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शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

खानाबदोश की डायरी

सूखते दरख्तों के बीच अनसुनी आवाजों का आर्तनाद

बुंदेलखंड के मध्‍यप्रदेश वाले हिस्‍से को तीन तरह से पकड़ सकते हैं। सतना होते हुए आप वहां पहुंचें या फिर सागर की तरफ से। इससे पहले मैं दोनों हिस्‍सों से बुंदेलों की जमीन पर दाखिल हो चुका था। झांसी की तरफ से जाने का यह पहला मौका था। झांसी स्‍टेशन से बाहर निकलते ही आपको इस पूरे अंचल की गरीबी नजर आने लगेगी। मुझे ओरछा जाना था, क्‍योंकि वही पहला पड़ाव था। शेयरिंग टेम्‍पो में, जिसे कई जगहों पर स्‍थानीय भाषा में आपे भी कहा जाता है, बैठने का मजा ही अलग है। खासतौर पर तब, जबकि सड़क पर सरकारी एहसान के थीगड़े जड़े हों। अगर आपकी रीढ़ मजबूत नहीं है तो ओरछा तक 15 किलोमीटर के सफर में ही आप बेहाल हो सकते हैं। रानी लक्ष्‍मीबाई के शहर झांसी में बहुतेरे विदेशी सैलानी उतरते हैं। सत्रहवीं सदी में बना राजा वीर सिंह का किला और उसमें रखी कड़क बिजली तोप, रानी का महल (जो अब म्‍यूजियम बन चुका है), बरुआ सागर लेक जैसी कुछ जगहों के सैर सपाटे में दो दिन से ज्‍यादा नहीं लगते। इसके बाद विदेशी सैलानी मध्‍यप्रदेश के ओरछा का ही रुख करते हैं। हर कोई इन्‍हें जल्‍द से जल्‍द घेर लेना चाहता है।

स्‍टेशन से बाहर आते ही ओरछा-ओरछा चिल्‍लाते आपे मिलेंगे। ड्राइवर दुबले-पतले होने चाहिए, ताकि अगल-बगल दो-दो सवारियां आराम सं टंग सकें। कुल 10 सवारियों के बिना आपे हिलेगा भी नहीं। पीछे सामान रखने की जगह पर भी तीन लोग आधे किराए पर टंग सकते हैं और नजर चूकते ही आपका सामान गायब भी कर सकते हैं। खैर, झांसी शहर से निकलकर हाइवे पर आते ही हमारा आपे तूफानी रफ्तार से दौड़ने लगा। घुप्‍प अंधेरे में तीन पहियों की यह रफ्तार खौफ पैदा करती है। लेकिन बुंदेलों के सीने में डर नाम की कोई चीज नहीं। बमुश्‍किल आधे घंटे में तीन स्‍टापेज पार कर हम अपनी मंजिल, यानी ओरछा में थे। होटल तक छोड़ने के बदले डबल किराया देने का लालच ड्राइवर को भा गया और उसने बेधड़क आपे को बड़ी सफाई से संकरी गली में डाल दिया।

ओरछा के राम राजा मंदिर से लगे होटल श्री पैलेस में हमारी बुकिंग थी। अपने देश में होटलों के नाम कुछ इस तरह के होते हैं, जैसे ‘किसी दृष्‍टिहीन का नाम नैनसुख हो’। छोटे से टीले के सामने का होटल हिल्‍स व्‍यू होगा तो बदबू मारते पोखर के सामने वाला लेक व्‍यू कहलाएगा। श्री पैलेस मिश्रा जी का है। ओरछा में तकरीबन सभी होटल-ढाबे और रेस्‍त्रां पंडितों के हैं। छोटे मिश्रा लॉज, बड़े मिश्रा की दुकान वगैरह। बुंदेलखंड के सागर वाले हिस्‍से में होटल-ढाबे जैन समुदाय के हैं, जबकि पन्‍ना-छतरपुर में यादव व शिवहरे समुदाय होटल चलाता है। होटल पहुंचते ही सामना मिश्रा जी से हुआ। मिश्रा जी खब्‍बू (बाएं हाथ वाले) हैं। माथे पर तिलक, होंठों पर पान की लाली समेटे मिश्रा जी ने हमारे खाने के बारे में नहीं, बल्‍कि राम राजा के भोजन का बखान उल्‍टे हाथ की अनोखी नृत्‍य मुद्राओं से करना शुरू किया। बोलते समय उनकी बाईं आंख मिचमिचाने लगती थी। बाल भोग यानी राम राजा का नाश्‍ता, राज भोग माने लंच से लेकर डिनर तक के इस बखान के पीछे का स्‍वार्थ हमें तब समझ आया, जब फ्रेश होकर हम नीचे उतरे और सीढि़यों के नीचे झांका। मिठाई (राम राजा का प्रसाद) की दुकान उन्‍हीं की थी। छूटते ही फिर आंख मारते हुए बोले, ‘कम से कम 300 रुपए का भोग तो चढ़ा दीजिए।’ घबराकर हम आगे बढ़ गए।

