सोमवार, 6 नवंबर 2017

चोर दरवाजे से हो रहे करप्शन का खुलासा है ‘पैराडाइज पेपर्स’

मैं मोदी राज और बीजेपी का कतई विरोधी नहीं हूं और न ही मैं सिर्फ वोट बटोरने के लिए किसी एक जाति, धर्म या संप्रदाय को समर्थन देने की किसी दल की नीति का समर्थन करता हूं। लेकिन एक आम आदमी होने के नाते मेरे मन में कुछ सवाल हैं। ये सवाल इसलिए भी उठना चाहिए, क्योंकि मैं इमानदारी से अपना टैक्स चुकाता हूं, केंद्र और राज्य सरकार की सारी देनदारियों को समय से अदा करता हूं। मैंने किसी का लोन नहीं दबाया, जिससे किसी बैंक का माली हालत खस्ताहाल हो जाए या फिर मैंने अपने पद और नैतिक दायित्वों को दरकिनार करते हुए कोई ऐसा काम नहीं किया है, जो देश को लंबे समय के लिए नुकसानदेह हो। 

देश में ‘एंटी ब्लैक मनी डे’ का जश्न मनाए जाने में अभी कुछ घंटे और बाकी हैं, लेकिन इसी बीच ‘इंडिया फाउंडेशन’ और ‘पैराडाइज पेपर्स’ के नाम से दो बड़े खुलासे हुए हैं। दोनों से यह साफ होता है कि किस तरह भारत कानून और नीतियां बनाने वाले उन कुछ विदेशी कंपनियों के इशारों पर काम कर रहे हैं, जिनके बिजनेस और निजी हित न सिर्फ देश को दीमक की तरह खोखला कर देंगे, बल्कि संविधान में लिखी लोकतंत्र की मूल भावना को भी छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। इससे पहले पनामा पेपर्स नाम का एक लीक हुआ था, जिसमें कुछ भारतीय कंपनियों और फर्मों के काले कारनामों की खबर आई थी। मोदी सरकार की नोटबंद को एक साल गुजरने के बाद रिजर्व बैंक ने 35000 शेल यानी मुखौटा कंपनियों को उजागर किया है, लेकिन यह बताने में नाकाम है कि इन मुखौटों के पीछे असली चेहरा किसका है।

सुप्रीम कोर्ट ने कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आधार की अनिवार्यता को अभी तक नहीं माना है। मामला कोर्ट में विचाराधीन है, फिर भी सरकार हर लेन-देन में आधार को अनिवार्य बनाने की जिद पर अड़ी हुई है। बैंकों के एटीएम कम किए जा रहे हैं और डिजिटाइजेशन पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन मेरे, आपके बैंक खातों से जुड़ी जानकारियों को लीक से बचाने पर कोई बात नहीं की जा रही है। क्या ‘सब सुरक्षित है’, ‘सब ठीक है’ कहने से काम चल जाएगा, जबकि सोमवार को सामने आए ‘पैराडाइज पेपर्स’ में सामने आए 714 नामों में कई ऐसे बड़े नाम हैं, जो पहले ही सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय की जांच में दायरे में हैं। लेकिन असल चिंता केंद्र सरकार में राज्य मंत्री जयंत सिन्हा जैसे नामों को लेकर है, जो न सिर्फ ऑनलाइन फर्म ई-बे की मुख्य प्रमोटर कंपनी ओमिड्यार से जुड़े रहे हैं, बल्कि उन्होंने नरेंद्र मोदी को देश का पीएम बनाने के लिए फंडिंग भी करवाई।

इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि इसी ओमिड्यार कंपनी ने मोदी के सरकार में आने के बाद जनाग्रह नाम के एक एनजीओ को यूएसएड नाम की संस्था की फंडिंग भी करवाई, जिसने बाद में गुपचुप तरीके से बेंगलुरू शहर में पानी के निजीकरण के गोपनीय एजेंडे के साथ एक अभियान चलाया। इसी ओमिड्यार फाउंडेशन ने उक्रेन में ‘गुड गवर्नेंस’ के नाम से कुछ एनजीओ को फंडिंग दिलवाकर वहां की सत्ता ही पलट दी। ठीक इसी तरह मोदी के सत्ता में आने के बाद जयंत सिन्हा जब एक न्यूज चैनल को बताते हैं कि ‘भारत को अपनी अर्थव्यवस्था में सिरे से बदलाव कर गरीबों को दी जा रही सब्सिडी को खत्म करने, श्रम कानूनों को बदलने और भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव की जरूरत है’ और अगले दो सालों में सरकार उसी एजेंडे से काम करती है। सोमवार के ‘पैराडाइज पेपर्स’ में सिन्हा का नाम आने के बाद तो क्या यह मान लिया जाए कि मोदी सरकार बाहरी, विदेशी फर्मों के एजेंडा पर काम कर रही है ? यह भी कि भारत की राजनीति और नीतिगत व्यवस्था उन बाहरी कंपनियों के निजी हितों को पूरा करने में जुटी हुई है, जिनमें न केवल कांग्रेस और बीजेपी के आला नेताओं के सगे-संबंधियों से लेकर बिग बी जैसे फिल्मी सितारों ने पैसे लगाए हुए हैं ? इसी बरक्स यह शक भी क्यों नहीं किया जाए कि मोदी सरकार के ‘स्टार्टअप इंडिया’ और ‘मेक इन इंडिया’ की नाकामी के बावजूद ई-कॉमर्स इंडस्ट्री को व्यापक पैमाने पर दिया गया सरकारी प्रोत्साहन देश के कुछेक अरबपतियों के लिए ‘अच्छे दिन’ लाने के लिए नहीं है? अगर ओमिड्यार जैसी कंपनी यह सरकार से यह चाहती है कि ई-कॉमर्स के जरिए वह भारत की 60 करोड़ भूखी ग्रामीण आबादी को सोलर पावर से चलने वाला मोबाइल फोन थमाकर खुश कर दे तो इससे देश का विकास कैसे होगा ?



