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बुधवार, 14 नवंबर 2012

नेहरू : आज तुम खूब याद आए

जब बच्‍चे थे तो 14 नवंबर, यानी बाल दिवस पर स्‍कूल में खास आयोजन होते थे, लड्डू, समोसे मिलते थे। लगता था मानों जवाहर लाल नेहरू (सारे बच्‍चों के चाचा) हम बच्‍चों के लिए खूब सारी टॉफियां, चॉकलेट, मिठाइयां छोड़ गए थे। ये तो आज भी बंट रही हैं (इस बार नहीं बटी, क्‍योंकि दिवाली की छुट्टी आ गई।) आज सुबह एक मित्र ने फोन पर जब हैप्‍पी चिल्‍ड्रंस डे कहते हुए गुजरे जमाने की याद दिलाई तो नेहरू को याद कर मन अचानक कड़वा हो गया। इसलिए, क्‍योंकि एक उम्र गुजर चुकी है, सच्‍चाइयों को जानते-समझते। 123 साल हो गए नेहरू को गुजरे। इस बीच सरकार ने नेहरू की विरासत और कांग्रेस को जिंदा रखने के लिए क्‍या-क्‍या नहीं किया। कोर्स की किताबों में, फिल्‍मों में, टीवी सीरियलोंमें, कार्टून-कॉमिक्‍स में.... हर कहीं नेहरू दिख ही जाते हैं। वही नेहरू, जिसने देश में औद्योगिकीकरण के नाम पर विस्‍थापन और पलायन जैसी गरीबी बढ़ाने वाली बीमारियां दीं। नेहरू की विरासत है कांग्रेस, जिसकी डूबती नैया को गांधी परिवार टिकाए हुए है। गांधी परिवार का सहारा छूटते ही कांग्रेस का नामोनिशान मिट जाएगा। उधर, गांधी परिवार को भी इंदिरा और नेहरू की विरासत का ही सहारा है। यानी दोनों एक-दूसरे के पर्याय हैं।

इस अंतहीन कथा को छोड़ें और यह सोचें कि नेहरू असल में कौन थे, कहां से आए ? उनके वंशजों के नाम क्‍या थे? क्‍यों नेहरू इस समय देश की सबसे विवादास्‍पद शख्‍सियतों में शामिल हैं ? बाल दिवस के दिन उन्‍हें कोसने वालों की संख्‍या इतनी ज्‍यादा क्‍यों है ? वे औद्योगिक उपनिवेशवाद और वंशवाद के जनक के रूप में या फिर अपनी गंभीर राजनीतिक भूलों के लिए नफरत का कारण बने हुए हैं ?

यह सब जानने के लिए आपको दो अलग किताबें पढ़नी होंगी। एक है इनसायक्‍लोपीडिया ऑफ इंडियन वॉर ऑफ इंडीपेंडेंस (ISBN:81-261-3745-9) - लेखक एमके सिंह और दूसरी है नेहरू के निज सचिव एमओ मथाई की किताब (ISBN-13: 9780706906219) रेमिनिसेंसेज ऑफ नेहरू एज है। एक और किताब द ग्रेट डिवाइड – मुस्‍लिम सेपरेटिज्‍म एंड पार्टीशन (ISBN-13:9788121205917) भी पढ़नी होगी, जिसके लेखक एससी भट्ट हैं। इन तीनों किताबों में नेहरू और गांधी परिवार के बारे में ऐसी जानकारियां हैं, जिन्‍हें कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने इसलिए दबा रखा है क्‍योंकि इनके आधिकारिक रूप से बाहर आने पर कांग्रेस की लुटिया पूरी तरह से डूब जाएगी। खैर, मैं इन तीनों किताबों के अंश आपके साथ बांट रहा हूं, सिर्फ अपडेट करने के लिए गांधी-नेहरू परिवार भारत की संस्‍कृति, परंपराओं, सिद्धांतों और आम लोगों की तकलीफों के प्रति कितना वफादार रहा है।

सबसे पहले इस सवाल पर नेहरू परिवार के पैतृक निवास इलाहाबाद के आनंद भवन में जवाहरलाल नेहरू का स्‍मारक क्‍यों नहीं बनाया गया ? जवाब – क्‍योंकि यह पूरा इलाका कभी वैश्‍यालय था। नेहरू के पिता मोतीलाल ने आनंद भवन का एक हिस्‍सा लाली जान नाम की एक वेश्‍या को बेच दिया था। आज उसी जगह पर इलाहाबाद का इमामबाड़ा खड़ा है। मोतीलाल के पिता यानी नेहरू के दादा का नाम गयासुद्दीन गाजी था। एमके सिंह की किताब के अनुसार 1857 की क्रांति से पहले वह दिल्‍ली के शहर कोतवाल थे। क्रांति के दौरान जब अंग्रेज देश में मुगलों के सिपहसालारों का कत्‍लेआम कर रहे थे, तब गयासुद्दीन इलाहाबाद में था। हजारों मुसलमानों की भीड़ के साथ वह भी आगरा से चला। रास्‍ते में अंग्रेज सिपाहियों ने मेरठ के पास उसे रोका और पहचान बताने को कहा। गयासुद्दीन ने अपना नाम गंगाधर बताया। वह अपने परिवार के साथ हिंदू के रूप में वेश बदलकर इसी नाम के साथ रहने लगा। उसका घर चूंकि एक नहर के किनारे था, सो लोग उसे नेहरू कहने लगे। भारत सरकार इस सच्‍चाई को नकारती रही है। लेकिन नेहरू की दूसरी बहन कृष्‍णा हथिसिंह ने अपनी आत्‍मकथा में खुद स्‍वीकारा है कि उसके दादा दिल्‍ली के शहर कोतवाल थे। यहां तक कि नेहरू ने भी अपनी अपनी आत्‍मकथा में लिखा है कि उसने अपने दादा की तस्‍वीर मुगल सैनिक की वेशभूषा में देखी थी।

