिटी पर। लेकिन कमबख्‍त ने आज ही गच्‍चा दे दिया। दर्जनों बार स्‍टार्ट करने की कोशिश की, पर कोई फायदा नहीं। डरते-डरते उसने प्रियंका को फोन लगाया, ‘सॉरी प्रिया, माय कार इज नॉट रेडी।’ उधर से एक भारी सी आवाज आई, ‘टू हेल विथ योर कार। खटारा हो गई है। बेच क्‍यों नहीं देते ?  भद्र मानुष की तरह अंशुमान ने मनाने की कोशिश की, ‘सॉरी स्‍वीटी, बस से चलते हैं न! उम्‍मीद के मुताबिक ही जवाब मिला, ‘तुम जाओ और नई कार में आना, तब चलेंगे।’
कोई फायदा नहीं.... फोन काटने के बाद मन ही मन बुदबुदाया अंशु (प्रियंका उसे इसी नाम से बुलाती है)। बैंक में कस्‍टमर रिलेशंस का काम संभालती है प्रिया। कोलकाता से ट्रांसफर होकर पहली बार दिल्‍ली आने के बाद अंशु को मकान दिलाने में प्रिया ने ही मदद की थी। उसकी सहेली जोर बाग का मकान छोड़कर पुणे शिफ्ट हो रही थी। गंदे सीलन भरे होटल के कमरे में रहकर बोर हो चुके अंशु को लंच के वक्‍त अचानक प्रिया ने कहा, ‘हाय हैंडसम! यू वांट अ रेंटेड अकोमोडेशन ना ?’ अंशु की तो मानों निकल पड़ी। फौरन जवाब दिया, ‘यस, हैव यू एनी ?’ इतना सुनना था कि 27 साल की तेजतर्रार पंजाबन प्रिया ने उसका हाथ पकड़ा और बोली, ‘मकान चलकर नहीं आएगा। अभी चलो, वरना भूल जाओ।’
अंशु : और लंच ?
प्रिया : कल कर लेना, अगर मकान मिले तो...
क्‍या लड़की है बाप रे... प्रिया की एक्‍टिवा में पीछे बैठते हुए सोचने लगा अंशु। चंद सेकंडों में गाड़ी की स्‍पीड 50 से ऊपर थी। दिन-दहाड़े ट्रैफिक के बीच इस कदर फर्राटे से लहराते हुए दौड़ रही स्‍कूटर में बैठे अंशु की धड़कनें तेज हो गई थीं। एक कार के पीछे जाकर प्रिया ने इस कदर ब्रेक मारा कि वह पीछे रखी भरी बोरी की तरह उसकी पीठ में जा धंसा।
प्रिया : शर्म नहीं आती ? बीच सड़क में एक लड़की पर झूम रहे हो ?
अंशु : सॉरी यार, पर तुम इतना तेज क्‍यों चला रही हो।
प्रिया : बॉस ने आधे घंटे की छुट्टी दी है। 10-10 मिनट आने-जाने के और 10 मिनट तुम्‍हारी नौटंकी में गुजरेंगे।
वाकई लोदी कॉलोनी से जोर बाग तक का रास्‍ता प्रिया ने 10 मिनट में नाप लिया। स्‍कूटर से उतरकर दुर्गा मां को याद किया अंशु ने। फिर पूछा, ‘कौन सा मकान है ?
प्रिया : सामने क्‍या फुटबॉल का मैदान दिख रहा है ?
अंशु : वाऊ, नाइस प्‍लेस यार...
प्रिया : यहीं तंबू लगाओगे या मकान भी देखोगे ?
अंशु : ओके। गो अहेड।
प्रिया ने जैसे ही बंगले का गेट खोला तो एक बड़ा सा काला अल्‍सेशियन कुत्‍ता लपक पड़ा। अंशु के तो प्राण सूख गए। बचपन में एक बार कुत्‍ते ने उसकी कमर पर काट खाया था। 14 इंजेक्‍शन और तीन टांके लगे थे। पांच दिन उल्‍टा सोकर टेढ़ा हो गया था अंशु।
लेकिन प्रिया ने एक खास तरीके से सीटी बजाई तो राक्षस जैसा कुत्‍ता दुम हिलाने लगा।
अंशु : यार तुम तो सीटी भी बजाती हो ?