सिर्फ ओमिड्यार ही क्यों ? क्या यह महज एक इत्तेफाक था कि सितंबर 2012 में गोधरा दंगों में गुजरात के नेताओं और नौकरशाहों के नाम आने के बाद गूगल ने हैंगआउट फीचर में मोदी को सबसे पहले जोड़ा और बाद में वे गूगल के एक इवेंट में भी शामिल हुए ? ठीक एक साल बाद मोदी गूगल के एक सम्मेलन में स्टार स्पीकर होते हैं और सत्ता में आने के बाद तकरीबन हर मुद्दे पर चुप्पी साध लेते हैं। क्या ह भी इतेफाक ही था कि चुनाव आयोग ने जब 2014 के आम चुनाव में गूगल को सहयोगी बनाने से मना कर दिया तो गूगल को जबर्दस्ती यह कहना पड़ा कि उसने अपने सर्च इंजन में कोई हेरफेर नहीं किया था, ताकि मोदी को चुनावी लाभ मिल सके? इतिहास के आइने में झांकें तो हिटलर भी तकनीक के पीछे पागल था। उसने जुनून में आकर कई तरह के रॉकेट और विमान बनाए और तब आईबीएम ने अपनी पंच कार्ड तकनीक से हिटलर का काम और आसान बना दिया। इस बात की क्या गारंटी है कि तकनीक खासकर गूगल और ओमिड्यार जैसी विदेशी कंपनियों के हितों को पूरा करने वाली तकनीक से इस कदर मोह देश को जंग और भुखमरी के कगार पर नहीं धकेल देगा ? इजिप्ट की अरब क्रांति का उदाहरण सामने है। आज वहां सैन्य तानाशाही है। 

सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने आम बजट में शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण से जुड़ी गरीबोन्मुखी योजनाओं पर जिस तरह से आवंटन में कटौती की, गरीबों की बेहतरी के लिए एनजीओ को मिलने वाली फंडिंग पर गाज गिराकर उन्हें बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों के चंगुल में फंसने को मजबूर किया, उससे पैसा वंचितों के विकास पर खर्च होने के बजाय जिंदल, हिंदुजा, अपोलो टायर्सटायर्स, वीडियोकॉन और हीरानंदानी ग्रुप जैसी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों के व्यापारिक हितों को पूरा करने में खर्च किया जा रहा है, जिनका नाम ‘पैराडाइज पेपर्स’ में प्रमुखता से सामने आया है।

इस पूरे भयावह परिदृश्य को समझने के बाद यही लगता है कि ‘अच्छे दिन’ का मुखौटा पहनकर सरकार देश की अवाम को झूठे सपने दिखाकर और ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ जैसे खोखले जुमलों के सहारे भ्रष्टाचार को एक नए आयाम के रूप में बढ़ावा ही दे रही है। सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि देश के कई बड़े देशों में कंपनियां और तकनीक अवाम, संसाधनों, बाजार और यहां तक कि लोगों की आदतों को भी बदलने का कोशिश में है। दरअसल यह दुनिया की राजनीतिक व्यवस्था का कॉर्पोरेटीकरण है। इससे समझ आता है प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों के लिए इस कदर गहरा प्रेम। इससे यह भी समझ आता है कि हमारे बैंकों क्यों दिवालिया होते चले गए और अब सरकार बजाय बकायादारों से लोन वसूलने के, बैंकों को राहत क्यों बांट रही है।

देश की अवाम को वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति के ताने-बाने को समझने में वक्त लगेगा, लेकिन लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया में जिस तरह से उन कॉर्पोरेट कंपनियों की घुसपैठ हुई है, जो चोर दरवाजे से अपने निजी हितों के लिए नीतियों और सरकार के लोकतांत्रिक दायित्वों को प्रभावित कर रहे हैं, उसने जिस तरह से अपने होंठ सिल रखे हैं, यह सबसे बड़ी चिंता की बात है। परदे के पीछे का घटनाक्रम दिखाना मीडिया का नैतिक कर्त्तव्य है। कुछ निडर पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय समूह ने जिस तरह ‘पैराडाइज पेपर्स’ का खुलासा किया है, वह अच्छे दिनों की नहीं, बुरे दिनों का संकेतक है।



-