एडविना और पद्मजा नायडू के साथ नेहरू के अंतरंग संबंधों को एक तरफ रख दें तो नेहरू के करीबी रिश्‍ते बनारस की एक साध्‍वी श्रद्धा माता से भी बताए जाते हैं। दोनों से एक बेटा है, जिसे नेहरू ने अपने राजनीतिक करियर को कायम रखने के लिए बेंगलुरू के मिशनरी बोर्डिंग स्‍कूल में डलवा दिया। उसका जन्‍म 30 मई 1949 को माना जाता है। एससी भट्ट लिखते हैं कि नेहरू की बहन विजयलक्ष्‍मी मोतीलाल नेहरू की मुलाजिम सैयद हुसैन के साथ भाग गई थी।

क्‍या अमेठी गांधी परिवार की बपौती है ?

नहीं। इटावा के राजा की मौत के बाद राज्‍य के अंग्रेजों के हाथों में जाने का खतरा मंडराने लगा, क्‍योंकि राजा की कोई संतान नहीं थी। तब इलाहाबाद के एक नामी वकील मुबारक अली ने मोतीलाल से मिलकर रानी से मुकदमा लड़ने की अनुमति मांगी। रानी ने दोनों को पांच लाख रुपए दिए। लोवर कोर्ट से लेकर ऊंची अदालत तक में मुकदमा हारने और इतनी ही रकम लेने के बाद दोनों ने रानी से लंदन की प्रिवी काऊंसिल में केस लड़ने की इजाजत मांगी। मोटी रकम ऐंठने के बाद दोनों ने रानी से कहा कि वह एक बच्‍चा गोद ले और बताए कि वह उसी का बेटा है। रानी ने संकट सुलझने के एवज में खुश होकर मोतीलाल को अमेठी की जागीर सौंपी, जिसे गांधी परिवार अपनी बपौती बताता है।

इंदिरा की कहानी :

इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी ऑक्‍सफोर्ड में दाखिल कराया गया था, लेकिन अफेयर्स के चक्‍कर में पढ़ाई पर ध्‍यान न देने के कारण वहां से निकाल दिया गया। फिर वह शांतिनिकेतन पहुंची, जहां उसका चक्‍कर एक जर्मन शिक्षक से हुआ। फिर अपने पिता के निजी सचिव एमओ मथाई से और फिर अपने योग गुरू धीरेंद्र ब्रह्मचारी से। शादी से पहले इंदिरा के प्रेम की आखिरी कड़ी पूर्व विदेश मंत्री दिनेश सिंह थे। पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपनी किताब प्रोफाइल्‍स एंड लेटर्स (ISBN: 8129102358) में 1968 को इंदिरा की अफगानिस्‍तान यात्रा का जिक्र करते हुए कहा है कि तब बाबर की मजार के पास खड़े होकर इंदिरा ने कहा था, ‘आज हम अपने इतिहास को फिर याद कर रहे हैं।’ नटवर उस समय इंदिरा के साथ ही थे। केएन राव तो यह भी लिखते हैं कि इंदिरा के दूसरे बेटे संजय के पिता मोहम्‍मद युनूस थे, क्‍योंकि फिरोज और इंदिरा का तलाक कई महीने पहले ही हो चुका था। बाद में संजय का मेनका गांधी (एकमात्र टॉवेल में बांबे डाइंग का विज्ञापन करने वाली सिख बाला) से शादी भी युनूस के घर पर ही मुस्‍लिम रीति-रिवाजों के साथ हुई। युनूस की किताब पर्सन्‍स पैशंस एंड पॉलिटिक्‍स (ISBN-10: 0706910176) में साफ लिखा है कि संजय गांधी का बचपन में ही खतना हो गया था। संजय ने जिस फिरोज गांधी से प्रेम विवाह किया, वह भी पारसी नहीं, बल्‍कि मुसलमान ही था। उसका नाम फिरोज खान था। फिरोज गांधी के पिता का नाम नवाब खान था। मुंबई से गुजरात पहुंचा फिरोज का परिवार आनंद भवन में शराब की आपूर्ति करता था। इंदिरा और फिरोज के बीच गहरी नजदीकियां कायम हो गईं और इस अंतरंग संबंध के बारे में महाराष्‍ट्र के तत्‍कालीन गवर्नर डॉ. श्रीप्रकाश ने नेहरू को खबरदार भी किया था। बाद में लंदन की एक मस्‍जिद में इंदिरा और फिरोज ने शादी कर ली और इंदिरा ने अपना नाम बदलकर मैमूना बेगम रख लिया था। भारत लौटकर फिरोज ने एक हलफनामा दायर कर खुद को पारसी घोषित कर दिया और अपना नाम फिरोज गांधी रख दिया।