प्रिया : दिल्‍ली के कुत्‍तों को पटाने के लिए सब बजाना पड़ता है।
मकान मालिक ने पिछवाड़े का हिस्‍सा किराए पर दे रखा था। प्रिया ने कॉल बेल बजाई तो एक बेहद खूबसूरत बाला ने दरवाजा खोला।
प्रिया : हाय जेनी। हियर इज द न्‍यू टेनेंट अंशुमान। अ रियल जेंटलमैन।
जेनी ने अपना नर्म हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ाया। बड़े संकोच के लिए अंशु ने औपचारिकता निभा ली। जेनी खिलखिलाकर हंसी और प्रिया से बोली, ‘यू आर राइट।’
प्रिया ने आगे परिचय दिया कि मैं उसके ही बैंक का मुलाजिम हूं और हफ्ते भर से मकान ढूंढ़ रहा हूं।
जेनी बोली, ‘वेल हैंडसम। हियर इज द लिविंग... यू वांट टू सी माय बेडरूम एंड टैरेस ? इट्स, वेरी सेक्‍सी...’
अंशु : ओह, नो... आईमीन....यस।
जेनी ने प्रिया को आंख मारी और अपना बेडरूम दिखाने ले गई। 10 बाय 12 का कमरा। वार्डरोब... एसी.... एलसीडी और अटैच्‍ड बाथ्‍रूम कम टॉयलेट के साथ.... सजा-संवरा। बगल में टैरेस।
जेनी फूलों की बड़ी शौकीन थी और कैक्‍टस की भी। अंशु ने पूछ लिया, ‘फूलों के साथ कांटे भी। क्‍यों ?
जेनी : कांटों में ही मजा आता है डियर। फूल तो सिर्फ मन बहलाने वाले होते हैं।
इस अजीब फलसफे ने अंशु को हैरान किया। वह बुदबुदाया, ‘चांद में भी दाग होते हैं। डिफेक्‍टिव पीस लगता है।’ इसी बीच प्रिया ने भीतर से आवाज लगाई, ‘हैव समथिंग टू ईट ? बड़ी भूख लगी है यार...।’
जैसे ही जेनी लिविंग रूम की ओर भागी, अंशु ने मौका ताड़कर बाथरूम के भीतर झांकने का गुनाह कर ही दिया। उम्मीद से उल्‍टे बाथरूम एकदम साफ-सुथरा फाइव स्‍टार था। बगल में छोटा सा किचन भी चमचमा रहा था।
लिविंग रूम में प्रिया और जेनी एप्‍पल का मजा ले रही थी।
जेनी : हाऊ यू फाइंड इट ? सेक्‍सी न ? नाऊ द मोस्‍ट इंपॉर्टेंट... रेंट विल बी द सेम, 7 के (7000 रु.)
एंड हियर आर द डू एंड डोंट्स। जेनी ने वार्डरोब में स्‍केच पेन से लिखे एक चिट्ठे की ओर इशारा किया।
लिखा था, नो गर्लफ्रेंड्स, नो ड्रिंकिंग, नो नॉनवेज।
और... रात 12 बजे के बाद आओगे तो टाइसन काट देगा।
अंशु : टाइसन कौन ?