राम ही राजा, बाकी सब प्रजा



ओरछा के राजा राम हैं। राष्‍ट्रपति, पीएम, सीएम और कलेक्‍टर से लेकर सिपाही तक सब उनकी प्रजा हैं। किसी को भी ओरछा में सैल्‍यूट नहीं पड़ता। कहते हैं, 1984 में तत्‍कालीन पीएम इंदिरा गांधी यहां आई थीं। तब उन्‍होंने चरणामृत की जांच करवाई थी। लोगों का कहना है कि भगवान के प्रसाद पर शक करना उन्‍हें भारी पड़ गया। इस कहानी का संबंध उसी साल हुई उनकी हत्‍या से है। मध्‍यप्रदेश के एक मंत्री के बारे में भी इसी तरह की कहानी प्रचलित है। लोग मानते हैं कि जो भी राम राजा के दरबार में उनका असम्‍मान करेगा, शक करेगा उसे जान-माल का नुकसान उठाना पड़ेगा।

किवंदती के अनुसार भगवान राम जब वनवास के लिए निकले तो पिता दशरथ पुत्र वियोग में रोने लगे। उन्‍होंने राम से कहा कि तुम्‍हे देखे बिना मैं कैसे जी पाऊंगा। इस पर राम-लक्ष्‍मण की मूर्तियां प्रकट हुईं। एक बार ओरछा की रानी गणेशी बाई (बुंदेला शासक मधुकर शाह की पत्‍नी) अयोध्‍या स्‍थित सरयू नदी में स्‍नान-ध्‍यान कर रही थीं। तभी राम लला उनकी गोद में आ गए। रानी ने उनसे ओरछा चलने को कहा तो उन्‍होंने तीन शर्तें रखीं – पुक पुक चलैहें (पग पग चलूंगा), उजाड़ देहैं (रास्‍ते में सब उजाड़ दूंगा), जित बैठें उतै उठे नहीं (जहां विराजूंगा, वहां से हिलूंगा नहीं)। रानी ने तीनों शर्तें मान लीं। इस तरह राम लला अयोध्‍या से ओरछा तक के रास्‍ते में सब-कुछ उजाड़ते हुए यहां आकर बस गए। इसके बाद रानी ने अपना सारा राजपाठ राम को समर्पित कर दिया। तभी से राम ओरछा के एकक्षत्र राजा हैं। राम राजा के दरबार में सुबह बाल भोग का प्रसाद बंटता है। इससे कई गरीबों का भला हो जाता है।

सोते हैं अयोध्‍या में 




रात 9 बजे मंदिर में राम राजा की आरती होती है। 9.30 बजे कपाट खुलते ही जयजयकार के साथ एक पुलिस वाला उन्‍हें सशस्‍त्र सलामी देता है और फिर पुजारी आरती लेकर रवाना होते हैं प्राचीन हनुमान मंदिर की तरफ। मान्‍यता है कि हनुमान खुद राम लला को आरती समेत रोज रात को अयोध्‍या लेकर जाते हैं। किस्‍मत से राम लला को सी-ऑफ करने हम भी मौजूद थे। उन्‍हें हनुमान जी के कांधे पर बिठाकर हम भोजन के लिए निकले। फिक्र थी कि तेजी से सोते शहर में कहीं ठीक-ठाक भोजन मिल जाए। पूछताछ में एक ठीहे का पता चला। भीतर दीवान सजा था। कच्‍चे मकान को बेतरतीब तरीके से तराशकर एस्‍थेटिक लुक देने की कोशिश की गई थी। दीवार पर लिखा था, फ्री वाई-फाई। बगल में इंटरनेट पर होटल के मालिक यादव साब के सुपुत्र ? लैपटॉप पर फेसबुक खोलकर लप्‍पे खा रहे थे। गाढ़ा काला रंग, पतली कमर और कान में हेडफोन ठूंसे उस विचित्र प्राणी को देखकर हमने यादव जी और उनकी पत्‍नी को निहारा तो फिर कोई शक नहीं रहा।

हमारे हर ऑर्डर पर कालूराम ओके सर कहता और जूते पहनकर किचन में घुस जाता। मेन्‍यू कार्ड में कई अजीबोगरीब डिशेज थीं। सब कालूराम का कमाल था। हमें यकीन हो गया कि जल्‍दी ही वह बड़ा नाम करेगा। कांगो, बुरुंडी जैसे किसी अफ्रीकी देश में उसके लिए अपार संभावनाएं थीं। हमने पूछा फेसबुक पर क्‍या करते हो तो मुस्‍कुराकर लाल-पीले दांतों को हिलाकर बोला- चैटिंग। बहरहाल, खाना अच्‍छा था। वापसी का रास्‍ता मंदिर के बगल से होकर जाता था। वहां देखा कि कुछ लोग ठंड में फटा कंबल ओढ़कर खुले में ही सो रहे हैं। कोई रैन बसेरा नहीं। राम राजा की प्रजा बेहाल है, यह जानकर दुख हुआ। मिश्रा जी का होटल श्री पैलेस नया बना है, सो आइना नहीं लगा। पानी अगर ऊपर की टंकी में नहीं चढ़ा तो नहाने का संकट खड़ा होगा। खैर, जीवन नाम के व्‍यक्‍ति ने हमारी बहुत मदद की। बाल्‍टियों में गर्म-ठंडा पानी ढोया। सुबह की अदरक वाली गर्म चाय उसी ने पिलाई। सुबह मिश्रा जी से तमाम अव्‍यवस्‍थाओं के बारे में पूछा तो पुराने विलेन रंजीत की तरह आंख मींचकर बाएं हाथ की नृत्‍य मुद्रा में बोले, ‘जो आज हुआ है, कल नहीं होगा।’ 


इस सुनहरे कल के इंतजार में हम चल दिए ओरछा के पुराने मंदिर और जहांगीर महल की ओर। बुंदेला राजपूत रुद्र प्रताप की रियासत रहे ओरछा की जड़ें 16वीं सदी के बुंदेला शासन में समाई हैं। बेतवा के किनारे बसे इस शहर का सबसे प्रमुख आकर्षण है जहांगीर महल। जहांगीर ने 1598 में वीर सिंह बुंदेला को हराया था। तभी से इसका नाम जहांगीर महल पड़ गया। महल में जंगी हाथियों के आने लायक दरवाजे हैं। प्राचीर पर खड़ी तोपें मुगलिया शासनकाल के फौजी इंतजामों की झलक दिखाती हैं। महल से पूरा शहर नजर आता है। 


जहांगीर से मात खाकर रुद्र प्रताप बुंदेला मुगलों के दोस्‍त बने और 5000 सिपाही भी उन्‍हें भेंट में दिए। हालांकि, किले की दीवारों पर बने असंख्‍य प्रेम त्रिकोणों में विरासत गुम होती जा रही है। जहांगीर महल में हनुमान और गणेश जी के गेरुए प्रतिमाएं देखकर हमें हैरत हुई। फिर समझ आया कि मुगलों के निकलने के बाद स्‍थानीय हिंदू आबादी ने इस पर अपना ठप्‍पा लगाने की पुरजोर कोशिश की है। किले के प्रवेश द्वार पर शीश महल नाम का होटल बना है, जहां ठहरने की जहमत विदेशी या प्रायोजित अतिथि ही उठा सकते हैं। आधे घंटे की फोटोग्राफी हम राम लला के मूल निवास, यानी रानी के महल की ओर चल पड़े। 


 
इस महल में यूं तो खास कुछ नहीं, पर राम लला की प्रतिमाएं विराजमान हैं। पुजारी जब तक फोटो खींचने के लिए मना करते, मैंने कैमरे के जूम का बखूबी इस्‍तेमाल करते हुए एक क्‍लोज अप ले ही लिया। यह पुराना मंदिर है। नया मंदिर बाद में बना, जिसमें मोबाइल, कैमरा और यहां तक कि बेल्‍ट पहनकर जाना भी मना है। अलबत्‍ता पुलिस वालों को बेल्‍ट पहनने की छूट है (वर्दी का सवाल है भाई)। हमने बाहर संतरी से वजह पूछी तो बताया कि हमारे बेल्‍ट का चमड़ा अशुद्ध है। खाकी वालों की बेल्‍ट प्‍लास्‍टिक की होती है, सो वे पहन सकते हैं। मंदिर के ठीक सामने रनिवास है। कहते हैं, वहां झरोखे से रानी रोज राम लला के दर्शन करती थीं। खैर, राय प्रवीण महल और चतुर्भुज मंदिर ओरछा की अन्‍य ऐतिहासिक विरासतों में से एक हैं। मंदिर के पास ही न्‍यूयॉर्क के ध्‍वस्‍त वर्ल्‍ड ट्रेड सेंटर की इमारतों के समान दो स्‍तंभ नजर आते हैं। ये सावन-भादो हैं। दोनों भाई थे। इनके इतिहास के बारे में यही इकलौता विवरण उपलब्‍ध है। आसपास मंडराती गाएं, दूर तक फैला कचरा और आसपास निवृत्‍त होते लोग। देश के अधिकांश पर्यटन स्‍थलों की तरह राम राजा के राज में भी भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग भी बेबस है।

 .... शेष अगली बार।