जेनी : नीचे पैदाइशी भूखा कुत्‍ता। साले को पेट भर-भर के खिलाते हैं, फिर भी काटने को दौड़ता है।
अंशु को मकान पसंद आया। सिर्फ नॉनवेज पर बात अटक रही थी। उसे पसोपेश में देख जेनी बोली, ‘कम ऑन हैंडसम। बाहर से ला सकते हो, पर टाइसन से छिपाकर। वरना रोटी के साथ तुम्‍हारी बोटी भी चबा जाएगा।’
डील अगले दिन फाइनल होनी थी। 10 हजार सिक्‍योरिटी और दो माह का भाड़ा एडवांस में। प्रिया के पीछे-पीछे नीचे उतरकर अंशु टाइसन को ढूंढ़ने लगा। पर वो तो मस्‍ती से बैठा था।
प्रिया : गेटिंग लेट मैन। हमें जल्‍दी पहुंचना है। डर लगे तो मेरी कमर पकड़ लेना या पीठ थाम लेना। झूमना नहीं, वरना मेरी चीख पर पूरे दिल्‍ली वालों को गर्मी आ जाएगी।
रास्‍ते में उसने पूछा, ‘तो क्‍या ख्‍याल है गुरू ?
अंशु : दफ्तर से इतना नजदीक वेल फर्निश्‍ड मकान और कहां मिलेगा ? तुमने भूखे रहकर मुझे मकान दिला दिया। थैंक्‍स अ लॉट यार। यू आर सच ए नाइस गर्ल...
प्रिया : देखो, ऐसे सस्‍ते में काम नहीं चलेगा। लंच और लेटेस्‍ट मूवी की ट्रीट लूंगी ही। बोलो हां, वरना करूं जेनी को फोन ?
अंशु : धमकी क्‍यों देती हो यार ? बंगाल का भी दिल बड़ा होता है। कल वीकेंड है। पक्‍का चलेंगे।
... और इस तरह प्रियंका भसीन उसकी दोस्‍त बन गई। तीन बहनों में सबसे बड़ी प्रियंका की मां पांच साल पहले एक कार हादसे में गुजर गई थीं। पापा हार्डवेयर का बिजनेस संभालते थे।
सबसे छोटी बहन को स्‍कूल ड्रॉप कर ठीक सुबह 9 बजे दफ्तर पहुंच जाती थी प्रिया। मंझली वाली बीए ऑनर्स का कोर्स कर रही थी। लाल टमाटर जैसे गाल और सुगठित शरीर की धनी प्रिया को उसके चुलबुलुपन के कारण पूरा स्‍टाफ माथे पर बिठाकर रखता था। लेकिन अंशु ने ज्‍वॉइनिंग के दिन को छोड़कर बाकी एक भी दिन उसे पलटकर नहीं देखा।
अचानक उसे लगा, मानों वह दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की के साथ बैठा है। प्रिया अब सामान्‍य रफ्तार से गाड़ी चला रही थी। पता नहीं, क्‍यों उसे दफ्तर पहुंचने की कोई जल्‍दी नहीं थी। अंशु को भी कोई जल्‍दी नहीं थी। वह उसके डिऑडोरेंट की हल्‍की सी महक को महसूस कर सकता था।
तभी लोन डिपार्टमेंट से बॉस का फोन आया। ‘कहां हैं आप ? कुछ क्‍लाइंट्स इंतजार में हैं।’ अंशु ने मामला संभालते हुए कहा, ‘जस्‍ट कमिंग सर, इन 5 मिनिट्स।’
दफ्तर पहुंचकर प्रिया हौले से मुस्‍कुराई, ‘बाबू मोशाय, कल का वादा याद रखना। द मूवी विल बी बाय च्‍वॉइस।’
अंशु : हां, बस बैंक लूटने ही जा रहा हूं।


(आगे पढ़ें : अंशु की खुशनुमा जिंदगी में कैसे आएगा रोमांचक मोड़। यह उसे एक ऐसे खतरनाक जाल में उलझाएगा, जो उसकी जिंदगी को तबाह कर देगी।)

Disclaimer: इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं पूर्णत: काल्‍पनिक हैं। किसी के व्‍यक्‍तिगत जीवन या उससे जुड़ी बातों से इनका कोई लेना-देना नहीं। किसी के लिए यथार्थ और काल्‍पनिकता के बीच बेहद महीने फर्क हो सकता हैलेकिन इसके लिए लेखक की कल्‍पनाशीलता और रचनात्‍मकता कतई जिम्‍मेदार नहीं है।   

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